Hari Mohan Jha Ki Shreshtha Kathayen

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हरिमोहन झा की श्रेष्ठ कथाएँ संग्रह में हरिमोहन झा की तीस श्रेष्ठ कथाओं को चुनकर रखा गया है। उन्हें मैथिली का हास्य-व्यंग्य सम्राट कहा जाता है। हरिमोहन झा की कथा में हास्य-व्यंग्य ही नहीं, मार्मिक कारुण्य तथा विचार-वैदग्ध्य भी है जो रंगशाला तथा चर्चरीकी कई कथाओं में देखा जा सकता है। इसलिए हास्य-व्यंग्य सम्राट के साथ-साथ इनको गल्प-सम्राट भी कहा गया है। यहाँ इनकी सभी वर्ग की कथाओं को ऐसे क्रमबद्ध किया गया है जिससे इनके विषय में किसी भी पूर्व-धारणा को अलग रखकर पाठक इनके कथाकार के बारे में स्वयं स्वतंत्र और समग्र छवि बनाने में सफल हो सकें।

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ISBN
9789387989887
Pages
312
Avg Reading Time
10 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

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About the Book

हरिमोहन झा की श्रेष्ठ कथाएँ संग्रह में हरिमोहन झा की तीस श्रेष्ठ कथाओं को चुनकर रखा गया है। उन्हें मैथिली का हास्य-व्यंग्य सम्राट कहा जाता है। हरिमोहन झा की कथा में हास्य-व्यंग्य ही नहीं, मार्मिक कारुण्य तथा विचार-वैदग्ध्य भी है जो रंगशाला तथा चर्चरीकी कई कथाओं में देखा जा सकता है। इसलिए हास्य-व्यंग्य सम्राट के साथ-साथ इनको गल्प-सम्राट भी कहा गया है। यहाँ इनकी सभी वर्ग की कथाओं को ऐसे क्रमबद्ध किया गया है जिससे इनके विषय में किसी भी पूर्व-धारणा को अलग रखकर पाठक इनके कथाकार के बारे में स्वयं स्वतंत्र और समग्र छवि बनाने में सफल हो सकें।

Book Details

  • ISBN
    9789387989887
  • Pages
    312
  • Avg Reading Time
    10 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Hari Mohan Jha Ki Shreshtha Kathayen gathers thirty stories that defy the label "satirist" often assigned to Harimohan Jha. Known as the hasya-vyangya samrat of Maithili literature, Jha's craft extends far beyond laughter—his narratives from collections like Rangshala and Charchri carry pathos, philosophical depth, and incisive social observation. This selection arranges his work to reveal the full arc of his storytelling: domestic absurdities that unmask power, village sketches that expose caste and gender hierarchies, and moments of quiet tragedy that linger long after the punchline fades. Each story is a window into mid-20th-century Mithila, rendered with the precision of a documentarian and the timing of a playwright. Readers encounter a voice that refuses to console, choosing instead to illuminate the contradictions of tradition, modernity, and human folly with unflinching wit.

हरिमोहन झा की श्रेष्ठ कथाएँ पढ़ते समय पाठक को कैसा अनुभव होता है?

यह संग्रह पाठक को हँसी और विचार के बीच झूलने पर मजबूर करता है। हरिमोहन झा की कहानियाँ सतही हास्य से आगे बढ़कर सामाजिक विडंबनाओं को उजागर करती हैं—एक पल में आप किसी पात्र की मूर्खता पर मुस्कुराते हैं, अगले ही क्षण उसके पीछे छिपी त्रासदी आपको झकझोर देती है। रंगशाला और चर्चरी की कथाएँ जाति, लिंग और परंपरा के अंतर्विरोधों को ऐसे प्रस्तुत करती हैं जो न तो उपदेशात्मक हैं न भावुक। यह वह पाठन अनुभव है जो बुद्धि को सक्रिय रखता है और संवेदनशीलता को कुंद नहीं होने देता।

यह पुस्तक किस तरह के पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है?

  • वे पाठक जो व्यंग्य को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक आलोचना का उपकरण मानते हैं।
  • मैथिली संस्कृति और बिहार के ग्रामीण जीवन की बारीकियों में रुचि रखने वाले।
  • जो कहानियों में पात्र-चित्रण और संवाद की तीक्ष्णता की कद्र करते हैं।
  • जिन्हें प्रेमचंद के बाद की हिंदी कथा-परंपरा में क्षेत्रीय आवाज़ों की तलाश है।
  • जो किसी लेखक को उसकी प्रचलित छवि से परे जानना चाहते हैं—यहाँ हास्यकार नहीं, गल्प-सम्राट मिलते हैं।

मैथिल समाज और संस्कृति को समझने में यह संग्रह आज के भारतीय पाठक के लिए क्यों प्रासंगिक है?

मैथिली समाज की जाति-व्यवस्था, लैंगिक मानदंड और धार्मिक आडंबर—जिन्हें हरिमोहन झा ने मध्य बीसवीं सदी में चित्रित किया—आज भी भारत के अनेक हिस्सों में जीवित हैं। इनकी कथाएँ दिखाती हैं कि परंपरा और आधुनिकता के बीच का तनाव कोई नई घटना नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा संघर्ष है। ग्रामीण भारत में शिक्षा, विवाह और सामाजिक प्रतिष्ठा की राजनीति को समझने के लिए ये कहानियाँ एक ऐतिहासिक दर्पण हैं जो आज भी प्रतिबिंब दिखाता है।

हरिमोहन झा की कथा-शैली उनके समकालीन लेखकों से किस तरह अलग है?

हरिमोहन झा हास्य को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उसे कभी ढाल नहीं बनाते—वे दुख और विसंगति से मुँह नहीं मोड़ते। उनकी कथाओं में मार्मिक कारुण्य और विचार-वैदग्ध्य हास्य के साथ इस तरह गुँथे होते हैं कि पाठक को लगता है कि एक ही पात्र में तीन आयाम एक साथ जी रहे हैं। उनका संवाद-लेखन नाटकीय है, पात्र-चित्रण यथार्थवादी, और समाज-दृष्टि निर्मम। वे न तो आदर्शवाद की शरण लेते हैं न निराशावाद की—बस, जैसा है वैसा दिखाते हैं, तीखी भाषा में।

इन तीस कहानियों को पढ़ने के बाद पाठक के मन में क्या बचता है?

पाठक के पास एक ऐसी दृष्टि बच जाती है जो सामाजिक पाखंड को पहचानना सिखाती है—चाहे वह धर्म के नाम पर हो, परंपरा के नाम पर या आधुनिकता के नाम पर। हरिमोहन झा की कहानियाँ यह विश्वास जगाती हैं कि साहित्य केवल सांत्वना देने के लिए नहीं, बल्कि असहज सवाल खड़े करने के लिए भी होता है। पाठक यह समझ लेकर उठता है कि मैथिली साहित्य—और व्यापक रूप से भारतीय क्षेत्रीय साहित्य—में वह गहराई और तीक्ष्णता है जो मुख्यधारा की हिंदी कथा में कभी-कभी अनुपस्थित रहती है।

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