'Badchalan' Beevion Ka Dweep
(0)
Author:
Krishna Baldev VaidPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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यह कृष्ण बलदेव वैद सरीखे अलबेले और हठी कथाकार से ही मुमकिन था कि पुरानी, बहुत पुरानी, कहानी का भी नए-नवेले, अनूठे और समसामयिक अन्दाज़ में एक बार फिर बयान सम्भव हो सके, जैसा सोमदेव रचित ‘कथासरित्सागर’ की कुछ संस्कृत कहानियों के साथ उन्होंने इस संग्रह में सफलतापूर्वक कर दिखलाया है।</p> <p>यह उद्यम इस मायने में मौलिक और रचनाधर्मी है कि पारम्परिक कथाओं का रूप विन्यास करते हुए ‘पुनर्लेखक’ न जाने कितनी जगह कथा काया में एक सजग लेखक की तरह प्रवेश करता है : न सिर्फ़ प्रवेश ही, बल्कि अपनी चुटीली, चटपटी टिप्पणियों से कहानी की रसात्मकता को समसामयिक जीवन सज्जा में ढालने की सुविचारित चेष्टा भी। यही असल में परम्परा का नवीनीकरण है : एक सच्ची और सचमुच पुनर्रचना।</p> <p>कथा की क्लासिकल, पर भाषा और शैली अभी और आज की। पात्र वही पुराने, पर उन्हें देखने, आँकने, टाँकने का अन्दाज़ ‘कृष्णबलदेवी’। घटनाएँ वही पुरानी, पर उन्हें बयान करते हुए उन्हें समकालिक जीवन-छवियों से जोड़ने का सपना नया। अगर कहानीकार का सरोकार, कहानी के सन्देश, पाठ या शिक्षा से कम और ख़ुद कहानी से ज़्यादा है, तो यह वैद जी जैसे कहानीकार के लिए निहायत स्वाभाविक बात है, जिसकी बुनियादी दिलचस्पी का सबब कहानी ही है : कहानी का निहितार्थ नहीं।</p> <p>कृष्ण बलदेव वैद हमारे समय के ऐसे इने-गिने मूल्यवान और महत्त्वपूर्ण लेखकों में अग्रगण्य हैं, कथा कहने और अपनी शर्तों पर कहने की जिनकी उमंग न थकी है, न चुकी। कथित आलोचकों के सामने झुकी तो वह ज़रा भी नहीं है। प्रयोग और नएपन के प्रति उनका स्वाभाविक उल्लास और अनुराग हिन्दी की याद रखने लायक़ घटना हैं, वह इसलिए भी कि हर दफ़ा अपने ही ढब-ढंग का कुछ अलग, कुछ नया रचना, उनकी लेखकीय फ़ितरत में कुछ उसी तरह शरीक है जैसे इधर कम से कमतर होते जा रहे ‘प्रयोगशील’ हिन्दी गल्प में ख़ुद कृष्ण बलदेव वैद।</p> <p>‘कथासरित्सागर’ की कुछ प्रसिद्ध कहानियों का यह रोचक ‘विचलन’ एक दफ़ा फिर वैद जी के नवाचारी मन-मस्तिष्क की रोमांचक उड़ान का असन्दिग्ध साक्ष्य है।
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यह कृष्ण बलदेव वैद सरीखे अलबेले और हठी कथाकार से ही मुमकिन था कि पुरानी, बहुत पुरानी, कहानी का भी नए-नवेले, अनूठे और समसामयिक अन्दाज़ में एक बार फिर बयान सम्भव हो सके, जैसा सोमदेव रचित ‘कथासरित्सागर’ की कुछ संस्कृत कहानियों के साथ उन्होंने इस संग्रह में सफलतापूर्वक कर दिखलाया है।</p>
<p>यह उद्यम इस मायने में मौलिक और रचनाधर्मी है कि पारम्परिक कथाओं का रूप विन्यास करते हुए ‘पुनर्लेखक’ न जाने कितनी जगह कथा काया में एक सजग लेखक की तरह प्रवेश करता है : न सिर्फ़ प्रवेश ही, बल्कि अपनी चुटीली, चटपटी टिप्पणियों से कहानी की रसात्मकता को समसामयिक जीवन सज्जा में ढालने की सुविचारित चेष्टा भी। यही असल में परम्परा का नवीनीकरण है : एक सच्ची और सचमुच पुनर्रचना।</p>
<p>कथा की क्लासिकल, पर भाषा और शैली अभी और आज की। पात्र वही पुराने, पर उन्हें देखने, आँकने, टाँकने का अन्दाज़ ‘कृष्णबलदेवी’। घटनाएँ वही पुरानी, पर उन्हें बयान करते हुए उन्हें समकालिक जीवन-छवियों से जोड़ने का सपना नया। अगर कहानीकार का सरोकार, कहानी के सन्देश, पाठ या शिक्षा से कम और ख़ुद कहानी से ज़्यादा है, तो यह वैद जी जैसे कहानीकार के लिए निहायत स्वाभाविक बात है, जिसकी बुनियादी दिलचस्पी का सबब कहानी ही है : कहानी का निहितार्थ नहीं।</p>
