Pratinidhi Kavitayein : Ravindra Bharati
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Ravindra Bharti, Jyotish JoshiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
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रवीन्द्र भारती की कविताएँ साधारण लोगों और चीज़ों की साधारणता को इस तरह आलोकित करती हैं कि वे उत्सवधर्मी और बड़बोली असाधारणताओं के सम्मुख न सिर्फ़ उनका विकल्प बल्कि उनसे ज़्यादा गरिमापूर्ण और अर्थवान लगने लगती हैं। बहुत नज़दीक और बहुत जाने-पहचाने हमारे संसार में ही उनकी कविता ऐसे बिन्दुओं को चिह्नित करती चलती है जहाँ हम एक मनुष्य के रूप में सहजभाव से रह सकते हैं। सरल और आमफ़हम शब्दावली में अनुभूति के सघन क्षणों को कविता में ले आना रवीन्द्र भारती की विशेषता है, जिसे अपने देशज बोध के साथ वे एक अविस्मरणीय दृश्य के रूप में पाठक के सामने कर देते हैं। आज के काव्य-जगत में उनकी कविताओं को पढ़ना कविता की एक अत्यन्त प्राकृतिक भूमि से साक्षात्कार करना है, वह भूमि जहाँ कुछ भी ऐसा नहीं जो कविता न हो सके।
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रवीन्द्र भारती की कविताएँ साधारण लोगों और चीज़ों की साधारणता को इस तरह आलोकित करती हैं कि वे उत्सवधर्मी और बड़बोली असाधारणताओं के सम्मुख न सिर्फ़ उनका विकल्प बल्कि उनसे ज़्यादा गरिमापूर्ण और अर्थवान लगने लगती हैं। बहुत नज़दीक और बहुत जाने-पहचाने हमारे संसार में ही उनकी कविता ऐसे बिन्दुओं को चिह्नित करती चलती है जहाँ हम एक मनुष्य के रूप में सहजभाव से रह सकते हैं। सरल और आमफ़हम शब्दावली में अनुभूति के सघन क्षणों को कविता में ले आना रवीन्द्र भारती की विशेषता है, जिसे अपने देशज बोध के साथ वे एक अविस्मरणीय दृश्य के रूप में पाठक के सामने कर देते हैं। आज के काव्य-जगत में उनकी कविताओं को पढ़ना कविता की एक अत्यन्त प्राकृतिक भूमि से साक्षात्कार करना है, वह भूमि जहाँ कुछ भी ऐसा नहीं जो कविता न हो सके।
Book Details
-
ISBN9789360867980
-
Pages152
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Kajal Lagana Bhoolna
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Vyomesh Shukla
- Book Type:

- Description:
यह एक गद्य कविता है पर इसमें सघन बिम्ब, शब्दों से खिलवाड़, कई अविवक्षित अर्थों के संकेत, अप्रत्याशित मोड़ आदि सब हैं जो गद्य के नहीं, कविता के गुण होते हैं। कविता का शीर्षक जो संकेत देता है, उन्हें कविता की काया में ऐन्द्रिय रूप से चरितार्थ होते महसूस किया जा सकता है। जिस ‘जगह’ से कविता शुरू होती है, कविता के अन्त तक आते-आते उसकी सच्चाई, आशय और परिणतियाँ अप्रत्याशित रूप से बहुल-उत्कट और अर्थगर्भी हो जाती हैं। साधारण जीवन की छवियाँ—जगह, चकवड़ के पौधे, जानवर, गर्मियों की शाम, बँधी पर सौ साँप, डंडे, प्यास, हिजड़े दोस्त—कविता का शिल्प रूपायित कर इस आत्मीय सच्चाई कि ‘जगह के बाहर मुलाक़ातें नहीं हो सकतीं’ और इस दार्शनिक सत्य तक पहुँचाती हैं कि जगह के बाहर ‘न दोस्त होते हैं, न लोग होते हैं, न होना होता है, न न होना होता है’। एक युवा कवि द्वारा एक अपेक्षाकृत अस्पष्ट विषय को इस कौशल और संयम से बरतना विरल है। —अशोक वाजपेयी
