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Ek Aur Mrityunjay

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मिथिलेश्वर की ये लम्बी कहानियाँ शोषण, अन्याय, अत्याचार, अन्धविश्वास और सर्वग्रासी भ्रष्टाचार के प्रति संवेदनशील रचनाकार मन की तीखी प्रतिक्रियाएँ हैं, जिनके माध्यम से वह इन सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध एक प्रतिकूल वातावरण तैयार करने की चेतना जाग्रत करते हैं। इस तरह उनकी कहानियाँ कथा-सूत्रों एवं चरित्रों के माध्यम से सभ्यता की समीक्षा भी हैं। मिथिलेश्वर अपनी इन लम्बी कहानियों में हमारे समय की ज्वलन्त समस्याओं को उनके अन्तर्विरोधों के साथ मारक रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिससे ये कहानियाँ अनियंत्रित, अमर्यादित, अपसंस्कृति को बेनक़ाब करती हुई वर्गीय चेतना को प्रामाणिक रूप में व्यक्त करती हैं। लोगों की बद्धमूल धारणाएँ, मानसिक पिछड़ापन, बदलते सामाजिक-आर्थिक सम्बन्ध, पारिवारिक ढाँचे में बदलाव, धर्म, संस्कृति एवं अर्थसत्ता का अन्तर्सम्बन्ध, असहिष्णुता, संवेदनहीनता और संकीर्णता में अनपेक्षित वृद्धि, सत्ता की संस्कृति एवं लोकतंत्र की पतनशीलता के परिणाम-जैसे पक्ष इन लम्बी कहानियों की संरचनाओं में समाहित है। इन कहानियों को पढ़ते हुए कुछ समाजशास्त्रीय अवधारणाएँ भी स्पष्ट होती हैं। असहाय एवं उपेक्षित लोगों के प्रति संवेदनशील दृष्टि और उनके अस्तित्व को स्थापित करने का प्रयास इन लम्बी कहानियों को सार्थक एवं सफल बनाते हैं। इन कहानियों में जीवन का राग है तथा तपती और खुरदरी ज़मीन पर नंगे पाँव चलने का एहसास है। इस रूप में ये कहानियाँ पाठकों के अन्दर आलोचनात्मक विवेक जागृत करने में सक्षम एवं सफल हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि मिथिलेश्वर की ये लम्बी कहानियाँ असाधारण महत्त्व की कहानियाँ हैं, जो न सिर्फ़ पठनीय हैं, बल्कि संग्रहणीय एवं उल्लेखनीय भी हैं।

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मिथिलेश्वर की ये लम्बी कहानियाँ शोषण, अन्याय, अत्याचार, अन्धविश्वास और सर्वग्रासी भ्रष्टाचार के प्रति संवेदनशील रचनाकार मन की तीखी प्रतिक्रियाएँ हैं, जिनके माध्यम से वह इन सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध एक प्रतिकूल वातावरण तैयार करने की चेतना जाग्रत करते हैं। इस तरह उनकी कहानियाँ कथा-सूत्रों एवं चरित्रों के माध्यम से सभ्यता की समीक्षा भी हैं।

मिथिलेश्वर अपनी इन लम्बी कहानियों में हमारे समय की ज्वलन्त समस्याओं को उनके अन्तर्विरोधों के साथ मारक रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिससे ये कहानियाँ अनियंत्रित, अमर्यादित, अपसंस्कृति को बेनक़ाब करती हुई वर्गीय चेतना को प्रामाणिक रूप में व्यक्त करती हैं। लोगों की बद्धमूल धारणाएँ, मानसिक पिछड़ापन, बदलते सामाजिक-आर्थिक सम्बन्ध, पारिवारिक ढाँचे में बदलाव, धर्म, संस्कृति एवं अर्थसत्ता का अन्तर्सम्बन्ध, असहिष्णुता, संवेदनहीनता और संकीर्णता में अनपेक्षित वृद्धि, सत्ता की संस्कृति एवं लोकतंत्र की पतनशीलता के परिणाम-जैसे पक्ष इन लम्बी कहानियों की संरचनाओं में समाहित है।

इन कहानियों को पढ़ते हुए कुछ समाजशास्त्रीय अवधारणाएँ भी स्पष्ट होती हैं। असहाय एवं उपेक्षित लोगों के प्रति संवेदनशील दृष्टि और उनके अस्तित्व को स्थापित करने का प्रयास इन लम्बी कहानियों को सार्थक एवं सफल बनाते हैं। इन कहानियों में जीवन का राग है तथा तपती और खुरदरी ज़मीन पर नंगे पाँव चलने का एहसास है। इस रूप में ये कहानियाँ पाठकों के अन्दर आलोचनात्मक विवेक जागृत करने में सक्षम एवं सफल हैं।

कहने की आवश्यकता नहीं कि मिथिलेश्वर की ये लम्बी कहानियाँ असाधारण महत्त्व की कहानियाँ हैं, जो न सिर्फ़ पठनीय हैं, बल्कि संग्रहणीय एवं उल्लेखनीय भी हैं।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2014
Weight
184 grams
ISBN-13
9788180318078
Pages
211
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
13.5 × 21 cm
Language
Hindi

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