Ghoonghat Ke Pat Khol
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‘घूँघट के पट खोल’ व्यंग्य-रचनाओं का संकलन है जो जीवन तथा समाज के अलग-अलग पहलुओं को विषय बनाकर लिखे गए हैं। हास्य के साथ-साथ विचार के लिए प्रेरित करनेवाले व्यंग्य-निबन्ध मौजूदा समय की वास्तविकताओं को भी एक अलग अन्दाज़ में देखते हैं।</p> <p>मिसाल के तौर पर पहला ही व्यंग्य प्रेमचन्द के मशहूर पात्रों अलगू चौधरी और जुम्मन शेख को आज के ग्रामीण परिदृश्य में ले आता है, जहाँ आज़ादी के बाद लोकतांत्रिक राजनीति का एक स्थानीय संस्करण पनपा है। इसमें अलगू और जुम्मन की अलग-अलग पार्टियाँ हैं जिनमें एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ चलती रहती है।</p> <p>नाई की दुकान में ‘विमान अपहरण की योजना’ का हास्य, ‘फ़ाइलें बतर्ज नायिका-भेद’ में सरकारी दफ़्तरों की लाल फीताशाही का व्यंग्यात्मक विश्लेषण, किसी शहरी कान्वेंटी की किशोर द्वारा लिखा गया ‘एक निबन्ध गाँव पर’—ऐसी कई चुटीली रचनाएँ इस पुस्तक में संकलित हैं जो आपको हँसाते-हँसाते सोचने पर मजबूर कर देंगी। इश्क़-मुहब्बत से लेकर संस्कृति, शिक्षा प्रणाली, परीक्षाएँ, साहित्य, सिनेमा तक लगभग हर विषय पर लेखक ने इसमें व्यंग्य-प्रहार किए हैं।</p> <p>लोककला उत्सवों की विसंगतियों पर ये पंक्तियाँ देखें : ‘जो कलाकार हैं वे अपने उदर-पोषण के लिए सड़क किनारे गिट्टी फोड़ रहे हैं। अफ़सरों से लदी सरकारी जीत उन पर धूल उड़ाती हुई ‘लोक-कला’ खोज रही है।’
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‘घूँघट के पट खोल’ व्यंग्य-रचनाओं का संकलन है जो जीवन तथा समाज के अलग-अलग पहलुओं को विषय बनाकर लिखे गए हैं। हास्य के साथ-साथ विचार के लिए प्रेरित करनेवाले व्यंग्य-निबन्ध मौजूदा समय की वास्तविकताओं को भी एक अलग अन्दाज़ में देखते हैं।</p>
<p>मिसाल के तौर पर पहला ही व्यंग्य प्रेमचन्द के मशहूर पात्रों अलगू चौधरी और जुम्मन शेख को आज के ग्रामीण परिदृश्य में ले आता है, जहाँ आज़ादी के बाद लोकतांत्रिक राजनीति का एक स्थानीय संस्करण पनपा है। इसमें अलगू और जुम्मन की अलग-अलग पार्टियाँ हैं जिनमें एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ चलती रहती है।</p>
<p>नाई की दुकान में ‘विमान अपहरण की योजना’ का हास्य, ‘फ़ाइलें बतर्ज नायिका-भेद’ में सरकारी दफ़्तरों की लाल फीताशाही का व्यंग्यात्मक विश्लेषण, किसी शहरी कान्वेंटी की किशोर द्वारा लिखा गया ‘एक निबन्ध गाँव पर’—ऐसी कई चुटीली रचनाएँ इस पुस्तक में संकलित हैं जो आपको हँसाते-हँसाते सोचने पर मजबूर कर देंगी। इश्क़-मुहब्बत से लेकर संस्कृति, शिक्षा प्रणाली, परीक्षाएँ, साहित्य, सिनेमा तक लगभग हर विषय पर लेखक ने इसमें व्यंग्य-प्रहार किए हैं।</p>
<p>लोककला उत्सवों की विसंगतियों पर ये पंक्तियाँ देखें : ‘जो कलाकार हैं वे अपने उदर-पोषण के लिए सड़क किनारे गिट्टी फोड़ रहे हैं। अफ़सरों से लदी सरकारी जीत उन पर धूल उड़ाती हुई ‘लोक-कला’ खोज रही है।’
Book Details
-
ISBN9788126703258
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘राग दरबारी’ एक ऐसा उपन्यास है जो गाँव की कथा के माध्यम से आधुनिक भारतीय जीवन की मूल्यहीनता को सहजता और निर्ममता से अनावृत्त करता है। शुरू से आख़िर तक इतने निस्संग और सोद्देश्य व्यंग्य के साथ लिखा गया हिन्दी का शायद यह पहला बृहत् उपन्यास है। फिर भी ‘राग दरबारी’ व्यंग्य-कथा नहीं है। इसका सम्बन्ध एक बड़े नगर से कुछ दूर बसे हुए गाँव की ज़िन्दगी से है, जो इतने वर्षों की प्रगति और विकास के नारों के बावजूद निहित स्वार्थों और अनेक अवांछनीय तत्त्वों के सामने घिसट रही है। यह उसी ज़िन्दगी का दस्तावेज़ है। 1968 में ‘राग दरबारी’ का प्रकाशन एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक घटना थी। 1971 में इसे ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया और 1986 में एक दूरदर्शन-धारावाहिक के रूप में इसे लाखों दर्शकों की सराहना प्राप्त हुई। वस्तुतः ‘राग दरबारी’ हिन्दी के कुछ कालजयी उपन्यासों में से एक है।
