Sadran
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सदरां दा सफ़र खारीयां रातां तों कसैले दिन, सुफनेयां दे निघ तों उडीक दी पीड़, ओसीयां भरीयां ‘तरकालां’ तों हिजर दी हूक निकियां-निकियां उम्मीदां, उडीकां ते गुआचीआं मुस्कुराहटां तों उस ‘किल’ तक दा है जो ऐसी ‘पीड़’ दे गया जिस तों कई जन्मां, रिश्तेयां ते रुतां दे बाद वी निजात नहीं मिली जापदी। बिट्टू दियां सदरां पता नहीं केहड़े जन्म तों केहड़ा पतझड़ ते केहड़ी बसन्त आपणी पोटली च बन लेआइयां हन। गल ख़ास एह है कि बिट्टू दी पहली किताब ‘सफ़ीना’ 2009 विच हिन्दुस्तानी दा लड़ फड़ डूंगे उफानी रुहानी समुंदरां च गोते लाउंदी सी। अज उनां समुंदरां ने साडे आले दुआले दी मिट्टी नू गल ला पंजाबी विच गुनीआं सदरां नू साडी झोली पाया ए। एह मिट्टी दा असर वी है। ते हां जो बिट्टू संधू नू नहीं जाणदे ते सिर्फ़ ‘सफ़ीना’ दी उर्दू हिन्दी विच बुणी महीन कविता नू मणदे हन। उन्हा लई एह ख़ुशख़बरी है कि पंजाबी बिट्टू संधू नू उन्हां दी अम्मी तों मिलया तोहफ़ा है। पनताली कवितावां विच लखां सदरां करोड़ां सुफनेआं ते अनगिणत सफ़र नामेयां दा एह ज़िक्र ख़ूबसूरत है बिट्टू च रचेया, मिचेया हूबहू उसदे नाल दा, बिलकुल उसदे हाल दा।
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सदरां दा सफ़र खारीयां रातां तों कसैले दिन, सुफनेयां दे निघ तों उडीक दी पीड़, ओसीयां भरीयां ‘तरकालां’ तों हिजर दी हूक निकियां-निकियां उम्मीदां, उडीकां ते गुआचीआं मुस्कुराहटां तों उस ‘किल’ तक दा है जो ऐसी ‘पीड़’ दे गया जिस तों कई जन्मां, रिश्तेयां ते रुतां दे बाद वी निजात नहीं मिली जापदी।
बिट्टू दियां सदरां पता नहीं केहड़े जन्म तों केहड़ा पतझड़ ते केहड़ी बसन्त आपणी पोटली च बन लेआइयां हन।
गल ख़ास एह है कि बिट्टू दी पहली किताब ‘सफ़ीना’ 2009 विच हिन्दुस्तानी दा लड़ फड़ डूंगे उफानी रुहानी समुंदरां च गोते लाउंदी सी। अज उनां समुंदरां ने साडे आले दुआले दी मिट्टी नू गल ला पंजाबी विच गुनीआं सदरां नू साडी झोली पाया ए।
एह मिट्टी दा असर वी है। ते हां जो बिट्टू संधू नू नहीं जाणदे ते सिर्फ़ ‘सफ़ीना’ दी उर्दू हिन्दी विच बुणी महीन कविता नू मणदे हन। उन्हा लई एह ख़ुशख़बरी है कि पंजाबी बिट्टू संधू नू उन्हां दी अम्मी तों मिलया तोहफ़ा है।
पनताली कवितावां विच लखां सदरां करोड़ां सुफनेआं ते अनगिणत सफ़र नामेयां दा एह ज़िक्र ख़ूबसूरत है बिट्टू च रचेया, मिचेया हूबहू उसदे नाल दा, बिलकुल उसदे हाल दा।
Book Details
-
ISBN9788126721573
-
Pages112
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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राजेश जोशी का यह कविता-संग्रह हिन्दी कविता का एक नया शिखर है। तीन दशकों से भी अधिक की काव्य-साधना एवं जीवन के लगभग साठ वसन्तों की हरीतिमा से दीप्त यह संग्रह अनेक स्वरों का विलक्षण पुंज है। राजेश ने न केवल अपने को बदला है, बल्कि अपने को बदलते हुए समस्त समकालीन काव्य में सर्वथा नए घूर्ण उत्पन्न कर दिए हैं। वे सारे गुण और स्वाद जिनके लिए राजेश जोशी जाने और माने जाते हैं, यहाँ अपनी पूर्णता एवं सौष्ठव के साथ उपस्थित हैं, साथ ही बहुत कुछ ऐसा भी है जो नितान्त अप्रत्याशित पर आह्लादकारी है और वह है जीवन को उसकी जटिलता में जाकर देखने का उपक्रम, सभी तहों-परतों को उलट-पुलट अनुभव के नामिक तक उत्खनन का धैर्य—‘दिखने में जो अक्सर आसान से दिखते हैं एक कवि को करने होते हैं ऐसे कई पेचीदा काम’। और इसके लिए राजेश तदनुरूप भाषा की खोज भी करते हैं, बनी-बनाई