MajmulBahrain
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"मज्म-उल-बहरैन" दारा शिकोह की प्रसिद्ध रचना है। दारा ने इस किताब में इस्लाम और हिन्दू धर्म के बीच की कड़ी को ढूँढ़ा है। इस पुस्तक में इस्लाम और हिन्दू धर्म के विभिन पहलुओं का तुलनात्मक वर्णन किया गया है। दारा शिकोह मुग़ल सम्राट शाहजहाँ का जयेष्ट पुत्र और उसका उत्तराधिकारी था। उसने वेदों,उपनिषदों और भारतीय धार्मिक साहित्य का ज्ञान प्राप्त किया था। जलालुद्दीन रूमी, मौलाना जामी, हकीम सनाई और निज़ामी जैसे महान फ़ारसी सूफ़ी कवियों का उसने गहन अअध्ययन किया था। उसने कई पुस्तकें लिखी हैं। उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘मज्म-उल-बहरैन’ है। अब्दुल वासे 1 दिसम्बर 1975 को फ़ातेहान (बिहार) में जन्म। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम.ए. एम.फिल, पी.एच.डी की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त लगभग तीन वर्षों तक इसी विश्वविद्यालय में अतिथि प्राध्यापक वे तौर पर कार्यरत रहे। दिल्ली से प्रकाशित उर्दू समाचार पत्र, हिंदुस्तान एक्सप्रेस में सहायक संपादक के पद पर कार्यरत रहे। ऑल इंडिया रेडियो के लिए भी काम किया। उर्दू के अलावा फ़ारसी, हिंदी, अरबी और अंग्रेज़ी भाषाओं का ज्ञान। सम्प्रति उर्दू ज़बान और शाइरी की संस्था रेख़्ता फ़ाउंडेशन में कार्यरत।
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"मज्म-उल-बहरैन" दारा शिकोह की प्रसिद्ध रचना है। दारा ने इस किताब में इस्लाम और हिन्दू धर्म के बीच की कड़ी को ढूँढ़ा है। इस पुस्तक में इस्लाम और हिन्दू धर्म के विभिन पहलुओं का तुलनात्मक वर्णन किया गया है। दारा शिकोह मुग़ल सम्राट शाहजहाँ का जयेष्ट पुत्र और उसका उत्तराधिकारी था। उसने वेदों,उपनिषदों और भारतीय धार्मिक साहित्य का ज्ञान प्राप्त किया था। जलालुद्दीन रूमी, मौलाना जामी, हकीम सनाई और निज़ामी जैसे महान फ़ारसी सूफ़ी कवियों का उसने गहन अअध्ययन किया था। उसने कई पुस्तकें लिखी हैं। उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘मज्म-उल-बहरैन’ है। अब्दुल वासे 1 दिसम्बर 1975 को फ़ातेहान (बिहार) में जन्म। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम.ए. एम.फिल, पी.एच.डी की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त लगभग तीन वर्षों तक इसी विश्वविद्यालय में अतिथि प्राध्यापक वे तौर पर कार्यरत रहे। दिल्ली से प्रकाशित उर्दू समाचार पत्र, हिंदुस्तान एक्सप्रेस में सहायक संपादक के पद पर कार्यरत रहे। ऑल इंडिया रेडियो के लिए भी काम किया। उर्दू के अलावा फ़ारसी, हिंदी, अरबी और अंग्रेज़ी भाषाओं का ज्ञान। सम्प्रति उर्दू ज़बान और शाइरी की संस्था रेख़्ता फ़ाउंडेशन में कार्यरत।
Book Details
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ISBN9789394494466
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Pages104
