Pratinidhi Kavitayen : Amrita Pritam
(0)
₹
199
₹ 159.2 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
पंजाबी की शीर्षस्थ रचनाकार अमृता प्रीतम की कविताओं ने न केवल हिन्दी, बल्कि अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं के पाठकों के बीच पर्याप्त लोकप्रियता अर्जित की है। उनकी कविताओं में जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को जितनी आत्मीयता और लगाव के साथ ग्रहण किया गया है, वह निश्चय ही उनके रचनाकार की महती उपलब्धि है। समुद्र के समान हिलोरें खाती विराट जिजीविषा ने अमृता प्रीतम की कविताओं को गहरे लौकिक सन्दर्भ प्रदान किए हैं, रंग-बिरंगी प्रकृति और मानवीय भावनाओं के रागात्मक टकराव से उद् भुत उनकी कल्पनाशक्ति ने रचनात्मकता की नई ऊँचाइयाँ हासिल की हैं। स्मृतियों के नीले आकाश में घुमड़ते बादलों-सी इन कविताओं में नारी की मुक्ति-आकांक्षा और उसके संघर्ष की बड़ी मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। अमृता प्रीतम की प्रतिनिधि कविताओं का यह संग्रह पंजाबी और हिन्दी कविता के बीच रचनात्मक संवाद का जीवन्त वाहक सिद्ध होगा।
Read moreAbout the Book
पंजाबी की शीर्षस्थ रचनाकार अमृता प्रीतम की कविताओं ने न केवल हिन्दी, बल्कि अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं के पाठकों के बीच पर्याप्त लोकप्रियता अर्जित की है। उनकी कविताओं में जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को जितनी आत्मीयता और लगाव के साथ ग्रहण किया गया है, वह निश्चय ही उनके रचनाकार की महती उपलब्धि है। समुद्र के समान हिलोरें खाती विराट जिजीविषा ने अमृता प्रीतम की कविताओं को गहरे लौकिक सन्दर्भ प्रदान किए हैं, रंग-बिरंगी प्रकृति और मानवीय भावनाओं के रागात्मक टकराव से उद् भुत उनकी कल्पनाशक्ति ने रचनात्मकता की नई ऊँचाइयाँ हासिल की हैं। स्मृतियों के नीले आकाश में घुमड़ते बादलों-सी इन कविताओं में नारी की मुक्ति-आकांक्षा और उसके संघर्ष की बड़ी मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। अमृता प्रीतम की प्रतिनिधि कविताओं का यह संग्रह पंजाबी और हिन्दी कविता के बीच रचनात्मक संवाद का जीवन्त वाहक सिद्ध होगा।
Book Details
-
ISBN9788126700462
-
Pages135
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
ANDHERE SE ADAWAT
- Author Name:
Deepak Kumar
- Book Type:

- Description: Poems
Amrit Manthan
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
‘अमृत मंथन’ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ओजस्वी कविताओं का संकलन है।
इस पुस्तक में दिनकर जी की कुछ कविताएँ 1945 से 1948 के बीच लिखी गई थीं, जो तत्कालीन परिस्थितियों की दस्तावेज़ हैं तथा राष्ट्रकवि की जनहित के प्रति प्रतिबद्ध मानसिकता को हमारे सामने लाती हैं।
इन कविताओं में जहाँ देश के विराट व्यक्तित्वों के प्रति कवि का श्रद्धा-निवेदन है, वहीं कुछ कविताओं में उत्कट देश-प्रेम की ओजस्वी अभिव्यक्ति है। कुछ कविताएँ देशी एवं विदेशी कवियों की उत्कृष्ट रचनाओं का सरस अनुवाद हैं तो कुछ कविताओं में निसर्ग का सुन्दर चित्रण है।
इन कविताओं की विशेषता है—इनकी प्रांजल, प्रवाहमयी भाषा, उच्चकोटि का छंद-विधान और सहज भाव-सम्प्रेषण।
हिन्दी काव्य के स्वर्ण-युग की यात्रा करने के लिए यह पुस्तक उत्तम साधन है।
Paaji Nazmein
- Author Name:
Gulzar
- Book Type:

-
Description:
ये गुलज़ार की नज़्मों का मजमूआ है जिससे हमें एक थोड़े अलग मिज़ाज के गुलज़ार को जानने का मौ$का मिलता है। बहैसियत गीतकार उन्होंने रूमान और ज़ुबान के जिस जादू से हमें नवाज़ा है, उससे भी अलग। ये नज़्में सीधे सवाल न करते हुए भी हमारे सामने सवाल छोड़ती हैं, ऐसे सवाल जिन्हें कोई ऐसा ही श$ख्स पूछ सकता है जिसे दुनिया का बहुरंगी तिलस्म अपने बस में न कर पाया हो। इन नज़्मों में $गुस्सा भी है, अपने आसपास की दुनिया के मामूलीपन से को$फ्त भी इन्हें होती है, कहीं वे अपने आसपास के लोगों की क्षुद्रताओं पर उन्हें चिकोटी काटकर मुस्कुराने लगती हैं, कहीं हल्का-सा तंज़ करके उन्हें उनकी ओढ़ी हुई ऊँचाइयों में छोटा कर देती हैं। यहाँ तक कि वे ईश्वर को भी नहीं ब$ख्शतीं। उसको कहती हैं कि ये तुम्हारे भक्त तुम्हारे ऊपर तेल भी डालते हैं और शहद भी, कितनी चिपचिपाहट होती होगी! अगर सब कुछ देख रहे तो एक बार घी से उठे धुएँ पर ज़रा छींक कर ही दिखा दो। लेकिन फिर उन्हें महसूस होता है कि दुनिया-भर की नज़्मों को जितनी ज़ुबानें आती हैं, उनमें से कोई भी उस सर्वशक्तिमान की समझ में नहीं अँटती—‘न वो गर्दन हिलाता है, न वो हँकारा भरता है’। इसलिए गुलज़ार चाँद की त$ख्ती पर $गालिब का एक शे’र लिख देते हैं कि शायद वो $फरिश्तों ही से पढ़वा ले, कि इंसान को उसकी इंसानियत में छोटा बनानेवाले वे $खुदा के चहेते ही शायद पढक़र उसे सुना दें, लेकिन अ$फसोस कि बजाय इसके वह उसे या तो धो देता है या कुतर के फाँक जाता है, यानी वो
‘$खुदा अपना’ शायद पढ़ा-लिखा भी नहीं है, अगर होता तो कम-से-कम
चिट्ठी-पत्री तो कुछ करता!
ता$कत के सबसे ऊँचे मचान पर इससे बड़ी चोट और क्या होगी!
गुलज़ार की ये नज़्में बड़बोली नहीं हैं, न अपनी $कद-काठी में और न अपनी ज़ुबान में। लेकिन वे हमें बड़बोलों की एक एंटी-थीसिस देती हैं। वे बड़ी समझदारी के साथ हमें यह हिम्मत जुटाने की दावत देती हैं कि मोबाइल की ठहरी हुई इस दुनिया में ‘पर्तिपाल’ नाम के आदमी की बरतरी को ‘पाली’ नाम के कुत्ते की कमतरी के साथ रखकर तौला जा सकता है।
Jia Jugati Ke Rang
- Author Name:
Sidharth
- Book Type:

-
Description:
अनहद, अनसुनी आवाज़ें जो कि सिख रहस्यवाद का अभिन्न हिस्सा हैं, वे बौद्ध तांत्रिकता, स्कैंडिनेवियाई मिथक और अजान की आवाज़ से काफ़ी मेल खाती हैं। पंजाबी
से किए गए ज़ोरदार अनुवाद में मूल भाषा के ओज को बरकरार रखा गया है। शब्दों और छवियों, मिथक और अनुभवजन्य विवेक, सुने और अनसुने गीतों के मेल से एक सशक्त कविता प्रस्तुत होती है, जो पाठक को एक गहन तथा ज्योतिर्मय परिदृश्य की यात्रा कराती है।
—नमिता गोखले
Kammo Matiyarin
- Author Name:
Mukesh Dubey
- Book Type:

- Description: Book
Sparsh ke Gulmohar
- Author Name:
Sangeeta Gupta
- Book Type:

-
Description:
अपने चित्रों एवं फ़िल्मों के लिए विख्यात संगीता गुप्ता के पास निश्चय ही असीम का वरदान है, वे चित्रकार होने के साथ-साथ कवि भी हैं। कला, साहित्य एवं वृत्तचित्र जैसे बहुआयामी क्षेत्रों में उनकी सक्रियता इसी तथ्य को इंगित करती है। जीवन में उनकी गहरी आस्था है, विषमताओं से गुज़रते हुए भी उनका स्वर सदा सकारात्मक ही रहा है। उनका प्रेम व्यक्ति-विशेष तक सीमित नहीं, वह जीवन से जुड़े सब छोटे-बड़े तत्त्वों तक व्याप्त है। इस संग्रह की कविताएँ जीवनोमुखी हैं। उल्लास व आनन्द से भरी कविताएँ उनकी जिजीविषा को उनके चित्रों की भाँति मूर्त से अमूर्त की ओर ले जाती हैं।
‘स्पर्श के गुलमोहर’ संगीता गुप्ता का एक महत्त्वपूर्ण काव्य-संकलन है। 1988 में प्रकाशित उनके पहले काव्य-संग्रह ‘अन्तस् से’ के बाद अब तक की उनकी रचनात्मक सक्रियता में उनके सरोकार निरन्तर परिपक्व हुए हैं। निश्चय ही यह कवि की रचना-यात्रा का एक अहम पड़ाव है।
Ragini
- Author Name:
Gopal Singh 'Nepali'
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Thanega Pranam
- Author Name:
Manju Preetham
- Rating:
- Book Type:

- Description: The best poetry collection
Divya Kaidkhane Mein
- Author Name:
Rakesh Ranjan
- Book Type:

-
Description:
पिछले लगभग एक दशक से राकेश रंजन की कविताएँ पढ़ता रहा हूँ। इधर जो युवा हस्ताक्षर उभरकर आए हैं, उनमें वे कई दृष्टियों से मुझे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लगते रहे हैं। उनके पिछले दो संग्रहों की कविताएँ भी मैंने चाव से पढ़ी थीं और अब यह संग्रह 'दिव्य क़ैदख़ाने में' सामने है। सबसे पहले तो इस शीर्षक ने ही मेरा ध्यान आकर्षित किया, जिसमें एक गहरी व्यंजना छिपी हुई है और आज की राजनीतिक स्थिति को देखते हुए इसकी व्यंजकता और बढ़ जाती है।
राकेश रंजन में कुछ बातें ऐसी हैं, जो उन्हें अपनी पीढ़ी से एकदम पृथक् व्यक्तित्व प्रदान करती हैं। यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इस कवि ने हिन्दी कविता की परम्परा के सकारात्मक तत्त्वों को एक गहरे काव्य-विवेक के साथ न केवल आत्मसात् किया है, बल्कि उसे एक नया आयाम देने का भी प्रयास किया है। इस संग्रह के पाठकों से यह बात अलक्षित नहीं रह जाएगी कि इस कवि का मुख्य स्वर व्यंग्य और विडम्बना से भरा है और शायद यह इस गड्डमड्ड समय को व्यक्त करने का सबसे भरोसेमन्द हथियार भी है। इस ज़मीन पर राकेश रंजन अकेले खड़े हैं और मुझे लगता है कि इस बिन्दु पर वे नागार्जुन की परम्परा के अन्यतम उत्तराधिकारी कहे जा सकते हैं। उन्हीं की भाँति इस कवि ने छन्द और बेछन्द दोनों का पूरी सामर्थ्य के साथ इस्तेमाल किया है। इस संग्रह में मुझे यह देखकर विशेष रूप से प्रसन्नता हुई कि इस युवा कवि ने शायद पहली बार कवित्त-जैसे लगभग छोड़ दिए गए छन्द को एक नई भंगिमा के साथ अपनी कविता में अवतरित किया है। एक और अन्य वैशिष्ट्य भी अलग से रेखांकित किया जा सकता है कि राकेश रंजन गहरे अर्थ में एक राजनीतिक-चेतना-सम्पन्न कवि हैं और यहाँ भी वे नागार्जुन की परम्परा के ही वाहक दिखाई पड़ते हैं।
मुझे विश्वास है कि 'दिव्य क़ैदख़ाने में' की कविताएँ समकालीन हिन्दी कविता के पाठक को एक नई काव्यात्मक उत्तेजना प्रदान करेंगी और किसी हद तक आज की कविता को एक नई दिशा की ओर ले जाती हुई प्रतीत होंगी।
—केदारनाथ सिंह
Pichhale Prishth Se Aage…
- Author Name:
Narayan Kulkarni Kavthekar
- Book Type:

-
Description:
मराठी के प्रसिद्ध कवि नारायण कुलकर्णी कवठेकर के काव्य-संग्रह ‘मागील पानावरून पुढे सुरू...’ का हिन्दी अनुवाद है—‘पिछले पृष्ठ से आगे...’।
संग्रह की कविताएँ देश की समकालीन परिस्थितियों पर नई शैली में प्रकाश डालती हैं। यह नई शैली हिन्दी पाठकों को निश्चय ही कवि की भावनाओं की उत्कट प्रतीति कराएगी। यह काव्य-संग्रह मनुष्य को असहाय, विवश एवं संत्रस्त बनानेवाली व्यवस्था के विरुद्ध एक प्रतिभावान कवि का कारगर हस्तक्षेप है।
न्यायिक प्रक्रिया का खोखलापन, सरकारी नीतियों की अशाश्वतता, सरकारी योजनाओं का ग़लत कार्यान्वयन, व्यवस्था द्वारा किए जानेवाले विकास के ग़लत दावे एवं फ़तवे, कलाकारों की बाधित स्वतंत्रता, प्रभावहीन नेताओं के नक़ली चेहरे, प्राकृतिक तत्त्वों की बेशुमार लूट, किसानों एवं आदिवासियों की छीछालेदर, उन पर बरसनेवाले आसमानी एवं सुल्तानी संकट, महिलाओं पर हो रहे निर्मम अत्याचार आदि कितने ही विषय हैं जिनको ज़मीनी यथार्थ के अधिकाधिक पहलुओं समेत प्रस्तुत कर कवि ने अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया है।
कवि द्वारा समस्या की जड़ तक जाने, उसके अछूते पहलुओं को उभारने तथा उक्ति, सूक्ति, स्वभावोक्ति, वक्रोक्ति, व्यंग्योक्ति आदि अभिव्यक्ति के सभी स्तरों पर नए प्रयोग करने से प्रस्तुत संग्रह की कविताओं में हम असाधारण ताज़गी एवं जीवन्तता का अनुभव कर सकते हैं।
Chalo Shanti Ki Or
- Author Name:
Susheela Agrwal
- Book Type:

- Description: This book has no description
Des
- Author Name:
Sanjay Chaturvedi
- Book Type:

- Description: संजय चतुर्वेदी लगभग चालीस वर्षों से हिंदी कविता के केंद्र में प्रखर हस्तक्षेप की तरह अडिग हैं। सच कहा जाय तो उनकी अद्वितीय कविताई आज हिंदी के आँगन में वह अकेला दिया है जो अपसंस्कृति के अंधकार और झंझावात से निडर जूझ रहा है। यह सचमुच हमारे देश के हृदय में बसे हुए 'देस' की कविता है जिसमें पाठक खुद अपना झिलमिलाता हुआ प्रतिबिम्ब भी देख पायेगा।अद्भुुत भाषा और कहन वाली यह औघड़ कविता अपने शब्द और बिम्ब धरती के कोने-कोने से चुन कर हमारे लिए लाई है। एकदम समसामयिक काव्यरूप के साथ-साथ भक्तिकालीन कविता का मर्मस्पर्शी संगीत और ओज आपको अचानक द्रवित कर देगा। कहीं पद, कहीं सवैया, कहीं घनाक्षरी, कहीं दोहे, कहीं निर्द्वंद्व निर्झर सा बहता हुआ गीत तो कहीं मुक्त छंद का तरंगित विस्तार। भाषा और काव्यसृष्टि पर ऐसा अधिकार दूर-दूर तक किसी समकालीन का नहीं। इसके पीछे तगड़ी साधना और सत्य की अविचल टेक है। इस कविता में हमारे अस्तित्व पर आक्रांता आततायी सांस्कृतिक पाखंड के खिलाफ सीधे-सीधे आमने-सामने की लड़ाई है। संजय चतुर्वेदी संभवत: अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी कविता इस देशव्यापी छल-छद्म का पर्दाफाश करती है।यह लड़ाई कविता में ही नहीं स्वयं अपने भीतर भी अपनी काहिली, गफलत और आत्मविस्मृति के विरुद्ध सतत चलने वाली लड़ाई है। बार-बार ऐसा लगता है जैसे हमारा सामना अपने समय की सबसे प्रतिभाशाली, जागृत और ईमानदार सृजनदृष्टि से है। यह संग्रह हिंदी कविता के आत्म के विस्तार और दुर्गम रास्तों की यात्रा है। और यह भी—कि जैसे बहुत दिनों बाद आप अपने घर लौटें।—दिनेश कुमार शुक्ल
Sab Ki Aawaz Ke Parde Mein
- Author Name:
Vishnu Khare
- Book Type:

-
Description:
बीसवीं सदी की हिन्दी कविता में अपनी धुन और आत्महानि की सीमा तक जाकर, लीक छोड़ लिख पानेवाले कम थे लेकिन शायद विष्णु खरे उन्हीं में गिने जाएँ। विष्णु खरे के साथ एक बड़ी घटना यह रही कि उनकी कविता हिन्दी के विभिन्न समसामयिक सम्प्रदायों को तुष्ट नहीं कर पाई। उनके न तो गुरु-संरक्षक रहे, न मित्र-प्रोत्साहक और न भक्त-शिष्य। ऐसी लगभग सर्वसम्मत उपेक्षा के बावजूद कहीं-कहीं उनकी कविताएँ न केवल याद रखी गईं, बल्कि कभी-कभी उनकी माँग भी की जाती रही, यही कोई कम ग़नीमत नहीं है।
अपने और दूसरों के लिए और मुश्किलें पैदा करते हुए विष्णु खरे एक ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जिसमें भूले-भटके काव्यावेश आ जाता है, वरना अक्सर उसमें निम्न-मध्यवर्गीय संकेतों और ब्याजशब्दावली का बाहुल्य रहता है और कभी उनकी ज़ुबान बातचीत की तरह आमफ़हम, दफ़्तरी, अख़बारी, तत्समी या गवेषणात्मक तक हो जाती है और ख़तरनाक ढंग से कहानी, गद्य, वर्णन, ब्योरों, रपट आदि के नज़दीक पहुँचती है और यह तय करना कठिन होता है कि उस निर्विकार-सी वस्तुपरकता में तथ्याभास का व्यंग्य है, करुणा है या उन्हें कविता लिखना ही नहीं आता।
कविता के विषयों को लेकर भी उनके यहाँ एक कैलाइडोस्कोप की बहुबिम्बदर्शी विविधता है जो उनकी हर चीज़ में दिलचस्पी के दख़ल की पैदाइश है और इस ज़िद की कि सब कुछ में जो कविता है, उसका कुछ हिस्सा हासिल करना ही है। दुनिया उनके आगे बाज़ीचा-ए-इत्फ़ाल नहीं, उसमें जन्म ले चुके आदमी का कौतूहल और कशमकश है। विष्णु खरे को भी कवियों का कवि कहकर दाख़िल-दफ़्तर कर देना सुविधाजनक है लेकिन वे उन सजगों के कवि हैं जिनकी तादाद अन्दाज़ से कहीं ज़्यादा है। भारतीय आदमी और मानव के लिए उनकी प्रतिबद्धता असन्दिग्ध है लेकिन वे सारे ऐहिक और अपौरुषेय व्यापार, माया और लीला, यथार्थ और मिथक को जानने के प्रयास के प्रति भी वचनबद्ध हैं, क्योंकि हर बार उसे नई तरह से जानना चाहे बिना आदमी और अस्तित्व के पूरे बखेड़े को समझने की कोशिश अधूरी ही रहेगी। इसमें अनुभववाद या दूर की कौड़ी लाने का लाघव-प्रदर्शन नहीं है, समूचे जीवन से वाबस्तगी की बात है।
इसीलिए विष्णु खरे की कविता न तो आदमी और समाज से घबराकर ‘शुद्ध कला’, अध्यात्म या रहस्यवाद में पलायन करती है और न कायनात को मात्र भौतिक मान किसी आसान ‘वाद’ की शरण लेती है। उनके यहाँ अनुभव और कविता ‘प्योर’ तथा ‘अप्लाइड’ दोनों अर्थों में हैं क्योंकि दोनों प्रकारों का एक-दूसरे के बिना अस्तित्व और गुज़ारा सम्भव नहीं है। वे वाक़ई अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने को मनुष्य और कवि होने की सार्थकता मानते हैं। इस संग्रह की कविताओं में भी वे अपने कथ्य, भाषा तथा शैली को जोखिम-भरी चुनौतियों और परीक्षाओं के सामने ले गए हैं। वे कविता को बाँदी या देवदासी की तरह नहीं, मानव-प्रतिभा की तरह हर काम में सक्षम देखना चाहते हैं क्योंकि उनका मानना है कि ऐसी कोई स्थिति नहीं है जिसकी अपनी कोई अर्थवत्ता न हो—हर आवाज़ के पीछे जो दुनिया है, विष्णु खरे की यदि कोई महत्त्वाकांक्षा है तो उसे ही अभिव्यक्ति देने का प्रयास करने की लगती है।
Paandaan
- Author Name:
Mujtaba Khan
- Book Type:

- Description: पानदान’ — सिर्फ़ पान का सामान रखने की एक छोटी संदूक़ची नहीं, बल्कि एक ख़ानदानी विरासत है, जो पीढ़ियों से गुज़रते हुए मुमताज़ बेगम तक पहुँची है। यह अफ़साना एक औरत की उस नाज़ुक पर मज़बूत दुनिया की कहानी है, जो अपने हिस्से की इज़्ज़त, रुतबा और औलादों की परवरिश को उसी सलीके से सँभालती है, जैसे वह अपने पानदान को। मुमताज़ बेगम का जीवन उन तमाम औरतों का प्रतीक है, जो समय और हालात की मार झेलते हुए भी अपने भीतर की गरिमा और अपनापन नहीं खोतीं। मुज्तबा ख़ान ने इस दास्तान को उस दौर के पूरे सामाजिक परिवेश, उसकी भाषा और रवायतों समेत हमारे सामने ज्यों का त्यों रख दिया है। हर किरदार में मुहब्बत और इंसानियत की खुशबू है। भाषा में पुराने लखनऊ की नफ़ासत और क़िस्सागोई का ऐसा रंग है कि कहानी शुरू होते ही पाठक उस दुनिया में उतर जाता है — और आख़िरी पंक्ति तक वहीं ठहर जाना चाहता है। लेखक परिचय: मुज्तबा ख़ान प्रसिद्ध पटकथा लेखक और लोकप्रिय भाषा-शिक्षक हैं, जो अपनी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ, इंसानी रिश्तों और सांस्कृतिक विरासत को बारीकी से पिरोते हैं।
Via Nayi Sadi
- Author Name:
Shriprakash Shukla
- Book Type:

-
Description:
‘वाया नई सदी’ दस्तावेज़ है समय की असहजताओं और अस्वाभाविकताओं का जिन्हें हमने जीवन की स्वाभाविक मुद्राओं की तरह स्वीकार कर लिया है। ये कविताएँ इस स्वीकृति के विरुद्ध उठी मुट्ठियों की तरह हैं। यह समय जहाँ बोलने, चीखने और विरोध करने पर लगातार कठोर होती पाबन्दियाँ हमारी चुप्पियों पर हँसने लगी हैं, और हम प्यार को, जनतन्त्र को, मानवीयता को धीरे-धीरे छीजते देख रहे हैं, और ख़ामोश हैं।
‘हमारे समय के करुण इतिहास पर/हिंसा की तरह दर्ज अभिलाषाओं में/महामौन की तरह खड़ी है एक गाय/जो अभी-अभी खूँटे पर आई है/लहूलुहान’—‘गाय’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ भारत की नयी सदी की उस महाविडम्बना की ओर संकेत करती है जहाँ करुणा में रसे-बसे सांस्कृतिक प्रतीकों को हिंसक बिम्बों में बदलने की कोशिश बाक़ायदा सत्ता के इशारों पर हो रही है और समाज, जैसे कि उसे इसी का इंतज़ार था, इस प्रक्रिया को पूरा करने में जुटा हुआ है : ‘उनमें ग़ज़ब की सामूहिक सहमति है’, और ‘एक सीधी सरल गाय/हिंसक पशु में बदल जाती है।’
श्रीप्रकाश शुक्ल भारतीयता के इस क्षरण के प्रति अपनी असहमति, अपना प्रतिरोध दर्ज कराना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि हम बोलें, 'चुप्पी के काइएँपन से दूसरे की हत्या करने से बेहतर है/बोल-बोलकर ख़ुद के भीतर जमी काइयों का वध करना।’ वे कहते हैं कि ‘बोलता आदमी जब चुप हो जाए/तो समझिए कि इस व्यवस्था में एक तानाशाह का जन्म हो चुका है/जो हमारे मुँह से प्रवेश करता है और जीभ को चीरता हुआ/अंतड़ियों में उतर जाता है।’ इसीलिए वे एक मुखर आदमी के पक्ष में अपना बयान देते हैं, ‘मनुष्यों के मुद्दे राजनीति से बड़े होते हैं/और अर्थनीति से ज़्यादा उलझे हुए/...कि लोकतंत्र के मुद्दे भुजा से नहीं/भाषा से तय होते हैं।’
श्रीप्रकाश शुक्ल के इस नए संग्रह में कई कविताएँ ऐसी हैं जो इस विचित्र सदी को सीधे-सीधे सम्बोधित हैं और कई ऐसी जो समय के शोर में बिला रही मनुष्यता की सरस, सहज, सकारात्मक भंगिमाओं को आवाज़ देती हैं। उनके ‘नहीं होने’ को रेखांकित करती हैं ताकि हम उन्हें लौटा लाएँ। कोरोना काल के भीषण विद्रूप भी इन कविताओं में अंकित हुए हैं, और प्रकृति के साहचर्य से पल्लवित संवेदनाएँ भी। लेकिन ‘वाया’ की ओट से समय की लय को भंग करनेवाली ताक़तों को लेकर चेतावनी कहीं धूमिल नहीं पड़ती : ‘बादल होंगे लेकिन नमी नहीं होगी/...रक्षक होंगे लेकिन रक्षार्थ कुछ नहीं होगा.../और तब वे अपने वर्तमान से मुक्त होकर/एक शानदार विरासत का जश्न मनाएँगे/...मानव-मुक्त विकास का जश्न!’
Subh Ki Chay Aur Akhardboundar
- Author Name:
Sabeeha Fatma
- Book Type:

- Description: सबीहा फातमा का कविता-संग्रह 'सुबह की चाय और अखबार' न केवल अपने अनोखे और अलग तरह के विषय की वजह से अद्वितीय और पुरकशिश है बल्कि इसमें मौजूद छोटी-छोटी कविताओं की शैली और शिल्प भी लीक से हटकर है। आमतौर पर हमारी दिनचर्या का आगाज़ चाय की गर्म और मीठी चुस्कियों के साथ-साथ अखबारों में परोसी गई खबरों से होता है। पिछले लगभग एक दशक से न केवल इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया बल्कि प्रिंट मीडिया भी ऐसी खबरें परोसने लगा है जिनका हेंगओवर दिनभर रहता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरे देश में तानाशाही और अघोषित आपातकाल का वह सिलसिला चल निकला जिसने हर एक को अपनी लपेट में लिया है। इन परिस्थितियों ने जहाँ देश के अन्य संवेदनशील लोगों को प्रभावित किया है वहीं बुद्धिजीवी सीधे तौर पर इसके शिकार हुए। सबीहा के कवि-मन को इन जटिल, भयावह और मार्मिक परिस्थितियों और इनसे संबंधित खबरों ने कचोटा है। यह संग्रह उसी दर्द और टीस की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। उन्होंने न केवल प्रशासन पर सवाल उठाए बल्कि धार्मिक कट्टरवाद को भी कठघरे में खड़ा किया है। इस संग्रह की पहली कविता 'पेशावर' में उन्होंने अपने आपको इस्लाम का मुहाफ़िज़ कहने वालों पर तंज़ कसा है। सबीहा की कविताएँ जहाँ कविताई से भरपूर हैं वहीं अपनी प्रौढ़ता का परिचय भी देती हैं। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि उन्होंने कविताओं में आम लोगों की संवेदनाओं को पिरोने का हुनर बखूबी बरता है। उनकी कविताएँ हमारे समकाल को आइना दिखाने का जोख़िम भरा काम करती हैं। —निदा नवाज़
Close To My Heart
- Author Name:
Sushma Malhotra
- Book Type:

