Tulsidas "Nirala"
(0)
Author:
Suryakant Tripathi 'Nirala'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
199
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“तुलसीदास में स्वाधीनता की भावना का पूर्ण प्रस्फुटन हुआ है। भारत के सांस्कृतिक सूर्य के अस्त होने पर देश में किस तरह अन्धकार छाया हुआ है, इसका मार्मिक चित्रण करते हुए निराला ने दिखलाया है कि किस प्रकार एक कवि इस अन्धकार को दूर करने की चेष्टा करता है। तुलसीदास के रूप में निराला ने आधुनिक कवि के स्वाधीनता-सम्बन्धी भावों के उद्गम और विकास का चित्रण किया है। छायावादी कवि की तरह निराला के तुलसीदास को भी देश की पराधीनता का बोध प्रकृति की पाठशाला में ही होता है; किन्तु छायावादी कवि की तरह वे भी कुछ दिनों के लिए नारी-मोह में पड़कर उस भाव को भूल जाते हैं। अन्त में जो ज्ञान प्रकृति की पाठशाला में मिला था, उसका दीक्षांत भाषण उसी नारी के विश्वविद्यालय में सुनने को मिलता है, और भविष्यवाणी होती है कि : देश-काल के शर से बिंधकर यह जागा कवि अशेष छविधर इसके स्वर से भारती मुखर होंगी। इस तरह हिन्दी जाति के सबसे बड़े जातीय कवि की जीवन-कथा के द्वारा निराला ने अपनी समसामयिक परिस्थितियों में रास्ता निकालने का संकेत दिया है।” —नामवर सिंह
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“तुलसीदास में स्वाधीनता की भावना का पूर्ण प्रस्फुटन हुआ है। भारत के सांस्कृतिक सूर्य के अस्त होने पर देश में किस तरह अन्धकार छाया हुआ है, इसका मार्मिक चित्रण करते हुए निराला ने दिखलाया है कि किस प्रकार एक कवि इस अन्धकार को दूर करने की चेष्टा करता है। तुलसीदास के रूप में निराला ने आधुनिक कवि के स्वाधीनता-सम्बन्धी भावों के उद्गम और विकास का चित्रण किया है। छायावादी कवि की तरह निराला के तुलसीदास को भी देश की पराधीनता का बोध प्रकृति की पाठशाला में ही होता है; किन्तु छायावादी कवि की तरह वे भी कुछ दिनों के लिए नारी-मोह में पड़कर उस भाव को भूल जाते हैं। अन्त में जो ज्ञान प्रकृति की पाठशाला में मिला था, उसका दीक्षांत भाषण उसी नारी के विश्वविद्यालय में सुनने को मिलता है, और भविष्यवाणी होती है कि :
देश-काल के शर से बिंधकर
यह जागा कवि अशेष छविधर
इसके स्वर से भारती मुखर होंगी।
इस तरह हिन्दी जाति के सबसे बड़े जातीय कवि की जीवन-कथा के द्वारा निराला ने अपनी समसामयिक परिस्थितियों में रास्ता निकालने का संकेत दिया है।”
—नामवर सिंह
Book Details
-
ISBN9789360862510
-
Pages72
-
Avg Reading Time2 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रकृति के साथ मनुष्य के सम्बन्धों पर भी एक हिसाबी-किताबी दृष्टि का ही क़ब्ज़ा होता जा रहा है। मंगलेश की कविता पेड़ को ‘करोड़ों चिड़ियों की नींद’ से जोड़ती हुई जैसे इस तरह के क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ ही खड़ी है। महानगर में रहते हुए मंगलेश का ध्यान जूझती हुई गृहस्थिन की दिनचर्या, बेकार युवकों और चीज़ों के लिए तरसते बच्चों से लेकर दूर गाँव में इन्तज़ार करते पिता, नदी, खेतों और ‘बर्फ़ झाड़ते पेड़’ तक पर टिका है। उनकी नज़र उस अघाए हुए वर्ग के बीच जाकर बेचैन हो जाती है जो सब कुछ को बाज़ार-भाव के हवाले करने पर तुला है।