Via Nayi Sadi
- Author Name:
Shriprakash Shukla
- Book Type:

- Description:
‘वाया नई सदी’ दस्तावेज़ है समय की असहजताओं और अस्वाभाविकताओं का जिन्हें हमने जीवन की स्वाभाविक मुद्राओं की तरह स्वीकार कर लिया है। ये कविताएँ इस स्वीकृति के विरुद्ध उठी मुट्ठियों की तरह हैं। यह समय जहाँ बोलने, चीखने और विरोध करने पर लगातार कठोर होती पाबन्दियाँ हमारी चुप्पियों पर हँसने लगी हैं, और हम प्यार को, जनतन्त्र को, मानवीयता को धीरे-धीरे छीजते देख रहे हैं, और ख़ामोश हैं। ‘हमारे समय के करुण इतिहास पर/हिंसा की तरह दर्ज अभिलाषाओं में/महामौन की तरह खड़ी है एक गाय/जो अभी-अभी खूँटे पर आई है/लहूलुहान’—‘गाय’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ भारत की नयी सदी की उस महाविडम्बना की ओर संकेत करती है जहाँ करुणा में रसे-बसे सांस्कृतिक प्रतीकों को हिंसक बिम्बों में बदलने की कोशिश बाक़ायदा सत्ता के इशारों पर हो रही है और समाज, जैसे कि उसे इसी का इंतज़ार था, इस प्रक्रिया को पूरा करने में जुटा हुआ है : ‘उनमें ग़ज़ब की सामूहिक सहमति है’, और ‘एक सीधी सरल गाय/हिंसक पशु में बदल जाती है।’ श्रीप्रकाश शुक्ल भारतीयता के इस क्षरण के प्रति अपनी असहमति, अपना प्रतिरोध दर्ज कराना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि हम बोलें, 'चुप्पी के काइएँपन से दूसरे की हत्या करने से बेहतर है/बोल-बोलकर ख़ुद के भीतर जमी काइयों का वध करना।’ वे कहते हैं कि ‘बोलता आदमी जब चुप हो जाए/तो समझिए कि इस व्यवस्था में एक तानाशाह का जन्म हो चुका है/जो हमारे मुँह से प्रवेश करता है और जीभ को चीरता हुआ/अंतड़ियों में उतर जाता है।’ इसीलिए वे एक मुखर आदमी के पक्ष में अपना बयान देते हैं, ‘मनुष्यों के मुद्दे राजनीति से बड़े होते हैं/और अर्थनीति से ज़्यादा उलझे हुए/...कि लोकतंत्र के मुद्दे भुजा से नहीं/भाषा से तय होते हैं।’ श्रीप्रकाश शुक्ल के इस नए संग्रह में कई कविताएँ ऐसी हैं जो इस विचित्र सदी को सीधे-सीधे सम्बोधित हैं और कई ऐसी जो समय के शोर में बिला रही मनुष्यता की सरस, सहज, सकारात्मक भंगिमाओं को आवाज़ देती हैं। उनके ‘नहीं होने’ को रेखांकित करती हैं ताकि हम उन्हें लौटा लाएँ। कोरोना काल के भीषण विद्रूप भी इन कविताओं में अंकित हुए हैं, और प्रकृति के साहचर्य से पल्लवित संवेदनाएँ भी। लेकिन ‘वाया’ की ओट से समय की लय को भंग करनेवाली ताक़तों को लेकर चेतावनी कहीं धूमिल नहीं पड़ती : ‘बादल होंगे लेकिन नमी नहीं होगी/...रक्षक होंगे लेकिन रक्षार्थ कुछ नहीं होगा.../और तब वे अपने वर्तमान से मुक्त होकर/एक शानदार विरासत का जश्न मनाएँगे/...मानव-मुक्त विकास का जश्न!’
