Yama
Author:
Mahadevi VermaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
प्रस्तुत पुस्तक ‘यामा’ में महादेवी की काव्य-यात्रा के चार आयाम संगृहीत हैं—‘नीहार’, ‘रश्मि’, ‘नीरजा’ तथा ‘सांध्यगीत’ जो भाव और चिन्तन-जगत् की क्रमबद्धता के कारण महत्त्वपूर्ण हैं। प्रत्येक आयाम में नवीनता तथा विशिष्टता का परिचय दिया गया है, फिर भी अपेक्षाकृत मानवीकरण एवं प्रतीकात्मकता पर बल दिया गया है। प्रकृति के स्थूल सौन्दर्य में भी प्रायः महादेवी ने मानवीय भावनाओं व क्रिया-कलापों का साक्षात्कार किया।
ISBN: 9788180313066
Pages: 105
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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विश्व-हिंसा और दिन-रात फैलते प्रदूषण के ख़िलाफ़ राजेश जोशी ने बहुत समर्थ कविताएँ लिखी हैं। इसका एक कारण तो यह है कि भोपाल की त्रासदी उन्होंने बहुत निकट से देखी और झेली है। दूसरा यह कि उनके अन्तरंग संवेदनों की दुनिया को इससे ज़बर्दस्त आघात पहुँचा है। उन्होंने मनुष्य की महानतम उपलब्धियों की क्षणभंगुरता और आत्मघाती दर्प की भयावह सच्चाई को पहचान लिया।
अपने परिवेश के प्रति अगाध प्रेम और सम्बद्धता शायद ही इधर प्रकाशित दूसरे कवियों की कविताओं में मिले। ख़ास बात यह है कि राजेश जोशी अपने अनुभव को कविता में सिरजते वक़्त शोकगीत की लयात्मकता नहीं छोड़ते। लय उनकी कविताओं में अत्यन्त सहज भाव से आती है, जैसे कोई कुशल सरोदवादक धीमी गति में आलाप द्वारा भोपाल राग का विस्तार कर रहा हो। इस दृष्टि से राजेश जोशी के शिल्प को एक सांगीतिक संरचना कहा जा सकता है। वे स्थानीयता के रंग में डूबकर भी कविता के सार्वजनिक प्रयोजनों को रेखांकित करते हैं।
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- Book Type:

- Description: मानव-दुर्दशाक बढ़ैत परिमाण, मानव-मूल्यक खुल्लमखुल्ला अपमानक वातावरण सँ मुक्तिक कामना हरदम सँ जन-आकांक्षा रहलए। कविताक लेल ई आकांक्षा, जीवन-राग छी जे पीड़ा आ कचोटक ताल पर बजैत रहैए। वैद्यनाथ मिश्रक कविता अही कचकैत पीड़ाक माझ सँ गमन करैए। आइ जाहि तथाकथित 'जनतांत्रिक व्यवस्था' सँ शासित छी हमरा लोकनि, ताहि मे पद-प्राप्ति होइते 'सेवक' अधिनायक भ' जाइए, भाग्य-विधाता बनि जाइए। अपेक्षा करैए जे ओकरा सँ जन-अधिकारक बात नइँ कयल जाए। कोनो प्रश्न नइँ पूछल जाए। कर्तव्यक चर्चा नइँ कयल जाए। जन के लेल एकमात्र उपाय छै, ठेहुनिया रोपि दसो नह जोड़ि, अनुनय, विनय, प्रार्थना, मनुहार, चिरौरी कयल जाए—हे प्रभो! (भक्तक) आनंददाता, कनी एम्हरो तकियउ! खाली ओएह सब मनुख नइँ जकर संपत्ति दिनानुदिन विशाल भेल जाइए। बाकी जनता सेहो अही देशक वासी छी... एम्हरो तकियउ... जनतंत्रक नाम पर एहि विकराल बिडम्बना सँ सोझाँ-सोंझी होइत वैद्यनाथ मिश्रक कविता गंहीर उतरैत तीक्ष्ण व्यंग्य मे परिणत भ' जाइए। सूक्ष्म-पर्यवेक्षण आ स्पष्ट संलिप्तता सँ भरल-पुरल वैद्यनाथ मिश्रक कविता, विम्ब-विधानक सरलता सँ अपरूप काव्यानुभूतिक सृष्टि करैए, सोचबाक लेल बिलमबैए आ चेतना केँ हिलकोरैए। वैद्यनाथ मिश्रक कविता स्वयं आ समय सँ साक्षात्कार करबैए। एहि अनुभूतिक लेल पढऩाइ आवश्यक शर्त। —कुणाल
