Mughal Badshahon Ki Hindi Kavita
Author:
Manager PandeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 120
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Available
यह आश्चर्यजनक लगेगा, लेकिन तथ्य है, कि बाबर से लेकर बहादुरशाह जफ़र तक, लगभग सभी मुग़ल बादशाह शायर और कवि भी थे; और उन्होंने फ़ारसी-उर्दू में ही नहीं, ब्रजभाषा और हिन्दी में भी काव्य-रचना की।</p>
<p>यह पुस्तक प्रमाण है कि जिस भी बादशाह को राजनीति और युद्धों से इतर सुकून के पल नसीब हुए, उन्होंने कवियों-शायरों को संरक्षण देने के अलावा न सिर्फ़ कविताएँ-ग़ज़लें लिखीं, अपने आसपास ऐसा माहौल भी बनाया कि उनके परिवार की महिलाएँ भी काव्य-रचना कर सकें। लिखित प्रमाण है कि बाबर की बेटी गुलबदन बेगम और नातिन सलीमा सुल्ताना फ़ारसी में कविताएँ लिखती थीं। हुमायूँ स्वयं कवि नहीं था, लेकिन काव्य-प्रेम उसका भी कम नहीं था। अकबर का कला-संस्कृति प्रेम तो विख्यात ही है, वह फ़ारसी और हिन्दी में लिखता भी था। ‘संगीत रागकल्पद्रुम’ में अकबर की हिन्दी कविताएँ मौजूद हैं। जहाँगीर, नूरजहाँ, फिर औरंगजेब की बेटी जेबुन्निसाँ, ये सब या तो फ़ारसी में या फ़ारसी-हिन्दी दोनों में कविताएँ लिखते थे। कहा जाता है कि शाहजहाँ के तो दरबार की भाषा ही कविता थी। दरबार के सवाल-जवाब कविता में ही होते थे। दारा शिकोह का दीवान उपलब्ध है, जिसमें उसकी ग़ज़लें और रुबाइयाँ हैं। अन्तिम मुग़ल बादशाह जफ़र की शायरी से हम सब परिचित हैं। उल्लेखनीय यह कि उन्होंने हिन्दी में कविताएँ भी लिखीं जो उपलब्ध भी हैं।</p>
<p>कहना न होगा कि हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक डॉ. मैनेजर पाण्डेय द्वारा सम्पादित यह संकलन भारत में मुग़ल-साम्राज्य की छवि को एक नया आयाम देता है; इससे गुज़रकर हम जान पाते हैं कि मुग़ल बादशाहों ने हमें क़िले और मक़बरे ही नहीं दिए, कविता की एक श्रेष्ठ परम्परा को भी हम तक पहुँचाया है।
ISBN: 9788126729456
Pages: 135
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: "Khwahishen" is a Hindi poetry and Shayari collection; most of the verses are emotions of love, sadness, wait, n dreams etc.; the poetry is in simple Hindi n coupled with some lovely words of Urdu; the verses are an exploration of the soul, close to life, straight from the heart... The best part is the poems are felt through every human nature, and while reading, one feels it's all about my thoughts. Sonika 'Niti' Ahuja is a Hindi poet who started her career as a homoeopath but gave up her practice to look after her children. She is a proud mother of three daughters and a son, who passed away while he was still very young. She is a passionate writer who started writing in her early forties to express her thoughts, feelings and dreams. She is already an author of a book named 'Soul's Whispers'. She currently resides in Ludhiana, Punjab, with her husband, father-in-law and three daughters, whom she loves to her heart's content, and she is a source of inspiration for thousands of people...
Mrityunjayee
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Bhagwat Jha Azad
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Description:
‘मृत्युंजयी’ का मुख्यराग है—लोक मुक्ति। दलित, शोषित, उपेक्षित, प्रताड़ित, पीड़ित; आर्थिक, सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक दृष्टि से सर्वथा उपेक्षित और अज्ञान के अन्धकार में भटकते अज्ञानी लोगों की बिलखती चेतना के रेगिस्तानी समुद्र में आस्था और संकल्प की सुगम राह बना डालने की युक्ति : “करो उपकृत धरा लोक को/अपना ज्ञान बाँटकर उनको/श्रम से मंडित जग जीवन है/यह रहस्य बतला कर उनको।”
“अपने सत्कर्मों से मानव/जीवन काल बढ़ा सकता है/धर्म आचरण से आत्मा को/वह उदात्त बना सकता है।”
कवि ने यहाँ तत्त्व के लिए संघर्ष किया है, अभिव्यक्ति को सक्षम बनाने के लिए संघर्ष किया है और लोक दृष्टि विकसित करने के लिए जन संघर्ष को अनिवार्य माना है : “मिटा भूत के पद्चिन्हों को/भूल पुराने व्यथा-व्यंग्य को/नई राह पर कदम बढ़ाकर/नई कहानी लिख डाला है/एक नया संसार बनाकर।”