Pedon Ki Amma
- Author Name:
Prabhat +1
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साँझ घिरे जब नींद की झपकी पेड़ों को आने लगती चुप चुप सी पेड़ों की अम्मा मन में पछताने लगती फैल-फूट कर जगह घेर कर सोते परबत बड़े बड़े मेरे दिल के टुकड़े कैसे सो पायेंगे खड़े खड़े
Keral Ke Kele
- Author Name:
Prayag Shukla +1
- Book Type:

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प्रयाग शुक्ल की मज़ेदार कविताओं की किताब जिसे आप और आपका बच्चा स्कूल बस का इंतज़ार करते समय या घर पर स्कूल के लिए तैयार होते समय गा सकते हैं। उनकी शब्दावली बनाने का एक मज़ेदार तरीका। देबब्रत घोष के रंगीन चित्र उनकी हास्य की भावना से समृद्ध हैं, जिसका आप और आपका बच्चा आनंद लेंगे। Age group 6-8 years
Rahim Rachnawali
- Author Name:
Satyaprakash Mishra
- Book Type:

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डॉ. सत्यप्रकाश मिश्र द्वारा सम्पादित इस रचनावली में रहीम के नाम से प्रचलित सभी रचनाओं का समावेश किया गया है। पाठ को प्रामाणिक बनाने के प्रयत्न के साथ ही साथ सम्पादक ने अपनी विस्तृत भूमिका में रहीम के विषय में प्रामाणिक सामग्री दी है। रहीम की भूमिका को निर्धारित करते हुए पुस्तक में रहीम द्वारा प्रयुक्त नई शैलियाँ और काव्य प्रयोगों को रेखांकित करके सम्पादक ने उस युग के काव्य मिज़ाज को समझाने का महत्त्वपूर्ण प्रयत्न किया है। रहीम के स्वनिर्मित स्वाभिमानी व्यक्तित्व और उनकी त्रासदी को समझे बग़ैर उनकी कविताओं को समझना कठिन है—यह इस ग्रन्थ को पढ़ने से और अधिक उजागर होगा। इस संग्रह की भूमिका और मूल पाठ से रहीम के साथ ही साथ मध्ययुगीन काव्य की मानसिक बुनावट और काव्य सन्दर्भ को समझने में मदद मिलेगी—यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है।
Main Jab Tak Aayi Bahar
- Author Name:
Gagan Gill
- Book Type:

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‘मैं क्यों कहूँगी तुम से/अब और नहीं/सहा जाता/मेरे ईश्वर’—गगन गिल की ये काव्य-पंक्तियाँ किसी निजी पीड़ा की ही अभिव्यक्ति हैं या हमारे समय के दर्द का अहसास भी? और जब यह पीड़ा अपने पाठक को संवेदित करने लगती है तो क्या वह अभिव्यक्ति प्रकारान्तर से प्रतिरोध की ऐसी कविता नहीं हो जाती, जिसमें ‘दर्दे-तनहा’ और ‘ग़मे-ज़माना’ का कथित भेद मिटकर ‘दर्दे-इनसान’ हो जाता है? कविता इसी तरह इतिहास अर्थात समय का काव्यान्तरण सम्भव करने की ओर उन्मुख होती है।
गगन गिल की इन आत्मपरक-सी लगती कविताओं के वैशिष्ट्य को पहचानने के लिए मुक्तिबोध के इस कथन का स्मरण करना उपयोगी हो सकता है कि कविता के सन्दर्भ ‘काव्य में व्यक्त भाव या भावना के भीतर से भी दीपित और ज्योतित’ होते हैं, उनका स्थूल संकेत या भाव-प्रसंगों अथवा वस्तु-तथ्यों का विवरण आवश्यक नहीं है। इन कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है—बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह।
यह भी कह सकते हैं कि ये कविताएँ प्रार्थना के नये-से शिल्प में प्रतिरोध की कविताएँ हैं—प्रतिरोध उस हर सत्ता-रूप के सम्मुख जो मानवत्व मात्र पर, स्त्रीत्व पर भी, आघात करता है। इन आघातों का दर्द अपने एकान्त में सहने पर ही कवि-मन पहचान पाता है कि ‘मैं जब तक आयी बाहर एकान्त से अपने/बदल चुका था मर्म भाषा का’। ये कविताएँ काव्य-भाषा को उसकी मार्मिकता लौटाने की कोशिश कही जा सकती हैं।
—नन्दकिशोर आचार्य
Kavya Chayanika
- Author Name:
Pramod Kovaprath
