Himalaya Ke Anchal Mein Prakriti Ka Sparsh
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पुस्तक के हर प्रसंग में एक अप्रत्यक्ष और अदृश्य शाश्वत शक्ति परिलक्षित होती है। यह पुस्तक एक उन्नत साधक से लेकर आध्यात्मिक पथ के प्रथम जिज्ञासुओं के लिए रोमांचक मार्गदर्शिका है। हिमालयवासी दिव्य संतों के रहस्यों से परिचय कराती आत्मकथा, जिसमें पुनर्जन्म, साधना, आध्यात्मिक उन्नयन आदि की अनसुनी घटनाएँ पाठकों को अचंभित कर देंगी। मैं तुम्हारे परिवार में लौट रहा हूँ। हमने पिछले जन्म में भी साथ गाया है। जैसे वाक्य इस पुस्तक में दृष्टिगोचर होते हैं। यह पुस्तक शरीर से निकलकर सूक्ष्म यात्रा कर पिछले जन्म के संबंधियों को सँभालने जैसे रहस्योद्घाटनों से भरी विस्मयकारी कृति है, जिसको आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे। इसमें आपको भौतिकवादी पश्चिम जगत् में प्रेम से ओत-प्रोत लोक-कल्याणार्थ हिमालयवासी भारतीय संतों की गौरवशाली करुणा गाथा का विस्तृत विवरण मिलेगा। साथ ही यह आपको सत्य और धर्म पर आधारित दुःख, पीड़ा और मृत्यु से निवृत्ति दिलाती दिव्य उद्देश्य से भरपूर ईश्वर के चिरसेवकों के चमत्कारों का परिचय भी देगी। अवतारों और अलौकिक महापुरुषों की क्रीड़ाभूमि भारत की अक्षुण्ण संत परंपरा की अत्यंत रोमहर्षक नवीनतम गाथा। कवि ने प्रकृति की तुलना माँ से की है और यह प्रतिपादित किया है ................. भारतीय मनीषा अनादि काल से ही प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जिज्ञासु एवं आस्थावान रही है। सर्वप्रथम ‘अथर्ववेद’ में ही ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथ्वियाः’ कहकर धरती की वंदना की गई है। साथ ही, आकाश को पिता की संज्ञा दी गई है। हमने पर्वत, नदी, वृक्ष-वनस्पतियों में भी देवी-देवता की संकल्पना की है। इस तरह हमारे आदि पूर्वज समूची प्रकृति में ही देवत्व का संधान करते थे। वैदिक साहित्य में प्रकृति की सारी शक्तियों को एक सुनिश्चित विधान में दिखलाया गया है। उसमें नियमन है। उसके विराट् एवं प्रशस्त रूप में चराचर जगत् तथा गोचर और अगोचर ब्रह्मांड के समस्त उपादान समाहित हैं। इस नियमन को वैदिक भाषा में ऋत कहा गया है। ऋत नियमों से बड़ा कोई नहीं है। अग्नि प्रकृति की विराट् शक्ति हैं। वे भी एतस्य क्षत्ता हैं। नदियाँ भी ऋतावरी हैं और नियमानुसार चलती हैं। भूमंडलीय ताप भी नियमबद्ध और संतुलित है। हमारे ऋषियों का यह मानना है कि जब प्रकृति की सारी शक्तियाँ नियमबद्ध हैं तो मनुष्य का आचरण भी नियमबद्ध होना चाहिए। यही कारण है कि हमारे कवियों और साहित्यकारों ने सदैव प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति अपनी संलग्नता का परिचय दिया है। भारतीय विश्वदृष्टि प्रकृति और मनुष्य में, व्यष्टि-समष्टि में भेद नहीं करती है। हम मानते हैं कि बाहर जो सूर्य का प्रकाश है, वही भीतर ज्ञान का प्रकाश है। बाहर जो अंधकार है, वही भीतरी भय है। इसी तरह तृण और वीरुध में जो ऊपर उठने और लहलहाने की प्रक्रिया है, वह हमारी आंतरिक उमंग है। हमने मनुष्य-देवता, प्रकृति-पुरुष में स्वामी के बजाय सहकार भाव देखा है। इसलिए वे परस्पर एक-दूसरे को प्रेरित-प्रकाशित और संपन्न करते हैं। फलतः वे युग्म परस्पर अपेक्षी हो जाते हैं। उनकी सहकारिता, सहस्थिति और अंतरावलंबन सामूहिक उत्थान में सुपरिणत हो जाते हैं। अतः पारस्परिक सामंजस्य और सहयोगपूर्ण अस्तित्व के द्वारा परम सामंजस्य तथा पूर्णता तक पहुँचना ही भारतीय चिंता-धारा का केंद्रीय वैशिष्ट्य है।
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पुस्तक के हर प्रसंग में एक अप्रत्यक्ष और अदृश्य शाश्वत शक्ति परिलक्षित होती है। यह पुस्तक एक उन्नत साधक से लेकर आध्यात्मिक पथ के प्रथम जिज्ञासुओं के लिए रोमांचक मार्गदर्शिका है। हिमालयवासी दिव्य संतों के रहस्यों से परिचय कराती आत्मकथा, जिसमें पुनर्जन्म, साधना, आध्यात्मिक उन्नयन आदि की अनसुनी घटनाएँ पाठकों को अचंभित कर देंगी। मैं तुम्हारे परिवार में लौट रहा हूँ। हमने पिछले जन्म में भी साथ गाया है। जैसे वाक्य इस पुस्तक में दृष्टिगोचर होते हैं। यह पुस्तक शरीर से निकलकर सूक्ष्म यात्रा कर पिछले जन्म के संबंधियों को सँभालने जैसे रहस्योद्घाटनों से भरी विस्मयकारी कृति है, जिसको आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे। इसमें आपको भौतिकवादी पश्चिम जगत् में प्रेम से ओत-प्रोत लोक-कल्याणार्थ हिमालयवासी भारतीय संतों की गौरवशाली करुणा गाथा का विस्तृत विवरण मिलेगा। साथ ही यह आपको सत्य और धर्म पर आधारित दुःख, पीड़ा और मृत्यु से निवृत्ति दिलाती दिव्य उद्देश्य से भरपूर ईश्वर के चिरसेवकों के चमत्कारों का परिचय भी देगी। अवतारों और अलौकिक महापुरुषों की क्रीड़ाभूमि भारत की अक्षुण्ण संत परंपरा की अत्यंत रोमहर्षक नवीनतम गाथा।
कवि ने प्रकृति की तुलना माँ से की है और यह प्रतिपादित किया है .................