<p>कृष्ण बलदेव वैद हमारे समय के ऐसे इने-गिने मूल्यवान और महत्त्वपूर्ण लेखकों में अग्रगण्य हैं, कथा कहने और अपनी शर्तों पर कहने की जिनकी उमंग न थकी है, न चुकी। कथित आलोचकों के सामने झुकी तो वह ज़रा भी नहीं है। प्रयोग और नएपन के प्रति उनका स्वाभाविक उल्लास और अनुराग हिन्दी की याद रखने लायक़ घटना हैं, वह इसलिए भी कि हर दफ़ा अपने ही ढब-ढंग का कुछ अलग, कुछ नया रचना, उनकी लेखकीय फ़ितरत में कुछ उसी तरह शरीक है जैसे इधर कम से कमतर होते जा रहे ‘प्रयोगशील’ हिन्दी गल्प में ख़ुद कृष्ण बलदेव वैद।</p>
<p>‘कथासरित्सागर’ की कुछ प्रसिद्ध कहानियों का यह रोचक ‘विचलन’ एक दफ़ा फिर वैद जी के नवाचारी मन-मस्तिष्क की रोमांचक उड़ान का असन्दिग्ध साक्ष्य है।
Book Details
-
ISBN9788126713646
-
Pages158
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: कुसुम खेमानी अपने कथा-साहित्य के लिए मनुष्य के परिष्कार से समाज-संस्कृति का परिष्कार और समाज-संस्कृति के परिष्कार से मनुष्य के परिष्कार का विधान और वितान जिस कलात्मकता से रचती हैं, वह अद्भुत ही नहीं, विलक्षण है। विलक्षण है एक पुरुष के भीतर एक स्त्री और एक स्त्री के भीतर एक पुरुष का अपने समय की विघटन-प्रक्रिया में द्वन्द्वात्मक अन्वेषण और उसका रचा जाना। घर-परिवार से अछूता संसार कोई संसार नहीं होता, अगर होता है तो वह कुसुम खेमानी का नहीं है। उनका यह कथा-संग्रह 'अनुगूँज जि़न्दगी की’ घर-परिवार और उससे जुड़े तमाम रिश्तों का ऐसा कथा-संसार है जो अपनी ज़मीन पर अपनी जड़ों के साथ है। इसके बावजूद अपनी हज़ारों क़िस्म की विसंगतियों और विडम्बनाओं से तो घिरा ही है, ऊपर से बदलते युग में न तो पूरी तरह आधुनिक हो पा रहा, न उत्तर-आधुनिक। कुसुम खेमानी इन्हीं जटिलताओं से कथा में टकराती हैं और टकराते हुए कई बार जोखिम भी उठाती हैं। निस्सन्देह, इस संग्रह की उपस्थिति एक ऐसी उपस्थिति है जिससे हिन्दी कथा-साहित्य में जीवन, प्रेम और उसके मूल्य; संघर्ष, सम्पूर्णता और उसकी चेतना जिस संवेदन-सघनता की सृष्टि रचते हैं, वह सृष्टि अपने संश्लिष्ट यथार्थ की ज़मीन पर अपने लोक और उसकी स्मृतियों की उम्मीद के साथ दर्ज होती है।
CHASO SELECTED SHORT STORIES
- Author Name:
K.Chandrahas +1
- Rating:
- Book Type:

- Description: Chaso, short for Chaganti Somayajulu, was born in 1915 in Srikakulam and spent most of his life in Vizianagaram. He began his literary journey as a poet in English and later in Telugu. He was also an essayist and wrote one play. However, his true passion was the short story, which he considered a lyrical poem. His first short story, 'Chinnaaji,' published in 1942, was critically acclaimed, and by 1945 he was recognised as a leading figure and master of the genre. He set high standards for himself and, throughout a life dedicated to literature, published only about 50 stories. He was the first Telugu writer to incorporate Marxist ideas into short stories, though his stories are notably free of rhetoric. His narratives often portray the raw lives of the poor and the very poor, characterised by brevity, reticence, and compression. He was a founding member of the Progressive Writers Association. An atheist, Chaso willed his body for medical research, which his family honoured after his death in 1994.