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अरुण कमल की कविता का उर्वर प्रदेश लगभग पाँच दशकों में फैला हुआ है। अरुण कमल की कविता में उस अभिनव काव्य-सम्भावना का आद्यक्षर और उसका पूरा ककहरा दिखाई पड़ता है, जिससे हिन्दी कविता का नया चेहरा आकार लेता प्रतीत होता है। अरुण कमल की कविता की बहुत बड़ी विशेषज्ञता वह अपनत्व है जो बहुत हद तक उनके व्यक्तित्व का ही हिस्सा है। उनकी कविताओं से होकर गुज़रना एक अत्यन्त आत्मीय स्वजन
के साथ एक अविस्मरणीय यात्रा है। अरुण कमल की कविताएँ एक साथ अनुभवजन्य हैं और अनुभवसुलभ। अनछुए बिम्ब, अभिन्न पर कुछ अलग से, अरुण कमल के काव्य-जगत में सहज ही ध्यान खींचते हैं और अपने समकालीनों में उन्हें एक अलग पहचान देते हैं। अरुण कमल की सबसे सधी कविताओं में अनन्य अर्थगौरव और अनुगूँज है। यह अर्थगुरुता या अर्थगहनता जिससे कविता पन्ने पर जहाँ ख़त्म होती है, वहाँ ख़त्म नहीं होती बल्कि अपने अर्थ और असर की अनुगूँजों से पढ़ने, सुननेवालों के मन-मानस में अपने को फिर से सृजित करती है। कवि का सतत सृजन-कर्म उसकी इसी अप्रतिहत विकास-यात्रा के प्रति आश्वस्त करता है।
Etiyadi Jan
- Author Name:
Puran Chandra Joshi
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अभिजन’ और ‘इत्यादि जन’ के बीच का अलगाव, उनके बीच की दरार नई सभ्यता की संरचना में ही निहित है। लगता है, इस अलगाव और दरार की चेतना से ही ‘अभिजन’ और ‘इत्यादि जन’ को दूर रखना इस सभ्यता की मूल प्रकृति है ताकि अभिजन के अन्दर ऐसे प्रबुद्ध तत्त्वों की निर्मिति न हो सके जो अपनी जन-विमुख ही नहीं, जन-विरोधी जीवनशैली के प्रति आत्म-पीड़ा और उत्ताप महसूस कर सकें और जन के प्रति अपने दायित्व का भी उन्हें अहसास हो सके।
सबसे अधिक चिन्ताजनक बात यह है कि उच्च और निम्न वर्गों के बीच की इस दरार के बारे में चेतना प्रसार के बदले मिथ्या चेतना प्रसार में राज्य पर दबाव डालने वाली स्थापित स्वार्थी संरचनाएँ ही नहीं, बौद्धिक और सर्जनात्मक तत्त्व भी जो समाज की आत्मा या अन्तःकरण माने जाते हैं, वे भी भागीदार नज़र आते हैं।
मिथ्या चेतना प्रसार के इस बड़े व्यापार में बहुत बड़ी भूमिका संख्या शास्त्र की है या संख्या शास्त्र की मूल प्रेरणाओं के विपरीत व्यवहार में उसे पूर्व स्थापित और नव स्थापित स्वार्थों के साँचे में ढालने की है। संख्या शास्त्र के क्रियाकलाप में बड़ी भूमिका आँकड़ों की है। आँकड़े ही वह ‘ब्रह्मास्त्र’ हैं जिनके द्वारा विपन्नों की वास्तविक स्थिति का मिथकीकरण कर उनके बुनियादी हितों पर सबसे बड़ा आघात होता है। आँकड़ों का भ्रमजाल ज़मीनी स्तर पर समर्थ अभिजन और असमर्थ ‘इत्यादि जन’ की दरार को सामने नहीं आने देता।
आँकड़ों द्वारा अँधेरे में रखे गए विकास के मूल्य-विमुख, समता-विरोधी, अमानुष और नकारात्मक पक्ष को ज़मीनी दृष्टि और अनुभव के आधार पर ये कविताएँ उजागर करती हैं। ये कविताएँ अध्ययन कक्ष के ‘एकान्त और प्रशान्त माहौल में स्मरण किए गए विचार मात्र नहीं हैं।’ न ये कवि के ‘संवेदी मन के स्वत:प्रसूत भावोद्गार मात्र हैं।’
अधिकांश कविताएँ ग्रामीण जगत् के कठोर और भयावह यथार्थ से जूझते ‘इत्यादि जनों’ से ज़मीनी स्तर पर आमने-सामने के ट्रौमा से उपजी रचनाएँ हैं। विकास (या अपविकास) का अमानुष चेहरा महज़ एक बुद्धिजीवी के दिमाग़ से उपजी अवधारणा नहीं है, यह ‘इत्यादि जनों’ की वास्तविक जीवन-स्थिति है, इसी सच्चाई पर ये रचनाएँ प्रकाश डालती हैं।
Bahati Ho Tum Nadi Nirantar
- Author Name:
Shyam Sunder Tiwari
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Hamare Jhooth Bhi Hamare Nahin
