Is Shahar Mein Tumhen Yaad Kar
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'इस शहर में तुम्हें याद कर' संग्रह की कविताएँ इसी दुनिया में एक ऐसी धरती की कविताएँ हैं, जहाँ आसमान में जब काले बादल मँडराते हैं, धरती बिवाइयों की तरह फटती है और अपनी पीड़ा किसी से नहीं कह पाती; जहाँ कुछ लोग बाज और चील की तरह अपनी उड़ान में शामिल हैं और कुछ उन तोते-मैना की तरह हैं जिनके पंख काट दिए गए हैं; जहाँ दया और प्रेम की हत्याएँ होती हैं तो अपराधियों के अपराध की सज़ा एक निरपराध को भुगतना पड़ता है; जहाँ एक भागा हुआ आदमी भागकर भी कहीं नहीं भाग पाता, वापस वहीं आ जाता है अपनी ग़लती पुन: दुहराने; जहाँ बूट रौंदते हैं सड़कों को तो आह में बस पिघलने को अभिशप्त पर्वत देखते रह जाते हैं कि रात में श्रमिकों की ख़ुशियों को जलानेवाले ही दिन में संरक्षक हैं...। ऐस में कवि की यह अदम्य जिजीविषा ही है कि वह अपनी आग से सृजन की ही कामना करता है और कहता है—'...तुम्हारे कारावास से परे/जो जीवन है/नितान्त नवीन जीवन/वहीं से गुज़रने दो/कि मैं तुम्हारी ईश्वरीय दुनिया में/पुन: एक युग ईश्वरहीन होकर जी सकूँ!</p> <p>इस संग्रह की कविताएँ अपनी पीठ पर अपना बोझ लेकर अपने पैरों से यात्रा करनेवाले कवि की कविताएँ हैं, जो अपने वितान-उद्देश्य में जितनी मनुष्यों की उतनी ही प्रकृति की हैं—सुख, दु:ख, संघर्ष और सौन्दर्य के साथ; अपनी बोली-बानी, संस्कृति और सभ्यता के साथ; बदलते समय में सत्ता और समाज के बीच निरन्तर प्रदूषित होते कारकों के साथ—इसीलिए ये कविताएँ अपने पाठक से मुखर होकर संवाद भी करती हैं।</p> <p>प्रेम है, बिछुड़न है और उसकी यादें भी हैं जो कवि की अपनी ज़मीन की ऋतुओं और पर्वतों की तरह जीने की कला में शामिल हैं, और इस तरह जैसे थाह के आगे अथाह की अभिव्यक्ति हों; वह कैनवस हों जहाँ कहने-भूलने के सम्बन्धों की हार-जीत का कोई भी चित्र बनाना बेमानी है। ईश्वर है तो आध्यात्मिक चेतना के उस रूप में जिससे कुछ कहा जा सके, जिसका कुछ सुना जा सके। आँसुओं में मन की बातें देखने-समझने की ये कविताएँ जो अनूदित होने के बावजूद अपरिचित नहीं लगतीं—साथ जगते हुए जीने की कविताएँ हैं।
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'इस शहर में तुम्हें याद कर' संग्रह की कविताएँ इसी दुनिया में एक ऐसी धरती की कविताएँ हैं, जहाँ आसमान में जब काले बादल मँडराते हैं, धरती बिवाइयों की तरह फटती है और अपनी पीड़ा किसी से नहीं कह पाती; जहाँ कुछ लोग बाज और चील की तरह अपनी उड़ान में शामिल हैं और कुछ उन तोते-मैना की तरह हैं जिनके पंख काट दिए गए हैं; जहाँ दया और प्रेम की हत्याएँ होती हैं तो अपराधियों के अपराध की सज़ा एक निरपराध को भुगतना पड़ता है; जहाँ एक भागा हुआ आदमी भागकर भी कहीं नहीं भाग पाता, वापस वहीं आ जाता है अपनी ग़लती पुन: दुहराने; जहाँ बूट रौंदते हैं सड़कों को तो आह में बस पिघलने को अभिशप्त पर्वत देखते रह जाते हैं कि रात में श्रमिकों की ख़ुशियों को जलानेवाले ही दिन में संरक्षक हैं...। ऐस में कवि की यह अदम्य जिजीविषा ही है कि वह अपनी आग से सृजन की ही कामना करता है और कहता है—'...तुम्हारे कारावास से परे/जो जीवन है/नितान्त नवीन जीवन/वहीं से गुज़रने दो/कि मैं तुम्हारी ईश्वरीय दुनिया में/पुन: एक युग ईश्वरहीन होकर जी सकूँ!</p>