भाषिक आदतों को छोड़ते हुए वह अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाते हैं—‘ताप से भरे शब्दों’ को ढूँढ़ते दूर बीहड़ में जाते हैं और ‘आँसुओं के लिए’ भी ढूँढ़ लाते हैं वैसे ही ‘पारदर्शी शब्द’। राजेश की कविता हमारे समय का ऐसा संघनित दस्तावेज़ है कि केवल उसके आधार पर हम समकालीन भारत का एक दृश्य-लेख बना सकते हैं। इतने तात्कालिक ब्योरे हैं यहाँ, इतने प्रसंग, पात्र और राजनीतिक-सामाजिक उद्वेलन। साथ ही उनकी कविता जीवन के उन तन्तुओं की खोज करती है जहाँ उन उद्वेलनों का कम्प सबसे तीव्र है, और उन लोगों का यशोगान करती है जो निरन्तर संघर्ष करते हुए जीवन को बदलने का ताब रखते हैं। उनकी कविता साहस के साथ सत्ता के सभी पायदानों पर वार करती है, एक विराट सत्ता जो अर्थव्यवस्था से लेकर हमारी रसोई तक व्याप्त है। नागार्जुन और धूमिल के बाद सत्ता के तिलिस्म को उघाड़नेवाले सर्वाधिक सशक्त कवि राजेशी जोशी हैं। आख्यान, कथोपकथन, लोक-कथाओं के स्वप्न-वृत्तान्त, जातीय मिथक, अतियथार्थ के खम, सपाटबयानी, शब्दों के खेल और कल्पना-क्रीड़ा, फंतासी सब कुछ मिलकर एक नया रसायन बनाते हैं जो अन्यत्र दुलर्भ है। राजेश की कविता अब भाषा के नए उपकरणों एवं आयुधों का व्यवहार करती है तथा कविता को वहाँ ले जाती है जहाँ भाषा ‘अर्थ से अधिक अभिप्रायों में निवास करती है’। यह ठोस जगत् की, ठोस जीवन की कविता है उर्फ़ चाँद की वर्तनी नीले नभ पर। — अरुण कमल
Be-Lagaam Shayari
- Author Name:
Sanjiv Saraf
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‘बे-लगाम शाइरी’ उन शाइरों के अदम्य साहस का जश्न मनाती है, जो सामाजिक रीति-रिवाजों, परंपराओं और नैतिकता की आम कसौटियों को चुनौती देने की हिम्मत रखते हैं। ये आज़ाद-ख़याल शाइर अपनी पैनी और सटीक शाइरी के ज़रीए पुराने जड़ विचारों पर वार करते हैं और “पवित्रता” के ठेकेदारों का ख़ूब मज़ाक़ उड़ाते हैं। उनके लिए कुछ भी और कोई भी इतना पवित्र या ख़राब नहीं कि उस पर सवाल न उठाया जा सके या उस पर बात न की जा सके — चाहे वो ख़ुदा हो, धर्म हो, शराब-नोशी पर पाबंदी लगाने वाले उपदेशक हों, जिस्मानियत का ज़िक्र हो, या फिर समलैंगिकता की बातें हों। ये शाइर हर तरह की रोक-टोक, ज़ुल्म, और ‘ये करो–ये न करो’ जैसी बंदिशों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं। हाज़िर-जवाबी और तंज़ (व्यंग्य) इन शाइरों के सबसे धारदार हथियार हैं, और इन्हीं के सहारे वो अपनी बात पाठक के दिल में उतार देते हैं। इस किताब में संजीव सराफ़ ने बेहद मेहनत और लगन से ऐसे अश्आर चुनकर पेश किए हैं, जो इस अपारंपरिक शाइरी की पूरी दुनिया का एक संक्षिप्त परिचय देते हैं। उद्योगपति, निवेशक और सामाजिक उद्यमी संजीव सराफ़ कई भूमिकाएँ निभाते नज़र आते हैं, लेकिन उर्दू शाइरी का जुनून उनके दिल के सबसे क़रीब है। उन्होंने रेख़्ता फ़ाउंडेशन की स्थापना की, जो उर्दू भाषा और साहित्य की दुनिया का सबसे बड़ा और लोकप्रिय प्लैटफ़ॉर्म है। साथ ही ये संस्था उर्दू के पुराने ग्रंथों के संरक्षण और युवाओं के बीच उर्दू को बढ़ावा देने के लिए साहित्यिक उत्सवों और अन्य कार्यक्रमों के आयोजन का व्यापक काम कर रही है। सिंधिया स्कूल (1975) और आई.आई.