Bhuri-Bhuri Khak-Dool
- Author Name:
Gajanan Madhav Muktibodh
- Book Type:

-
Description:
“मुक्तिबोध एक ऐसे कवि हैं जो अपने समय में अपने पूरे दिल और दिमाग़ के साथ, अपनी पूरी मनुष्यता के साथ रहते हैं। वे अपनी एक ऐसी निजी प्रतीक-व्यवस्था विकसित करते हैं कि जिसके माध्यम से सार्वजनिक घटनाओं की दुनिया और कवि की निजी दुनिया एक सार्थक और अटूट संयोग में प्रकट हो सके। एक सच्चे कवि की तरह वे सरलीकरणों से इनकार करते हैं। वे विचार या अनुभव से आतंकित नहीं होते। वे यथार्थ को जैसा पाते हैं वैसा उसे समझने और उसका विश्लेषण करने की कोशिश करते हैं और उनकी कविता का एक बड़ा हिस्सा अनुभव की अनथक व्याख्या और पड़ताल का उत्तेजक साक्ष्य है। मुक्तिबोध मनुष्य के विरुद्ध हो रहे विराट षड्यंत्र के शिकार के रूप में ही नहीं लिखते, बल्कि वे उस षड्यंत्र में अपनी हिस्सेदारी की भी खोज करते और उसे बेझिझक ज़ाहिर करते हैं। इसीलिए उनकी कविता निरा तटस्थ बखान नहीं, बल्कि निजी प्रामाणिकता और ‘इन्वॉल्वमेंट’ की कविता है। उनकी आवाज़ एक दोस्ताना आवाज़ है और उनके शब्द मित्रता में भीगे और करुणा-भरे शब्द हैं। ब्रेख़्त की तरह उन्हें मालूम है कि ‘जो हँसता है, उसे भयानक ख़बर बताई नहीं गई है। वे भयानक ख़बर के कवि हैं—हिन्दी में शायद अकेले। उन्होंने हमारे समय में आदमी की हालत की पूरी परिभाषा अलभ्य साहस और शक्ति से करने की अद्वितीय कोशिश की है।’
‘भूरी-भूरी ख़ाक धूल’ में मुक्तिबोध की कविता की इन सभी ख़ूबियों का एक नया स्तर खुलता है। ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ के बाद, प्रकाशन-क्रम के लिहाज़ से, यह उनकी कविताओं का दूसरा संग्रह है। इसमें उनकी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कविताएँ हैं, साथ ही अधिकांशतः ऐसी कविताएँ भी हैं जो अब तक बिलकुल अप्रकाशित रही हैं। इन कविताओं में आज के उत्पीड़न-भरे समाज को बदलने का आकुल आग्रह तथा ‘जनसंघर्षों की निर्णायक स्थिति’ में अमानवीय व्यवस्था के ‘कालान्त द्वार’ तोड़ डालने का दृढ़ संकल्प विस्मयकारी शक्ति के साथ अभिव्यक्त हुआ है। अपनी प्रचंड सर्जनात्मक ऊर्जा के कारण ये कविताएँ मन को झकझोरती भी हैं और समृद्ध भी करती हैं। यह आकस्मिक नहीं है कि मृत्यु के वर्षों बाद आज भी मुक्तिबोध हिन्दी के सर्वाधिक चर्चित कवि हैं।
Pratinidhi Kavitayen : Bhagwat Ravat
- Author Name:
Bhagwat Rawat
- Book Type:

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Description:
भगवत रावत की काव्य-चिन्ता के मूल में बदलाव के लिए बेचैनी और अकुलाहट है। इसीलिए उनकी कविता में संवादधर्मिता की मुद्राएँ सर्वत्र व्याप्त हैं, जो उनके उत्तरवर्ती लेखन में क्रमश: सम्बोधन-शैली में बदल गई हैं। पर उनकी कविता में कहीं भी नकचढ़ापन, नकार, मसीही अन्दाज़ और क्रान्ति की हड़बड़ी नहीं दिखाई देती।
भगवत रावत शुरू से अन्त तक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी कवि के रूप में सामने आते हैं। सोवियत संघ के विघटन के बावजूद मार्क्सवाद के प्रति उनकी आस्था और विश्वास खंडित नहीं हुआ। हाँ, उनका यह मत ज़रूर था कि अगर विचारधारा मैली हो गई है तो पूरी निर्ममता के साथ उसकी सफ़ाई करो। मैल जमने मत दो।
भगवत रावत को सबसे ज़्यादा विश्वास ‘लोक’ में है। उनकी कविताओं से गुज़रते हुए आपको लगेगा कि इस कवि का लोक से नाभिनाल रिश्ता है। लेकिन उनकी कविता लोक से सिर्फ़ हमदर्दी, सहानुभूति, दया, कृपा-भाव पाने के लिए नहीं जुड़ती, बल्कि इसके उलट वह लोक की ताक़त और उसके स्वाभिमान को जगह-जगह उजागर करती है। उनकी उत्तरवर्ती कविताओं को पढ़ते हुए साफ़ ज़ाहिर होता है कि उन्हें सही बात कहने से कोई रोक नहीं सकता—न दुनिया, न समाज, न व्यवस्था, न कोई ताक़तवर सत्ता-पुरुष। आज़ादी के बाद प्रगतिशील कविता के इतिहास में लोकजीवन को आवाज़ देने और उसके हक़ की लड़ाई लड़नेवाले कवियों को जब याद किया जाएगा तो भगवत की कविताएँ हमें बहुत प्यार से पास बुलाएगी और कहेगी—‘आओ, बैठो, बोलो तुम्हें क्या चाहिए।’
Jidhar Kuchh Nahin
- Author Name:
Devi Prasad Mishra
- Book Type:

- Description: ‘जिधर कुछ नहीं’ की विशिष्टता यह नहीं है कि यह हिन्दी की सबसे लम्बी कविताओं में एक है बल्कि यह कि यह एक नई तरकीब से लिखी गई है और वैकल्पिक नागरिकता को आविष्कृत करने के लिए एक दुष्कर और लम्बी अन्तर्यात्रा पर निकली हुई है। यह वैकल्पिक सृष्टि को खोजना तो है लेकिन इसके लिए भारतीय पृथ्वी के कोलाहल, वैषम्य और क़ैद से गुज़रने से कोई निज़ात नहीं है। दरअस्ल, जो शोर, दिग्भ्रम, अमर्ष, धुंध और अँधेरा मौजूद है, उसी के पीछे और नीचे वैकल्पिक नागरिकता छिपी हुई है। तो खोज का प्रश्न राजनीतिक प्रबोध और बड़ी समाजार्थिक परिकल्पना से जुड़ा हुआ है। देवी एक ऐसी सामाजिक सुरंग से गुज़रने और पाठक को गुज़ारने का चयन करते हैं जिसके कितने ही स्टेशन और अड्डे ढहा दिये गये हैं या जला दिये गये हैं। यह कठिन समय में लिखी गई कविता है जब राज्य के चरित्र को बदल दिया गया है, जब उत्तर-सत्य का बोलबाला है, जब बड़ी संकल्पनाएँ नष्ट की जा रही हैं, जब ज्ञान की जगह अंधी आस्था को स्थापित किया जा रहा है, जब अपराध को वैधता दी जा रही है, जब सामाजिक रचना के लिए मानवीय अन्तर्दृष्टि की जगह घृणादृष्टि ले रही है, जब ज्ञान को संदेहास्पद बनाया जा रहा है और इतिहास का विभाजक पाठ तैयार किया जा रहा है। उजाड़ने का यह काम भले ही बहुत क्रूर तरीक़े से किया गया दिख रहा हो, इस अमानवीय और नागरिकता विरोध की दीर्घ और सत्तात्मक परंपरा है। इस रौशनी में देखने पर