- Description: The book Close to my Heart is an odyssey of my life with love for nature, time spent with my family, personal relations, pains of waiting, separating, and joys of meeting. Most of the poems are vivid imagery, deeply passionate and come straight from the core of my heart. A reader can connect to any poem and experience the same feelings during their lifetime. The mood in the Close to my Heart reflects a variety of experiences of contentment, regret, delight, loneliness, separation and ecstasy in personal, professional, and emotional life. I did not follow any traditional regular poetic scheme; however the flow of the verse sounds rhythmic. Some poems are short and some are long, yet remain focused on a particular theme and topic. Usually it’s the rejection, abandonment and the solitude that turns you to Almighty. Nowhere it is mentioned in the book; however a reader can perceive my trust and subservience to the Omnipotent. Occasionally it takes many pages to express one’s thoughts but anthology Close to my Heart is a squeezed collection of my poems with myriad thoughts and scores of experiences. Any critique or analyst can spend years paraphrasing those thoughts into writing. For a reader’s convenience, anthology is divided into very succinct six sections: Realization, Nature, Prayers, Connection, Charismatic Kullu, and Close to my Heart.
Amaltas
- Author Name:
Bipin Kumar Sharma
- Book Type:

- Description: Hindi poems by Bipin Kumar Sharma
Pul Kabhi Kahali Nahi Milte
- Author Name:
Sudhanshu Upadhyaya
- Book Type:

- Description: सुधांशु उपाध्याय की ये कविताएँ भविष्य को जिस रूप में वर्तमानित करती हैं, उससे वर्तमान और भविष्य और व्यतीत का चेहरा त्रिशिरा की तरह दिखाई पड़ने लगता है। वैसे तो कविता अपने समय की संवेदन शून्यता को पहचानने और उसे पूरने का काम करती ही है, बल्कि ऐसा करके ही वे कविताएँ बनती हैं। सुधांशु की इन कविताओं में यह तत्त्व जिस मुहावरे में व्यक्त हुआ है, उसे भाषा की सहज लाक्षणिकता कहा जा सकता है। सुधांशु की विशेषता यह है कि वे ‘घटना’ को काव्य वस्तु में बदलते समय उसकी वास्तविकता का निषेध नहीं करते हैं, बल्कि उसके ‘देश’ को कभी-कभी काल के आयाम से मुक्त कर देते हैं। फलत: मनुष्य की पीड़ा, बेचैनी, खीज, कुढ़न आदि चिन्तनशीलता से भावित होकर ही कविता का रूप ग्रहण करती है। यह संकलन इसका प्रमाण है। गीतों की प्रमुख विशेषता मुहावरों का निर्माण और विकास है। इस संकलन में कवि ने नए मुहावरों को अन्वेषित किया है। मुहावरों का प्रयोग कविता नहीं बनाता, बल्कि मुहावरों का विकास कविता बनाता है। सामान्य शब्द जब अपना कोशीय अर्थ छोड़कर, ‘संकेत बन जाते हैं तो गीत की निर्वचन क्षमता ग्रहीता प्रति ग्रहीता बदलती रहती है। इस संग्रह की कविताओं को काव्य-रूढ़ियों से मुक्त होकर इस अर्थ में पढ़ा जाना चाहिए। ‘वाह’ और ‘आह’ के तत्त्वों से रहित होने के कारण इन कविताओं का महत्त्व बढ़ जाता है। लगभग सभी गीतों में मनुष्य के प्रति गहरी संसक्ति है और इसीलिए मार्मिक चिन्ता भी। सुधांशु अपने पहले संग्रह से ही निरर्थक शब्दों के प्रयोग-प्रवाह से बचते रहे हैं। इस संग्रह में अब वह कवि की आदत हो गया है। इसलिए मैं मानता हूँ कि उनकी कविताओं में ‘उक्तिवैचित्र्य या अनूठापन’ के बजाय बिम्बविधान की क्षमता है। इस अर्थ में वे क़तार से कुछ भिन्न हैं और इसे उनके इस संग्रह से भली-भाँति समझा जा सकता है। —सत्यप्रकाश मिश्र
Mall mein Kabutar
- Author Name:
Dr. Vinay Kumar
- Book Type:

- Description: poetry
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book