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बिगड़ते पर्यावरण की समस्या आज मनुष्य के लिए भूख के बाद दूसरी सबसे बड़ी समस्या है। भूख जिस तरह एक देह के अस्तित्व के लिए आसन्न ख़तरा होती है, उसी तरह पर्यावरण-विनाश सृष्टि के अस्तित्व के लिए होता है। एक-एक व्यक्ति के रूप में जी रहे हम लोगों की आँखों से वह ख़तरा भले ही इतने स्पष्ट और ठोस रूप में न दिखाई देता हो, और भले ही हम बीच-बीच में प्रकृति द्वारा दी जानेवाली चेतावनियों को नज़रअन्दाज़ करने की ढीठता भी जुटा लेते हों, लेकिन जल, ज़मीन, हवा और हरियाली का सतत क्षरित होता जीवन उन निगाहों से अनचीन्हा नहीं रह जाता जो प्रस्तुत उल्लास की झीनी चदरिया के पार दूर क्षितिज के धुँधलके में लिखी जा रही नाश-विनाश की पटकथाओं की पंक्तियाँ पढ़ लेती हैं, यानी कवियों और रचनाशील हृदयों की निगाहें। यह पुस्तक प्रकृति और कवि के इसी अपने, और समाज की रिश्तेदारियों के धोखादेह प्रपंच से परे, उनके निहायत पवित्र और निजी रिश्ते का दस्तावेज़ है। पाठकगण इस किताब को सरकारों और संस्थाओं के रस्मी पर्यावरण-प्रेम और शुष्क रुदन के काव्यानुवाद के रूप में न लें। यह समष्टि-मन के रचनाकुल और ईमानदार स्नायुओं की पीड़ाजनित प्रतिक्रियाओं का संकलन है जिसमें हिन्दी के नए-पुराने, वरिष्ठ, श्रेष्ठ और सजग रचनाकारों ने प्रकृति के साथ अपनी सम्बन्ध-यात्रा के सबसे चिन्तित क्षणों को वाणी दी है। संग्रह में एक सौ एक समकालीन कविताएँ और पैंतालीस कवि शामिल हैं। कौन छोटा है, कौन बड़ा है, यह सवाल अप्रासंगिक है। क्योंकि कविता का विषय महत्त्वपूर्ण है, समस्याओं की भयंकरता प्रासंगिक है। एक ही त्रासदपूर्ण मुद्दा सबके लिए महत्त्वपूर्ण है। सब में आशंकाएँ हैं तो साथ ही आशाएँ भी हैं। प्रकृति की आसन्न मृत्यु पर चीख़ने के बजाय प्रतिरोध खड़ा करना ये रचनाकार अपना दायित्व समझते हैं।
Naye Yug Mein Shatru
- Author Name:
Mangalesh Dabral +1
- Book Type:

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एक बेगाने और असन्तुलित दौर में मंगलेश डबराल अपनी नई कविताओं के साथ प्रस्तुत हैं—अपने शत्रु को साथ लिए। बारह साल के अन्तराल से आए इस संग्रह का शीर्षक चार ही लफ़्ज़ों में सब कुछ बता देता है : उनकी कला-दृष्टि, उनका राजनीतिक पता-ठिकाना, उनके अन्तःकरण का आयतन।
यह इस समय हिन्दी की सर्वाधिक समकालीन और विश्वसनीय कविता है। भारतीय समाज में पिछले दो-ढाई दशक के फासिस्ट उभार, साम्प्रदायिक राजनीति और पूँजी के नृशंस आक्रमण से जर्जर हो चुके लोकतंत्र के अहवाल यहाँ मौजूद हैं और इसके बरक्स एक सौन्दर्य-चेतस कलाकार की उधेड़बुन का पारदर्शी आकलन भी। ये इक्कीसवीं सदी से आँख मिलाती हुई वे कविताएँ हैं जिन्होंने बीसवीं सदी को देखा है। ये नए में मुखरित नए को भी परखती हैं और उसमें बदस्तूर जारी पुरातन को भी जानती हैं। हिन्दी कविता में वर्तमान सदी की शुरुआत ही ‘गुजरात के मृतक का बयान’ से होती है।
ऊपर से शान्त, संयमित और कोमल दिखनेवाली, लगभग आधी सदी से पकती हुई मंगलेश की कविता हमेशा सख्तजान रही है—किसी भी चीज़ के लिए तैयार। इतिहास ने जो ज़ख़्म दिए हैं उन्हें दर्ज करने, मानवीय यातना को सोखने और प्रतिरोध में ही उम्मीद का कारनामा लिखने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध। यह हाहाकार की ज़बान में नहीं लिखी गई है; वाष्पिभूत और जल्दी ही बदरंग हो जानेवाली भावुकता से बचती है। इसकी मार्मिकता स्फटिक जैसी कठोरता लिए हुए है। इस मामले में मंगलेश ‘क्लासिसिस्ट’ मिज़ाज के कवि हैं—सबसे ज़्यादा तैयार, मँजी हुई और तहदार ज़बान लिखनेवाले।
मंगलेश असाधारण सन्तुलन के कवि हैं—उनकी कविता ने न यथार्थ-बोध को खोया है, न अपने निजी संगीत को। वे अपने समय में कविता की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारियों को अच्छे से सँभाले हुए हैं और इस कार्यभार से दबे नहीं हैं। मंगलेश के लहज़े की नर्म-रवी और आहिस्तगी शुरू से उनके अकीदे की पुख़्तगी और आत्मविश्वास की निशानी रही है। हमेशा की तरह जानी-पहचानी मंगलेशियत इसमें नुमायाँ है।
और इससे ज़्यादा आश्वस्ति क्या हो सकती है कि इन कविताओं में वह साजे-हस्ती बे-सदा नहीं हुआ है जो ‘पहाड़ पर लालटेन’ से लेकर उनके पिछले संग्रह ‘आवाज़ भी एक जगह है’ में सुनाई देता रहा था। ‘नए युग में शत्रु’ में उसकी सदा पूरी आबो-ताब से मौजूद है।
—असद ज़ैदी।
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