Shikayat Mujhe Bhee Hai
- Author Name:
Harishankar Parsai
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शिकायत मुझे भी है' में हरिशंकर परसाई के लगभग दो दर्जन निबन्ध संगृहीत हैं और इनमें से हर निबन्ध आज की वास्तविकता के किसी न किसी पक्ष पर चुटीला व्यंग्य करता है। परसाई के लेखन की यह विशेषता है कि वे केवल विनोद या परिहास के लिए नहीं लिखते। उनका सारा लेखन सोद्देश्य है और सभी रचनाओं के पीछे एक साफ-सुलझी हुई वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि है, जो समाज में फैले हुए भ्रष्टाचार, ढोंग, अवसरवादिता, अन्धविश्वास साम्प्रदायिकता आदि कुप्रवृत्तियों पर तेज रोशनी डालने के लिए हर समय सतर्क रहती है। कहने का ढंग चाहे जितना हल्का-फुल्का हो, किन्तु हर निबन्ध आज की जटिल परिस्थितियों को समझने के लिए एक अन्तर्दृष्टि प्रदान करता है। इसलिए जो आज की सच्चाई को जानने में रुचि रखते हैं, उनके लिए यह पुस्तक संग्रहणीय है।
Nithalle Ki Diary
- Author Name:
Harishankar Parsai
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हरिशंकर परसाई हिन्दी के अकेले ऐसे व्यंग्यकार रहे हैं जिन्होंने आनन्द को व्यंग्य का साध्य न बनने देने की सर्वाधिक सचेत कोशिश की। उनकी एक-एक पंक्ति एक सोद्देश्य टिप्पणी के रूप में अपना स्थान बनाती है। स्थितियों के भीतर छिपी विसंगतियों के प्रकटीकरण के लिए वे कई बार अतिरंजना का आश्रय लेते हैं, लेकिन, तब भी यथार्थ के ठोस सन्दर्भों की धमक हमें लगातार सुनाई पड़ती रहती है। लगातार हमें यह एहसास होता रहता है कि जो विद्रूप हमारे सामने प्रस्तुत किया जा रहा है, उस पर सिर्फ ‘दिल खोलकर’ हँसने की नहीं, थोड़ा गम्भीर होकर सोचने की हमसे अपेक्षा की जा रही है। यही परसाई के पाठ की विशिष्टता है। ‘निठल्ले की डायरी’ में भी उनके ऐसे ही व्यंग्य शामिल हैं। आडंबर, हिप्पोक्रेसी, दोमुँहापन और ढोंग यहाँ भी उनकी क़लम के निशाने पर हैं।
Vote Le, Dariya Mein Daal
- Author Name:
Sharad Joshi
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शरद जोशी हिन्दी व्यंग्य के ‘आइकॉन’ हैं। व्यंग्य की तीव्रता को उन्होंने जिस भाषा और तेवर के साथ सम्भव किया, और जो मानक निर्मित किया, उनके बाद कोई भी व्यंग्यकार उसे पार नहीं कर सका। उनके व्यंग्य-लेख वर्तमान हालात पर भी आज के व्यंग्यकारों से ज़्यादा सार्थक, प्रासंगिक और बेधक लगते हैं। गहरे सामाजिक सरोकार, समाज और राजनीति की परिपक्व समझ, खुली दृष्टि और तीखे ‘ऑब्ज़र्वेशन’ ने उन्हें जो अलग जगह दी, वह हिन्दी में आज भी उन्हीं की है।
इस पुस्तक में उनके राजनीतिकेन्द्रित लेखों को संकलित किया गया है, और उनमें भी ज़ोर चुनाव-विषयक टिप्पणियों पर है, इसीलिए इसका शीर्षक ‘वोट ले, दरिया में डाल’ पड़ा जो भारतीय लोकतंत्र पर एक टिप्पणी है।
पुस्तक में शामिल पचास से अधिक इन आलेखों में, जैसे हमारे देश की राजनीति की एक-एक कमज़ोर कड़ी का पोस्टमार्टम किया गया है। चुनाव में खड़े आदमी की छवि से शुरू करके शरद जोशी यहाँ ‘चुनाव गीतिका : सरलार्थ’ तक जाते हैं और लिखते हैं : ‘निशि व्यतीत हुई। ओ कज्जल-मलिन नयनोंवाली कामिनी, उठ। पोलिंग बूथों से राजनीति का कन्त तुझे टेर रहा है। चुनाव के कटे-कटे पोस्टरों से गृहों की दीवारें ऐसी प्रतीत हो रही हैं मानो किसी सुन्दरी के तन पर नख-क्षत हैं। प्रचार बन्द हो गया है। सभी जन मतदान हेतु केन्द्रों की ओर सत्वर गति से जा रहे हैं। ऐसे में हे गजगामिनी, तू गमन-विलम्बिनी होने की कलंकिनी मत बन।’ कहने की ज़रूरत नहीं कि भाषा का यह तत्सम ठाठ एक गहरे और सतह पर शान्त क्रोध की हुंकार है।
आशा है, शरद जोशी के ये लेख पाठकों को पुनः प्रतिरोध व अस्वीकार की उसी तमतमाती दुनिया में ले चलेंगे।
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