Koyla Aur Kavitwa
Author:
Ramdhari Singh DinkarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 396
₹
495
Available
ला और कवित्व' में रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की सन् साठ के बाद रची गई ऐसी कविताएँ हैं जो अपने आधुनिकता-बोध में पारदर्शी तो हैं ही, कला-विन्यास का श्रेष्ठ उदाहरण भी हैं।
इस संग्रह में संकलित है एक विदुषी को लिखा गया कवि का गीत-पत्र–'कला फलाशा से युक्त होती है या वियुक्त और कोयले का उत्पादन बढ़ाने को यदि गीत लिखे जाएँ तो कैसा रहे?' यह गीत-पत्र मात्र पत्र नहीं, कवि के गहन चिन्तन का दस्तावेज़ भी है। और यह चिन्तन-ज़मीन अपनी सम्पूर्णता में इस संग्रह को विशिष्ट भी बनाती है, हमें अपने वर्तमान से जोड़ती भी है।
'कोयला और कवित्व' में संकलित कविताएँ अपने आकार में बहुत बड़ी न होकर भी अपनी प्रकृति में बहुत बड़ी हैं। एक बड़े कालखंड से जुड़ी ये कविताएँ परम्परा और अन्तर्विरोधों से गुज़रते हुए जिस संवाद का निर्वाह करती हैं, वह बहुत बड़ी सृजनात्मकता का प्रतीक है।
हमारे मन और मस्तिष्क को उद्वेलित करनेवाली ये कविताएँ संग्रहणीय भी हैं, और अविस्मरणीय भ
ISBN: 9789389243826
Pages: 120
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Pyar Karta Hua Koi Ek
- Author Name:
Manoj Kumar Pandey
- Book Type:

-
Description:
प्यार जब जीवन और कविता, दोनों जगह दुर्लभ हो रहा हो, दोनों ही जगह जब समाज और व्यवस्था में उग रहीं विषैली, प्रेमविरोधी और हिंस्र प्रतिक्रियाएँ मुख्यधारा हो रही हों, तब 'प्यार करता हुआ कोई एक' भी बड़ी राहत, और गहरी आश्वस्ति का स्रोत मालूम होता है।
यह कविता-संग्रह उन प्रेमियों के लिए है जिनसे जाने-अनजाने उनका प्रेम खो गया है; और दुखद यह है कि आज के समय में जीनेवाले हम सभी उसी श्रेणी में आते हैं। कभी हम उसे समझ नहीं पाते, कभी उसे सँभाल नहीं पाते क्योंकि हम सिर्फ़ 'प्रेम में होकर' बने रह सकें, इस विकल्प को ही कर सकनेवालों ने असम्भव कर दिया है।
इसलिए ये कविताएँ हम सबके लिए हैं। ये प्रेम की उस खाली जगह से उद्भूत हुई हैं जहाँ से अभी-अभी उठकर कोई गया है, जहाँ अभाव से भरी हुई एक कुर्सी अभी भी रखी है, हिल रही है, लेकिन उसे छूते हुए हमारे हाथ काँपते हैं, जिसे देखकर हमें हमारी अपात्रता याद आती है।
बीती हुई नजदीकियों के चमकीले कणों से दमकती ये कविताएँ विछोह के असीम पठार पर प्रेम के सबसे गहन सत्य की खोज में भटकती हुई हमें प्रेम की कीमत समझाती हैं। बताती हैं कि जब वह होता है तब भी, और जब नहीं होता तब भी, वह अमूल्य है, वह हर रूप में हमें ज्यादा मानवीय और ज्यादा सम्भावनाशील बनाता है। और यह कि, उसके 'होने' और 'न होने' से परे का प्रेमच्युत संसार कुछ भी नहीं है। 'मुझसे लिपटती है मेरी जान/वो मुझे खाती है मैं उसे/मैं उसकी बाँहों में मजे से मर जाता हूँ।'
ये कविताएँ हमें कोंचकर पूछती हैं कि 'मजे से मरे' हुए हमें कितनी सदियाँ बीत गई हैं; कि कितना वक्त हो गया है हमें किसी की तलाश में भटककर खुद से जा मिले हुए।
ये कविताएँ प्रेम के अभाव में जीने के हमारे अभ्यास को तोड़ती हैं; वियोग की
अलग-अलग कन्दराओं से आहों की तरह निकली ये पंक्तियाँ हमें पुन: प्रेम की अबूझ दुनिया में जाने को उकसाती हैं।
Mahaprashthan
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

