Himalaya Ke Anchal Mein Prakriti Ka Sparsh
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पुस्तक के हर प्रसंग में एक अप्रत्यक्ष और अदृश्य शाश्वत शक्ति परिलक्षित होती है। यह पुस्तक एक उन्नत साधक से लेकर आध्यात्मिक पथ के प्रथम जिज्ञासुओं के लिए रोमांचक मार्गदर्शिका है। हिमालयवासी दिव्य संतों के रहस्यों से परिचय कराती आत्मकथा, जिसमें पुनर्जन्म, साधना, आध्यात्मिक उन्नयन आदि की अनसुनी घटनाएँ पाठकों को अचंभित कर देंगी। मैं तुम्हारे परिवार में लौट रहा हूँ। हमने पिछले जन्म में भी साथ गाया है। जैसे वाक्य इस पुस्तक में दृष्टिगोचर होते हैं। यह पुस्तक शरीर से निकलकर सूक्ष्म यात्रा कर पिछले जन्म के संबंधियों को सँभालने जैसे रहस्योद्घाटनों से भरी विस्मयकारी कृति है, जिसको आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे। इसमें आपको भौतिकवादी पश्चिम जगत् में प्रेम से ओत-प्रोत लोक-कल्याणार्थ हिमालयवासी भारतीय संतों की गौरवशाली करुणा गाथा का विस्तृत विवरण मिलेगा। साथ ही यह आपको सत्य और धर्म पर आधारित दुःख, पीड़ा और मृत्यु से निवृत्ति दिलाती दिव्य उद्देश्य से भरपूर ईश्वर के चिरसेवकों के चमत्कारों का परिचय भी देगी। अवतारों और अलौकिक महापुरुषों की क्रीड़ाभूमि भारत की अक्षुण्ण संत परंपरा की अत्यंत रोमहर्षक नवीनतम गाथा। कवि ने प्रकृति की तुलना माँ से की है और यह प्रतिपादित किया है ................. भारतीय मनीषा अनादि काल से ही प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जिज्ञासु एवं आस्थावान रही है। सर्वप्रथम ‘अथर्ववेद’ में ही ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथ्वियाः’ कहकर धरती की वंदना की गई है। साथ ही, आकाश को पिता की संज्ञा दी गई है। हमने पर्वत, नदी, वृक्ष-वनस्पतियों में भी देवी-देवता की संकल्पना की है। इस तरह हमारे आदि पूर्वज समूची प्रकृति में ही देवत्व का संधान करते थे। वैदिक साहित्य में प्रकृति की सारी शक्तियों को एक सुनिश्चित विधान में दिखलाया गया है। उसमें नियमन है। उसके विराट् एवं प्रशस्त रूप में चराचर जगत् तथा गोचर और अगोचर ब्रह्मांड के समस्त उपादान समाहित हैं। इस नियमन को वैदिक भाषा में ऋत कहा गया है। ऋत नियमों से बड़ा कोई नहीं है। अग्नि प्रकृति की विराट् शक्ति हैं। वे भी एतस्य क्षत्ता हैं। नदियाँ भी ऋतावरी हैं और नियमानुसार चलती हैं। भूमंडलीय ताप भी नियमबद्ध और संतुलित है। हमारे ऋषियों का यह मानना है कि जब प्रकृति की सारी शक्तियाँ नियमबद्ध हैं तो मनुष्य का आचरण भी नियमबद्ध होना चाहिए। यही कारण है कि हमारे कवियों और साहित्यकारों ने सदैव प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति अपनी संलग्नता का परिचय दिया है। भारतीय विश्वदृष्टि प्रकृति और मनुष्य में, व्यष्टि-समष्टि में भेद नहीं करती है। हम मानते हैं कि बाहर जो सूर्य का प्रकाश है, वही भीतर ज्ञान का प्रकाश है। बाहर जो अंधकार है, वही भीतरी भय है। इसी तरह तृण और वीरुध में जो ऊपर उठने और लहलहाने की प्रक्रिया है, वह हमारी आंतरिक उमंग है। हमने मनुष्य-देवता, प्रकृति-पुरुष में स्वामी के बजाय सहकार भाव देखा है। इसलिए वे परस्पर एक-दूसरे को प्रेरित-प्रकाशित और संपन्न करते हैं। फलतः वे युग्म परस्पर अपेक्षी हो जाते हैं। उनकी सहकारिता, सहस्थिति और अंतरावलंबन सामूहिक उत्थान में सुपरिणत हो जाते हैं। अतः पारस्परिक सामंजस्य और सहयोगपूर्ण अस्तित्व के द्वारा परम सामंजस्य तथा पूर्णता तक पहुँचना ही भारतीय चिंता-धारा का केंद्रीय वैशिष्ट्य है।
