Kam Se Kam
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ऐसे दौर में जब लोकतन्त्र में कई गैर लोकतान्त्रिक तरीकों से असहमति को दबाये जाने का एक सुनियोजित अभियान ही चल रहा है, तब अशोक वाजपेयी उन सार्वजनिक रूप से सक्रिय व्यक्तियों में से हैं जो कविता, लेखन, वक्तव्य और कर्म के अनेक स्तरों पर असहमति को विन्यस्त और मुखर कर रहे हैं। तरह-तरह से डराई जा रही व्यवस्था में वे निडर रहकर अपनी बात कहते हैं। वे उन लोगों में से हैं जो अन्त:करण के आयतन को संक्षिप्त होने से लगातार बचाने का अथक यत्न करते रहे हैं। ‘कम से कम’ की कविताएँ ज़्यादा से ज़्यादा मानवीय बने रहने का अभ्यास हैं : वे इसका साक्ष्य हैं कि कठिन से कठिन समय में कविता मनुष्य बने रहने की सम्भावना की जगह होती है।
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ऐसे दौर में जब लोकतन्त्र में कई गैर लोकतान्त्रिक तरीकों से असहमति को दबाये जाने का एक सुनियोजित अभियान ही चल रहा है, तब अशोक वाजपेयी उन सार्वजनिक रूप से सक्रिय व्यक्तियों में से हैं जो कविता, लेखन, वक्तव्य और कर्म के अनेक स्तरों पर असहमति को विन्यस्त और मुखर कर रहे हैं। तरह-तरह से डराई जा रही व्यवस्था में वे निडर रहकर अपनी बात कहते हैं। वे उन लोगों में से हैं जो अन्त:करण के आयतन को संक्षिप्त होने से लगातार बचाने का अथक यत्न करते रहे हैं।
‘कम से कम’ की कविताएँ ज़्यादा से ज़्यादा मानवीय बने रहने का अभ्यास हैं : वे इसका साक्ष्य हैं कि कठिन से कठिन समय में कविता मनुष्य बने रहने की सम्भावना की जगह होती है।
Book Details
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ISBN9789388753852
-
Pages71
-
Avg Reading Time2 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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शुरुआती वक़्त में जब ज़ोहरा निगाह मुशायरों में अपनी ग़ज़लें पढ़तीं तो लोग कहा करते थे कि ये दुबली-पतली लड़की इतनी उम्दा शायरी कैसे कर लेती है, ज़रूर कोई बुज़ुर्ग है जो इसको लिखकर देता होगा; लेकिन बाद में सबने जाना कि उनका सोचना सही नहीं था। छोटी-सी उम्र में मुशायरों में अपनी धाक ज़माने के बाद उन्होंने दूसरा क़दम सामाजिक सच्चाइयों की ख़ुरदरी ज़मीन पर रखा; यहीं से उनकी नज़्म की भी शुरुआत होती है जो शायरा की आपबीती और जगबीती के मेल से एक अलग ही रंग लेकर आती है और ‘मुलायम गर्म समझौते की चादर’, ‘कसीदा-ए-बहार’ तथा ‘नया घर' जैसी नज़्में वजूद में आती हैं।
ज़ोहरा निगाह आज पाकिस्तान की पहली पंक्ति के शायरों में गिनी जाती हैं; ‘शाम का पहला तारा’ उनकी पहली किताब थी, जिसे भारत और पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर सराहा गया था। ज़ोहरा निगाह औरत की ज़बान में दुनिया के बारे में लिखती हैं, फ़ैमिनिस्ट कहा जाना उन्हें उतना पसन्द नहीं है। वे ऐसे किसी वर्गीकरण के हक़ में नहीं हैं। इस किताब में शामिल नज़्में और ग़ज़लें उनकी दृष्टि की व्यापकता और गहराई की गवाह हैं।
‘‘दिल गुज़रगाह है आहिस्ता ख़रामी के लिए
तेज़ गामी को जो अपनाओ तो खो जाओगे
इक ज़रा देर ही पलकों को झपक लेने दो
इस क़दर ग़ौर से देखोगे तो खो जाओगे।’’
Yaad Ka Chehra
- Author Name:
Ambareen Haseeb Ambar
- Book Type:

- Description: अम्बरीन हसीब अम्बर की शायरी में एक अलग तरह का फ़िक्री जहान नज़र आता है। वह एक तरफ़ हुस्न की जानिब से शायरी में अपना मुक़द्दमा पेश करती नज़र आती हैं और नाज़ और अदा कही जाने वाली महबूबा की ज़िन्दगी के असली मसलों से हमें रू-ब-रू करवाती हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ वह इतिहास की धूल में दफ़नाई हुई औरत के सवालों को भी दौर-ए-हाज़िर के दामन पर सब्त करती हुई मालूम होती हैं। ‘याद का चेहरा’ ग़ज़ल और नज़्म का एक ऐसा गुलदस्ता है जिसमें सिर्फ़ तख़य्युल के फूल ही नहीं हैं, बल्कि आज की औरत के चुभते हुए तंज़ के काँटे भी हैं। वह ज़ुल्म और जब्र से आँखों में आँखें डाल कर मुकालमा करने की रवादार हैं। मोहब्बत में भी वह अगर एक तरफ़ ईसार और क़ुर्बानी के जज़्बे को अहम तस्लीम करती हैं तो वहीं अपना हक़ माँगने से भी पीछे नहीं हटती हैं। वफ़ा उनके लिए मर्द को तन्हाई से जहान-ए-रंगीं तक लाती है, मगर ख़ुद के जहान-ए-रंगीं से तन्हाई तक पहुँचने को नज़रअन्दाज़ नहीं करती। उनकी शायरी की इस ख़ूबसूरत किताब को उन्हीं के अल्फ़ाज़ में कुछ यूँ पेश किया जा सकता है— तंज़ रुसवाई सितम शिकवे गिले हैं यही शायद वफ़ाओं के सिले मुझको दुनिया की नहीं है आरज़ू मेरे होने की ख़बर मुझको मिले
Udte Hain Ababeel
- Author Name:
Sushma Naithani
- Book Type:

- Description: Poems
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