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Amita Sharma
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अमिता शर्मा की कविताओं की दुनिया काफ़ी विस्तृत और वैविध्यमयी है और यह विस्तार और वैविध्य मनमाना या अवधारणात्मक न होकर ऐसी अर्जित जीवनानुभूति है जो हमें अपने परिवेश को और उससे प्रतिकृत होनेवाले अपने दिलो–दिमाग़ की प्रतिक्रियाओं को भी उन पर पड़े अभ्यास और अतिपरिचय के जाले छुड़ाती हुई—एक नई समझ और नई विकलता के साथ स्वायत्त करने में मदद करती है। यह कविता यदि एक ओर ‘अख़बारी हादसे पलटते, अपनी सुरक्षा की धूप सेंकते रहने के सुख’ की आत्म–वंचना को उघाड़ती है तो दूसरी ओर वह नितान्त आज के सामाजिक अरण्य में ‘मेमने की खाल ओढ़े भेड़िए’ को भी पहचानती है और उस ‘जोकर’ को भी, जो ‘अपना सन्तुलन बनाए रखने के लिए सबको चाहिए।’ वह मानवी साहचर्य और अलगाव के एक समूचे वर्णपट को उकेर सकती है और ‘बिना घर की छतों’ को भी। वह उन ‘ईर्ष्याओं’ को भी जानती है जो औरों से आगे बढ़ने के लिए उत्तेजित करती हुई हमें अपने आपसे छोटा करती हैं, और उन सपनों को भी, जो ज़िन्दगी को बदलते नहीं, और जटिल कर देते हैं।
बन्धन और स्वातंत्र्य, अनिवार्य उत्पीड़न और उतनी ही दुर्दम्य मुक्ति–चेष्टा की छटपटाहट मानो अमिता की कविता के वादी–संवादी सुर हैं। सिमोन वेल की कृति ‘ऑपरेशन एंड लिबर्टी’ के आवरण–पृष्ठ पर खुले आसमान की पृष्ठभूमि में सलाखों का ‘क्लोज–अप’ जिस तरह उभरकर आता है, कुछ–कुछ उस तरह का कथ्य–रूप इन कविताओं के भीतर से उजागर होते देखा जा सकता है—‘कितनी विशाल खिड़की/कितना विशाल आसमान/पर दीखती हैं केवल उनके बीच की छड़ें’—किसी भी दृष्टिकोण की इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी! निश्चय ही अमिता के यहाँ अपसंस्कृति के विद्रूपों के बरक्स प्रकृति हमेशा विद्यमान रही है, किन्तु रूसो-ई रोमैन्टिक विद्रोह और वापसी के तर्ज पर नहीं। यह निहायत ही एतद्देशीय और निहायत आँख–सामने की हक़ीक़तों के भीतर से उजागर होता आत्महीनता का घेराव है जो अपने भोक्ता और साक्षी को इस प्रश्न के सम्मुख धकेलता है—‘इस असंज्ञ संस्कृति में/किस सच को हम अपना कहें/हमारे झूठ भी अपने नहीं।’
इन कविताओं में आत्म और अनात्म के ही नहीं, निजी और सार्वजनिक के बीच भी ख़ासी आवाजाही सम्भव हुई है। बौखलाहट, विक्षोभ की जगह सूखी–सान्द्र टिप्पणियों ने ले ली है जो हमारे निकट सम्बन्धों में भी घर करती जा रही रिक्ति की कचोट को भी सह्य बना लेती हैं कुछ इस तरह कि एक तरफ़ अपने दर्द को ‘अपनी तरह अपने से कह लेने’ और दूसरी तरफ़ ‘अपने अभिनय का द्रष्टा बनने’ के बीच चुनाव की गुंजाइश ही नहीं छूटती। ध्यान देने की बात मगर यह है कि दोनों को ‘मोक्ष’ की संज्ञा से अभिहित करना इस मूल्य–विपर्यय के युग को उसकी अपनी शर्तों पर स्वीकार लेना नहीं है। लगता है, जैसे मोक्ष या आत्मा जैसे पारम्परिक प्रत्ययों को ही नहीं, स्वतंत्रता और समता सरीखे शब्दों को भी उनका अर्थ–प्रामाण्य लौटा लेने के लिए इक्कीसवीं सदी के लेखकों को भी ‘एक्जाइल’ और ‘कनिंग’ के सूक्ष्म उपकरणों की उतनी ही ग़रज़ और दरकार है जितनी आधुनिकों को थी। ‘एक नितान्त ख़ाली जगह में’ अपने आपको ढूँढ़ने की समस्या और साँसत इस कविता की एक चरितनायिका की ही नहीं, हम सबकी है, और जिस दु:ख के सहारे यह खोज सम्भव होती है, वह भी एक अनिवार्य, किन्तु सार्थक दु:ख है।
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