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Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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कहते हैं धर्म वेदों में प्रतिपादित है। वेद साक्षात् परम नारायण है। वेद में जो अश्रद्धा रखते हैं, उनसे भगवान् बहुत दूर हैं। वेदों का अर्थ है—भिन्न-भिन्न कालों में भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत आध्यात्मिक सत्यों का संचित कोष। वास्तव में जीवन को सुंदर व साधक बनानेवाला प्रत्येक विचार ही मानो वेद है। मैक्स म्यूलर का तो यहाँ तक कहना था कि वेद मानव जाति के पुस्तकालय में प्राचीनतम ग्रंथ हैं। वेद संख्या में चार हैं—ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद। वेद का शाब्दिक अर्थ है ‘ज्ञान’ या ‘जानना’। ये हमारे ऋषि-तपस्वियों की निष्कपट, निश्छल भावना की अभिव्यक्ति हैं। इनमें जीवन को सद्मार्ग पर प्रशस्त करने का आह्वान है। इतना ही नहीं, वेदों में आत्मा-परमात्मा, देवी-देवता, प्रकृति, गृहस्थ-जीवन, सृष्टि, लोक-परलोक के साथ-साथ नाचने-गाने आदि की बातें भी निहित हैं। इन सबका एक ही उद्देश्य है—मानव-कल्याण। एक ओर जहाँ वेदों में ईश-भक्ति और अध्यात्म की महिमा गाई गई है, वहीं दूसरी ओर कर्म को ही कल्याण का मार्ग कहा गया है। वेद हमारे अलौकिक ज्ञान की अनुपम धरोहर हैं। अत: इनके प्रति जन-सामान्य की जिज्ञासा होना स्वाभाविक है, इसलिए वेदों के गूढ़ ज्ञान को हमने कथारूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। इन कथा-कहानियों के माध्यम से सुधी पाठक न केवल इन्हें पढ़-समझ सकते हैं, बल्कि पारंपरिक वैदिक ज्ञान को आत्मसात् कर लोक-परलोक भी सुधार सकते हैं।
Ramlila Ki Utpatti Tatha Vikas
- Author Name:
Mohan Ram Yadav
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राम के जीवन में भारतीय आदर्शों के चरम विकास के दर्शन होते हैं। भक्ति-सम्प्रदाय में वे भगवान के अवतार माने जाते हैं। अतः उनके चारित्रिक गुण एवं जीवन का ज्ञान बड़े उत्साह से प्राप्त किया जाता है। रामलीला का आयोजन भारत में तो अत्यन्त प्राचीन काल से होता ही रहा है, विदेशों में भी सहस्रों वर्षों से बसे भारतीय इसे अक्षुण्ण बनाए हुए हैं। इस प्रकार रामलीला ने विदेशों में स्थापित भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध को ऐसा दृढ़ बना दिया है कि सहस्रों वर्षों तक निरन्तर प्रयत्न करते रहने पर भी काल उसे नष्ट करने में समर्थ नहीं हो सका है। इसमें सांस्कृतिक जीवन की ऐसी महत्त्वपूर्ण झाँकी मिलती है जो इस युग में भी समस्त क्षेत्रों में मानव का पथ-प्रदर्शन करने में सर्वथा समर्थ है।
देश के कोने-कोने में रामलीला के आयोजन की चर्चा अनेक धार्मिक तथा ऐतिहासिक ग्रन्थों में हुई। किन्तु किसी में उसका सम्यक् निरूपण प्राप्त नहीं होता। रामलीला का आयोजन प्रायः भक्ति-साधना के रूप में होता रहा है। अतएव भौतिकता से दूर रहनेवाले साधु-महात्मा इसके विश्लेषणात्मक इतिहास को धर्म-विरुद्ध समझ इससे दूर ही रहे। उन्हें तो रामलीला के दर्शन मात्र से प्रयोजन था। गोस्वामी जी राम का व्यापक प्रचार करना चाहते थे। उनके मत से तात्कालिक व्याधियों का सबसे बड़ा उपचार रामचरित था। जहाँ उन्होंने प्रचार के अनेक साधन अपनाए वहाँ मानस की रामलीला का आयोजन धूम-धाम से किया। रामलीला प्रचार का बड़ा उपयुक्त साधन है। कथा-वार्ता, मन्दिर या अखाड़ों में तो वह व्यक्ति जाता है जिसमें उस प्रकार की प्रवृत्ति रहती है, किन्तु रामलीला के कारण ऐसे जन भी उनकी ओर आकृष्ट होते हैं जिनकी सम्भावना नहीं की जाती। इसमें मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा भी मिलती हैं। प्रत्यक्ष दर्शन का प्रभाव श्रव्यकाव्य या उपदेश की अपेक्षा अधिक तथा स्थायी होता है।