Chand Ke Paar Ek Chabhi
- Author Name:
Avadhesh Preet
- Book Type:

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Description:
कोई भी विधा जितना कथ्य होती है, उससे कुछ ज़्यादा फ़ॉर्म होती है। फ़ॉर्म से ही पता चलता है कि रचनाकार ने सामाजिक के रूप में अपने समय में ख़ुद को कहाँ स्थित किया है। अवधेश प्रीत का कहानीकार अपने कथ्य को एक सन्तुलित दूरी से देखता और उसका अंकन करता है जिसके बल ही शायद उनकी कहानी भी पाठक को अपने आनन्द में डुबो लेने के बजाय एक ख़ास दूरी पर खड़ा रखकर अपने कथ्य को वस्तुगत ढंग से देखने को बाध्य करती है। इसी संग्रह में शामिल शीर्षक कहानी 'चाँद के पार एक चाभी' जाति की जड़ और विकट संरचना, उसके सम्मुख प्रेम की असहायता और असम्भवता, और साथ ही आधुनिकता के साथ जगती उम्मीदों के नए अंकुरों की कहानी है। यह कहानी आँसुओं की बाढ़ ला सकती थी, लेकिन अगर नहीं लाती और पढ़ने के बाद डूबने के बजाय चिन्ता में डाल देती तो यह उसके शिल्प के चलते है।
शिल्प का यह जादू वे भाषा के प्रयोग में ख़ास तौर पर साधते हैं। उनका क़िस्सागो दृश्य को बखानने की प्रक्रिया में चीज़ों को देखने का एक नज़रिया पाठक को देता चलता है जो गुदगुदाता भी है और कहानी के साथ-साथ पात्रों के चरित्र की रेखाओं को भी उभारना चलता है।
अवधेश प्रीत जाने-माने कथाकार हैं। लगातार पढ़े जाते रहे हैं। मनुष्यता के हामी किसी भी लेखक को समाज में जिन चीज़ों से विचलित होना चाहिए, उन सबको ईमानदारी से देखने के साक्ष्य इन कहानियों में भरे पड़े हैं।
COFFEE TIMES: 151 LAGHUKATHAYEN
- Author Name:
Poonam Anand
- Book Type:

- Description: "लेखक अपने विचारों को समाज, संस्कृति, संस्कार, प्रकृति, हास-परिहास, सुख-दुःख, देश-दुनिया आदि विषयों की विविधता से स्वयं को पहले जोड़ता है और बहुत ही सावधान होकर एक-एक शब्दों का चयन करता है। फिर उसे बड़ी सावधानी से बुनता है और चुन-चुनकर अपने लेखन से जोड़ने का कार्य करता है। जीवन के विविध रंगों से सजी ये हृदयस्पर्शी लघुकथाएँ आपको झकझोरेंगी, उद्वेलित करेंगी और आप जीवन के अनुभव-सागर से निकले मोतियों-मणियों से अपने को समृद्ध करेंगी।
Palko ki chhav tale
- Author Name:
Ravishekhar Verma
- Book Type:

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Description:
मध्यवर्गीय जीवन, उसके सपनों, आदर्शों और संवेदनाओं पर केन्द्रित इन कहानियों में लेखक ने समसामयिक जीवन के मानसिक और मूल्यगत द्वन्द्व को भी अभिव्यक्ति दी है। आधुनिक मानव–मन की चिरन्तन पीड़ा को ये कहानियाँ जितनी सहजता से शब्द देती हैं, वह उल्लेखनीय है।
संग्रह की कुछ कहानियाँ हमारे समाज की मूल्य संरचना को सीधे चुनौती देती हैं, मसलन, ‘माँ’ शीर्षक कहानी। इस कहानी में नायक उस स्त्री को माँ का सम्मान देकर प्रतिष्ठित करता है जिससे कभी उसके पिता ने अवैध शारीरिक सम्बन्ध बनाए थे। ऐसी ही कहानी ‘नई राहें’ है जिसमें एक वीतरागी साधु प्रेम में पड़कर वापस दुनिया में आ जाता है। अन्य कहानियाँ भी हमारे मन को झंकृत कर सोच का एक नया धरातल अन्वेषित करती हैं।
किसी भी वैचारिक झंडाबरदारी से मुक्त इन कहानियों की सहजता, सरलता और प्रवाहमयता इनको विशेष तौर पर पठनीय बनाती है। कहानियों की भाषा पात्रों और उनके परिवेश के पूरी तरह अनुकूल है और अनायास ही पाठकों को अपने साथ बहा ले जाती है।
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