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पुस्तक के हर प्रसंग में एक अप्रत्यक्ष और अदृश्य शाश्वत शक्ति परिलक्षित होती है। यह पुस्तक एक उन्नत साधक से लेकर आध्यात्मिक पथ के प्रथम जिज्ञासुओं के लिए रोमांचक मार्गदर्शिका है। हिमालयवासी दिव्य संतों के रहस्यों से परिचय कराती आत्मकथा, जिसमें पुनर्जन्म, साधना, आध्यात्मिक उन्नयन आदि की अनसुनी घटनाएँ पाठकों को अचंभित कर देंगी। मैं तुम्हारे परिवार में लौट रहा हूँ। हमने पिछले जन्म में भी साथ गाया है। जैसे वाक्य इस पुस्तक में दृष्टिगोचर होते हैं। यह पुस्तक शरीर से निकलकर सूक्ष्म यात्रा कर पिछले जन्म के संबंधियों को सँभालने जैसे रहस्योद्घाटनों से भरी विस्मयकारी कृति है, जिसको आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे। इसमें आपको भौतिकवादी पश्चिम जगत् में प्रेम से ओत-प्रोत लोक-कल्याणार्थ हिमालयवासी भारतीय संतों की गौरवशाली करुणा गाथा का विस्तृत विवरण मिलेगा। साथ ही यह आपको सत्य और धर्म पर आधारित दुःख, पीड़ा और मृत्यु से निवृत्ति दिलाती दिव्य उद्देश्य से भरपूर ईश्वर के चिरसेवकों के चमत्कारों का परिचय भी देगी। अवतारों और अलौकिक महापुरुषों की क्रीड़ाभूमि भारत की अक्षुण्ण संत परंपरा की अत्यंत रोमहर्षक नवीनतम गाथा।
कवि ने प्रकृति की तुलना माँ से की है और यह प्रतिपादित किया है .................
भारतीय मनीषा अनादि काल से ही प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जिज्ञासु एवं आस्थावान रही है। सर्वप्रथम ‘अथर्ववेद’ में ही ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथ्वियाः’ कहकर धरती की वंदना की गई है। साथ ही, आकाश को पिता की संज्ञा दी गई है। हमने पर्वत, नदी, वृक्ष-वनस्पतियों में भी देवी-देवता की संकल्पना की है। इस तरह हमारे आदि पूर्वज समूची प्रकृति में ही देवत्व का संधान करते थे। वैदिक साहित्य में प्रकृति की सारी शक्तियों को एक सुनिश्चित विधान में दिखलाया गया है।
उसमें नियमन है। उसके विराट् एवं प्रशस्त रूप में चराचर जगत् तथा गोचर और अगोचर ब्रह्मांड के समस्त उपादान समाहित हैं। इस नियमन को वैदिक भाषा में ऋत कहा गया है। ऋत नियमों से बड़ा कोई नहीं है। अग्नि प्रकृति की विराट् शक्ति हैं। वे भी एतस्य क्षत्ता हैं। नदियाँ भी ऋतावरी हैं और नियमानुसार चलती हैं। भूमंडलीय ताप भी नियमबद्ध और संतुलित है। हमारे ऋषियों का यह मानना है कि जब प्रकृति की सारी शक्तियाँ नियमबद्ध हैं तो मनुष्य का आचरण भी नियमबद्ध होना चाहिए।
यही कारण है कि हमारे कवियों और साहित्यकारों ने सदैव प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति अपनी संलग्नता का परिचय दिया है। भारतीय विश्वदृष्टि प्रकृति और मनुष्य में, व्यष्टि-समष्टि में भेद नहीं करती है। हम मानते हैं कि बाहर जो सूर्य का प्रकाश है, वही भीतर ज्ञान का प्रकाश है। बाहर जो अंधकार है, वही भीतरी भय है। इसी तरह तृण और वीरुध में जो ऊपर उठने और लहलहाने की प्रक्रिया है, वह हमारी आंतरिक उमंग है।