गोस्वामी जी के पूर्व से वाल्मीकीय ‘रामायण’ के अनुसार रामलीला होती थी। उसके प्रति जनता में आस्था भी थी। वाल्मीकीय ‘रामायण’ के निर्माण काल की सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक परिस्थिति तत्कालीन समय से भिन्न थी। वाल्मीकीय ‘रामायण’ के आधार पर होनेवाली रामलीला में धार्मिक भावना की प्रधानता थी। वह मुसलमानी शासन तथा इस्लाम धर्म के कारण उस युग में उपादेय सिद्ध नहीं हो सकती थी। गोस्वामी जी उसको नया तथा उपयोगी स्वरूप प्रदान करना चाहते थे। यह रामलीला का आन्दोलन था। रामलीला के आयोजन से जनता में नव-चेतना जग पड़ी। उनके सामने एक उदाहरण प्रत्यक्ष रूप में आ गया। राम की भाँति विपत्तियों में धैर्य रखने तथा पराक्रम द्वारा कार्य करने से राक्षसी प्रवृत्तियों का विनाश हो सकता है। भारतीय संस्कृति का मूर्त रूप पाकर जनता ने अपने हृदय का परिष्कार किया तथा चरित्र सुधारा। गोस्वामी जी की रामलीला की लहर सारे उत्तरी भारत में फैलती हुई दक्षिण में भी जा पहुँची। सारा देश राममय हो गया। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक तथा अटक से लेकर कटक तक रामलीला का आन्दोलन व्याप्त हो गया। इस क्षेत्र में गोस्वामी जी को अपूर्व सफलता मिली।
Hindu Dharma Vishwakosh
- Author Name:
Mahesh Sharma
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हिंदू धर्म को सर्वाधिक प्राचीन और शाश्वत धर्म होने का गौरव प्राप्त है। भारत की लगभग तीन-चौथाई आबादी हिंदू धर्मावलंबी है। दुनिया के दूसरे देशों में भी हजारों हिंदू मतावलंबी रहते हैं। हिंदू धर्म का कोई संस्थापक नहीं है, न ही इसका प्रतिपादन किसी एक व्यक्ति अथवा ईश्वर द्वारा हुआ है—जैसा कि पहले ही कहा गया है—यह शाश्वत धर्म है। हिंदू धर्म में लोग अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। यह इस धर्म की विविधता, उदारता और उदात्तता है कि इसमें नदियों, वृक्षों और पर्वतों को भी देवी-देवताओं की भाँति पूजा जाता है। पूजा, प्रार्थना, आराधना, स्तुति—मार्ग के अंतिम और सर्वोच्च पड़ाव हैं, इसलिए हिंदू धर्म ग्रंथ मोक्ष-प्राप्ति के उपायों से भरे पड़े हैं। प्रस्तुत विश्वकोश हिंदू-धर्म के बारे में व्यापक रूप से प्रकाश डालता है। इससे हिंदू-धर्म के बारे में अब तक अज्ञात कई विषयों के बारे में जानकारी पाई जा सकती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि इस पुस्तक द्वारा हिंदू धर्म एवं उसकी संस्कृति को न केवल जाना जा सकता है वरन् उसे सीखा भी जा सकता है। हिंदू धर्म के गौरव और श्रेष्ठता को रेखांकित और पुनर्स्थापित करनेवाली पठनीय कृति।
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