<p>इस संग्रह की कविताएँ अपनी पीठ पर अपना बोझ लेकर अपने पैरों से यात्रा करनेवाले कवि की कविताएँ हैं, जो अपने वितान-उद्देश्य में जितनी मनुष्यों की उतनी ही प्रकृति की हैं—सुख, दु:ख, संघर्ष और सौन्दर्य के साथ; अपनी बोली-बानी, संस्कृति और सभ्यता के साथ; बदलते समय में सत्ता और समाज के बीच निरन्तर प्रदूषित होते कारकों के साथ—इसीलिए ये कविताएँ अपने पाठक से मुखर होकर संवाद भी करती हैं।</p>
<p>प्रेम है, बिछुड़न है और उसकी यादें भी हैं जो कवि की अपनी ज़मीन की ऋतुओं और पर्वतों की तरह जीने की कला में शामिल हैं, और इस तरह जैसे थाह के आगे अथाह की अभिव्यक्ति हों; वह कैनवस हों जहाँ कहने-भूलने के सम्बन्धों की हार-जीत का कोई भी चित्र बनाना बेमानी है। ईश्वर है तो आध्यात्मिक चेतना के उस रूप में जिससे कुछ कहा जा सके, जिसका कुछ सुना जा सके। आँसुओं में मन की बातें देखने-समझने की ये कविताएँ जो अनूदित होने के बावजूद अपरिचित नहीं लगतीं—साथ जगते हुए जीने की कविताएँ हैं।
Book Details
-
ISBN9788126726042
-
Pages128
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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शेफाली का रचना-कर्म उसके काव्य-आत्म से एकमेक हो जाने को उन्मुख है। वह कविता रचती है और वह स्वयं कविता हो जाने को उत्सुक है।...एक तरह से देखें तो यह सिर्फ साहित्यिक यात्रा नहीं, आध्यात्मिक यात्रा भी है।...
शेफाली की साहित्यिक कल्पना उसकी आध्यात्मिक पिपासा से एकमेक है। और इस कारण, उसकी कविताएँ अक्षय वैभव का गीत हैं। प्रकृति उसके कानों में अपना रहस्य खोलती है और उसका ध्यानधीर आत्म हमें उन क्षणों के दर्शन को प्रेरित करता है।
—अभिजीत पाठक
Pratinidhi kavitayen : Gopal Singh Nepali
- Author Name:
Gopal Singh 'Nepali'
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गोपाल सिंह ‘नेपाली’ उत्तर छायावाद के प्रतिनिधि कवियों में कई कारणों से विशिष्ट हैं। उनमें प्रकृति के प्रति सहज और स्वाभाविक अनुराग है, देश के प्रति सच्ची श्रद्धा है, मनुष्य के प्रति सच्चा प्रेम है और सौन्दर्य के प्रति सहज आकर्षण है। उनकी काव्य-संवेदना के मूल में प्रेम और प्रकृति है।
ऐसा नहीं है कि ‘नेपाली’ के प्रेम में रूप का आकर्षण नहीं है। उनकी रचनाओं में रूप का आकर्षण भी है और मन की विह्वलता भी, समर्पण की भावना भी है और मिलन की कामना भी, प्रतीक्षा की पीड़ा भी है और स्मृतियों का दर्द भी।
