Swachchhand
(0)
Author:
Prabhat Ranjan, Apoorvanand, Sumitranandan Pant, Ashok VajpeyiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
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कविश्री सुमित्रानंदन पंत का काव्य-संसार अत्यन्त विस्तृत और भव्य है। प्रायः काव्य-रसिकों के लिए इसके प्रत्येक कोने-अँतरे को जान पाना कठिन होता है। पंत जी की काव्य-सृष्टि में, किसी भी श्रेष्ठ कवि की तरह ही, स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठता के शिखरों के दर्शन होते हैं, नवीन काव्य-भावों के अभ्यास का ऊबड़-खाबड़, निचाट मैदान भी मिलता है और अवरुद्ध काव्य-प्रयासों के गड्ढे भी। किन्तु किसी कवि के स्वभाव को जानने के लिए यह आवश्यक होता है कि यत्नपूर्वक ही नहीं, रुचिपूर्वक भी उसके काव्य-संसार की यात्रा की जाए। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने पंत जी के बारे में लिखा कि आरम्भ में उनकी प्रवृत्ति इस जग-जीवन से अपने लिए सौन्दर्य का चयन करने की थी, आगे चलकर उनकी कविताओं में इस सौन्दर्य की सम्पूर्ण मानव जाति तक व्याप्ति की आकांक्षा प्रकट होने लगी। प्रकृति, प्रेम, लोक और समाज-विषय कोई भी हो, पंत-दृष्टि हर जगह उस सौन्दर्य का उद्घाटन करना चाहती है, जो प्रायः जीवन से बहिष्कृत रहता है। वह उतने तक स्वयं को सीमित नहीं करती, उस सौन्दर्य को एक मूल्य के रूप में अर्जित करने का यत्न करती है।</p> <p>सुमित्रानंदन पंत की जन्मशती के अवसर पर उनकी विपुल काव्य-सम्पदा से एक नया संचयन तैयार करना पंत जी के बाद विकसित होती हुई काव्य-रुचि का व्यापक अर्थ में अपने पूर्ववर्ती के साथ एक नए प्रकार का सम्बन्ध बनाने का उपक्रम है। यह चयन पंत जी के अन्तिम दौर की कविताओं के इर्द-गिर्द ही नहीं घूमता, जो काल की दृष्टि से हमारे अधिक निकट हैं; बल्कि उनके बिलकुल आरम्भिक काल की कविताओं से लेकर अन्तिम दौर तक की कविताओं के विस्तार को समेटने की चेष्टा करता है। चयन के पीछे पंत जी को किसी राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा, किसी नई नैतिक-दार्शनिक, दृष्टि जैसे काव्य-बाह्य दबाव में नए ढंग से प्रस्तुत करने की प्रेरणा नहीं है—यह एक नई शताब्दी और सहस्राब्दी की उषा वेला में मनुष्य की उस आदिम, साथ ही चिरनवीन सौन्दर्याकांक्षा का स्मरण है, पंत जी जैसे कवि जिसे प्रत्येक युग में आश्चर्यजनक शिल्प की तरह गढ़ जाते हैं।</p> <p>किसी कवि की जन्मशती के अवसर पर परवर्ती पीढ़ी की इससे अच्छी श्रद्धांजलि क्या हो सकती है कि वह उसे अपने लिए सौन्दर्यात्मक विधि से समकालीन करे। पंत-शती के उपलक्ष्य में उनकी कविताओं के संचयन को ‘स्वच्छंद’ कहने के पीछे मात्र पंत जी की नहीं, साहित्य मात्र की मूल प्रवृत्ति की ओर भी संकेत है। संचयन में कालक्रम के स्थान पर एक नया अदृश्य क्रम दिया गया है, जिसमें कवि-दृष्टि, प्रकृति, मानव-मन, व्यक्तिगत जीवन, लोक और समाज के बीच संचरण करते हुए अपना एक कवि-दर्शन तैयार करती है। ‘स्वच्छन्द’ के माध्यम से पंत जी के प्रति विस्मरण का प्रत्याख्यान तो है ही, इस बात को नए ढंग से चिह्नित भी करना है कि जैसे प्रकृति का सौन्दर्य प्रत्येक भिन्न दृष्टि के लिए विशिष्ट है, वैसे ही कवि-संसार का सौन्दर्य भी अशेष है, जिसे नई दृष्टि अपने लिए विशिष्ट प्रकार से उपलब्ध करती है।
