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Tum Ho Mujh Mein

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‘तुम हो मुझमें’ संवेदनशील कवयित्री पुष्पिता का महत्त्वपूर्ण कविता–संग्रह है। महत्त्वपूर्ण इस अर्थ में कि इन कविताओं में आकुल आत्मीयता और राग–विराग के जो उदात्त आशय हैं वे पाठक के शब्दबोध में प्रीतिकर विस्मय उपजाते हैं। प्रेम समस्त कविताओं का बीज शब्द है। प्रेम के अगणित अर्थों का अनुभावन करते हुए पुष्पिता ने अनुभवों, भावों व संवादों का सान्द्र आस्वाद सिरजा है। संग्रह की एक कविता में वे कहती हैं— ‘प्रेम शब्दों से परे है शब्दकोशों से बहिष्कृत मन के अन्त:पुर का पाहुन है वह केवल हृदय से— हार्दिकता से काम्य।’ इन कविताओं का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है समकालीन चिन्तन व चेतना से सुगठित सम्पृक्ति। प्रचलित विमर्शों के सूत्र उनके आन्तरिक सत्यों के साथ सहेजे गए हैं। सतह पर तिरते मूल्यों व निष्कर्षों से कवयित्री की सहमति नहीं है। ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ’ को चरितार्थ करके शब्दार्थ के अगम को सुगम बनाया गया है। यह कविता–संग्रह प्रेम, मैत्री, साहचर्य, प्रकृति, गोचर–अगोचर, शब्द–शब्दातीत को उनकी मौलिकता में आलोकित करता है। पुष्पिता के पास भाषा और शिल्प की समृद्धि है। ‘तुम्हें देखने के बाद/छूट जाता है तुम्हारा देखना, मुझमें’—के स्वर में कहें तो ये कविताएँ पढ़कर पाठकों के मन में इनका बहुत कुछ छूट जाएगा। जीवन को समग्रता में सँजोती रचनाएँ ‘तुम हो मुझमें’ की उपलब्धि हैं।

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‘तुम हो मुझमें’ संवेदनशील कवयित्री पुष्पिता का महत्त्वपूर्ण कविता–संग्रह है। महत्त्वपूर्ण इस अर्थ में कि इन कविताओं में आकुल आत्मीयता और राग–विराग के जो उदात्त आशय हैं वे पाठक के शब्दबोध में प्रीतिकर विस्मय उपजाते हैं। प्रेम समस्त कविताओं का बीज शब्द है। प्रेम के अगणित अर्थों का अनुभावन करते हुए पुष्पिता ने अनुभवों, भावों व संवादों का सान्द्र आस्वाद सिरजा है। संग्रह की एक कविता में वे कहती हैं—

‘प्रेम शब्दों से परे है

शब्दकोशों से बहिष्कृत

मन के अन्त:पुर का पाहुन है वह

केवल हृदय से—

हार्दिकता से काम्य।’

इन कविताओं का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है समकालीन चिन्तन व चेतना से सुगठित सम्पृक्ति। प्रचलित विमर्शों के सूत्र उनके आन्तरिक सत्यों के साथ सहेजे गए हैं। सतह पर तिरते मूल्यों व निष्कर्षों से कवयित्री की सहमति नहीं है। ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ’ को चरितार्थ करके शब्दार्थ के अगम को सुगम बनाया गया है।

यह कविता–संग्रह प्रेम, मैत्री, साहचर्य, प्रकृति, गोचर–अगोचर, शब्द–शब्दातीत को उनकी मौलिकता में आलोकित करता है। पुष्पिता के पास भाषा और शिल्प की समृद्धि है। ‘तुम्हें देखने के बाद/छूट जाता है तुम्हारा देखना, मुझमें’—के स्वर में कहें तो ये कविताएँ पढ़कर पाठकों के मन में इनका बहुत कुछ छूट जाएगा।

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Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2013
Weight
350 grams
ISBN-13
9788183616058
Pages
163
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22 cm
Language
Hindi

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