‘नेपाली’ की राष्ट्रीय चेतना भी अत्यन्त प्रखर है। वे देश को दासता से मुक्त कराने के लिए रचनात्मक पहल करनेवाले कवि ही नहीं हैं, राष्ट्र के संकट की घड़ी में ‘वन मैन आर्मी’ की तरह पूरे देश को सजग करनेवाले और दुश्मनों को चुनौती देनेवाले कवि भी हैं।
‘नेपाली’ एक शोषणमुक्त समतामूलक समाज की स्थापना के पक्षधर कवि हैं—
वे आश्वस्त हैं कि समतामूलक समाज का निर्माण होगा। मनुष्य रूढ़ियों से मुक्त होकर विकास पथ पर अग्रसर होगा। प्रेम और बन्धुत्व विकसित होंगे और मनुष्य सामूहिक विकास की दिशा में अग्रसर होगा—
“सामाजिक पापों के सिर पर चढ़कर बोलेगा अब ख़तरा
बोलेगा पतितों-दलितों के गरम लहू का क़तरा-क़तरा
होंगे भस्म अग्नि में जलकर धरम-करम और पोथी-पत्रा
और पुतेगा व्यक्तिवाद के चिकने चेहरे पर अलकतरा
सड़ी-गली प्राचीन रूढ़ि के भवन गिरेंगे, दुर्ग ढहेंगे
युग-प्रवाह पर कटे वृक्ष से दुनिया भर के ढोंग बहेंगे
पतित-दलित मस्तक ऊँचा कर संघर्षों की कथा कहेंगे
और मनुज के लिए मनुज के द्वार खुले के खुले रहेंगे।”
Aasha Balwati Hai Rajan
- Author Name:
Nand Chaturvedi
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नन्द चतुर्वेदी हिन्दी के उन विरल कवियों में हैं जिन्होंने अपनी कविता को अपने जीवन-कर्म से जोड़कर सार्थक बनाया है। वे चिन्तन के स्तर पर समाजवादी रहे तथा उन्होंने अपने कवि-कर्म को समाज में व्याप्त ग़ैरबराबरी को मिटाने के लिए समर्पित किया। उनकी सम्पूर्ण कविता तथा इतर लेखन सामान्य जन के बेहतर जीवनयापन के प्रति एक ईमानदार आह्वान है। उनके कवि की मूल चिन्ता उस जन को सम्बोधित है जो सदियों से सामन्तवादी, पूँजीवादी और उपनिवेशवादी शोषण का शिकार रहा है। पर नन्द बाबू की देशज संवेदना ने अपनी कविताओं में इस जन की पीड़ाओं को ऐसी तीव्र अभिव्यक्ति दी है कि उनकी कविता पाठकों को उद्वेलित करती रही है। उन्होंने कविता की भाषा उसी आदमी से ग्रहण की है जो उनके कवि-कर्म का उपजीव्य है। वे अपनी कविता को अमूर्त बिम्बों की सरणि या मिथकीय घटाटोप से नहीं लादते, प्रत्युत सीधी-सादी ज़बान में कह देते हैं। लेकिन वे अपनी कविता को सीधे सपाटपन से भी बचाते हैं और सामान्य जीवन से कविता के औज़ार तलाशते हैं। परिणामस्वरूप उनकी कविता लोकधर्मिता से अलंकृत होती है। वे कबीर की परम्परा के कवि हैं जिनकी कविता जितनी सरल लगती है, उतनी ही विविध अर्थछवियों से सज्जित। नन्द बाबू की कविता का उत्स जनचेतना है तो उसका प्रवाह नैसर्गिक झरने की धारा की तरह है। किन्तु यह झरना पाठक को शीतलता प्रदान कर सुलाता नहीं, बल्कि अपनी कलकल ध्वनि से पाठक को उद्वेलित कर जनपक्षधर बनाता है। उनकी कविता में जो ताप है, वह उसे अग्निधर्मा बनाती है। यह ताप नन्द बाबू आमजन की पीड़ा से प्रसूत अश्रुओं से ग्रहण करते हैं। यही ऊष्मा उनकी कविता का मूल चरित्र है।
—हेतु भारद्वाज
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