हमने मनुष्य-देवता, प्रकृति-पुरुष में स्वामी के बजाय सहकार भाव देखा है। इसलिए वे परस्पर एक-दूसरे को प्रेरित-प्रकाशित और संपन्न करते हैं। फलतः वे युग्म परस्पर अपेक्षी हो जाते हैं। उनकी सहकारिता, सहस्थिति और अंतरावलंबन सामूहिक उत्थान में सुपरिणत हो जाते हैं। अतः पारस्परिक सामंजस्य और सहयोगपूर्ण अस्तित्व के द्वारा परम सामंजस्य तथा पूर्णता तक पहुँचना ही भारतीय चिंता-धारा का केंद्रीय वैशिष्ट्य है।
Book Details
-
ISBN9789390923472
-
Pages216
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: वरिष्ठ कवि गंगेश गुंजनक 'अन्हार मे डमरू' घुप्प अन्हरियाक विरुद्ध इजोत तकबाक विलक्षण काव्य-प्रयासक नाम थिक। सम्पूर्ण सम्भावनाक संग कविक दायित्व-बोध आ काव्य-विवेकक मणिकांचन सहकार संग्रहक वैशिष्ट्य। 'धानक शीश जकाँ फुटैत' जाग्रत कविताक 'बगूचा' अछि—'अन्हार मे डमरू'। चमत्कृत करैत कविताक रेंज आ कविक निजी काव्य-भाषाक सौंदर्य कविता केँ नव सृजनशीलता सँ भरि दैछ। मिथिलाक संस्कृति सँ अथाह अनुराग आ रूढ़ अपसंस्कृतिक प्रति घोर चिंताक अंतर्द्वंद्व सँ बनैत कविता विमर्शक लेल पाठक केँ सहजहि हकारैत अछि। 'प्रथम चुम्बनक कृतज्ञता' आ 'दोसर चुम्बनक कृतघ्नता' सँ ल' क' 'कुसियारक पर्याय बनैत स्त्रीक जीवन-कथा', 'धुआँइन ढेकार जकाँ सुन्न दालन पर' 'पुरना मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपि जकाँ' पड़ल लोकतंत्रक ठठरी, दिल्ली नगरक त्रासद तामस, जबियाअल मनुक्खक सामने अकादारुन बजार वा 'यात्रीजीक एक कंठ मे सय-पचास लाखक प्रतिध्वनि'; ई सभ टा स्वर समवेत रूपेँ 'अन्हार मे डमरू:क परिसर मे भेटि जैत। बहुस्वरता, विषय-बहुलता आ कथन-भंगीक विविधता संग्रहक नवीनता थिक। प्रतीक, बिंब सँ सुसज्जित एक टा पारदर्शी महीन काव्य-आवरण कविता केँ कुहेसगर नहि बना जीवन-जगतक अलक्षित समय केँ दर्शबैत अछि। गुंजनजीक कविताक संवादधर्मिता हुनक कविता केँ सहज बोधगम्य तँ बनबैत अछि, मुदा ई सहजता सरलता नहि अपितु विषय-वस्तुक समग्रता आ जटिलता केँ सरलता सँ बुझबाक काव्य-युक्ति अछि। —कमलानंद झा
Nai Konplen
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Motilal Alamchandra
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Tera Tujhko Arpan
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Rashmi Sthapak
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Ghar Ke Vaaste
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Swayam Srivastava
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- Description: यह लोकप्रिय युवा कवि स्वयं श्रीवास्तव का पहला काव्य संग्रह है। इसके हर गीत और नज़्में पहले ही लोगों की ज़ुबान पर हैं। स्वयं श्रीवास्तव अपने समय की असल समस्याओं को उठाते हैं। उनकी कविताओं में युवा मन की बेकरारी, बेकारी, प्रेम, असफलताबोध और सौन्दर्याकांक्षा मिलेगी। जब उनकी हिन्दुस्तानी जुबान में आप इन्हीं चीज़ों को सुनते हैं तो एक ही बात जेहन में कौंधती है— “देखना तक़रीर की लज़्ज़त कि जो उसने कहा मैं ने ये जाना कि गोया ये भी मेरे दिल में है”।
Saare Sukhan Humare
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Faiz Ahmed 'Faiz'