टी. खड़गपुर (1980) के पूर्वछात्र रहे संजीव, कारोबार और उद्योग में तीस से अधिक वर्षों से सक्रिय हैं। इस दौरान उन्होंने पॉलीप्लेक्स कॉरपोरेशन लिमिटेड (एक भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनी) की स्थापना की। साथ ही उन्होंने मनुपत्र (भारत का प्रमुख लीगल डेटाबेस) स्थापित की और ग्रीन-एनर्जी के क्षेत्र में कई छोटे-बड़ी परियोजनाएँ शुरू कीं। इसके बाद उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा उर्दू साहित्य पर केंद्रित कर दी और अब पूरी तरह इसी क्षेत्र में सक्रिय हैं, जिसे वो अब तक के अपने जीवन का सबसे संतोषजनक काम कहते हैं। संजीव को कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है, जिनमें 2016 में मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद की डॉक्टर ऑफ़ लेटर्स (D.Litt.) की उपाधि; 2018 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का नैशनल सर सय्यद एक्सिलेंस अवार्ड; 2020 में रेख़्ता फ़ाउंडेशन के माध्यम से उत्कृष्ट काम के लिए सिंधिया स्कूल का माधव अवॉर्ड; और 2022 में उनके अल्मा मेटर आई.आई.टी. खड़गपुर द्वारा दिए गए डिस्टिंग्विश्ड एलमनाई अवॉर्ड शामिल हैं।
Hazaar Daastaan-e-Ishq
- Author Name:
Sanjiv Saraf
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The exquisite journey of love passes through numerous twists and turns, bringing different experiences to each individual. In Urdu poetry, poets have penned down these diverse experiences in rhyme with a sheer eloquence that aptly expresses the exceptional bond between the lover and the beloved. Meer, Ghalib, Momin, Dagh, Faiz, and hundreds of Urdu poets have given voice to the emotions of lovers going through stages such as longing, interplay, loving, possessiveness, rivalry, separation, breaking up, and frenzy. This eloquence makes every reader share this thought, as was inimitably expressed by Mirza Ghalib: Dekhna taqreer ki lazzat ki jo us ne kahaa Maine ye jaanaa ki goyaa ye bhi mere dil men hai ‘Love Longing Loss in Urdu Poetry’ narrates the enchanting tale of this journey that includes the subtle nuances and the beauty of Urdu poetry with all its grace. Also, this book is available in Hindi and Urdu languages with the title "Hazaar Daastaan-e-Ishq".
Main Jab Tak Aayi Bahar
- Author Name:
Gagan Gill
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‘मैं क्यों कहूँगी तुम से/अब और नहीं/सहा जाता/मेरे ईश्वर’—गगन गिल की ये काव्य-पंक्तियाँ किसी निजी पीड़ा की ही अभिव्यक्ति हैं या हमारे समय के दर्द का अहसास भी? और जब यह पीड़ा अपने पाठक को संवेदित करने लगती है तो क्या वह अभिव्यक्ति प्रकारान्तर से प्रतिरोध की ऐसी कविता नहीं हो जाती, जिसमें ‘दर्दे-तनहा’ और ‘ग़मे-ज़माना’ का कथित भेद मिटकर ‘दर्दे-इनसान’ हो जाता है? कविता इसी तरह इतिहास अर्थात समय का काव्यान्तरण सम्भव करने की ओर उन्मुख होती है।
गगन गिल की इन आत्मपरक-सी लगती कविताओं के वैशिष्ट्य को पहचानने के लिए मुक्तिबोध के इस कथन का स्मरण करना उपयोगी हो सकता है कि कविता के सन्दर्भ ‘काव्य में व्यक्त भाव या भावना के भीतर से भी दीपित और ज्योतित’ होते हैं, उनका स्थूल संकेत या भाव-प्रसंगों अथवा वस्तु-तथ्यों का विवरण आवश्यक नहीं है। इन कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है—बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह।
यह भी कह सकते हैं कि ये कविताएँ प्रार्थना के नये-से शिल्प में प्रतिरोध की कविताएँ हैं—प्रतिरोध उस हर सत्ता-रूप के सम्मुख जो मानवत्व मात्र पर, स्त्रीत्व पर भी, आघात करता है। इन आघातों का दर्द अपने एकान्त में सहने पर ही कवि-मन पहचान पाता है कि ‘मैं जब तक आयी बाहर एकान्त से अपने/बदल चुका था मर्म भाषा का’। ये कविताएँ काव्य-भाषा को उसकी मार्मिकता लौटाने की कोशिश कही जा सकती हैं।