‘मृत्युंजयी’ पढ़कर आप एक ऐसे फूल की कल्पना कर सकते है जो कभी जुही भी हो जाता है तो कभी कमल, कभी मौलश्री, कभी अमलतास तो कभी शेफालिका। ‘मृत्युंजयी’ पढ़ने और उसकी संवेदना के आन्तरिक सतह का स्पर्श करने के पश्चात आपको सहज अनुभव होगा कि महाकवि भागवत झा ‘आज़ाद’ अपने शब्दों से जीवन की परिधि का विस्तार करते हैं। उनकी कविता मानव मन में उच्चतर जीवन मूल्यों के प्रति उत्कंठा और आस्था जगाती है और इस तरह मानवीय नश्वरता के विरुद्ध शाश्वरता का जयगान करती है।
Beghar
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Nigahbani Mein Phool
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Pawan Karan
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- Description: पवन करण की कविताएँ जीवन की स्वाभाविक हरकत की तरह आती हैं। वे हर जगह कवि हैं। इसीलिए उनकी कविताएँ हर कहीं से उग आती हैं। न उन्हें विषयों के लिए दिमाग़ को किसी अनोखी दुनिया में दौड़ाना पड़ता है, न कविता को वाणी देने के लिए भाषा के साथ कोई शारीरिक-मानसिक अभ्यास करना पड़ता है। दुनिया में रहना-जीना जितना प्राकृतिक है, उनकी कविताएँ भी लगभग वैसी ही हैं। त्योहार पर घर जाते आदमी का उल्लास हो या शहर के सबसे पुराने बैंड का रुदन जो सिर्फ़ उसे सुनाई देता है, या घर वह पुरानी कैंची जो ‘फ़िलहाल घर के कोष में/नोट के दो टुकड़ों की तरह रखी है।’ और ताला, ‘यह राजदार हमारा/अनुपस्थिति में हमारी/कभी झुकता नहीं टूट भले जाए।’ या फिर बिजली के खम्भे जो रात के सुनसान में ‘जब उनके नीचे से/गुज़रता है चौकीदार/उसके सिर पर हर बार/रोशनी की उजली टोपी/पहना देते हैं’ और जब वह देर तक वापस नहीं आता तो उसे ‘अपने नीचे लेटे कुत्तों में से/किसी एक को भेजते हैं उसे देखने।’ ये कविताएँ हमें व्याकुल करके किसी बदलाव की क़सम खाने के लिए नहीं उकसातीं, बल्कि जहाँ हम हैं, जिस भी मुद्रा में वहीं हमारे भीतर आकर वहीं से हमें बदलना शुरू कर देती हैं, और इनसे गुज़रकर जब हम वापस दुनिया के रूबरू होते हैं, सबसे पहले हमें अपनी दृष्टि नई लगती है, और दुनिया के अनेक कच्चे जोड़ अचानक हमें दिखाई देने लगते हैं जिन्हें फ़ौरन रफ़ू की या मरम्मत की ज़रूरत है।
TUM AAI HO!
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- Description: जितना शाश्वत प्रेम है, उतनी ही शाश्वत हैं वेदनापथियों की प्रेम कविताएँ! कोई कवि इस सृष्टि में यदि शादी को युगल समाधि जैसी नई दृष्टि से देखता है तो निश्चित ही कविताएँ कुछ अलग रूप ग्रहण करने लगती हैं। दरअसल, ईश्वर के दरबार की सबसे प्यारी प्रार्थनाएँ हैं, 'तुम आई हो!’ में संगृहीत कविताएँ। पुस्तक की भूमिका में एक प्रेम-पत्र है। वस्तुत: सारी कविताओं में ही प्रेम-पत्रों का माधुर्य और सौंदर्य की उपासना के मूर्त सूत्र हैं। इसके अलावा, कविताएँ एक निश्चित घटनाक्रम में भी हैं, जो क्रमश: पवित्रता के सोपानों की तरह हैं कि जैसे-जैसे आप पृष्ठ पलटते जाएँगे, आप अपने भीतर प्रेम को और भी प्रगाढ़ और भी घनीभूत होता महसूस करेंगे। अभी उड़ान बाक़ी है, कि अभी जीवन का छप्पन भोग सजा है, कि अभी तो उठाया है पहला कौर, निवाला एक, कि अभी शेष है, दिन का भोजन पूरा, कि अभी रात बाक़ी है, रात का भोजन भी, कि अभी कितने तो दिन, जीवन भरे, प्रतीक्षा में हैं हमारे, कि अभी कई-कई भोर होना है, कितने तो सुप्रभात, अभी एक रात, आज भी कह रही कानों में-शुभ रात्रि! हाँ प्रिये! शुभ रात्रि। कि अभी शेष है, कितने सूर्यों का उदित होना, नित्य, कितने चंद्रमाओं का आना, कि बचे हैं अभी, कितने-कितने वसंत, कितनी ही बारिशों की रिमझिम, कितनी ठंडियों की रातें, कितने गुलाबी धूप तो शेष हैं, अभी बचे हैं बहुत, जीवन के रंग-बिरंगे मौसम। ऐसी ही ताज़गी और जीवंतता से लबरेज़ एक ऐसी किताब, जिसे प्रेमी-प्रेमिका भी पढ़ सकते हैं और पति-पत्नी भी। वे भी जिन्हें लगता है कि प्रेम चूक गया या कि उमर चूक गई। आप अपने प्रिय को प्रेम की उष्मा और ऊर्जा से भरा 'कुछ’ यदि भेंट करना चाहते हैं, तो इन कविताओं का गुच्छ सर्वोत्तम उपहार हो सकता है।
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