Pratinidhi Kavitayen : Amrita Pritam
Author:
Amrita PreetamPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
पंजाबी की शीर्षस्थ रचनाकार अमृता प्रीतम की कविताओं ने न केवल हिन्दी, बल्कि अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं के पाठकों के बीच पर्याप्त लोकप्रियता अर्जित की है। उनकी कविताओं में जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को जितनी आत्मीयता और लगाव के साथ ग्रहण किया गया है, वह निश्चय ही उनके रचनाकार की महती उपलब्धि है। समुद्र के समान हिलोरें खाती विराट जिजीविषा ने अमृता प्रीतम की कविताओं को गहरे लौकिक सन्दर्भ प्रदान किए हैं, रंग-बिरंगी प्रकृति और मानवीय भावनाओं के रागात्मक टकराव से उद् भुत उनकी कल्पनाशक्ति ने रचनात्मकता की नई ऊँचाइयाँ हासिल की हैं। स्मृतियों के नीले आकाश में घुमड़ते बादलों-सी इन कविताओं में नारी की मुक्ति-आकांक्षा और उसके संघर्ष की बड़ी मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। अमृता प्रीतम की प्रतिनिधि कविताओं का यह संग्रह पंजाबी और हिन्दी कविता के बीच रचनात्मक संवाद का जीवन्त वाहक सिद्ध होगा।
ISBN: 9788126700462
Pages: 135
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘उजली हँसी के छोर पर’ (1960) और ‘अगली शताब्दी के बारे में’ (1981) संग्रहों के बाद परमानंद श्रीवास्तव की कविताओं का तीसरा संग्रह ‘चौथा शब्द’ एक दशक से कुछ अधिक के अन्तराल पर प्रकाशित हो रहा है। कविता के इतिहास में यह बीता हुआ दशक कविता के लिए ही कठिन समय बनकर उपस्थित नहीं हुआ, शब्द या अभिव्यक्ति के सभी रूपों और माध्यमों के लिए और सबसे अधिक मानवीय अस्तित्व के लिए, मनुष्य द्वारा अर्जित समस्त मूल्य सम्पदा के लिए चुनौती बनकर उपस्थित हुआ। यह दौर बीता नहीं है बल्कि आज और अधिक भयावह प्रश्नों और शंकाओं से घिरा है। परमानंद श्रीवास्तव ने कविता के बाहर भी शब्द के पक्ष में, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में, मानवीय मूल्यों के पक्ष में लगातार संघर्ष किया है और कविता के भीतर भी धीमी शान्त ऐन्द्रिकता, राग संवेदना और जीवन के प्रति सहज आसक्ति मात्र से सन्तुष्ट न होकर ऐसा उत्तेजक नाटकीय
शिल्प विकसित किया है जो कविता के पाठकों के रूप में अपने समाज के प्रति सीधा सम्बोधन है।
परमानंद श्रीवास्तव के इस संग्रह में ‘इन दिनों’, ‘साध्वियों’, ‘बटोर’ जैसी कविताएँ अपने कठिनतम समय के मुख्य संकट को न किसी शब्द-छल से छिपाती हैं, न ख़तरनाक ताक़तों को सीधे लक्ष्य करने से बचती हैं। इसके बाद भी परमानंद श्रीवास्तव कविता के अपने विन्यास या रूप-तंत्र के प्रति कितने सजग हैं, इसका अनुमान सहज ही किया जा सकता है। ‘चौथा शब्द’ में उनका अनुभव-संसार अधिक विस्तृत है और स्थितियों, चरित्रों तथा समय की त्रासदियों को देखने-समझने की दृष्टि भी अधिक विकसित और सचेत है। ‘वह अघाया हुआ आदमी‘, ‘फ़ुर्सत में’, ‘अपरिचित', ‘सहपाठी मिले एक दिन’ जैसी कविताएँ एक तरह के कथातन्तु का आश्रय लेती हैं जबकि ‘स्त्री सुबोधनी’ जैसी कविता मानवीय अनुभव और भाषा के स्रोतों तक जाने के लिए एक विलक्षण लोकरंग प्राप्त करती है। स्त्री की यातना के अनुभव प्रत्यक्ष कई कविताओं मे दर्ज हैं। यह कविता भी उसी अनुभव को अतीत की यातनापूर्ण यादों में जोड़कर देखने की सार्थक कोशिश है। परिप्रेक्ष्य-सम्पन्न कविताओं के लिए यह संग्रह ज़रूर ही पाठकों के बीच देर तक चर्चा में रहेगा और शायद आनेवाली कविता का संकेत भी देगा।
Roshani Ke Raste Per
- Author Name:
Anita Verma
- Book Type:

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Description:
अपने पहले संग्रह ‘एक जन्म में सब’ के प्रकाशन के साथ अनीता वर्मा ने एक ऐसे कवि के रूप में पहचान बनायी जिनके पास एक विरल संवेदना है, अपने आंतरिक संसार के स्पंदनों को सही शब्दों और सार्थक बिंबों में रूपांतरित कर पाने की क्षमता है और एक सघन सुंदर विन्यास है। वह एक अद्वितीय संग्रह है जिसे संवेदनशील पाठकों ने एक सुखद आश्चर्य के साथ देखा और समझा। अनीता वर्मा का दूसरा संग्रह ‘रोशनी के रास्ते पर’ उस गतिशीतला और ऊर्जा को रेखांकित करता है जो एक रचनात्मक जीवन की यात्रा से अपने आप जुड़ी होती हैं। लेकिन इस संग्रह की कविताएं इससे भी अधिक कुछ संकेत करती हैं और कवि के रचनात्मक अंतर्संघर्ष के साथ-साथ उनकी कविताओं के कथ्य और शिल्प में आये बदलावों को बतलाती हैं। यहां बिंबों से वृत्तांत की ओर, स्मृति से स्वप्न की ओर, अंतरंग से बहिरंग की ओर और अनुभूति से अनुभव की ओर जाने और कभी-कभी एक-दूसरे में आवाजाही करने की एक अनोखी यात्रा दर्ज हुई है: ‘अच्छा हुआ कि हृदय बच गया/और शब्दों को चलने के लिए पैर मिल गये।’
अनीता वर्मा की ज़्यादातर कविताओं में दिखने वाली आत्मिकता, रहस्यमयता, शमशेर बहादुर सिंह जैसी शुद्धता और गहरे आशावाद की ओर कई पाठकों-आलोचकों का ध्यान गया है। इन विशेषताओं का जन्म कवि के भीतर संवेदना की गहराइयों और ऊंचाइयों से ही हुआ है और वे इस संग्रह की कविताओं में भी पूरे घनत्व के साथ उपस्थित हैं। अंतर यह है कि अनीता अब इस संवेदना के माध्यम से बाहर के संसार को भी व्यक्त कर रही हैं जिसका प्रमाण ‘बूढ़ानाथ की औरतें’, ‘अपने घर’, ‘भय’, ‘सभागार में’, ‘मां का हाथ’, ‘अनिंदो दा के साथ’, ‘मंच पर’ जैसी विलक्षण रचनाओं में मिलता है। अनीता वर्मा की काव्य संवेदना में निराशा और विकलता के बीच उम्मीद के आत्मिक बिंदु हमेशा चमकते दिखते हैं और पाठक की संवेदना को भी प्रकाशित करते रहते हैं। ऐसे कवि की सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि भी बहुत मानवीय और प्रतिबद्ध होगी जिनकी अभिव्यक्ति ‘महज़ नाम नहीं’, ‘झारखंड’, ‘रोशनी’ जैसी रचनाओं में हुई है। एक कविता की पंक्तियां कहती हैं: ‘मुझे अचानक दिखाई दिये कहीं खिले हुए कुछ फूल/और तभी कोई लालटेन का शीशा साफ़ कर/उसे जला कर रख गया था।’ हमारे समय में जमा हो रहे कई तरह के अंधकारों के बीच ये पंक्तियां इन कविताओं के स्वभाव को भी बतलाती हैं।
Hindostan Hamara : Vols. 1-2
- Author Name:
Jaan Nisar Akhtar
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Description:
सुविख्यात शायर जाँ निसार अख़्तर द्वारा दो खंडों में सम्पादित पुस्तक ‘हिन्दोस्ताँ हमारा’ में उर्दू कविता का वह रूप सामने आया है जिसकी ओर इसके पहले लोगों का ध्यान कम ही गया था। प्रायः ऐसा माना जाता है कि उर्दू की शायरी व्यक्ति के प्रेम, करुणा और संघर्ष तक ही सीमित है और समय, समाज, राष्ट्र, प्रकृति तथा इतिहास से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। परन्तु यह पूरी तरह एक भ्रान्त धारणा है, इसकी पुष्टि इस पुस्तक के दोनों खंडों में संकलित सैकड़ों कविताओं से होती है। इनमें देश-प्रेम के साथ-साथ भारत की प्रकृति, परम्परा और इतिहास को उजागर करनेवाली कविताएँ भी हैं। हिमालय, गंगा, यमुना, संगम आदि पर कोई दर्जन भर कविताएँ हैं, तो राजहंस, चरवाहे की बंसी और धान के खेत भी अछूत नहीं हैं। होली और वसंतोत्सव जैसे त्योहारों पर भी उर्दू शायरों ने बड़ी संख्या में कविताएँ लिखी हैं। इनमें ‘मीर’ और ‘नज़ीर’ की रचनाएँ तो काफ़ी लोकप्रिय रही हैं।
ताजमहल ही नहीं अजंता, एलोरा और नालन्दा के खँडहर पर भी शायरों की नज़र है। देश के विभिन्न शहरों और आज़ादी के रहनुमाओं के साथ-साथ राम, कृष्ण, शिव जैसे देवताओं पर भी कविताएँ लिखी गई हैं। साथ ही ‘कुमार सम्भव’, ‘अभिज्ञान शाकुन्तल’, ‘मेघदूत’ जैसे महान संस्कृत काव्यों का अनुवाद भी उर्दू में हुआ है जिसकी झलक इस संकलन में मिलती है।
कुल मिलाकर उर्दू कविता का यह एक ऐसा चेहरा है जो इस संकलन के पहले तक लगभग छुपा हुआ था। भारत की सामासिक संस्कृति में उर्दू कविता के योगदान को रेखांकित करनेवाले इस संकलन का ऐतिहासिक महत्त्व है। पहली बार 1965 में इसका प्रकाशन हुआ था। उर्दू कविता की दूसरी परम्परा, जो वास्तव में मुख्य परम्परा है, को रेखांकित करनेवाला यह संकलन पिछले कई वर्षों से अनुपलब्ध रहा है। अब राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा इसे नई साज-सज्जा के साथ अविकल रूप में प्रकाशित किया जा रहा है।
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