Prakriti Ki God Mein Maa Ki Paathshala
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‘याद आता है मुझको अपना तरौनी ग्राम, याद आती लीचियाँ और आम’ बाबा नागार्जुन की इन पंक्तियों में अत्यंत सूक्ष्म संकेतों में उनके ‘तरौनी ग्राम’ की स्मृति अवश्य बँध गई है, लेकिन उत्तराखंड के गौरवकवि डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की ‘कोरोना काल’ में रची गई ‘प्रकृति की गोद में माँ की पाठशाला’ कविता संग्रह की कविताओं में तो उनके ‘बचपन’ की लगभग हर स्मृति के साथ माँ के वात्सल्य का अमृत पाठकों को मिलेगा, जो सहज ही प्रत्येक पाठक के हृदय को झकझोरकर रख देगा। डॉ. ‘निशंक’ की इन ‘स्मृति-कविताओं’ में पहाड़ की धड़कन को महसूस किया जा सकता है। पर्वतीय लोक-जीवन, लोक-संस्कृति और संवेदनाओं से महकती हुई डॉ. ‘निशंक’ की ये कविताएँ पर्वतीय समाज की अदम्य जिजीविषा का निर्मल दर्पण कही जा सकती हैं। निश्चित रूप से विश्वव्यापी ‘कोरोना महामारी’ की भयंकर विभीषिका में कवि ‘निशंक’ ने इन रचनाओं के रूप में ‘स्मृति-काव्य’ का अनुपम उपहार हिंदी जगत् को दिया है। देवभूमि की पावन स्मृतियों को अपनी कविताओं में साकार करने वाले कवि डॉ. ‘निशंक’ की भावनाओं में ‘पर्वतीय समाज और परिवेश’ आपको शब्दशः जीवंत मिलेगा। —इसी पुस्तक की भूमिका से
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‘याद आता है मुझको
अपना तरौनी ग्राम,
याद आती लीचियाँ
और आम’
बाबा नागार्जुन की इन पंक्तियों में अत्यंत सूक्ष्म संकेतों में उनके ‘तरौनी ग्राम’ की स्मृति अवश्य बँध गई है, लेकिन उत्तराखंड के गौरवकवि डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की ‘कोरोना काल’ में रची गई ‘प्रकृति की गोद में माँ की पाठशाला’ कविता संग्रह की कविताओं में तो उनके ‘बचपन’ की लगभग हर स्मृति के साथ माँ के वात्सल्य का अमृत पाठकों को मिलेगा, जो सहज ही प्रत्येक पाठक के हृदय को झकझोरकर रख देगा।
डॉ. ‘निशंक’ की इन ‘स्मृति-कविताओं’ में पहाड़ की धड़कन को महसूस किया जा सकता है। पर्वतीय लोक-जीवन, लोक-संस्कृति और संवेदनाओं से महकती हुई डॉ. ‘निशंक’ की ये कविताएँ पर्वतीय समाज की अदम्य जिजीविषा का निर्मल दर्पण कही जा सकती हैं।
निश्चित रूप से विश्वव्यापी ‘कोरोना महामारी’ की भयंकर विभीषिका में कवि ‘निशंक’ ने इन रचनाओं के रूप में ‘स्मृति-काव्य’ का अनुपम उपहार हिंदी जगत् को
दिया है।
देवभूमि की पावन स्मृतियों को अपनी कविताओं में साकार करने वाले कवि डॉ. ‘निशंक’ की भावनाओं में ‘पर्वतीय समाज और परिवेश’ आपको शब्दशः जीवंत मिलेगा।
—इसी पुस्तक की भूमिका से
Book Details
-
ISBN9789390923847
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
डॉ. जगदीश अग्रवाल प्रवासी भारतीय संघ से जुड़े हैं। विदेशों में रह रहे भारतीय के भीतर भी यहाँ के तीज-त्योहार, यहाँ के संस्कार, यहाँ के रीति-रिवाज, यहाँ का मौसम, पेड़-पौधे, पक्षी जीवित रहते हैं। विदेशों में बसने के बाद भी रिश्तों की नफ़ासत, रिश्तों के प्रति प्रतिबद्धताएँ बदल नहीं पातीं! कह सकते हैं कि प्रवासी भारतीय विदेशी सरज़मीं पर भारतीयता को जीवित रखने की कला को विकसित करते हैं। कभी यह भारतीयता कविता के रूप में सामने आती है तो कभी कहानी और उपन्यासों के रूप में।
डॉ. जगदीश अग्रवाल का यह कविता-संग्रह एक प्रवासी भारतीय की ऐसी ही भावनाओं को समर्पित है। इसका प्रकाशन एक तरह से प्रवासी भारतीयों को जोड़ने का भी प्रयास है—ऐसे भारतीयों को, जो किसी न किसी रूप में साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े हैं।
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