—नन्दकिशोर आचार्य
Dhoop Ka Tukda
- Author Name:
Amrita Preetam +1
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अमृता प्रीतम की कविताओं में रमना, हृदय में कसकती व्यथा का घाव लेकर, प्रेम और सौन्दर्य की धूपछाँह-वीथी में विचरने के समान है, जहाँ वियोग तथा अतृप्ति के तीखे नुकीले काँटे भावना के सुकुमार चरणों को क्षत-विक्षत करते रहते हैं । ऐसी गहरी, दर्द में डूबी, प्राणिक संवेदनाओं के गीत कम ही देखने को मिलते हैं। अमृताजी धरती के जीवन के गीत भी गाती हैं । वह युग-संघर्ष के प्रति प्रबुद्ध होने के कारण प्रगतिशील भावधारा से प्रेरित हैं, किन्तु प्रेम के प्रति एकाग्र समर्पण ही उनकी जीवन-साधना तथा आत्म-विकास का एकान्त पथ है।
अमृताजी की कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव-धनी, स्वप्न-संस्कृत तथा शिल्प-समृद्ध बनेगा। इन कविताओं से यह सहज ही प्रमाणित हो जाता है कि अमृताजी का स्थान पंजाबी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में भी प्रथम श्रेणी के योग्य है । इस संग्रह से हिन्दी के नये कवियों को विशेष प्रेरणा मिलेगी। जिस गहरी भाव-संवेदना, सामाजिक यथार्थ तथा युग मानव की व्यथा का सच्चा चित्रण अमृताजी ने अपनी नारी-हृदय की जादू-तूली से इन कविताओं में किया है, वह उनकी कृति को एक अत्यन्त उच्च तथा व्यापक स्तर पर उठा देती है।
—सुमित्रानन्दन पंत
Aakash Dharti Ko Khatkhataata Hai
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla +1
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विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में उन थोड़े से ऐसे कवियों में शुमार हैं जिन्होंने समकालीन कविता की दिशा और दृष्टि को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया है। उनकी इस हैसियत को हिन्दी में लगभग सभी कवियों ने स्वीकार किया है।
काव्याभिव्यक्ति में मित कथनों का जितना सार्थक प्रयोग वे करते हैं, उतना शमशेर ही कर पाते थे। शब्दों को कम से कम ख़र्च करके कैसे अर्थ के भंडार को समेटा जाए इसे सीखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता काम की चीज़ है।
उनकी कविता नितांत समसामयिक होकर भी समयातीत लगती है। वह पीछे भी देखती है और आगे भी, पर उल्लेखनीय बात यह है कि वह अपने समय में धँसी होने के बावजूद अपने समय में फँसती नहीं है। उनके काव्यबोध में जो अचूक क़िस्म की पारदर्शी सूक्ष्मता है, वह कई लोगों को जटिलता, रूपवाद, कलावाद का अवतार लगती है लेकिन रूपवादी कविता है नहीं। काव्य-प्रयोगों के लिए उनसे बड़ा कवि आज कम से कम हिन्दी में दिखाई नहीं देता
वे विचारधारा के पुल से होकर रास्ता तय करने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि वे कविता की नदी को ख़ुद तैर कर पार करने वाले कवि हैं। कम से कम उनके लम्बे कवि-कर्म का संघर्ष यही प्रतिमान हमारे सामने रखता है। वे हिन्दी कविता के संसार में उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने चालू मुहावरे को तोड़कर अपनी कविता में संवेदना और काव्य-शिल्प के लिए अनोखा आयाम चुना है। अपनी काव्यभाषा के चुनाव में वे जितने विरल, संयमी और जागरूक कवि हैं, उतने कम ही कवि रहे हैं। यह उनकी चुनिन्दा कविताओं का संकलन है।
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