Sukh Aur Dukh Ka Sath
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AmarkantPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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सामाजिक बाधाग्रस्त स्थितियों के प्रति प्रगीतात्मक दिलचस्पी अमरकान्त की कहानियों में प्रायः नहीं मिलेगी, इसके बावजूद भावनात्मक दुनिया की छोटी-बड़ी हलचलें हमें उद्वेलित करती रहती हैं। नाटकीयता घटना में भी होती है और रचनाकार के दृष्टिकोण में भी, और अमरकान्त ने घटना और दृष्टिकोण के सामंजस्य के द्वारा कुछ बेहद सार्थक परिस्थितियाँ गढ़ी हैं।</p> <p>अमरकान्त के इस कथा-संसार को एक जीवित जाति की सम्पत्ति की तरह देखकर ही इस सम्भावना को बल मिलता है कि उनके कथाकार ने भय और त्रास के साथ ही जीवन की सम्भावनाओं के लिए अपने संघर्ष को जीवित रखा है। राष्ट्रीय जीवन की पहचान में इन कहानियों के संसार की एक केन्द्रीय भूमिका है। जीवित जाति अपनी लड़ाई रचना की सरहदों के भीतर लड़कर भी तय करती है, इसका विश्वास इन कहानियों को पढ़कर दृढ़ होता है।
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सामाजिक बाधाग्रस्त स्थितियों के प्रति प्रगीतात्मक दिलचस्पी अमरकान्त की कहानियों में प्रायः नहीं मिलेगी, इसके बावजूद भावनात्मक दुनिया की छोटी-बड़ी हलचलें हमें उद्वेलित करती रहती हैं। नाटकीयता घटना में भी होती है और रचनाकार के दृष्टिकोण में भी, और अमरकान्त ने घटना और दृष्टिकोण के सामंजस्य के द्वारा कुछ बेहद सार्थक परिस्थितियाँ गढ़ी हैं।</p>
<p>अमरकान्त के इस कथा-संसार को एक जीवित जाति की सम्पत्ति की तरह देखकर ही इस सम्भावना को बल मिलता है कि उनके कथाकार ने भय और त्रास के साथ ही जीवन की सम्भावनाओं के लिए अपने संघर्ष को जीवित रखा है। राष्ट्रीय जीवन की पहचान में इन कहानियों के संसार की एक केन्द्रीय भूमिका है। जीवित जाति अपनी लड़ाई रचना की सरहदों के भीतर लड़कर भी तय करती है, इसका विश्वास इन कहानियों को पढ़कर दृढ़ होता है।
Book Details
-
ISBN9788180310019
-
Pages121
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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रेणु ने अपने आत्म-कथ्य में चित्रगुप्त महाराज द्वारा निर्मित भाग्य-लेख के अंशों में अपना परिचय देते हुए कहा है कि यह आदमी ‘एक ही साथ सुर और असुर, सुन्दर और असुन्दर, पापी और विवेकी, दुरात्मा और सन्त, आदमी और साँप, जड़ और चेतन—सब कुछ होगा।’ क्या यही परिचय अपने विविध और विस्तृत रूप में उनकी समस्त रचनाओं में नहीं लहरा रहा है? जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि को गतिशील और व्यापक फ़लक प्रदान करनेवाली रेणु की कहानियों ने हिन्दी कथा-साहित्य को एक नई दिशा दी है—सामाजिक परिवर्तन ही एकमात्र विकल्प है। यह दिशा ही रेणु की रचनाओं की मूल सोच है। बड़े चुपके से कभी उनकी कहानियाँ किसानों और खेत मज़दूरों के कान में कह देती हैं कि ज़मींदारी प्रथा अब नहीं रह सकती और ज़मीन जोतनेवाले की ही होनी चाहिए। कभी मज़दूरों को यह सन्देश देने लगती हैं कि तुम्हारी मुक्ति में ही असली सुराज का अर्थ छिपा है—भूल-भुलैया में पड़ने की जरूरत नहीं। क्या कला, क्या भाषा, क्या अन्तर्वस्तु और विचारधारा, कोई भी कसौटी क्यों न हो, रेणु की कहानियाँ एकदम खरी उतरती हैं, लोगों का रुझान बदल देती हैं और यही रचनात्मक गतिविधि रेणु के साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान को अक्षुण्ण बनाती है। ‘अच्छे आदमी’ में संग्रहीत विधित रंगों की ये कहानियाँ रेणु की इसी विशिष्ट रचना-यात्रा का अगला पड़ाव हैं।
Ek Ladki, Paanch Deevane
- Author Name:
Harishankar Parsai
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एक लड़की है जिसे उसके दीवानों ने और मुहल्ले-भर की भूखी नज़रों ने जवान और चतुर बना दिया; फिर एक चूहा है जो रोज़ रात में गृह-निवासी के सिरहाने तब तक सत्याग्रह करता रहा जब तक कि उसे नियमित खाना नहीं दिया जाने लगा; अकाल का उत्सव है जिसके लिए जमाखोर, मुनाफ़ाखोर और नौकरशाही सालभर अनुष्ठान कराते हैं कि कब अकाल पड़े, कब दिन फिरें...और फिर नाक है, एक नहीं कई-कई तरह की। कुछ कट जाती हैं, फिर बढ़ जाती हैं, कुछ ऐसी कि चाहे जो जतन करो, कटती ही नहीं; फिर एक आदमी है जिसके भीतर दो आदमी हैं; कभी एक ऊपर आ जाता है, कभी दूसरा हावी हो जाता है।
आगे सड़े हुए आलू प्रवेश करते हैं। वे सुबह से टोकरे में पड़े हैं, पर बिक नहीं पाए। उनसे पूछा गया कि अब तुम क्या करोगे तो बोले कि हम विद्रोह करेंगे। चाहे आधी रात तक टोकरे में पड़े रहें, बिकेंगे नहीं। हम भी आत्मसम्मान रखते हैं। देखने में वे कुछ बुद्धिजीवी मालूम पड़ रहे थे लेकिन एक सस्ते होटल वाला आया और उन्हें ख़रीद ले गया।
इनके अलावा भी इस किताब में कई पात्र और परिस्थितियाँ हैं जिन्हें परसाई जी की निर्मम लेखनी ने यहाँ संग्रहीत व्यंग्य-कथाओं में उनकी तमाम विडम्बनाओं और विकृतियों के साथ अंकित किया है।
Sandigdh
- Author Name:
Tejendra Sharma
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पंद्रह बेहतरीन कहानियों का संग्रह।
Mansarovar Vol. 3 : Uddhar Aur Anya Kahaniyan
- Author Name:
Premchand
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स्पष्टता के मैदान में प्रेमचन्द बड़ी-से-बड़ी बात को बड़े उलझन के अवसर पर कुछ इस तरह सुलझा कर कह जाते हैं कि मुश्किल-से-मुश्किल बात हमारे रोजमर्रा के, घरेलू जीवन की जानी-पहचानी चीज हो जाती है। उनकी बातों में कुछ ऐसा अनुभव का मर्म भरा होता है कि आदमी उसे कंठस्थ कर लेना चाहता है। उनकी बात स्पष्ट, दो टूक निर्णय होती है। और उनकी कलम सब जगह पहुँचती है, अँधेरे में भी धोखा नहीं देती। —जैनेन्द्र कुमार
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