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- Description: ‘सारे स़ुखन हमारे’ के रूप में समकालीन उर्दू शाइरी के अजीमुश्शान शाइर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की तमाम ग़ज़लों, नज़्मों, गीतों और क़तआ’त को हिन्दी में पहली बार एक साथ प्रस्तुत किया गया है। इसमें उनका आख़िरी कलाम तक शामिल है। उर्दू शाइरी में फ़ैज़ को ग़ालिब और इक़बाल के पाये का शाइर माना गया है, लेकिन उनकी प्रतिबद्ध प्रगतिशील जीवन-दृष्टि सम्पूर्ण उर्दू शाइरी में उन्हें एक नई बुलन्दी सौंप जाती है। फूलों की रंगो-बू से सराबोर शाइरी से अगर आँच भी आ रही हो तो मान लेना चाहिए कि फ़ैज़ वहाँ पूरी तरह मौजूद हैं। यही उनकी शाइरी की ख़ास पहचान है, यानी रोमानी तेवर में ख़ालिस इन्क़लाबी बात। उनकी तमाम रचनाओं में जैसे एक अर्थपूर्ण उदासी, दर्द और कराह छुपी हुई है, इसके बावजूद वह हमें अद्भुत रूप से अपनी पस्तहिम्मती के ख़िलाफ़ खड़ा करने में समर्थ हैं। कारण, रचनात्मकता के साथ चलनेवाले उनके जीवन-संघर्ष। उन्हीं में उनकी शाइरी का जन्म हुआ और उन्हीं के चलते वह पली-बढ़ी। वे उसे अपने लहू की आग में तपाकर अवाम के दिलो-दिमाग़ तक ले गए और कुछ इस अन्दाज़ में कि वह दुनिया के तमाम मजलूमों की आवाज़ बन गई। वस्तुत: फ़ैज़ की शाइरी हमारे समय की गहन मानवी, समाजी और सियासी सच्चाइयों का पर्याय है। वह हर पल असलियत के साथ है और भाषाई दीवारों को लाँघकर बोलती है। कहना न होगा कि उर्दू के इस महान शाइर की सम्पूर्ण कविताओं का यह एकज़िल्द मज्मूआ हिन्दी में चाव के साथ पढ़ा और सहेजा जाएगा।
Swachchhand
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Sumitranandan Pant
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कविश्री सुमित्रानंदन पंत का काव्य-संसार अत्यन्त विस्तृत और भव्य है। प्रायः काव्य-रसिकों के लिए इसके प्रत्येक कोने-अँतरे को जान पाना कठिन होता है। पंत जी की काव्य-सृष्टि में, किसी भी श्रेष्ठ कवि की तरह ही, स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठता के शिखरों के दर्शन होते हैं, नवीन काव्य-भावों के अभ्यास का ऊबड़-खाबड़, निचाट मैदान भी मिलता है और अवरुद्ध काव्य-प्रयासों के गड्ढे भी। किन्तु किसी कवि के स्वभाव को जानने के लिए यह आवश्यक होता है कि यत्नपूर्वक ही नहीं, रुचिपूर्वक भी उसके काव्य-संसार की यात्रा की जाए। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने पंत जी के बारे में लिखा कि आरम्भ में उनकी प्रवृत्ति इस जग-जीवन से अपने लिए सौन्दर्य का चयन करने की थी, आगे चलकर उनकी कविताओं में इस सौन्दर्य की सम्पूर्ण मानव जाति तक व्याप्ति की आकांक्षा प्रकट होने लगी। प्रकृति, प्रेम, लोक और समाज-विषय कोई भी हो, पंत-दृष्टि हर जगह उस सौन्दर्य का उद्घाटन करना चाहती है, जो प्रायः जीवन से बहिष्कृत रहता है। वह उतने तक स्वयं को सीमित नहीं करती, उस सौन्दर्य को एक मूल्य के रूप में अर्जित करने का यत्न करती है।
सुमित्रानंदन पंत की जन्मशती के अवसर पर उनकी विपुल काव्य-सम्पदा से एक नया संचयन तैयार करना पंत जी के बाद विकसित होती हुई काव्य-रुचि का व्यापक अर्थ में अपने पूर्ववर्ती के साथ एक नए प्रकार का सम्बन्ध बनाने का उपक्रम है। यह चयन पंत जी के अन्तिम दौर की कविताओं के इर्द-गिर्द ही नहीं घूमता, जो काल की दृष्टि से हमारे अधिक निकट हैं; बल्कि उनके बिलकुल आरम्भिक काल की कविताओं से लेकर अन्तिम दौर तक की कविताओं के विस्तार को समेटने की चेष्टा करता है। चयन के पीछे पंत जी को किसी राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा, किसी नई नैतिक-दार्शनिक, दृष्टि जैसे काव्य-बाह्य दबाव में नए ढंग से प्रस्तुत करने की प्रेरणा नहीं है—यह एक नई शताब्दी और सहस्राब्दी की उषा वेला में मनुष्य की उस आदिम, साथ ही चिरनवीन सौन्दर्याकांक्षा का स्मरण है, पंत जी जैसे कवि जिसे प्रत्येक युग में आश्चर्यजनक शिल्प की तरह गढ़ जाते हैं।