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कविश्री सुमित्रानंदन पंत का काव्य-संसार अत्यन्त विस्तृत और भव्य है। प्रायः काव्य-रसिकों के लिए इसके प्रत्येक कोने-अँतरे को जान पाना कठिन होता है। पंत जी की काव्य-सृष्टि में, किसी भी श्रेष्ठ कवि की तरह ही, स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठता के शिखरों के दर्शन होते हैं, नवीन काव्य-भावों के अभ्यास का ऊबड़-खाबड़, निचाट मैदान भी मिलता है और अवरुद्ध काव्य-प्रयासों के गड्ढे भी। किन्तु किसी कवि के स्वभाव को जानने के लिए यह आवश्यक होता है कि यत्नपूर्वक ही नहीं, रुचिपूर्वक भी उसके काव्य-संसार की यात्रा की जाए। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने पंत जी के बारे में लिखा कि आरम्भ में उनकी प्रवृत्ति इस जग-जीवन से अपने लिए सौन्दर्य का चयन करने की थी, आगे चलकर उनकी कविताओं में इस सौन्दर्य की सम्पूर्ण मानव जाति तक व्याप्ति की आकांक्षा प्रकट होने लगी। प्रकृति, प्रेम, लोक और समाज-विषय कोई भी हो, पंत-दृष्टि हर जगह उस सौन्दर्य का उद्घाटन करना चाहती है, जो प्रायः जीवन से बहिष्कृत रहता है। वह उतने तक स्वयं को सीमित नहीं करती, उस सौन्दर्य को एक मूल्य के रूप में अर्जित करने का यत्न करती है।</p>
<p>सुमित्रानंदन पंत की जन्मशती के अवसर पर उनकी विपुल काव्य-सम्पदा से एक नया संचयन तैयार करना पंत जी के बाद विकसित होती हुई काव्य-रुचि का व्यापक अर्थ में अपने पूर्ववर्ती के साथ एक नए प्रकार का सम्बन्ध बनाने का उपक्रम है। यह चयन पंत जी के अन्तिम दौर की कविताओं के इर्द-गिर्द ही नहीं घूमता, जो काल की दृष्टि से हमारे अधिक निकट हैं; बल्कि उनके बिलकुल आरम्भिक काल की कविताओं से लेकर अन्तिम दौर तक की कविताओं के विस्तार को समेटने की चेष्टा करता है। चयन के पीछे पंत जी को किसी राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा, किसी नई नैतिक-दार्शनिक, दृष्टि जैसे काव्य-बाह्य दबाव में नए ढंग से प्रस्तुत करने की प्रेरणा नहीं है—यह एक नई शताब्दी और सहस्राब्दी की उषा वेला में मनुष्य की उस आदिम, साथ ही चिरनवीन सौन्दर्याकांक्षा का स्मरण है, पंत जी जैसे कवि जिसे प्रत्येक युग में आश्चर्यजनक शिल्प की तरह गढ़ जाते हैं।</p>
<p>किसी कवि की जन्मशती के अवसर पर परवर्ती पीढ़ी की इससे अच्छी श्रद्धांजलि क्या हो सकती है कि वह उसे अपने लिए सौन्दर्यात्मक विधि से समकालीन करे। पंत-शती के उपलक्ष्य में उनकी कविताओं के संचयन को ‘स्वच्छंद’ कहने के पीछे मात्र पंत जी की नहीं, साहित्य मात्र की मूल प्रवृत्ति की ओर भी संकेत है। संचयन में कालक्रम के स्थान पर एक नया अदृश्य क्रम दिया गया है, जिसमें कवि-दृष्टि, प्रकृति, मानव-मन, व्यक्तिगत जीवन, लोक और समाज के बीच संचरण करते हुए अपना एक कवि-दर्शन तैयार करती है। ‘स्वच्छन्द’ के माध्यम से पंत जी के प्रति विस्मरण का प्रत्याख्यान तो है ही, इस बात को नए ढंग से चिह्नित भी करना है कि जैसे प्रकृति का सौन्दर्य प्रत्येक भिन्न दृष्टि के लिए विशिष्ट है, वैसे ही कवि-संसार का सौन्दर्य भी अशेष है, जिसे नई दृष्टि अपने लिए विशिष्ट प्रकार से उपलब्ध करती है।
