Sanvali Ibaaratein
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‘साँवली इबारतें’ की कविताएँ एक ऐसे समय में लिखी गई हैं, जिसमें न्याय, सौन्दर्य और मनुष्य जीवन को सँवारने वाली कोमलता का विलोप हो रहा है। ऐसे में कविता लिखना मृत्यु पाने का निमंत्रण भी बन सकता है। समानता की लालसा रखने वाले लोगों पर रोज़ गोलियाँ चल रही हैं, फिर भी कवि अपने लिए इससे बेहतर काम नहीं खोजना चाहती। कविता ही उसका घर है; यहीं वह अपने मित्रों, शत्रुओं और मृत्यु को भी आने का निमंत्रण देती है। वह अपने शहर, मोहल्ले या देश से भी निष्कासित नहीं होना चाहती। वह इसी शहर में रहेगी जहाँ वह रहती है, जहाँ बसने में किसी ईश्वर ने उसकी मदद नहीं की बल्कि पड़ोसी, अजनबी लोग, यहाँ तक कि यहाँ के पेड़-पौधे ही ज़्यादा हितकारी रहे। इस जुझारू जीवन-अनुभव के कारण वह उन लोगों को सलाह देती है जो कविता को किसी तमग़े की तरह पहनना चाहते हैं, उसके जोखिम को नहीं उठाते। इस अन्धकार भरे समय में प्रेम करना भी जोखिम-भरा काम है, उतना ही जितना कविता लिखना लेकिन कवि की पूरी संलग्नता है इस पदार्थीय जीवन से। वह देखती और समझती है कि यह सारी प्रकृति, कायनात सारी, अपने जगरूप में बेहद सुन्दर है और मनुष्य के लिए कल्याणकारी भी। वह आश्वस्त है कि उसकी आँखों के जल में यह रोशनी-भरा संसार अपना जगरूप देख सकता है जैसे कि मनुष्य अपने सुन्दर विचारों की रूपरेखा अपने सामाजिक संघर्षों के ताप से बनते हुए देख सकता है। इस संग्रह की कविताएँ अपनी भाषा और कथ्य में इतनी सँवरी हुई हैं कि उन्हें परिपक्व कहना भी उनके कवित्व को संकुचित करने जैसा होगा। कवि अपनी राजनैतिक चेतना का विस्तार हवाओं को अपनी देह सौंपने का निर्णय लेकर करती है जो समकालीन अधिनायक तंत्र को नई चुनौती देने जैसा है। ये कविताएँ हमें नई राह पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं। हमारे समय की इस स्त्री कवि में इतना आत्मविश्वास और मेधा है कि यदि वह सबको साथ लिये चले तो सब चल भी पड़ेंगे उजले भविष्य की ओर। —सविता सिंह
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‘साँवली इबारतें’ की कविताएँ एक ऐसे समय में लिखी गई हैं, जिसमें न्याय, सौन्दर्य और मनुष्य जीवन को सँवारने वाली कोमलता का विलोप हो रहा है। ऐसे में कविता लिखना मृत्यु पाने का निमंत्रण भी बन सकता है। समानता की लालसा रखने वाले लोगों पर रोज़ गोलियाँ चल रही हैं, फिर भी कवि अपने लिए इससे बेहतर काम नहीं खोजना चाहती। कविता ही उसका घर है; यहीं वह अपने मित्रों, शत्रुओं और मृत्यु को भी आने का निमंत्रण देती है।
वह अपने शहर, मोहल्ले या देश से भी निष्कासित नहीं होना चाहती। वह इसी शहर में रहेगी जहाँ वह रहती है, जहाँ बसने में किसी ईश्वर ने उसकी मदद नहीं की बल्कि पड़ोसी, अजनबी लोग, यहाँ तक कि यहाँ के पेड़-पौधे ही ज़्यादा हितकारी रहे। इस जुझारू जीवन-अनुभव के कारण वह उन लोगों को सलाह देती है जो कविता को किसी तमग़े की तरह पहनना चाहते हैं, उसके जोखिम को नहीं उठाते। इस अन्धकार भरे समय में प्रेम करना भी जोखिम-भरा काम है, उतना ही जितना कविता लिखना लेकिन कवि की पूरी संलग्नता है इस पदार्थीय जीवन से। वह देखती और समझती है कि यह सारी प्रकृति, कायनात सारी, अपने जगरूप में बेहद सुन्दर है और मनुष्य के लिए कल्याणकारी भी। वह आश्वस्त है कि उसकी आँखों के जल में यह रोशनी-भरा संसार अपना जगरूप देख सकता है जैसे कि मनुष्य अपने सुन्दर विचारों की रूपरेखा अपने सामाजिक संघर्षों के ताप से बनते हुए देख सकता है।
इस संग्रह की कविताएँ अपनी भाषा और कथ्य में इतनी सँवरी हुई हैं कि उन्हें परिपक्व कहना भी उनके कवित्व को संकुचित करने जैसा होगा। कवि अपनी राजनैतिक चेतना का विस्तार हवाओं को अपनी देह सौंपने का निर्णय लेकर करती है जो समकालीन अधिनायक तंत्र को नई चुनौती देने जैसा है। ये कविताएँ हमें नई राह पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं। हमारे समय की इस स्त्री कवि में इतना आत्मविश्वास और मेधा है कि यदि वह सबको साथ लिये चले तो सब चल भी पड़ेंगे उजले भविष्य की ओर।
—सविता सिंह
Book Details
-
ISBN9789360866938
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Vandana Tete
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- Description: वासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के क़िले में आदिवासी स्त्री बिलकुल क़ैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोड़कर प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री-कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए ज़रूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ़ हो जाए कि नसों में दौड़नेवाला लहू चाहे कितनी पीढ़ियों का सफ़र तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढ़ने का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोंबीच खड़ा मज़बूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन
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