(0)
Author:
Kunwar Narayan, Purushottam AgrawalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
199
₹ 159.2 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
शुरू से लेकर अब तक की कविताएँ सिलसिलेवार पढ़ी जाएँ तो कुँवर नारायण की भाषा में बदलते मिज़ाज को लक्ष्य किया जा सकता है। आरम्भिक कविताओं पर नई कविता के दौर की काव्य-भाषा की स्वाभाविक छाप स्पष्ट है। इस छाप के बावजूद छटपटाहट है—कविता के वाक्य-विन्यास को आरोपित सजावट से मुक्त कर सहज वाक्य-विन्यास के निकट लाने की। आगे चलकर यह वाक्य-विन्यास कुँवर नारायण की कविता के लिए स्वभाव-सिद्ध हो गया है। लेकिन उनकी विशेषता यह है कि उन्होंने सहज वाक्य-विन्यास को बोध के सरलीकरण का पर्याय अधिकांशत: नहीं बनने दिया। सहज रहते हुए सरलीकरण से बचे रहना, साधना के कठिन अभ्यास की माँग करता है। 'सहज-सहज सब कोई कहै—सहज न चीन्हे कोय!' बाल-भाषा में 'प्रौढ़ व्यक्तित्व को अभिव्यक्ति' देने की चुनौती को कुँवर नारायण ने बहुत गहरे में लिया और जिया है। परम्परा की स्मृति और 'सैकड़ों नए-नए' पहलुओं को धारण करनेवाली काव्य-भाषा सम्भव करने के लिए जो साधना उन्होंने की होगी, उसका अनुमान ही किया जा सकता है। कुँवर नारायण इस महत्त्वपूर्ण सचाई के प्रति सजग हैं कि ‘कलाकार-वैज्ञानिक के लिए कुछ भी असाध्य नहीं।’ वे इस गहरी सचाई से भी वाक़िफ़ हैं कि चिन्तन चाहे दार्शनिक प्रश्नों पर किया जाए चाहे वैज्ञानिक तथ्यों पर, काव्यात्मक भाषा ही प्रत्यक्ष दिखने वाले विरोधों के परे जाकर मूलभूत सत्यों को धारण करने का हौसला कर पाती है। —पुरुषोत्तम अग्रवाल
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
शुरू से लेकर अब तक की कविताएँ सिलसिलेवार पढ़ी जाएँ तो कुँवर नारायण की भाषा में बदलते मिज़ाज को लक्ष्य किया जा सकता है। आरम्भिक कविताओं पर नई कविता के दौर की काव्य-भाषा की स्वाभाविक छाप स्पष्ट है। इस छाप के बावजूद छटपटाहट है—कविता के वाक्य-विन्यास को आरोपित सजावट से मुक्त कर सहज वाक्य-विन्यास के निकट लाने की। आगे चलकर यह वाक्य-विन्यास कुँवर नारायण की कविता के लिए स्वभाव-सिद्ध हो गया है। लेकिन उनकी विशेषता यह है कि उन्होंने सहज वाक्य-विन्यास को बोध के सरलीकरण का पर्याय अधिकांशत: नहीं बनने दिया। सहज रहते हुए सरलीकरण से बचे रहना, साधना के कठिन अभ्यास की माँग करता है। 'सहज-सहज सब कोई कहै—सहज न चीन्हे कोय!' बाल-भाषा में 'प्रौढ़ व्यक्तित्व को अभिव्यक्ति' देने की चुनौती को कुँवर नारायण ने बहुत गहरे में लिया और जिया है। परम्परा की स्मृति और 'सैकड़ों नए-नए' पहलुओं को धारण करनेवाली काव्य-भाषा सम्भव करने के लिए जो साधना उन्होंने की होगी, उसका अनुमान ही किया जा सकता है। कुँवर नारायण इस महत्त्वपूर्ण सचाई के प्रति सजग हैं कि ‘कलाकार-वैज्ञानिक के लिए कुछ भी असाध्य नहीं।’ वे इस गहरी सचाई से भी वाक़िफ़ हैं कि चिन्तन चाहे दार्शनिक प्रश्नों पर किया जाए चाहे वैज्ञानिक तथ्यों पर, काव्यात्मक भाषा ही प्रत्यक्ष दिखने वाले विरोधों के परे जाकर मूलभूत सत्यों को धारण करने का हौसला कर पाती है।
—पुरुषोत्तम अग्रवाल
Book Details
-
ISBN9788126715428
-
Pages232
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Chakravayuh
- Author Name:
Kunwar Narayan
- Book Type:

- Description:
समकालीन हिन्दी कविता में जब भी नई कविता दौर की चर्चा होती है, कुँवर नारायण कुछ-कुछ अलग खड़ा नज़र आते हैं। इसका कारण है उनकी काव्य-संवेदना का निर्बन्ध होना। अपने दौर के कविता-आग्रहों को अपनी कविता में उन्होंने अपनी ही तरह स्वीकार किया; अपने कवि-स्वभाव और भारतीय काव्य-परम्परा को अस्वीकार कर कविता करना उन्होंने कभी नहीं ‘सीखा’। ‘चक्रव्यूह’ की कविताएँ इस नाते आज दस्तावेज़ी महत्त्व रखती हैं। उनमें एक अलग ही तरह का ‘कवि समय’ मौजूद है। कुँवर नारायण के इस संग्रह का पहला संस्करण 1956 में प्रकाशित हुआ था। आकस्मिक नहीं कि ये कविताएँ आज भी हमारे संवेदन को गहरे तक छूती हैं। संगृहीत कविताओं में जो एक व्यवस्था है, चार खंडों में उन्हें जिन उपशीर्षकों (‘लिपटी परछाइयाँ’, ‘चिटके स्वप्न’, ‘शीशे का कवच’ और ‘चक्रव्यूह’) के अन्तर्गत रखा गया है; उसका वैयक्तिक नहीं, वैश्विक सन्दर्भ है लेकिन जिसे समझने के लिए स्वाधीनोत्तर भारतीय मन को ही नहीं, भारतीय राज्य-व्यवस्था के चरित्र को भी ध्यान में रखना होगा। कुँवर यदि यह जानते हैं कि कल का (या आज का) अभिमन्यु ‘ज़िन्दगी के नाम पर/हारा हुआ तर्क’ है तो यह कहने का साहस भी रखते हैं कि ‘छल के लिए उद्यत/व्यूह-रक्षक वीर कायर हैं’। अनुष्ठानपूर्वक, पूजकर मारे जानेवाले जीव की पीड़ा कवि-संवेदना से एकमेक होकर समष्टि की पीड़ा बन जाती है; और ऐसे में ईश्वर उसका अन्तिम भय। संक्षेप में कहा जाए तो कुँवर नारायण की समग्र काव्य-चेतना और उसकी विकास-यात्रा में उनके इस कविता-संग्रह का मूल्य-महत्त्व बार-बार उल्लेखनीय है।
Koi Doosra Naheen
- Author Name:
Kunwar Narayan
- Book Type:

- Description:
‘कोई दूसरा नहीं’ की कविताएँ मन को केवल आह्लादित ही नहीं करतीं, बल्कि विवेक का सम्बल भी प्रदान करती हैं। व्यक्ति से समष्टि की ओर ले जानेवाली ये कविताएँ पाठकों की सामाजिक संचेतना में नई त्वरा और नए संवेग भरती हैं। भाषा जब अनुभव का दामन थामकर चलती है तब उसकी प्रभावोत्पादकता और सम्प्रेषण की क्षमता किस तरह परिपक्व और हृदयग्राही बन जाती है, उसकी मिसाल है—‘कोई दूसरा नहीं’ की कविताएँ। ये कविताएँ कभी सहजता से मन को सहलाती हैं तो कभी कोमलता से कल्पना की पाँखों को उत्प्रेरित करती हैं—निराडम्बर-उदात्त मानवीय संस्कारों को जगाती हैं और इसके साथ ही जीवन और जगत के कड़े यथार्थ का आरोहण भी करती हैं। कविताएँ तलाशती हैं वैसी परिस्थितियाँ और वैसा परिवेश भी जिसमें बेहतर इंसान की कल्पना साकार होती है। इन कविताओं की विशेषता है—प्रगाढ़ जीवनानुभव और सादगी।
In Dino
- Author Name:
Kunwar Narayan
- Book Type:

- Description:
‘इन दिनों’ संग्रह कुँवर नारायण के विशद काव्य-संसार में ले जाता है। भाषा और विषय की विविधता अब तक उनकी कविताओं के विशेष गुण माने जा चुके हैं। स्थानों और समयों को लेकर ये कविताएँ अपनी एक उन्मुक्त दुनिया रचती हैं जिनमें अनवरत जीवन की खुली आवाजाही है। इनमें टूटने का दर्द भी है, और उसे बनाने का उत्साह भी। इनमें यथार्थ की पक्की पकड़ है, उसका खुरदुरा स्पर्श, साथ ही उसका सहज सौन्दर्य भी। जीवन और विचारों से जूझती ये कविताएँ उस सन्धिरेखा पर अपने को सम्भव बनाती हैं जो एक दूसरे का निषेध नहीं, गहरी मानवीय संवेदनाओं का आधार है। राजनीतिक और सामाजिक विकृतियों और अराजकता के समय ये कविताएँ समस्याओं से वाबस्तगी को पूरी ज़िम्मेदारी से प्रतिबिम्बित करती हैं। कभी आयरनी, कभी हमदर्दी के स्वर में वे मनुष्य की सबसे संवेदनशील प्रतिक्रियाओं को जगाती हैं। कुँवर नारायण की कविताओं में सीधी घोषणाएँ और फ़ैसले नहीं हैं, जीवन की बहुतरफ़ा समझ का वह धीरज है जो एक प्रौढ़ जीवन-विवेक और दृढ़ नैतिक चेतना से बनता है। समाज, राजनीति, व्यवसायीकरण आदि को लेकर उनकी कविताओं में दूरन्देशी फ़िक्र है जो लोक-जीवन के व्यापक हितों को केन्द्र में रखकर सोचती है—आज के मनुष्य की पीड़ा और जिजीविषा के साथ सार्थक संवाद स्थापित करने की कोशिश करती है। क्लासिकल अनुशासन में रहते हुए भी ये कविताएँ आदमी के बुनियादी आवेगों को भी इस तरह व्यक्त करती हैं कि एक सतर्क पाठक उनके साथ आसानी से एकात्म हो सकता है। कई जगह मिथकीय और ऐतिहासिक सन्दर्भों द्वारा कवि वर्तमान में हमारे यथार्थ-बोध को अधिक विस्तृत, गहरा और विवेकी बनाता है। ये कविताएँ आपका परिचय हिन्दी के उस अप्रतिम कवि से कराएँगी जिसकी ‘चक्रव्यूह’, ‘आत्मजयी’, ’अपने सामने’, ‘कोई दूसरा नहीं’ जैसी कृतियाँ हिन्दी साहित्य की मूल्यवान धरोहर बन चुकी हैं।
Apne Samne
- Author Name:
Kunwar Narayan
- Book Type:

- Description:
जीवन को अनुभूति और चिन्तन के विभिन्न धरातलों पर ग्रहण करनेवाले कवि कुँवर नारायण अपनी कविताओं में सीमाएँ नहीं बनाते; उनकी ज़्यादातर कविताएँ किसी एक ही तरह की भाषा या विषय में विसर्जित-सी हो गई नहीं लगतीं—दोनों को विस्तृत करती लगती हैं। अनेक कविताएँ मानो समाप्त नहीं होतीं, एक ख़ास तरह की हमारी बेचैनियों का हिस्सा बन जाती हैं। इस तरह से देखें तो वे अपने को सिद्ध करनेवाले कवि हमें नहीं नज़र आते। वे बराबर अपनी कविताओं में मुहावरों से बचते हैं और अपने ढंग से उनसे लड़ते भी हैं। उनकी कविता की भाषा में धोखे नहीं हैं। अधिकांश कविताओं का पैनापन ज़िन्दगी के कई हिस्सों को बिलकुल नये ढंग से छूता है। वे मानते हैं कि दैनिक यथार्थ के साथ कविता का रिश्ता नज़दीक का भी हो सकता है और दूर का भी और दोनों ही तरह वह जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है—सवाल है, कविता कितने सच्चे और उदार अर्थों में हमें आदमी बनाने की ताक़त रखती है। कविता उनके लिए जीवन का प्रतिबिम्ब मात्र नहीं, जीवन का सबसे आत्मीय प्रसंग है—कविता, जो अपने चारों तरफ़ भी देखती है और अपने को सामने रखकर भी। उनकी कविताओं में हमें बहुत सतर्क क़िस्म की भाषा का इस्तेमाल मिलता है; वह कभी बहुत गहराई से किसी ऐतिहासिक या दार्शनिक अनुभव की तहों में चली जाती है और कभी इतनी सरल दिखती है कि वह हमें अपने बहुत क़रीब नज़र आती है। बहुआयामी स्तरों पर भाषा से यह लड़ाई और प्यार कुँवर नारायण को चुनौती देता है, ख़ास तौर पर एक ऐसे वक़्त में जब कविता का एक बड़ा हिस्सा एक ही तरह की भाषा में अपने को अभिव्यक्त किए चला जा रहा है। हिन्दी के अग्रणी आधुनिक कवि कुँवर नारायण की कविता की दुनिया में जाने का मतलब ज़िन्दगी को गहराई और विस्तार से देखने और जानने का अच्छा मौक़ा पा लेना है।
Sab Itna Asamapt
- Author Name:
Kunwar Narayan
- Book Type:

- Description:
‘सब इतना असमाप्त’ अपने शीर्षक से ही संग्रह की अन्तर्वस्तु का आभास देता है। इसकी अधिकांश कविताएँ वर्ष 2010 के बाद लिखी गई हैं। यहाँ कुछ अन्य काव्य-प्रयोग भी शामिल हैं जो कविता और उसकी एक बड़ी दुनिया में कवि की निरन्तर आवाजाही के प्रमाण हैं। कुँवर नारायण ने किसी भी क़ीमत पर कविता की भूमिका को सीमित करके नहीं देखा। उन्होंने अपनी एक कविता में प्रतीकात्मक लहजे़ में कहा है कि मैं कभी भी अपनी कविताओं का अन्त नहीं लाना चाहता। उस जीवन्त नाते को बनाए रखना चाहता हूँ जिसे अन्त समाप्त कर देता है। वे हमेशा अनन्तिम कविताएँ लिखना चाहते थे, इसलिए अन्तहीन भी। प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ अपने आप में उनकी इस चिन्ता को मूर्त करती हैं और इस तरह अन्त और आरम्भ की एक व्यापक और परस्पर अभिन्न परिकल्पना हमारे सामने रखती हैं। संग्रह की कविताएँ बहुत अनोखे ढंग से बेचैन करती हैं और आश्वस्त भी। इनमें एक बड़े कवि के समस्त अनुभवों की काव्यात्मक फलश्रुति है और अक्सर एक भव्य उदासी का गूँजता हुआ स्वर। यहाँ कुछ भूली-बिसरी यादों का कोलाज है और अप्रत्याशित विडम्बनाओं की ओर लुढ़कते हुए समाज की चिन्ता भी। पूरे संग्रह में सागर के दो तटों की तरह जीवन और मृत्यु के विविध अनुभवों-आहटों की कविताएँ एक सायुज्य में हैं। हिन्दी के शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण ने अपनी कृतियों के माध्यम से एक पूरा अलग 'पैराडाइम’ रचा है। इसी क्रम में प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ एक नए रूप में उनकी उपस्थिति को सम्भव बनाती हैं। इसमें उनकी काव्य-यात्रा भौतिक-अभौतिक, नैतिक-अनैतिक, लौटना-जाना, अन्त और आरम्भ, जिजीविषा और मुमुक्षा की परस्पर यात्रा रही है। पूरे संग्रह में यह संवेदनशीलता क्रमश: बहुआयामी विस्तार पाती गई है और कुँवर नारायण का एक बेहद सघन और अनुभव-समृद्ध काव्य-संसार पाठकों के सामने खुलता चला जाता है।
Bechain Patton Ka Chorus
- Author Name:
Kunwar Narayan +1
- Book Type:

- Description:
कुँवर नारायण उन अत्यल्प साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों में हैं जिन्होंने अपने लेखन में भारतीय और वैश्विक विचार, चिन्तन, संवेदना और सरोकारों से गहन संवाद किया है। यह संवाद किसी एक साहित्यिक विधा तक सीमित नहीं रहा। उनकी काव्येतर कृतियाँ इस बात की पुष्टि करती हैं। कुँवर नारायण ने जैसे विश्वस्तरीय कविताएँ लिखी हैं वैसे ही कहानियाँ भी। 'बेचैन पत्तों का कोरस' कुँवर नारायण का दूसरा कहानी-संग्रह है। पहला कहानी-संग्रह, 'आकारों के आसपास', सत्तर के दशक में आया था। अपनी असाधारण मौलिकता के चलते यह संग्रह ख़ासा ध्यानाकर्षक रहा। उस वक़्त रघुवीर सहाय, श्रीकान्त वर्मा, श्रीलाल शुक्ल, नेमिचन्द्र जैन जैसे साहित्यकारों ने इन कहानियों को सुखद आश्चर्य के साथ सराहा। वर्तमान समय के कथाकारों और समीक्षकों तक के लिए ये कहानियाँ निरन्तर आकर्षण और प्रेरणा का विषय बनी हुई हैं। इसी उपलब्धि का विस्तार हम इस दूसरे संकलन में पाते हैं, जो कि एक लम्बे अन्तराल के बाद आ रहा है। वर्तमान कथा-परिदृश्य को यह संकलन कई मानों में समृद्ध करेगा। इन कहानियों में अन्तर्वस्तु की विविधता ही नहीं, भाषा, संरचना और रूप का वैविध्य भी उत्कृष्टता का प्रमाण है। हर कहानी स्वयं में नई है और दूसरी से पृथक् भी। ये कहानियाँ औपचारिक और परम्परागत तरीक़े से अलग, कहानी विधा में प्रयोग और नवाचार हैं। बहुविधात्मक प्रभाव का सुन्दर समन्वय इन कहानियों को बहुस्तरीय बनाता है, और निबन्ध, संस्मरण, रेखाचित्र, चारित्रिकी, कविता आदि विधाओं की सम्मिलित शक्ति इन कहानियों के क्षितिज को विस्तृत करती है।
Aakaron Ke Aaspas
- Author Name:
Kunwar Narayan
- Book Type:

- Description:
'आकारों के आसपास' की कहानियों को पढ़कर कुछ ऐसा आस्वाद मिलता है जो आम तौर पर आज की कहानियों से सुखद रूप में अलग है। एक तरह से इन कहानियों की दुनिया कोई ख़ास निजी दुनिया नहीं है, इनमें भी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के ही आम परिचित अनुभवों को पेश किया गया है। मगर उन्हें देखनेवाली नज़र, उसके कोण और इन दोनों के कारण उभरनेवाले रूप और भाषाई संगठन का फ़र्क़ इतना बड़ा है कि इन कहानियों की दुनिया एकदम विशिष्ट और विस्मयकारी जान पड़ती है जिसमें किसी-न-किसी परिचित सम्बन्ध, अनुभव या रूख़ का या तो कोई अन्तर्विरोध या नया अर्थ खुल जाता है, या इसकी कोई नई परत उभर आती है—जैसा अक्सर कविता के बिम्बों से हुआ करता है। कोई अजब नहीं कि इन कहानियों में यथार्थ और फैंटेसी के बीच लगातार आवाजाही है। फैंटेसी के साथ-साथ कुँवर नारायण अपनी बात कहने के लिए तीखे व्यंग्य के बजाय हलकी विडम्बना या 'आयरनी' का इस्तेमाल अधिक करते हैं। इसी से उनके यहाँ फूहड़ अतिरंजना या अति-नाटकीयता नहीं है, एक तरह का सुरोचिपूर्ण संवेदनशील निजीपन है । दरअसल, ये कहानियाँ काफ़ी फैले हुए फ़लक पा अनेक मानवीय नैतिक सम्बन्धों, प्रश्नों और मूल्यों को जाँचने, उधेड़ने और परिभाषित करने की कोशिश करती हैं, किसी क्रान्तिकारी मुद्रा में नहीं, बल्कि असलियत की बेझिझक निजी पहचान के इरादे से।
Shabd Aur Deshkal
- Author Name:
Kunwar Narayan
- Book Type:

- Description:
कवि और चिन्तक के रूप में कुँवर नारायण का हस्तक्षेप हिन्दी साहित्य में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वस्तुतः वे कविर्मनीषी के रूप में सर्वसमादृत हैं। ‘शब्द और देशकाल’ पुस्तक कुँवर नारायण की विचार-सम्पदा का एक अनूठा उदाहरण है। इसमें विभिन्न विशिष्ट अवसरों पर दिए गए उनके व्याख्यानों के साथ कुछ लेख भी उपस्थित हैं। भाषा, साहित्य, समाज, मीडिया, अनुवाद और अन्य प्रश्नों पर केन्द्रित उनके विचार ध्यानपूर्वक पढ़े जाने की माँग करते हैं। कुँवर जी की केन्द्रीय चिन्ता जीवन को समरस बनाने की है। इस क्रम में शाश्वत सन्दर्भों के साक्ष्य उभरते हैं। साथ ही, वर्तमान विश्व जिस अन्याय-अनाचार से त्रस्त है, उसके मानवीय समाधान की दिशाएँ भी प्रशस्त होती हैं। ‘साहित्य के सामाजिक सरोकार के माने’ में कुँवर जी कहते हैं, ‘इतना ही काफ़ी नहीं कि साहित्य जीवन के दैनिक और व्यावहारिक पक्ष से ही अपनी पहचान बनाए। अगर समाज का आत्मिक और नैतिक पक्ष भी नहीं उभरता तो साहित्य का काम अधूरा रह जाएगा।’ कुँवर नारायण बहुअधीत रचनाकार हैं। यही कारण है कि उनका लेखन देश और काल की सीमित और सुविदित परिधियों का विस्तार करता है। ‘विश्व विवेक’ के साथ चिन्तन करनेवाले कुँवर नारायण के ये आलेख पाठक को तात्त्विक रूप से बसंशोधित और समृद्ध करते हैं। स्मृति, विचार, रचना और बोध के विरुद्ध खड़े समय-समाज के सम्मुख कुँवर जी एक मानवीय पक्ष उद्घाटित करते हैं। पढ़े और गुने जाने योग्य एक संग्रहणीय पुस्तक।
Aaj Aur Aaj Se Pahale
- Author Name:
Kunwar Narayan
- Book Type:

- Description:
अगर यह संचयन साहित्य के प्रति निष्ठा से समर्पित एक रचनाकार की सोच-समझ का छोटा-सा किन्तु प्रमाणिक जीवन-भर होता तो मूल्यवान होते हुए भी वह गहरी विचारोत्तेजना का वैसा स्पंदित दस्तावेज़ न होता जैसा कि वह है। कुँवर नारायण आधुनिक दौर के कवि-आलोचकों की उस परम्परा के हैं जिसमें अज्ञेय और मुक्तिबोध, विजयदेव नारायण साही और मलयज आदि रहे हैं और जिसे पिछली अधसदी में हिन्दी की केन्द्रीय आलोचना कहा जा सकता है। अपने समय और समाज को, अपने साहित्य और समकालीनों को, अपनी उलझनों-सरोकारों और संघर्ष को समझने-बूझने और उन्हें मूल्यांकित करने के लिए नए प्रत्यय, नई अवधारणाएँ और नए औज़ार इसी आलोचना ने खोजे और विन्यस्त किए हैं। कुँवर नारायण का वैचारिक खुलापन और तीक्ष्णता, सुरुचि और सजगता तथा बौद्धिक अध्यवसाय उन्हें एक निरीक्षक और विवेचक की तरह 'अपने समय और समाज पर चौकन्नी नजर' रखने में सक्षम बनाते हैं। यह संचयन कुँवर नारायण का हिन्दी परिदृश्य पर पिछले चार दशकों से सक्रिय बने रहने का साक्ष्य ही नहीं, उनकी दृष्टि की उदारता, उनकी रुचि की पारदर्शिता और उनके व्यापक फ़लक का भी प्रमाण है। प्रेमचन्द, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा, हजारीप्रसाद द्विवेदी से लेकर अज्ञेय, शमशेर, नेमिचन्द्र जैन, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, निर्मल वर्मा, श्रीकान्त वर्मा, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, श्रीलाल शुक्ल, अशोक वाजपेयी तक उनके दृष्टिपथ में आते हैं और उनमें से हरेक के बारे में उनके पास कुछ-न-कुछ गम्भीर और सार्थक कहने को रहा है। इसी तरह कविता, उपन्यास, कहानी, आलोचना, भाषा आदि सभी पर उनकी नज़र जाती रही है। जो लोग साहित्य और हिन्दी के आज और आज के पहले को समझना और अपनी समझ को एक बृहत्तर प्रसंग में देखना-रखना चाहते हैं, उनके लिए यह एक ज़रूरी किताब है। कुँवर नारायण में समझ का धीरज है, अपना फ़ैसला आयद करने की उतावली नहीं है और ब्योरों को समझने में एक कृतिकार का अचूक अनुशासन है। हिन्दी आलोचना आज जिन थोड़े से लोगों से अपना आत्मविश्वास और विचार-ऊर्जा साधिकार पाती है। उनमें निश्चय ही कुँवर नारायण एक हैं। यह बात अचरज की है कि यह कुँवर नारायण की पहली आलोचना-पुस्तक है। बिना किसी पुस्तक के दशकों तक अपनी आलोचनात्मक उपस्थिति अगर कुँवर नारायण बनाए रख सके हैं तो इसलिए कि उनका आलोचनात्मक लेखन लगातार धारदार और ज़िम्मेदार रहा है।
Anviti - Khand : 2
- Author Name:
Kunwar Narayan +1
- Book Type:

- Description:
कुँवर नारायण हमारे समय के बड़े कवि हैं। यदि विश्व के कुछ चुनिन्दा कवियों की तालिका बनाई जाए तो उसमें निस्सन्देह उनका स्थान होगा। वे आधुनिक बोध और संवेदना के उन कवियों में हैं जिन्होंने सदैव कविता को मनुष्यता के आभरण के रूप में लिया है। कुँवर नारायण का काव्य मानवीय गुणों का ही नहीं, मानवीय संस्कारों का काव्य है। कविता में उनका प्रवेश चक्रव्यूह से हुआ। अपने गठन में कलात्मक किन्तु दार्शनिक प्रतीतियों वाले इस संग्रह में जीवन की पेचीदगियों को कवि ने सलीक़े से उठाया है। ‘आत्मजयी’ की लगभग अधसदी के बाद ‘वाजश्रवा के बहाने’ की रचना बतौर कुँवर नारायण यह भी जताने के लिए है कि यदि ‘आत्मजयी’ में मृत्यु की ओर से जीवन को देखा गया है तो ‘वाजश्रवा के बहाने’ में जीवन की ओर से मृत्यु को देखने की एक कोशिश है। उनके इस कथन को हम इस रोशनी में देख सकते हैं कि सारा कुछ हमारे देखने के तरीक़े पर निर्भर है—कुछ ऐसे कि यह जीवन विवेक भी एक श्लोक की तरह सुगठित और अकाट्य हो। उनके रचना-संसार पर समय-समय पर लिखा जाता रहा है। अनेक शोधार्थियों ने उनके व्यक्तित्व और साहित्य पर कार्य किया है। कहना न होगा कि कुँवर नारायण का कृतित्व बहुवस्तुस्पर्शी है। वर्ष 2002 से पहले तक उनके व्यक्तित्व एवं कृतियों पर लिखे महत्त्वपूर्ण लेख ‘उपस्थिति’ नामक संचयन में समाविष्ट हैं। उसके पश्चात् लिखे निबन्धों का यह संकलन दो खंडों में है : ‘अन्वय’ और ‘अन्विति’। ‘अन्विति’ उनकी कृतियों को केन्द्र में रखकर लिखे आलोचनात्मक निबन्धों का चयन है। इसमें हाल की कुछ प्रकाशित कृतियों को छोड़कर बाक़ी कृतियों पर लिखे लेखों को शामिल किया गया है जो उपस्थिति में सम्मिलित नहीं हैं। अधिकांश लेख 2015 तक के हैं जब कुँवर नारायण का प्रबन्ध-काव्य ‘कुमारजीव’ प्रकाशित हुआ। आशा है, पाठकों को ये दोनों खंड उपयोगी और प्रासंगिक लगेंगे तथा कुँवर नारायण के साहित्य के प्रति रुचि विकसित करेंगे।
Lekhak Ka Cinema
- Author Name:
Kunwar Narayan +1
- Book Type:

- Description:
कुँवर नारायण अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित कवि हैं। वह विश्व सिनेमा के गहरे जानकारों में हैं। उन्होंने आधी सदी तक सिनेमा पर गम्भीर, विवेचनापूर्ण लेखन किया है, व्याख्यान दिए हैं। ‘लेखक का सिनेमा’ उन्हीं में से कुछ प्रमुख लेखों, टिप्पणियों, व्याख्यानों और संस्मरणों से बनी पुस्तक है। इसमें अनेक अन्तरराष्ट्रीय फ़िल्मोत्सवों की विशेष रपटें हैं, जो लेखकीय दृष्टिकोण से लिखी गई हैं और बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इस किताब में वे कला, जीवन, समाज और सिनेमा, इन सबके बीच के सम्बन्धों को परिभाषित, विश्लेषित करते हुए चलते हैं। इसमें सिनेमा के व्याकरण की आत्मीय मीमांसा है। यहाँ देख डालने, सोच डालने की जल्दीबाज़ी नहीं है, बल्कि विचार एक लम्बी, निरन्तरता से भरी प्रक्रिया है, जो उतनी ही गझिन है, जितनी फ़िल्म बनाने की प्रक्रिया। प्रसिद्ध फ़िल्मों व निर्देशकों के अलावा उन निर्देशकों व फ़िल्मों के बारे में पढ़ना एक धनात्मक अनुभव होगा, जिनका नाम इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक तक कम आ पाया। हिन्दी किताबों से जुड़ी नई पीढ़ी, जो विश्व सिनेमा में दिलचस्पी रखती है, के लिए इस किताब का दस्तावेज़ी महत्त्व भी है। अर्जेंटीना के लेखक बोर्हेस की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं—‘‘मैं वे सारे लेखक हूँ जिन्हें मैंने पढ़ा है, वे सारे लोग हूँ जिनसे मैं मिला हूँ, वे सारी स्त्रियाँ हूँ, जिनसे मैंने प्यार किया है, वे सारे शहर हूँ जहाँ मैं रहा हूँ।’’ कुँवर नारायण के सन्दर्भ में इसमें जोड़ा जा सकता है कि मैं वे सारी फ़िल्में हूँ जिन्हें मैंने देखा है।
Anvaya - Khand : 1
- Author Name:
Kunwar Narayan +1
- Book Type:

- Description:
कुँवर नारायण ने लगभग सात दशकों का समृद्ध साहित्यिक जीवन जिया है। वे विश्व के श्रेष्ठ कवियों में गिने जाते हैं। उनके रचना-संसार पर समय-समय पर लिखा जाता रहा है तथा अनेक मर्मज्ञ लेखकों, कवियों एवं शोधार्थियों ने उनके व्यक्तित्व और साहित्य पर कार्य किया है। उन पर अनेक ग्रन्थ लिखे व सम्पादित किए गए हैं और देशी-विदेशी संचयनों में उनकी कविताएँ शामिल हैं। अनेक भाषाओं में उनकी कृतियों के अनुवाद हुए हैं। उन्होंने अपनी कविता-यात्रा में हमें कई नायाब संग्रह दिए हैं। जहाँ उनकी कविताएँ स्मृति और परम्परा से सम्पन्न हैं, वहीं उनकी कहानियाँ क़िस्सागो के रूप में उनके अलग मिज़ाज की बानगी देती हैं। एक समालोचक और गद्यकार के रूप में उनकी आलोचना, निबन्ध, डायरी, सिने-विवेचन और भेंटवार्ताओं की पुस्तकें साहित्य, कला, जीवन, समाज, राजनीति और संस्कृति पर उनके सारभूत चिन्तन की विरल उदाहरण हैं। विश्व कवियों के उनके अनुवाद काव्यानुवाद कौशल के परिचायक हैं। वे उच्च काव्यादर्श के कवि हैं जिसका पूर्ण परिपाक उनके प्रबन्ध काव्यों में देखने को मिलता है। ऐसे उच्चादर्शों के लिए वे अतीत, इतिहास और मिथक के पास जाते हैं जिनसे रूबरू होते हुए हम अपने समय का एक आधुनिक प्रतिबिम्ब देख पाते हैं। उनकी कविता इसी सदाशयता की कविता है। बिना शोरोगुल के कविता में वह ऐसी शहदीली मिठास पैदा कर देते हैं कि उसे पढ़ते ही सृष्टि से प्यार हो उठे। कुँवर नारायण जितने अच्छे कवि, आलोचक और चिन्तक हैं, उतने ही अच्छे मनुष्य। उनसे मिलते हुए कभी उनके व्यक्तित्व का आतंक नहीं महसूस होता, अपने व्यक्तित्व की लघुता नहीं महसूस होती। उनके व्यक्तित्व और रचना-संसार पर हमारे समय के सुधी चिन्तकों और साहित्यिकों के आकलन का यह खंड उन पर लिखी गई समालोचना का एक श्रेष्ठ उपहार है। उन पर लिखे आलोचनात्मक निबन्धों का यह चयन दो खंडों में है : ‘अन्वय’ और ‘अन्विति’। ‘अन्वय’ के इस खंड में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर लिखे आलेख समाहित हैं। ‘अन्विति’ उनकी कृतियों को केन्द्र में रखकर लिखे निबन्धों का चयन है। आशा है, कुँवर नारायण के साहित्य और व्यक्तित्व में रुचि रखनेवाले सभी पाठकों के लिए ये दोनों खंड मूल्यवान साबित होंगे।
Kabir Granthawali : Parimarjit Paath
- Author Name:
Kabir +2
- Book Type:

- Description:
कबीर-पंथियों में जो स्थान ‘बीजक’ का है, अकादमिक हलक़ों में वही स्थान श्यामसुन्दर दास द्वारा सम्पादित ‘कबीर-ग्रंथावली’ का है। तमाम विवादों और असहमतियों के बावजूद आज भी कबीर के प्रामाणिक पाठ के लिए अध्येता ‘ग्रंथावली’ का ही सहारा लेते हैं। ऐसे में अगर यह पता चले कि ‘ग्रंथावली’ में संकलित कबीर भले ही अन्य संग्रहों के मुक़ाबले ज़्यादा पूरे हों, लेकिन जो पाठ यहाँ प्रकाशित है, उसमें अनेक ऐसी भूलें हैं, जो अर्थ का अनर्थ ही नहीं कर रहीं, बल्कि कवि के मंतव्य को ही उलट दे रही हैं, तो क्या हो... आश्चर्य नहीं कि लगभग एक सदी से अनेक संस्करणों में व्यवहृत ‘ग्रंथावली’ के इस पक्ष पर प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल की निगाह रुकी और उन्होंने अपने विशद अध्ययन और कबीर के प्रति अपने असाधारण प्रेम के चलते इसके परिमार्जन का बीड़ा उठाया। यह संस्करण उसी परिमार्जित एवं शुद्धतम पाठ की प्रस्तुति है जिसका आरम्भ उनकी एक सुदीर्घ भूमिका से होता है। इस भूमिका में प्रो. अग्रवाल ने पाठ-परिमार्जन की इस पूरी श्रम-साध्य प्रक्रिया पर तो प्रकाश डाला ही है, कबीर पर अपने अब तक के अध्ययन से प्राप्त अद्यतन धारणाओं को भी सूत्र रूप में दे दिया है। पाठकों को ज्ञात ही है कि ‘अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय’ (2009) में उन्होंने कबीर के बहाने उस मध्यकाल में भारत की आधुनिकता की पहचान की थी, जो औपनिवेशिक आधुनिकता से पहले ही भारत के लोकवृत्त में प्रकट हो चुकी थी। ‘कबीर-ग्रंथावली’ की इस प्रस्तुति में वे न सिर्फ़ कबीर की वाणी को शुद्धतम रूप में हमें दे रहे हैं, बल्कि कबीर-अध्ययन के इतिहास की गुत्थियों को सुलझाते हुए उन्हें ठीक से पढ़ने-जानने की समझ भी हमें प्रदान कर रहे हैं।
Pratinidhi Kavitayen : Kunwar Narayan
- Author Name:
Kunwar Narayan
- Book Type:

- Description:
शुरू से लेकर अब तक की कविताएँ सिलसिलेवार पढ़ी जाएँ तो कुँवर नारायण की भाषा में बदलते मिज़ाज को लक्ष्य किया जा सकता है। आरम्भिक कविताओं पर नई कविता के दौर की काव्य-भाषा की स्वाभाविक छाप स्पष्ट है। इस छाप के बावजूद छटपटाहट है—कविता के वाक्य-विन्यास को आरोपित सजावट से मुक्त कर सहज वाक्य-विन्यास के निकट लाने की। आगे चलकर यह वाक्य-विन्यास कुँवर नारायण की कविता के लिए स्वभाव-सिद्ध हो गया है। लेकिन उनकी विशेषता यह है कि उन्होंने सहज वाक्य-विन्यास को बोध के सरलीकरण का पर्याय अधिकांशत: नहीं बनने दिया। सहज रहते हुए सरलीकरण से बचे रहना, साधना के कठिन अभ्यास की माँग करता है। 'सहज-सहज सब कोई कहै—सहज न चीन्हे कोय!' बाल-भाषा में 'प्रौढ़ व्यक्तित्व को अभिव्यक्ति' देने की चुनौती को कुँवर नारायण ने बहुत गहरे में लिया और जिया है। परम्परा की स्मृति और 'सैकड़ों नए-नए' पहलुओं को धारण करनेवाली काव्य-भाषा सम्भव करने के लिए जो साधना उन्होंने की होगी, उसका अनुमान ही किया जा सकता है। कुँवर नारायण इस महत्त्वपूर्ण सचाई के प्रति सजग हैं कि ‘कलाकार-वैज्ञानिक के लिए कुछ भी असाध्य नहीं।’ वे इस गहरी सचाई से भी वाक़िफ़ हैं कि चिन्तन चाहे दार्शनिक प्रश्नों पर किया जाए चाहे वैज्ञानिक तथ्यों पर, काव्यात्मक भाषा ही प्रत्यक्ष दिखने वाले विरोधों के परे जाकर मूलभूत सत्यों को धारण करने का हौसला कर पाती है। —पुरुषोत्तम अग्रवाल
Nacohus
- Author Name:
Purushottam Agarwal +1
- Book Type:

- Description:
एक दशक पहले, आहत भावनाओं की हिंसक राजनीति के बढ़ते संकट पर टिप्पणी करते हुए, पुरुषोत्तम अग्रवाल ने एक व्यंग्य-लेख में, प्रस्ताव किया था, ‘आहट भावना आयोग का गठन’ कर ही दिया जाए... अब यह उपन्यास...ज़बान पर लगते जा रहे नित नए तालों की डरावनी ख़बर की पड़ताल करने के साथ ही, सूचना और मनोरंजन के सब तरफ़ पसरते जंजाल में, तकनीकी आतंक तले चेतना के हाशिए पर धकेले जा रहे विवेक की चीत्कार को स्वर देता है यह उपन्यास... पुरुषोत्तम अग्रवाल का पहला उपन्यास ‘नाकोहस’ नई-नई गढ़ी जा रही वास्तविकता की पड़ताल के लिए गढ़े गए ‘बौनैसर’ और ऐसे अनेक विचारोत्तेजक शब्दों के कारण भी ध्यान खींचता है... स्वयं ‘नाकोहस’ भी ऐसा ही एक शब्द है...
‘Kaun Hain Bharat Mata?’
- Author Name:
Purushottam Agarwal +3
- Book Type:

- Description:
यह भारतमाता कौन है, जिसकी जय आप देखना चाहते हैं’? 1936 की एक सार्वजनिक सभा में जवाहरलाल नेहरू ने लोगों से यह सवाल पूछा। वही जवाहरलाल जो भारत के स्वाधीनता-आन्दोलन के सबसे महत्त्वपूर्ण नायकों में रहे और बाद में देश के पहले प्रधानमंत्री भी बने। फिर उन्होंने कहा : बेशक ये पहाड़ और नदियाँ, जंगल और मैदान सबको बहुत प्यारे हैं, लेकिन जो बात जानना सबसे ज़रूरी है वह यह कि इस विशाल भूमि में फैले भारतवासी सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं। भारतमाता यही करोड़ों-करोड़ जनता है और भारतमाता की जय उसकी भूमि पर रहने वाले इन सब की जय है।’ यह किताब इस सच्ची लोकतांत्रिक भावना और समावेशी दृष्टिकोण को धारण करने वाले शानदार दिमाग़ को हमारे सामने रखती है। यह पुस्तक आज के समय में ख़ासतौर से प्रासंगिक है जब ‘राष्ट्रवाद’ और ‘भारतमाता की जय’ के नारे का इस्तेमाल भारत के विचार को एक आक्रामक चोगा पहनाने के लिए किया जा रहा है जिसमें यहाँ रहनेवाले करोड़ों निवासियों और नागरिकों को छोड़ दिया गया है। ‘कौन हैं भारतमाता?’ में नेहरू की क्लासिक किताबों—‘आत्मकथा’, ‘विश्व इतिहास की झलक’ और ‘भारत की खोज’—से लेख और अंश लिये गए हैं। उनके भाषण, निबन्ध और पत्र, उनके कुछ बहुत प्रासंगिक साक्षात्कार भी इसमें हैं। संकलन के दूसरे भाग में नेहरू का मूल्यांकन करते हुए अन्य लेखकों के अलावा महात्मा गांधी, भगत सिंह, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, अरुणा आसफ़ अली, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, अली सरदार जाफ़री, बल्देव सिंह, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, रिचर्ड एटनबरो, ली कुआन यू और अटल बिहारी वाजपेयी के आलेख शामिल हैं। बहुत सारे विषयों से गुँथी इस किताब के पन्नों में—जिसमें एक बहुत शानदार प्रस्तावना भी है—नेहरू एक ऐसे महत्त्वपूर्ण कर्मशील व विचारशील व्यक्ति के रूप में उभरते हैं जिनमें भारत की सभ्यतामूलक आत्मा की एक सहज समझदारी थी और साथ ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता भी; और एक राजनेता के रूप में राजनीति की सारी मजबूरियों के बावजूद जो हमेशा एक लोकतंत्रवादी बने रहे। उनकी विरासत आज भी महत्त्वपूर्ण बनी हुई है—शायद हमारे इतिहास के किसी भी दौर से ज़्यादा वह आज प्रासंगिक है।
Hindi Saray : Astrakhan Vaya Yerevan
- Author Name:
Purushottam Agarwal +1
- Book Type:

- Description:
...और कई प्रमाणों की तरह अस्त्राखान के हिन्दू व्यापारी भी उस वास्तविकता के प्रमाण हैं, जिस पर ध्यान देने की ज़रूरत ही नहीं महसूस की जाती। वे ऐसे पात्र हैं जो सैकड़ों सालों से अपने लिए लेखक तलाश रहे हैं। वे हिन्दी सराय में बुला रहे हैं, कोई जाने को तैयार नहीं। अस्त्राखान की हिन्दी सराय की ये आवाज़ें, यों तो काफ़ी पहले से सुनता रहा था, धुँधली सी यादें बनी हुई थीं। ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ के अलावा, राहुल जी के ‘मध्य एशिया के इतिहास' में भी अस्त्राखान के व्यापारियों के भारत-सम्पर्क का उल्लेख है। ‘अकथ कहानी प्रेम की' लिखने के दौरान इन आवाज़ों की धुँधली यादें तो ताज़ा हो ही गईं, कुछ और आवाज़ें भी सुनाई देने लगीं। भारत के साथ-साथ अन्य सभ्यताओं के इतिहासों से भी आती हैं ऐसी आवाज़ें, जिन्हें औपनिवेशिक इतिहास-दृष्टि के अन्धविश्वास दबाते रहे हैं। ऐसी आवाज़ें मुझे बुलाती रहती हैं, कभी मेक्सिको तो कभी अस्त्राखान। इन्हीं आवाज़ों को सुनने की उत्सुकता ने, अस्त्राखान में हिन्दी-सराय बनानेवाले, वोल्गा किनारे के तातार-बाज़ार में अपने मकानों और मक़ामों के अब तक दिखनेवाले निशान छोड़ जानेवाले मुलतानियों, मारवाड़ियों, सिन्धियों, गुजरातियों से बात करने की बेचैनी ने ही कराया, मेरा यह सफ़र हिन्दी सराय अस्त्राखान वाया येरेवान का... —इसी पुस्तक से।
Nij Brahma Vichar
- Author Name:
Purushottam Agarwal +1
- Book Type:

- Description:
धर्म के सामान्य अनुयायी, साधारण आस्थावान लोग हों या धर्म को हिंसक राजनीति में बदलनेवाले चतुर सुजान, धर्म के अध्येता हों या कठोर आलोचक और घोर विरोधी—अपने सारे मतभेदों के बावजूद इनमें से अधिकांश एक बात पर सहमत हैं। वह यह कि धर्म और अध्यात्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। या तो अध्यात्म फिजूल की बात है, या फिर धर्म ही अध्यात्म का एकमात्र आधार और माध्यम है। या तो अध्यात्म का आशय है—समाजनिरपेक्ष आत्मलीनता या अध्यात्म का अर्थ है प्रतिक्रियावादी रहस्यवाद। दोनों में से किसी भी तर्क-पद्धति को अपनाइए, निष्कर्ष पहले से तय है : यदि अध्यात्म के प्रश्नों में आपकी दिलचस्पी है तो आप धर्म को अपनाइए; यदि आप धर्म से असुविधा महसूस करते हैं तो अध्यात्म को भी साथ-साथ खारिज कर दीजिए। परस्पर विरोधी तर्क-पद्धतियों का निष्कर्ष के धरातल पर यह सामंजस्य अद्भुत है। धर्मेतर अध्यात्म की सम्भावनाओं पर विचार का प्रस्ताव इस परिप्रेक्ष्य में ‘निज ब्रह्म विचार’ ही नहीं देती बल्कि विरुद्धों के इस सामंजस्य से टकराने का, और हो सके तो इसके परे जाने का प्रस्ताव भी देती है। दैनिक ‘जनसत्ता’ में लम्बे समय तक प्रकाशित होने वाला, पुरुषोत्तम अग्रवाल का चर्चित कॉलम ‘मुखामुखम’ विवेकसम्मत ढंग से सोचने-विचारने के लिए प्रेरित करता रहा। सैद्धान्तिक प्रश्नों से जूझने से लेकर अटलांटा, वर्धा और गोपेश्वर के अनुभव-संवेदनों को पाठकों के सामने प्रस्तुत करने तक के रूप में ये लेख लगातार उत्सुकता के साथ पढ़े गए। जाने-माने बुद्धिजीवियों से लेकर पाठकों तक सभी ने इनमें विशेष दिलचस्पी जाहिर की। बहसें भी हुईं। शुरुआती एक वर्ष (मई 2003-मई 2004) में प्रकाशित चर्चित लेख यहाँ पुस्तक रूप में प्रस्तुत हैं। लेखक ने इनमें वे आवश्यक पाद-टिप्पणियाँ और सन्दर्भोल्लेख भी जोड़ दिये हैं, जो अखबार में नहीं आ सकते थे, लेकिन जरूरी थे।
Akath Kahani Prem Ki : Kabir Ki Kavita Aur Unka Samay
- Author Name:
Purushottam Agarwal +1
- Book Type:

- Description:
कबीर के समय को, जबदी हुई मनोवृत्ति का ‘मध्य-काल’ नहीं, देशज आधुनिकता का समय बताती हुई यह चर्चित और बहु-प्रशंसित पुस्तक प्रामाणिक और विचारोत्तेजक ढंग से कबीर और उनके समय का नया आख्यान रचती है। कबीर की काव्य-संवेदना का मार्मिक विश्लेषण करते हुए पुरुषोत्तम अग्रवाल याद दिलाते हैं कि ‘नारी-निंदक’ कहे गए कबीर प्रेम के पलों में नारी का ही रूप धारण करते हैं। यह पाठक पर है कि वह सम्बन्ध नारी-निन्दा के संस्कार से बनाता है, या नारी रूप धारण करती कवि-संवेदना से। पुस्तक काव्योक्त और शास्त्रोक्त भक्ति की धारणाएँ प्रस्तुत कर भक्ति-संवेदना के इतिहास पर पुनर्विचार की दिशा भी देती है। पुरुषोत्तम जी ने व्यापारियों और दस्तकारों द्वारा रचे जा रहे भक्ति के लोकवृत्त की अभूतपूर्व अवधारणा प्रस्तुत की है, और दिखाया है कि कबीर और अन्य सन्तों को ‘हाशिए की आवाज़’ देशज आधुनिकता में रचे गए भक्ति के लोकवृत्त ने नहीं, औपनिवेशिक ज्ञानकांड ने बनाया है। देशभाषा स्रोतों से संवाद किए बिना भारतीय इतिहास को समझना असम्भव है। बीसवीं सदी में गढ़ी गई रामानन्द की संस्कृत निर्मिति के इतिहास को मौलिक शोध के आधार पर, जासूसी कहानी की सी रोमांचकता के साथ प्रस्तुत करते हुए पुरुषोत्तम जी बताते हैं कि ‘साजिश’ और ‘बुद्धूपन’ जैसे बीज-शब्दों के सहारे किसी परम्परा को नहीं समझा जा सकता। इस पुस्तक की स्थापना है कि औपनिवेशिक आधुनिकता ने ग़ैर-यूरोपिय समाजों में ‘मध्यकालीन जड़ता को तोड़नेवाली प्रगतिशील भूमिका’ नहीं, देशज आधुनिकता को अवरुद्ध करने की भूमिका निभाई है। इस अवरोध ने अब तक चला आ रहा जो सांस्कृतिक संवेदना-विच्छेद उत्पन्न किया है, उसे दूर किए बिना हम न तो अपने अतीत का प्रामाणिक आख्यान रच सकते हैं, और न भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार हो सकते हैं। कबीर की कविता और भारतीय इतिहास के जिज्ञासुओं के लिए अनिवार्य पुस्तक।
Akath Kahani Prem Ki : Kabir Ki Kavita Aur Unka Samay
Purushottam Agarwal
20% off₹ 499
₹ 399.2
Available
Kiya Ankiya
- Author Name:
Purushottam Agarwal +3
- Book Type:

- Description:
पुरुषोत्तम अग्रवाल हमारे समय की एक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक और सर्जनात्मक उपस्थिति हैं। उनका लेखन रूप और अन्तर्वस्तु की दृष्टि से विविध और विशाल है। उनकी कई स्वतंत्र छवियाँ हैं, लेकिन कोई एक छवि नहीं है। चिन्तक, आलोचक, कवि, कथाकार, विमर्शकार, कार्यकर्ता, पत्रकार, व्यंग्यकार, प्राध्यापक, फ़िल्म-विशेषज्ञ, धर्मशास्त्री से मिलकर उनकी छवि बनती है। उनकी समग्र छवि की परख और पहचान के लिए उनके सम्पूर्ण लेखन का परिचय प्राप्त करना जितना ज़रूरी है, उतना ही कठिन भी। उनका समग्र पाठ श्रमसाध्य है, इसलिए उनकी रचनाओं का एक प्रतिनिधि चयन और प्रकाशन विलम्बित माँग थी जिसे इस संचयन के प्रकाशन से पूरा करने का प्रयास किया गया है। नवीन और प्राचीन वैश्विक वैचारिक निरूपणों और साहित्यिक सिद्धान्तों की स्पष्ट समझदारी और उनसे संवाद की प्रवृत्ति पुरुषोत्तम अग्रवाल की शक्ति है, जो उनके लेखन को निरन्तर आकर्षक और विचारोत्तेजक बनाए रखती है। इसी से उनमें बौद्धिक साहस उत्पन्न होता है, इस साहस का एक प्रमाण है अस्मितावाद की शक्ति और सीमाओं का तटस्थ व साहसपूर्ण मूल्यांकन। इसी साहस का एक और प्रमाण है—धर्म, अध्यात्म और साम्प्रदायिकता पर उनका रुख़। वे धर्म को सत्ता-तंत्र मानते हैं लेकिन आध्यात्मिकता को सहज मानवीय प्रवृत्ति के रूप में देखते हैं। कबीर, कार्ल मार्क्स, महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के धर्म और अध्यात्म सम्बन्धी विचारों के आधार पर अपनी अवधारणा को तैयार करते हैं। उनकी दृढ़ मान्यता है कि धर्म का फलतः साम्प्रदायिकता का, उन्मूलन तभी सम्भव है जब आध्यात्मिकता को मानव सुलभ मानकर धर्म से उसे स्वायत्त किया जाए। पुरुषोत्तम अग्रवाल के लेखन का एक बड़ा हिस्सा भक्तिकाल पर है। ख़ास तौर पर कबीर पर। जाति, धर्म, औपनिवेशिक आधुनिकता, अस्मितावाद इत्यादि वैचारिक निरूपणों से आच्छादित कबीर के कवि रूप को सामने लाकर उन्होंने उनकी प्रासंगिकता को पुनः अनुभूत बनाया है। बौद्धिक बेचैनी, साहित्यिक अभिरुचि, सांस्कृतिक अन्तर्दृष्टि और आलोचकीय विवेक के साथ समकालीन जीवन के विविध पक्षों और प्रश्नों पर विचार करनेवाले बुद्धिजीवी विरल हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल की पत्रकारिता इस दृष्टि से आश्वस्तिदायक है। उनका कथा साहित्य विविध संकटों से आच्छन्न बौद्धिक-जीवन के संघर्ष और जिजीविषा को सामने लाता है। उनके साहित्य में फासीवाद के देशी संस्करण के दबाव में अभिव्यक्ति के संकट और कला-बुद्धि-विरोधी दमघोंटू वातावरण की भयावहता का एहसास मुक्तिबोध की याद दिलाता है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book