Book Details
-
ISBN9788126700929
-
Pages171
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भारतभूषण अग्रवाल की कविता बिना किसी नाटकीयता, बिना कोई चीख़-पुकार मचाए ईमानदारी से अपनी सच्चाई को देखती-परखती कविता है। उसमें रूमानी आवेग से लेकर मुक्त हास्य, विद्रूप से लेकर अनुराग और कोमलता की कई छवियाँ, सभी शामिल हैं। कामकाजी मध्यवर्ग की विडम्बनाएँ, संवेदनशील व्यक्ति के ऊहापोह, शहराती ज़िन्दगी के रोज़मर्रा के सुख-दु:ख आदि को भारत जी ईमानदारी और पारदर्शिता से अपनी कविता में जगह देते हैं। उनमें अपनी विशिष्टता का रत्ती-भर भी आग्रह नहीं है। बल्कि अगर आग्रह है तो अपनी सीधी-सादी, सरल जान पड़ती लेकिन दरअसल जटिल साधारणता का। यह आग्रह उनकी आवाज़ को और सघन तथा उत्कट बनाता है।
उनकी कविता अपने को महत्त्वाकांक्षा के किसी विराट लोक में विलीन नहीं करती। वह अपनी उत्सुकताओं और बेचैनियों को जतन से नबेरती है। वह कविता में विकल्प इतना नहीं खोजती जितना सच्चाई की ही कई अन्यथा अलक्षित रह जानेवाली परतों को। कविता में कवि का यह अहसास बराबर मौजूद है कि सच्चाई और ज़िन्दगी कविता से कहीं बड़ी और व्यापक हैं और वे कविता में अँट नहीं पा रही हैं।
Agar Itane Se
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Ashok Vajpeyi
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Awating description for this book
Punarvasu
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Ashok Vajpeyi
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जब भी हम अनुवाद, विशेषकर कविता का अनुवाद पढ़ते हैं, हम संशय में होते हैं। यह संशय तब तो और भी ज़्यादा होता है जब वह कविता, मसलन, फ़्रेंच या स्वीडिश से अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ी से हिन्दी जैसे तिर्यक रास्ते से भटकती आती हम तक पहुँचती है। “क्या वह ठीक वही कविता रह पाती है, जैसी वह मूल में है?” —यह संशय अनुवाद से ज़्यादा, अनुवाद की ओट में वस्तुतः कविता को लेकर संशय है जो इस विश्वास से जनमता है कि कविता का एक ‘स्थिर’, ‘मूल’ रूप होता है जो उस भाषा, शैली और ढाँचे में सुरक्षित होता है जिसमें वह लिखी गई है; और यह विश्वास भी कि जब हम उसे उसके ‘मूल रूप’ में पढ़ रहे होते हैं तब हम उसे यथा—अर्थतः ग्रहण कर रहे होते हैं। प्रस्तुत चयन हमें इस अन्धविश्वास से मुक्त करता हुआ उस विस्मयकारी प्रक्रिया के क़रीब ले जाता है जिसमें कविता भाषा, शैली और संरचना का निरन्तर उत्सर्जन करती हुई उस ‘एजेंसी’ की पकड़ से बाहर जाती रहती है जिसे हम ‘कवि’ या ‘रचयिता’ या ‘मूल’ कहते हैं।