भारतीय मनीषा अनादि काल से ही प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जिज्ञासु एवं आस्थावान रही है। सर्वप्रथम ‘अथर्ववेद’ में ही ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथ्वियाः’ कहकर धरती की वंदना की गई है। साथ ही, आकाश को पिता की संज्ञा दी गई है। हमने पर्वत, नदी, वृक्ष-वनस्पतियों में भी देवी-देवता की संकल्पना की है। इस तरह हमारे आदि पूर्वज समूची प्रकृति में ही देवत्व का संधान करते थे। वैदिक साहित्य में प्रकृति की सारी शक्तियों को एक सुनिश्चित विधान में दिखलाया गया है।
उसमें नियमन है। उसके विराट् एवं प्रशस्त रूप में चराचर जगत् तथा गोचर और अगोचर ब्रह्मांड के समस्त उपादान समाहित हैं। इस नियमन को वैदिक भाषा में ऋत कहा गया है। ऋत नियमों से बड़ा कोई नहीं है। अग्नि प्रकृति की विराट् शक्ति हैं। वे भी एतस्य क्षत्ता हैं। नदियाँ भी ऋतावरी हैं और नियमानुसार चलती हैं। भूमंडलीय ताप भी नियमबद्ध और संतुलित है। हमारे ऋषियों का यह मानना है कि जब प्रकृति की सारी शक्तियाँ नियमबद्ध हैं तो मनुष्य का आचरण भी नियमबद्ध होना चाहिए।
यही कारण है कि हमारे कवियों और साहित्यकारों ने सदैव प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति अपनी संलग्नता का परिचय दिया है। भारतीय विश्वदृष्टि प्रकृति और मनुष्य में, व्यष्टि-समष्टि में भेद नहीं करती है। हम मानते हैं कि बाहर जो सूर्य का प्रकाश है, वही भीतर ज्ञान का प्रकाश है। बाहर जो अंधकार है, वही भीतरी भय है। इसी तरह तृण और वीरुध में जो ऊपर उठने और लहलहाने की प्रक्रिया है, वह हमारी आंतरिक उमंग है।
हमने मनुष्य-देवता, प्रकृति-पुरुष में स्वामी के बजाय सहकार भाव देखा है। इसलिए वे परस्पर एक-दूसरे को प्रेरित-प्रकाशित और संपन्न करते हैं। फलतः वे युग्म परस्पर अपेक्षी हो जाते हैं। उनकी सहकारिता, सहस्थिति और अंतरावलंबन सामूहिक उत्थान में सुपरिणत हो जाते हैं। अतः पारस्परिक सामंजस्य और सहयोगपूर्ण अस्तित्व के द्वारा परम सामंजस्य तथा पूर्णता तक पहुँचना ही भारतीय चिंता-धारा का केंद्रीय वैशिष्ट्य है।
Book Details
-
ISBN9789390923472
-
Pages216
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पंजाबी के शीर्षस्थ कवियों और कथाकारों में गणनीय अमृता प्रीतम की सृजन-प्रतिभा को नारी-सुलभ कोमलता और संवेदनशीलता के साथ-साथ मर्मभेदिनी कला-दृष्टि का सहज वरदान प्राप्त है। उनके रचनाकार की यह विशिष्टता उन्हें एक ऐसा व्यक्तित्व प्रदान करती है जो तटस्थ भी है और आत्मीय भी! निजता की भावना से उनकी कृतियाँ सराबोर हैं।
वर्ष 1980-81 के ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित ‘काग़ज़ और कैनवस’ में अमृता जी की उत्तरकालीन प्रतिनिधि कविताएँ संगृहीत हैं। प्रेम और यौवन के धूप-छाँही रंगों में अतृप्त का रस घोलकर उन्होंने जिस उच्छल काव्य-मदिरा का आस्वाद अपने पाठकों को पहले कराया था, वह इन कविताओं तक आते-आते पर्याप्त संयमित हो गया है और सामाजिक यथार्थ के शिलाखंडों से टकराते युग-मानव की व्यथा-कथा ही यहाँ विशेष रूप से मुखरित है। आधुनिक यंत्र-युग की देन मनुष्य के आन्तरिक सूनेपन को भी अमृता जी ने बहुत सघनता के साथ चित्रित किया है।
देवनागरी लिपि में मुद्रित मूल पंजाबी कविताओं के साथ उनका हिन्दी रूपान्तर पाठकों को उनके मर्म तक पैठने में सहायक होगा; इस आशा के साथ प्रस्तुत है यह विशिष्ट कृति, जिसमें अमृता जी ने भोगे हुए क्षणों को वाणी दी है।
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