- Description: ‘महाप्रस्थान’ का स्रोत ‘महाभारत’ है। सहस्रों वर्षों से भारतीय साहित्य इस महागाथा के अखूट स्रोत से अभिनव सृष्टि करता रहा है। कवि ने अपने आधुनिक चिन्तन के लिए इनका आश्रय लिया है। पुस्तक का विषय पांडवों का ‘स्वर्गारोहण’ है, जिसमें युधिष्ठिर के माध्यम से कवि ने राज्य-व्यवस्था की अकूत शक्ति से उत्पन्न संकट और उसके बरक्स व्यक्ति की रक्षा जैसे प्रश्न उठाए हैं, जो चिरन्तन हैं, परन्तु आपात्काल के सन्दर्भ में प्रासंगिक प्रश्न भी हो गए हैं।
Pakistani Urdu Shayari Vol. 4
- Author Name:
Narendra Nath
- Book Type:

-
Description:
‘पाकिस्तानी उर्दू शायरी’ के इस खंड में बारह शायरों की रचनाएँ शामिल हैं। नज़्मों, ग़ज़लों और फुटकर शे’रों के अलावा कुछ रचनाकारों के गीत और क़तआत भी आपको इसमें मिलेंगे।
इस पुस्तक शृंखला में शायरों का परिचय, जिसे सम्पादकों ने काफ़ी खोजबीन के बाद तैयार किया, अपने आप में संग्रहणीय सामग्री है। इसे पढ़ते हुए हमें पाकिस्तान में उर्दू काव्य-संसार का भी परिचय मिलता चलता है। उससे हमें मालूम होता है कि जिस तरह भारत में, उसी तरह पाकिस्तान में भी अकसर शायरों-लेखकों का जीवन चुनौतीपूर्ण रहा है। वहाँ के लोगों का और भी ज़्यादा क्योंकि पाकिस्तानी क़लम के ऊपर कठमुल्लापन और शासन की भी तीख़ी निगाह टिकी रही।
इस शृंखला में अब तक शामिल शायरों में अनेक ऐसे हैं जिन्होंने इसके बावजूद कभी अपने स्वर को मद्धम नहीं होने दिया। इसी खंड में प्रकाशित हमीद जालंधरी का यह क़तआ इसका प्रमाण है : ‘कितने ठाठ-बाट से आए आख़िर को बदनाम गए / नाज़ी बनकर आनेवाले गए तो नाफ़रजाम गए / हिटलर, मुसोलिनी और नासिर, इसकंदर, यह्या, अय्यूब / बोल रही है दुनिया, आमिर सबके सब नाकाम गए।’
इसी तेवर और साफ़गोई से अपनी बात कहनेवाली अनेक नज़्में-ग़ज़लें इस ग्रन्थ-शृंखला को एक दस्तावेज़ बनाती हैं, हमारी नज़र से ओझल पाकिस्तान के शायरों को सामने लाने का काम तो ये पुस्तकें करती ही हैं।
Usaki Aankhon Mein Kuchh
- Author Name:
Pratap Rao Kadam
- Book Type:

-
Description:
प्रतापराव कदम की कविता, आज के अराजक समय और अख़बारी सतहीपन के दौर में प्रतिकार की कविता है। ज़ाहिर है यह प्रतिकार कवि किसी हथियार से न लेकर अपने वैचारिक परिष्कार एवं परिपक्व भावनात्मक बेध्यता से लेता है। दरअसल यह कविताएँ छोटे शहरों के मनोभावों को केन्द्र में रखते हुए व्यापक स्तर की अराजकता के प्रतिरोध में रची गई हैं। इसी कारण इनका मानस और विस्तार महानगरों की वर्चस्वशाली शक्तियों तक पसरा हुआ है। यह कविताएँ कुछ हद तक अपनी मान्यताओं एवं वैचारिक आग्रह के चलते ऐसा जनतांत्रिक परिदृश्य रचती हैं, जिसमें एक साधारण इनसान की पीड़ा, अवसाद, संघर्ष एवं यातनाएँ एक ऐसे सीमान्त पर खड़ी नज़र आती हैं, जहाँ से लौटकर आना सम्भव नहीं रहता। फिर वह धरातल हितैषियों की चर्चा में मुब्तिला हो या कि एक गर्भवती स्त्री की आशंका और ख़ुशियों का मिला-जुला फ़र्क़—सभी जगह लौटना या कि कुछ सार्थक बचाए रखने की खीज और खरोंचे ही हाथ लगते हैं। कवि का यह सूक्ष्म निरीक्षण देखने लायक है—‘एक आदमी एक जगह से हटता है/हवा तुरन्त ख़ाली जगह भर देती है (हितैषी कहाँ सब्र करते हैं)।’
यह तल्ख़ सच्चाई हमारे समाज और जीवन को आज बुरी तरह कँपा रही है कि एक दिन बाज़ार हम सबको लील जाएगा और हम अपनी सीमाओं और अपेक्षाओं के साथ उन सपनों को भी पूरी तरह गँवा चुके होंगे, जो कभी अपने लिए सोच रखे थे। प्रतापराव कदम यह बख़ूबी जानते हैं कि यहाँ तो एक आदमी के अपने ही धुरी से हटने पर कोई दूसरा उसकी जगह ले लेता है। अपने बचाव के लिए प्रतिहिंसा के स्तर पर उतरा हुआ आदमी अगर कहीं से ख़ुद को बचा भी लेता है, तो बाज़ार का सत्य उसके सच को कहीं पीछे छोड़ देता है। ‘बाज़ार सत्य है कविता नहीं/मैंने जोड़ा उसमें/मृत्यु सत्य है विचार नहीं/ दोनों सत्य को जोड़ो तो/बाज़ार ही सत्य है मृत्यु की तरह (बाज़ार ही सत्य मृत्यु की तरह)।’
जिस कवि को यह सत्य मृत्यु की तरह दिख रहा हो, आप अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि जीवन की तल्ख़ बयानियाँ, समाज का निर्मम विद्रूप एवं हमारे समकालीन समय की उपभोक्तावादी संस्कृति की कितनी सार्थक छवियाँ उसकी कविता में अपना उत्कर्ष पा रही होंगी। यह अकारण नहीं है कि ऐसा कवि इबादत के लिए हाथ उठाए पेड़ पर ‘आसमान ही टूट पड़ेगा’, वसीयत लिखे जाने के कटु यथार्थ पर ‘लोटा’, फल बेचने के सार्थक उद्यम पर ‘डांगरियाँ’ और चाटुकारिता के फूहड़ प्रहसन पर ‘दुम’ जैसी सार्थक और विचारवान कविता लिख रहा है।
ये कविताएँ जीवन के खुरदुरे स्पर्श और उनमें मौजूद उसके सहज सौन्दर्य के सन्तुलन की कविताएँ हैं, जिसमें एक-दूसरे का निषेध नहीं बल्कि उनमें गहरी मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्ति मिली है। यह देखना भी ख़ासा दिलचस्प और क़ाबिलेग़ौर है कि प्रतापराव कदम की निगाह समाज की तमाम उन विद्रूप ख़बरों की गहरी शिनाख़्त में भी शामिल रही है, जिसे कई बार धूर्त इरादों और नृशंसता से इधर-उधर कर दिया जाता है। वे इस अर्थ में राजनीतिक आशयों का भंडाफोड़ करनेवाले कवि भी ठहरते हैं। हैदराबाद में तसलीमा नसरीन पर हुए हमले की बात हो या फिर निठारी का जघन्य हत्याकांड—सभी जगह यह कवि अपनी कलम के नेज़े पर एक प्रश्नवाची राजनीतिक कविता को सम्भव बना रहा है।