इस चयन को पढ़ते हुए हम अनुभव करते हैं कि कविता निरन्तर रूपान्तरित और परिशोधित होती ऊर्जा है (जैसाकि इस चयन में शामिल स्वीडिश कवि टोमास ट्रान्सट्रोमर भी मानते हैं) और वह तभी तक ऊर्जा है जब तक वह रूपान्तरण और परिशोधन की प्रक्रिया में है। वह या तो मूल का निषेध है या वे तमाम पाठक उसका मूल हैं जो उसे अपनी सृजनात्मकता के भीतर से परिशोधित, रूपान्तरित और मुक्त होने देते हैं। वह किसी विशिष्ट देश, विशिष्ट भाषा या विशिष्ट कवि का सृजन नहीं, पाठक का सृजन है और इसी अर्थ में वह देश, भाषा और कवि का सृजन है। इस चयन में शामिल सारे अनुवादक ऐसे ही पाठक हैं और इसीलिए इन अनुवादों को पढ़ना, अपने भीतर निहित पाठक को उद्दीप्त कर उसे कविता के ‘होने’ की सतत प्रक्रिया में हिस्सेदार बनाना है; उसे उसकी ‘कर्मवाचक’ स्थिति से मुक्त कर कर्त्तृवाचक स्थिति में ले जाना है और अन्ततः उसे यह बोध कराना है कि कम से कम कविता की दुनिया में कर्तृत्त्व, स्वत्त्व का साधन नहीं है, वह स्वत्त्व का निषेध है।
कहना न होगा कि पाठक को उसकी इस गम्भीर और सृजनात्मक स्थिति का बोध करानेवाली यह एक अद्वितीय पुस्तक है। मनुष्यों के छह महाद्वीपों के बीच छुपा हुआ एक सातवाँ महाद्वीप है। जहाँ और जब भी कोई कविता लिखी (और पढ़ी) जाती है, यह महाद्वीप मूर्त और स्पन्दित होता है। इस महाद्वीप पर अस्तित्व का पुनर्वास होता है। हम इस महाद्वीप को ‘पुनर्वसु’ कहकर पुकार सकते हैं।
Vivaksha
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Ashok Vajpeyi
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अपनी सक्रियता, सृजनशीलता, विचारोत्तेजना और मुखरता से हिन्दी साहित्य के परिदृश्य में लगातार एक अलग उपस्थिति बने अशोक वाजपेयी ने लगभग पचास वर्ष पहले कविता-प्रवेश किया था। इस दौरान हिन्दी कविता में आए परिवर्तनों और आन्दोलनों से अपने को सुपरिचित रखते हुए भी, उनकी अपनी अलग राह रही है जिस पर वे लगभग ज़िद कर चलते रहे हैं। अपनी कविता-यात्रा को ‘शब्द के साथ प्रयोगों की प्रेमकथा’ बतानेवाले वे एक ऐसे कवि हैं जिनमें जीवनासक्ति और शब्दासक्ति के बीच कोई द्वैत नहीं है। अपने समय और समाज की जटिल सच्चाइयों के प्रति सजग और संवेदनशील रहते हुए यह एक ऐसी कविता है जिसमें निजी और सामाजिक को निरन्तर संगुम्फित किया गया है। कभी साक्षी, कभी सहचर, कभी हिस्सेदार यह कवि अपने समय में अन्तर्निहित दूसरे समयों को भी कविता में विन्यस्त करने की चेष्टा करता रहा है।
अब तक प्रकाशित अपने बारह कविता-संग्रहों में से लगभग दो सौ कविताएँ इस संचयन के लिए स्वयं अशोक वाजपेयी ने चुनी हैं। प्रेम, मृत्यु, दुनिया, शब्द, पूर्वज, कलाएँ, घर-पड़ोस आदि थीमों के इर्द-गिर्द बुना हुआ यह संकलन अशोक वाजपेयी के श्रेष्ठ काव्य के आस्वादन का एक नया अवसर भर नहीं जुटाता, वह इस दौरान लिखी गई हिन्दी कविता के कुछ परिष्कृत-जटिल पर सम्प्रेषणीय अंश को भी एकत्र करता है। कवि के पैंसठ वर्ष की आयु पूरी करने पर यह संचयन विशेष रूप से प्रकाशित है। भूमिका पोलिश विदुषी रेनाता चेकाल्स्का ने लिखी है जो कई बरसों से अशोक वाजपेयी की कविता का अध्ययन करती रही हैं।
Thodi Si Jagah
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Ashok Vajpeyi