यह साफ़ होगा कि यह कविता किसी भी तरह से प्रतिक्रियात्मक संरचना भर नहीं है बल्कि एक दस्तावेज़ी और ऐतिहासिक कामकाज है जिसकी प्रासंगिकता असमाप्य है क्योंकि ताक़त का दुरुपयोग ख़त्म होता नहीं दिखता। इस कविता में देवी कहन का अप्रतिम हुनर दिखाते हैं, हिन्दवी की तमाम प्रविधियों से लेन-देन शुरू कर देते हैं और इस कारोबार की अनायासता में एक नयी काव्य तकनीक हासिल कर लेते हैं। वह अनुभव की विपुलता से गुज़रते हुए कितनी ही बार रेटरिक को काव्यात्मक विज़न और परानुभूति की बड़ी सूझ में बदल देते हैं। इस महाकविता का पाठ उतना कठिन नहीं है जितना वह अपनी संरचना में दिखता है जो भले ही समकालीनता के कोने में किये गये एकांतिक दुस्साहस का नतीजा हो या किसी फक्कड़ के हाथ लग जाने वाली मौलिकता की जादुई भभूत। वैकल्पिक की खोज में भटकती कविता की परिकल्पना और संरचना दोनों अपूर्व हैं जो भारतीय और विश्व कविता के बीच गर्दन बहुत ऊँची करके खड़ी हो सकती हैं। किताब के अन्त में आता उत्तर कथन इस कविता के आलोक में राजकीय दमन और रचना के बीच के जटिल सम्बन्ध को जिस तरह से देखता है, हिन्दी विचार जगत में वह विरल है।’
Rashmimala
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Pratinidhi Kavitayen : Vishwanath Prasad Tiwari-Paperback
- Author Name:
Vishwanath Prasad Tiwari
- Book Type:

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Description:
विश्वनाथप्रसाद तिवारी के वर्षों के सक्रिय कवि-कर्म के सफ़र को देखते हुए आज यह बात कही जा सकती है कि अपने समकालीनों के बीच रहते हुए भी उन्होंने अपने समकालीनों का अतिक्रमण किया। वे अपनी पीढ़ी के उन कवियों में शुमार हैं जिनके मितकथन और मितभाषा के प्रयोग सघन और ताक़तवर हैं, जो आज उनकी काव्योपलब्धि के रूप में रेखांकित किए जा सकते हैं।
विश्वनाथप्रसाद तिवारी के कवि-कर्म के सरोकारों की गहरी छानबीन की जाए तो उसकी मुख्य थीम में तीन प्रस्थान-बिन्दु चिह्नित होते हैं—स्वाधीनता, स्त्री-मुक्ति और मृत्यु-बोध। ग़ौर से देखें तो उनकी समूची काव्य-यात्रा इन तीन प्रस्थान-बिन्दुओं को लेकर गहन अनुसन्धान करती हैं। इन तीनों जीवन-दृष्टियों का बोध वे भारतीय अन्त:करण से करते हैं। स्त्री-अस्मिता की खोज उनके कवि-कर्म के बुनियादी सरोकारों में सबसे अहम है। उनकी कविता के घर में स्त्री के लिए जगह ही जगह है। उनकी दृष्टि में स्त्री के जितने विविध रूप हैं, वे सब सृष्टि के सृजनसंसार हैं।
उनके कवि की समूची संरचना देशज और स्थानीयता के भाव-बोध के साथ रची-बसी है, काव्यानुभूति से लेकर काव्य की बनावट तक। भोजपुरी अंचल में पले-पुसे और सयाने हुए विश्वनाथ के मनोलोक की पूरी संरचना भोजपुरी समाज के देशज आदमी की है। उनकी कविताओं में इस समाज का आदमी प्राय: विपत्ति में लाठी की तरह दन्न से तनकर निकल आता है।
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