एक हद तक इस संग्रह की कविताएँ, प्रश्न करती हुई कविताएँ भी हैं। यह देखना भी प्रासंगिक है कि ये अनगिन प्रश्न ढेरों तरीक़ों से कई दिशाओं में सम्भव हुए हैं। फिर वह कोसी नदी हो, शवयात्रा के आगे बाजा बजाने वाले लोग हों, विष्णु गणपत चौधुले के मार्फत पुलिस विभाग हो, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी हो, फ़ज़र की नमाज़ हो, कबड्डी का खेल हो या फिर नदी की मछली—कवि हर जगह गया है और अद्भुत रूप से अपनी काव्य भंगिमाओं को एक सार्थक संवाद दे पाया है।
भारतीय समाज के मध्यवर्ग के तमाम आख्यानों, इतिहास, स्मृति और राजनीति का अचूक इस्तेमाल करते हुए, साथ ही उसे बाज़ार की भाषा से दूर ले जाकर हर दिन दुःसाध्य होती जाती दुनिया और जीवन को खोजने-नबेरने का साहस दिखाती हुई इन कविताओं में मनुष्य की चिन्ताओं को बड़े फ़लक पर विमर्श का मौक़ा मिला है। इसी कारण इन कविताओं में ऐसे चरित्रा औ गतिविधियाँ सहज ही अपनी भागीदारी बना पाए हैं, जो एक साथ पढ़े जाने पर अपने समवेत प्रतिरोध का शोर रचते हैं।
प्रतापराव कदम, इन कविताओं के बहाने—राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक प्रपंचों पर ऐसा तीक्ष्ण प्रहार करते हैं कि यह देख पाना सम्भव लगता है कि मनुष्य की आकांक्षाओं और सपनों के समर्थन में कभी शब्द या भाषा भी खड़ी हो सकती है। यह इन कविताओं के माध्यम से बख़ूबी सम्भव हो सका है और शोर-शराबे वाले ऐसे कृतघ्न समय में अगर कोई कवि अपने भ्रम के सहारे जीवन की सहजता को बचाए रखता है, तो वह कोशिश कम नहीं मानी जा सकती—‘दूर से, अछड़ते जैसे कोई है झोपड़ी में/जैसे कोई फ़सल निहारते खड़ा बीच खेत/यही भरम बनाए-बचाए रखता है। (भरम)’
इसी भरम को पोसते हुए स्वयं कवि, उसकी कविता या पाठक ही नहीं, बल्कि वे तमाम लोग भी समृद्ध होते हैं, जिनके जीवन में इस तरह का कोई भरम या विश्वास बचा हुआ है।
—यतीन्द्र मिश्र
Fir Ugana
- Author Name:
Parwati Tirkey
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी कविता की युवतम पीढ़ी में पार्वती तिर्की का स्वर एकदम अलग है। झारखंड के कुड़ुख समुदाय से आनेवाली पार्वती आदिवासी जीवन-बोध के आधारभूत तत्त्वों से अपनी कविता की काया रचती हैं जिसमें प्रकृति की बड़ी और निर्णायक भूमिका रहती है। धरती, चाँद-तारे, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु—ये सब जैसे आदिवासी जीवन में अभिन्न हैं, उसी तरह पार्वती की इन कविताओं में भी उनकी मौजूदगी दिखाई देती है।
अभिव्यक्ति की सरल भंगिमाओं में उनकी कविताएँ अनायास ही प्रकृति और मनुष्य के आपसी सम्बन्धों को देखने की हमारी दृष्टि को बदल देती हैं। ये कविताएँ बताती हैं कि सृष्टि के प्राकृतिक अनुशासन के भीतर ही मनुष्य की तमाम चेष्टाएँ अपना स्थान ग्रहण करती हैं, और उसी के अनुकूलन में मनुष्य अपना स्वाभाविक विकास कर पाता है।
पार्वती की कविताओं की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता यह है कि वे बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के प्रकृति के सान्निध्य में बनते-बढ़ते जीवन की सहज छवियों, बिम्बों, लोक के विश्वासों और मान्यताओं को कविता का हिस्सा बना देती हैं।
आदिवासी बोध के बाहर पनप रही सभ्यता के आक्रामक प्रभावों और ख़तरों को रेखांकित करना भी पार्वती नहीं भूलतीं। इस संग्रह की कई कविताएँ प्रकृति के साहचर्य और उसके बरक्स खड़े शहरी दबावों के तनाव को सफलतापूर्वक अंकित करती हैं।
‘फिर उगना’ के पन्नों से गुज़रना कविता-सुधी पाठकों के लिए निश्चय ही एक नए इलाक़े से वाक़िफ़ होने जैसा होगा।
Chaand Mein Bhi Daag Hai
- Author Name:
Dilip Kumar Chauhan 'Baaghi'
- Book Type:

- Description: The title "Chaand Mein Bhi Daag Hai" is written by Dilip Kumar Chauhan "Baaghi" which is a Hindi Poetry Book
Ummidon Ke Geetkar Shailendra : Cinema Mein Rache Gaane, Zindagi Mein Base Gaane
- Author Name:
Yunus Khan
- Book Type:

-
Description:
‘उम्मीदों के गीतकार शैलेन्द’ सिर्फ़ शैलेन्द्र के गीतों और उनकी प्रतिभा के बारे में नहीं है, यह किताब इसके साथ-साथ फ़िल्मों की संरचना, फ़िल्मों की दुनिया में रचनात्मकता के आयामों और गीतों की निगाह से फ़िल्म और उसकी कथा को भी देखती और दिखाती है।
गीत की विधा के मास्टर और अपने समय तथा समाज को ज़मीन पर उतरकर देखने-समझने वाले गीतकार-कवि शैलेन्द्र ने अपने छोटे-से फ़िल्मी जीवन में भारतीय जन-गण को वह दिया, जो सदियों उनके दुःख-सुख के साथ रहनेवाला है। अनेक ऐसे गीत, अनेक ऐसी पंक्तियाँ, जो मुहावरों की तरह हमारी ज़िन्दगी में शामिल हो गईं।
लेकिन वे गीत वजूद में कैसे आए, उन फ़िल्मों की पर्दे और पर्दे के पीछे की कहानियाँ जो इन गीतों को हम तक लाईं, शैलेन्द्र का अपना जीवन और उस दौर के हिन्दी सिनेमा का अनूठा माहौल; यह किताब हमें इस बारे में भी एक साथी की तरह पास बैठकर बताती है।
यूनुस ख़ान को रेडियो से और फ़िल्मी गीतों से जुड़े एक लम्बा अर्सा हो चुका है, फ़िल्मी गीतों को वे जुनून की तरह जीते हैं, शैलेन्द्र को इस किताब में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहीं अपने इस जुनून की लय को टूटने नहीं दिया। इस किताब में होना एक हमदम गद्य की गर्माइश में होना भी है; जहाँ शैलेन्द्र अपनी तमाम ख़ूबियों के साथ साकार होते दिखते हैं।
Kavita Mein Sab Kuchh Sambhav
- Author Name:
Shailendra Shail
- Book Type:

- Description: collection of poems
Aiwan-E- Ghazal
- Author Name:
Zilani Bano
- Book Type:

- Description: ‘ऐवाने ग़ज़ल’ की फ़िज़ा परम्परा से शायराना चली आई है, लेकिन वक़्त, बदला, ज़मींदारी की पुख़्ता ज़मीनें खिसकने लगीं, सबकी बराबरी के नारे हवा में गूँजने लगे तो ऐवाने ग़ज़ल के आख़िरी शायर वाहिद हुसैन के पास दिल की बातें करने के लिए रंगीन परों वाली एक नन्ही-सी चिड़िया ही बच गई जो रोज़ उनके बाग़ में उनके पास आकर बैठती। ख़त्म होने पर आमादा इस कहानी को नई रफ़्तार बख़्शती है चाँद। बड़ी हवेली की नन्ही-मुन्नी खिलंदड़ी नवासी चाँद बड़ी होकर स्टेज पर पहुँचती है और एक असम्भव मुहब्बत में तपेदिक के हत्थे चढ़ जाती है। लेकिन जाते-जाते अपने पीछे छोड़ जाती है ग़ज़ल को। ग़ज़ल जिसने पैदा होने के बाद से प्यार और दुलार क्या होता है, नहीं जाना; बड़ी हुई तो ज़िन्दगी से उसने सिर्फ़ एक चीज़ माँगी—प्यार। जो आख़िरकार उसे नहीं मिला और उसने अपना ख़ाली आँचल क्रान्ति के ऊपर फैला दिया। और नक्सली माँ-बाप की जंगलों में जन्मी इकलौती औलाद क्रान्ति ने जैसे ‘ऐवाने ग़ज़ल’ की पूरी परम्परा को ही उलटकर रख दिया। उसके कमरे में बम थे, जेब में पिस्तौल, हाथ में सिगरेट और चेहरे पर वह तेज़ जिसके सामने ऐवाने ग़ज़ल की दीवारों पर चस्पाँ तमाम हुस्नपरस्त शायर हक-दक रह गए। छोटी-छोटी तफ़सीलों से लबरेज़ एक बड़ी कहानी।
Bhaykshetr Mein Utarte Huye
- Author Name:
Abhinav Niranjan
- Book Type:

- Description: poetry
My Odyssey
- Author Name:
Apoorva Ravi
- Rating:
- Book Type:

- Description: Every human being traverses through the different stages of life experiencing love, loss, and loneliness. The book, ‘My Odyssey’ speaks about the author's tryst with life, learning to love, encountering loss, and experiencing loneliness. There are instances where the author ‘sees light and hope' in different forms. The book talks about the author’s mental health journey, relationships with people, and herself coupled with her lyrical reflections on life through poems. The author hopes that her book will help people embrace the love that they receive, accept the loss that they encounter, experience the inevitable loneliness with grace, and find hope in the little things of life.
Khuli Aankh Aur Anya Kavitayen
- Author Name:
Udyan Vajpeyi
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Kuch Purzay Dil Kay
- Author Name:
Deepthi Musley
- Book Type:

- Description: The heart is the fragments of experiences and realizations on the path of life. Kuch Purzay Dil Kay is the heart's journey with the soul,expressed in words as poetries and lyrics. The simple complexities of the heart and soul are what the readers will encounter by reading this collection. The Fragments Zikr-e-Rab is about the soul awakening, realizing happiness, encountering the divine in music, and expressing love lyrically in a contemporary fashion for the readers. Nazm-E-Bahaar expresses finding the self or finding the divine is like searching for the first raindrop that mixes in the river and flows to an unknown land. Nazm-E-Bahaar talks about the yearning soul. The calling by the part of the universe that is unlike the earth. Ehsaasaat-o-Tajurbaat is about feelings evoked by experiences. Love and life have plenty to offer to make a poet out of you. Khazaane The heart is but the beloved itself. Every centimetre fragment of the heart is a rich jewel of experience, Pain, and love felt intensely, making it appear as the lover. Triveni is about writing experiences of my life in triplets, with the first two misre complete in the same thought. The third misra acts as an analogy that draws out the context of the first two misras. My humble attempt at what was introduced by the great Gulzar
Humanist Social Vision of a Jungle Poet
- Author Name:
Kuvempu +1
- Rating:
- Book Type:

- Description: This book carries 51 poems of Kuvempu in translation with a long introduction to give the pan India audience an understanding of Kuvempu's major concerns. Prof Raghunath has made his choice carefully to represent Kuvempu's social concern, and that seems to be at the heart of his introductory piece.
Khul Gaya Hai Dwar Ek
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

-
Description:
अशोक वाजपेयी को पहले ‘देह और गेह का कवि’ कहा गया था। यह कहना निराधार नहीं था, लेकिन शनै:-शनै: उनकी दैहिक और गैहिक भावना का ऐसा विस्तार हुआ कि उसमें प्रकृति ही नहीं, सम्पूर्ण पृथ्वी सिमट आई। वे नई कविता के आख़िरी दौर के कवि हैं। उसके बाद से हिन्दी कविता में कई प्रकार के बदलाव हुए, पर उन्होंने अपना मार्ग कभी नहीं बदला। कारण यह कि उनकी कविता में स्वयं ऐसे आयाम प्रकट होते गए कि उन्हें कभी उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। उनकी काव्य-यात्रा एक लम्बी काव्य-यात्रा है, जिसमें कवि ने कई मंज़िलें पार की हैं। आज उनकी कविता के बारे में दिनकर के शब्दों में यही कहा जा सकता है कि ‘वर्षा का मौसम गया, बाढ़ भी साथ गई, जो बचा आज वह स्वच्छ नीर का सोता है...।’
अशोक जी हमेशा ऊँचे सरकारी पदों पर रहे, लेकिन यह प्रीतिकर आश्चर्य की बात है कि उनकी कविता का नायक अभिजन न होकर साधारण जन है। इस साधारण जन को वे नज़दीक से जानते हैं और उसकी समस्त पीड़ाओं के साथ उसकी इतिहास-निर्मात्री शक्ति से भी परिचित हैं। स्वभावत: उनमें नक़ली क्रान्ति के लिए कोई बेचैनी नहीं है, जैसी कथित प्रगतिशीलों और जनवादियों में देखी जाती है। उनकी तरह वे समाज को साहित्य के ऊपर नहीं रखते, बल्कि साहित्य के अनुशासन में ही समाज और इसके अन्य पक्षों को स्वीकार करते हैं। साधारण जन का शत्रु कौन है? यह कवि से छिपा नहीं है, इसलिए बिना कविता को छोड़े वह उससे उसे आगाह करता है। आशा है, यह चयन हिन्दी के बृहत्तर पाठक-समुदाय को पसन्द आएगा, क्योंकि यह उसी को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। यह उसे समकालीन हिन्दी कविता का एक ऐसा दृश्य भी दिखलाएगा, जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता।
Sampurna Soorsagar : Vols. 1-5
- Author Name:
Soordas
- Book Type:

- Description: अष्टछाप वाले प्रसिद्ध सूरदास, महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य थे। यह जन्मान्ध थे जो दिल्ली और मथुरा के बीच जनमेजय के नागयज्ञ स्थल पर सीही में पैदा हुए थे। इनका जीवन-काल सम्भवत: सं. 1535 से 1640 वि. है। यह परसौली में रहते थे और गोवर्धनगिरि पर स्थापित श्रीनाथ जी के मन्दिर में कीर्तन किया करते थे। यह स्वयं 'सूरसागर' कहे जाते थे और इनके कीर्तन पदों का संग्रह भी 'सूरसागर' कहलाया। इसमें केवल 'कृष्णलीला' के पद हैं। यह कृष्ण लीलात्मक ‘सूरसागर’ है। इसके प्रथम खंड में विनय के पद, गोकुल लीला एवं वृंदावन लीला के कुल 1100 पद हैं। डॉ. के इस महा कार्य ने सूर सम्बन्धी समय-समय पर उठी सभी समस्याओं का समाधान कर दिया है। एक अनुपम और अद्वितीय टीका के साथ बेहद महत्त्वपूर्ण कृति।
Sheeshon Ka Masiha
- Author Name:
Faiz Ahmed 'Faiz'
- Book Type:

- Description: शीशों का मसीहा की शुरुआत होती है फ़ैज़ के एक लेख से जो उन्होंने अपने बारे में लिखी है, ज़ाहिर है बहुत संकोच के साथ क्योंकि उनके मुताबिक अपने बारे में बात करना ‘बोर लोगों का शग़ल है।’ लेकिन आगे जो वे बताते हैं, वो फ़ैज़ के पाठकों के लिए काफ़ी काम का है; उनसे हम इस किताब में संकलित उनकी नज़्मों, ग़ज़लों और अशआर की पृष्ठभूमि को जानते हैं। ‘नक़्शे-फ़रियादी’ के बारे में बताते हैं कि इसकी शुरुआती नज़्में जिस फ़ज़ा में आईं वह तालिबे-इल्मी का दौर था जिसमें ‘इब्तिदा-ए-इश्क़’ का तहय्युद भी शामिल था कि ‘ख़ुदा वो वक़्त न लाए कि सोगवार हो तू’; लेकिन यह दौर लम्बा न चलाए—कॉलेज के बड़े-बड़े बाँके तीसमारखाँ रोजी-रोटी की तलाश में गलियों की ख़ाक फाँकने लगे; और दिल कह उठा—‘मुझसे पहली-सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग’। फिर फ़ैज़ पत्रकारिता, ट्रेड यूनियन, और जेलख़ाना जिसके बारे में उनका कहना है कि ‘जेलख़ाना’ आशिक़ी की तरह ख़ुद का बुनियादी तजुर्बा है। इस तजुर्बे की साक्षी हैं ‘दस्ते-सबा’ और ‘ज़िन्दाँनामा’। ‘शीशों का मसीहा’ इस तरह हमें फ़ैज़ की रचना-यात्रा को समझने का एक रास्ता देती है।
Rang Hasi Ke
- Author Name:
Mahesh Garg "Bedhadak"
- Book Type:

- Description: हम जब भी घर गए हम जब भी घर गए अक्सर उधर गए पर छत पर चाँद को बरसों गुज़र गए उनको पता भी है कि नहीं किसको पता है बुढ़ापे का सच सर ऊपर चाँदी उगी, याददाश्त कमज़ोर पीठ धनुष जैसी हुई, कच्ची उम्र की डोर कच्ची उम्र की डोर, दाँत ले रहे हिलोरें छू-मंतर मुस्कान, नज़र हुई कमज़ोर नज़र गड़ाए बीवी कहती—हाय! अभी से तुम सठियाए।
Ummeed Se Banate Hain Raste
- Author Name:
Santosh Kumar Chaturvedi
- Book Type:

- Description: संतोष कुमार चतुर्वेदी के इस संग्रह की कविताएँ भूलने के खिलाफ रचनाधर्मी विपक्ष के अस्तित्ववान होने का गवाह बनती हैं। अपनी समस्त रचनाधर्मिता के साथ जहाँ विपक्ष हो, वहाँ विचारों के चौराहे अनिवार्यत: होंगे ही। सुकरात और बुद्ध से ले कर मुक्तिबोध, धूमिल और आगे भी विपक्ष की रचनाधर्मिता ने इन चौराहों को बनाते हुए और इन्हीं चौराहों पर स्वयं को बनते हुए देखा है, विकल्पहीनता के हर दौर में विकल्पों को सृजित कर सता के नशे में चूर गढ़ों और मठों को ध्वस्त किया है। कविता के पास चीजों को ‘हटकर देखने’ की आँख होती है । इस संग्रह की ज्यादातर कविताएँ इसका उदाहरण हैं। कील-कब्जे, कूड़ा करकट, पोस्टमॉर्टम, पासंग जैसी कविताएँ ‘दृश्य’ के दबाव में ‘अदृश्य’ रह गयी श्रमशीलता की महत्ता को पूरी संवेदना के साथ उजागर करती हैं। एक समूचा ‘अदृश्य’ परिवेश हमारे सामने कौंध उठता है जो ‘दृश्यता’ के भारी-भरकम तामझाम को अपने श्रम के बूते थामे हुए है। कविता के असुविधाजनक और संघर्ष भरे पथ पर हर कोई नही चल सकता। ग़ालिब नें यों ही नहीं कहा था कि ‘जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।’ हर ‘छोटे’ और ‘बड़े’ कवि को हर दौर में हर कदम पर अपना आत्मविश्वास अर्जित करना पड़ता है, दुनियादारी के सर्वग्रासी खोल से बाहर निकल कर दुनिया का सामना करने के लिए। संतोष के कवि के पास यह आत्मविश्वास फिलवक्त है जो हिन्दी कविता के लिए आश्वस्ति की तरह है। —प्रियम अंकित
Amiri Rekha
- Author Name:
Kumar Ambuj
- Book Type:

-
Description:
न्याय और अन्याय, अभाव और रईसी, इच्छा और यथार्थ, पुरातन और नई सभ्यता जैसे अनेक विलोम प्रत्ययों के बीच वैचारिक आवागमन को ये कविताएँ अप्रत्याशित अनूठेपन एवं द्वंद्वात्मकता के साथ सम्भव बनाते हुए नए प्रस्ताव प्रस्तुत करती हैं। यहाँ भाषा, विचार, नैतिकता और स्वप्नशीलता के साथ कलाकर्म की वही अप्रतिम सर्जनात्मकता दृष्टव्य है जिसे कुमार अंबुज की कविता ने लगातार अर्जित किया है और अंबुज हर बार उसे नई ऊँचाइयों, अभिनव जगहों तक ले गए हैं। ये कविताएँ सक्रिय और सकर्मक प्रतिरोध की रचनात्मक कार्रवाई हैं। इनमें जीवन के संगीत, उत्तराधिकार, वैश्विकता, राजनीति, बाज़ार, मनुष्यता, प्रेम और अपमान की, हमारे समय और हमारी भाषा की पुनर्परिभाषाएँ हैं, उनकी आधुनिक पहचान है। साहसिक आत्मावलोकन और प्रवंचनाएँ भी हैं। इन कविताओं से अपने भीतर के टूटे-फूटे मनुष्य की मरम्मत की जा सकती है। इन्हें इनके खुरदुरेपन के लिए प्यार किया जा सकता है और इस बात के लिए भी कि इनके भीतर कितना कुछ है—शान्त, चपल और भविष्य से लबालब भरा हुआ। संवेदित, व्यग्र अभिव्यक्ति, अचूक दृष्टि और पक्षधरता से पुष्ट कविता कुमार अंबुज की अपनी उपलब्धि है, जिसे यहाँ समूची हिन्दी कविता के सन्दर्भ में कुछ अधिक शक्ति के साथ औचक, विस्मयकारी, दुर्लभ, हार्दिक और नव्यतर भंगिमाओं के साथ देखा जा सकता है। किंचित् लम्बे अन्तराल और प्रतीक्षा के बाद प्रकाशित यह संग्रह निश्चय ही नई बहसों, रुझानों, प्रस्थानों और चुनौतियों का कारण बनेगा।
Customer Reviews
0 out of 5
Book
Be the first to write a review...