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अशोक वाजपेयी हिन्दी के समकालीन कवियों में उन थोड़े-से लोगों में से हैं जिन्होंने अपने समय में प्रेम की सघनता, उत्कृष्टता और महिमा को लगातार अपनी कविता के केन्द्र में बनाए रखा है। एक ऐसे समय में जब रति और शृंगार के पारम्परिक सौन्दर्य-मूल्य कविता के दृश्य से ग़ायब ही हो गए हैं, अशोक वाजपेयी ने उन्हीं को अपनी कविता में सबसे अधिक जगह दी है। उनकी प्रेम कविता में जो ऐन्द्रिकता है, वह परम्परा को पुनराविष्कृत करती है और साथ ही उसे समकालीन आँच और लपक भी देती है। प्रेम की अनेक सूक्ष्मताएँ खड़ी बोली में इन कविताओं के माध्यम से पहली बार कविता के परिसर में प्रवेश करती हैं।
प्रेम में, अशोक वाजपेयी के कविता-संसार में भरा-पूरापन है, रसिकता और प्रयास है। उसमें जीवन से भागकर कहीं और नहीं, बल्कि इसी अच्छी-बुरी दुनिया में अपने लिए थोड़ी-सी जगह पाने की दुर्लभ ज़िद है।
कविता में प्रेम करना या कि प्रेम की कविता करना अशोक वाजपेयी की अदम्य जिजीविषा का ही प्रमाण है। यह स्पन्दन और ऊष्मा की पुस्तक है : प्रेम के स्पन्दन, जीवन और भाषा की ऊष्मा की पुस्तक।
Kahin Nahin Vahin
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Ashok Vajpeyi
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अनुपस्थिति, अवसान और लोप से पहले भी अशोक वाजपेयी की कविता का सरोकार रहा है, पर इस संग्रह में उनकी अनुभूति अप्रत्याशित रूप से मार्मिक और तीव्र है। उन्हें चरितार्थ करनेवाली काव्यभाषा अपनी शान्त अवसन्नता से विचलित करती है। निपट अन्त और निरन्तरता का द्वन्द्व, होने–न–होने की गोधूलि, आसक्ति और निर्मोह का युग्म उनकी इधर लगातार बढ़ती समावेशिता को और भी विशद और अर्थगर्भी बनाता है।
अशोक वाजपेयी उन कवियों में हैं जो कि निरे सामाजिक या निरे निजी सरोकारों से सीमित रहने के बजाय मनुष्य की स्थिति के बारे में, अवसान, रति, प्रेम, भाषा आदि के बारे में चरम प्रश्नों को कविता में पूछना और उनसे सजग ऐन्द्रियता के साथ जूझना, मनुष्य की समानता से बेपरवाह हुए जाते युग में, अपना ज़रूरी काम मानते हैं। बिना दार्शनिकता का बोझ उठाए या आध्यात्मिकता का मुलम्मा चढ़ाए उनकी कविता विचारोत्तेजना देती है।
अशोक वाजपेयी की गद्य कविताएँ, उनकी अपनी काव्य-परम्परा के अनुरूप ही, रोज़मर्रा और साधारण लगती स्थितियों का बखान करते हुए, अनायास ही अप्रत्याशित और बेचैन करनेवाली विचारोत्तेजक परिणतियों तक पहुँचती हैं।
यह संग्रह बेचैनी और विकलता का एक दस्तावेज़ है—उसमें अनाहत जिजीविषा और जीवनरति ने चिन्ता और जिज्ञासा के साथ नया नाजुक सन्तुलन बनाया है। कविता के पीछे भरा–पूरा जीवन, अपनी पूरी ऐन्द्रियता और प्रश्नाकुलता में, स्पन्दित है। एक बार फिर यह बात रेखांकित होती है कि हमारे कठिन और कविताविमुख समय में कविता संवेदनात्मक चैकन्नेपन, गहरी चिन्तनमयता, उत्कट जीवनासक्ति और शब्द की शक्ति एवं अद्वितीयता में आस्था से ही सम्भव है। यह साथ देनेवाली पासपड़ोस की कविता है, जिसमें एक पल के लिए हमारा अपना संघर्ष, असंख्य जीवनच्छवियाँ और भाषा में हमारी असमाप्य सम्भावनाएँ विन्यस्त और पारदर्शी होती चलती हैं ।
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