किसी कवि की जन्मशती के अवसर पर परवर्ती पीढ़ी की इससे अच्छी श्रद्धांजलि क्या हो सकती है कि वह उसे अपने लिए सौन्दर्यात्मक विधि से समकालीन करे। पंत-शती के उपलक्ष्य में उनकी कविताओं के संचयन को ‘स्वच्छंद’ कहने के पीछे मात्र पंत जी की नहीं, साहित्य मात्र की मूल प्रवृत्ति की ओर भी संकेत है। संचयन में कालक्रम के स्थान पर एक नया अदृश्य क्रम दिया गया है, जिसमें कवि-दृष्टि, प्रकृति, मानव-मन, व्यक्तिगत जीवन, लोक और समाज के बीच संचरण करते हुए अपना एक कवि-दर्शन तैयार करती है। ‘स्वच्छन्द’ के माध्यम से पंत जी के प्रति विस्मरण का प्रत्याख्यान तो है ही, इस बात को नए ढंग से चिह्नित भी करना है कि जैसे प्रकृति का सौन्दर्य प्रत्येक भिन्न दृष्टि के लिए विशिष्ट है, वैसे ही कवि-संसार का सौन्दर्य भी अशेष है, जिसे नई दृष्टि अपने लिए विशिष्ट प्रकार से उपलब्ध करती है।
Sach Poochho To
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Bhagwat Rawat
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Description:
अपनी ईमानदारी और सदाशयता के बावजूद एकरस होती जा रही अधिकांश हिन्दी कविता के बीच भगवत रावत इसलिए अपनी अनायास और अप्रगल्भ पहचान तथा अस्मिता प्राप्त कर लेते हैं कि उनके यहाँ अपने कवि और कविताई को लेकर उतना हिसाब-किताब नहीं है जितनी कि अपनी और औरों की इनसानियत और दोस्ती को बचा पाने और चरितार्थ कर पाने की चिन्ता। इसलिए अभिव्यक्ति को लेकर उनकी कविता में कई क़िस्म के ‘कलात्मक’ संकोच या आत्म-प्रतिबन्ध नहीं हैं। लिखना उनके लिए इसलिए ज़रूरी नहीं है कि कविता एक प्रतिष्ठा का प्रश्न है या उसे लिखकर कुछ सिद्ध किया जाना है, बल्कि आज के भारतीय समय में जो लिख सकते हैं, उनके पास लिखने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। वे लिखकर अमरत्व प्राप्त नहीं करना चाहते बल्कि यदि कोई विकल्प न हो तो मर-मर कर लिखना चाहते हैं।
आदमी को लेकर एक निस्संकोच अपनापन और करुणा भगवत रावत की कविता के केन्द्र में है, इसीलिए जब वे याद दिलाते हैं कि इस समय दुनिया को ढेर सारी करुणा चाहिए तो वे भावुक नहीं हो रहे होते हैं, बल्कि निर्वैयक्तिकता, तटस्थता आदि के मूलत: मानव-विरोधी मूल्यों के ख़िलाफ़ एक अमोघ नकार दर्ज करते हैं।
भारतीय साहित्य की एक महान् परम्परा पर कभी भी ध्यान नहीं दिया गया है और वह है मित्रता के चित्रण की। ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ की मैत्रियाँ भी भारतीय मानवीयता का एक अनिवार्य तत्त्व हैं और बीसवीं शताब्दी में जिस वैश्विक मानवीय प्रतिबद्धता की बात की जाती है, उसके मूल में यही वह स्वाभाविक दोस्ताना है जो इनसानों में हमेशा मौजूद रहता है। मुक्तिबोध के बाद भगवत रावत आज के पहले हिन्दी कवि हैं जिनके यहाँ दोस्ती का जज़्बा, किसी मित्र की प्रतीक्षा, सखा के आने की ख़ुशी, बल्कि किसी भी राह चलते को दोस्त बनाने की चाहत इतनी शिद्दत से मौजूद है। जब हर अपने जैसा इनसान दोस्त है तो बेशक वसुधा भी कुटुम्ब है। यह आकस्मिक नहीं है कि भगवत रावत ने कुछ कविताएँ अपने कवि-कलाका र मित्रों पर भी लिखी हैं। दोस्ती का यह जज़्बा उस समय और भी सम्पूर्ण तथा सार्थक हो जाता है, जब भगवत रावत उसकी ज़द में प्रकृति और पर्यावरण को भी ले आते हैं।
भगवत रावत की ये कविताएँ भारतीय जीवन के ऐसे कई चित्र हिन्दी कविता में पहली बार लाती हैं जो शायद पहले कभी देखे नहीं गए। यदि प्रेमचन्द ने ‘क़फन’ में दलितों के मर्मांतक यथार्थ का चित्रण किया था तो ‘अतिथि कथा’ में भगवत रावत उसी बिरादरी का एक ऐसा स्निग्ध दृश्य उपस्थित करते हैं जो आत्मा को जगमगा जाता है। ‘यह तो अच्छा हुआ’, ‘सोच रही है गंगाबाई’, ‘मानव-संग्रहालय’ (जो निराला की ‘तोड़ती पत्थर’ का समसामयिक संस्करण है) आदि में उनकी कविता संसार के सबसे बड़े सर्वहारा वर्ग—स्त्रियों की कथाएँ खोज लेती है। उनकी ‘कचरा बीननेवाली लड़कियाँ’ हिन्दी की इस तरह की बेहतरीन समूहपरक कविताओं में भी अपनी निगाह और वात्सल्य के लिए बेमिसाल स्वीकार की जानी चाहिए। यदि भगवत रावत की व्यापक आस्था और पक्षधरता को लेकर किसी भी दुविधा की गुंजाइश नहीं है तो यह भी सच है कि उसमें कोई अतिमानवीय, सुनियोजित, यंत्रचालित आशावाद तथा आत्माभिनन्दन भी नहीं है। कई कविताओं में पराजय की अकातर स्वीकृति है, अपनी और अपने जैसों की भूल-ग़लतियों, ख़ामियों और ग़फ़लतों का इक़बाल भी है। लेकिन इनमें आत्मदया और विलाप नहीं है, बल्कि उस तरह का मूल्यांकन है जो हर मुक़ाबले के बाद शाम को शिविरों में किया जाता है ताकि अगली सुबह फिर आगे बढ़ा जा सके। ‘मेरा चेहरा’, ‘सच पूछो तो’, ‘ठहरा हूँ जब-जब छाया के नीचे’, ‘क्या इसीलिए धारण की थी देह’, ‘मौत’ तथा ‘आग पेटी’ जैसी अत्यन्त निजी कविताओं में अपने एकान्त, पारिवारिक और सामाजिक जीवन से कई क़िस्म की मुठभेड़ें हैं, आत्म-स्वीकृतियाँ हैं, यथार्थ से निर्मम मुक़ाबले हैं लेकिन निराशा या पस्ती कहीं नहीं है।
भगवत रावत की काव्य-प्रौढ़ता का एक विलक्षण पहलू उनका शिल्प-वैविध्य है। ‘सम्भव नहीं’, ‘और अन्त में’ तथा ‘हम जो बचे रह गए’ सरीखी कविताएँ सिद्ध करती हैं कि छन्द पर भी उनका सहज अधिकार है जबकि कुछ लम्बी कविताओं में उन्होंने सिर्फ़ एक विचार-स्थिति को निबाहा है और कुछ में वे सफल कथा-निर्वाह कर ले गए हैं। छोटी रचनाओं को उन्होंने उक्ति, सुभाषित, शब्द-चित्र या व्यंग्य नहीं बना दिया है, बल्कि, उनमें जायज़ कविता मौजूद है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात शायद यह है कि इन कविताओं में अधिकांश में भगवत रावत भाषा की एक ऐसी विरल सादगी हासिल कर पाए हैं जो अपनी सम्प्रेषणीयता में किसी तंतुवाय से जगाए गए सुदूर लेकिन गहरे संगीत की तरह है। भाषा को शिल्प, और इन दोनों को कथ्य से अलग करके देखना हिमाकत है, इसलिए यह माने बिना काम नहीं चलता कि सच पूछो तो भगवत रावत की कविता अपने सारे आयामों में हिन्दी में ऐसी जगह बना चुकी है जिसकी उपेक्षा कविता की अपनी समझ पर प्रश्नचिन्ह लगाकर ही की जा सकती है।
Dukh Koi Chidiya To Nahi
- Author Name:
Amit Manoj
- Book Type:

- Description: Poems
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