Andhere Mein Buddha
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उनींद, अवसाद, शोक, स्मृतियाँ, आत्मा के ख़ाली पात्र को भरता एकान्त और उसे वापस सोख लेता अकेलापन, मृत्यु, बिछोह और दुख, ‘अँधेरे में बुद्ध’ की कविताएँ ऐसे ही तत्वों से बनी हैं। ये कविताएँ जितनी अपने बारे में हैं उतनी ही दूसरों के बारे में, और उन चीज़ों के बारे में जो सबकी हैं, जैसे सपने, जैसे हताशाएँ, जैसे पीड़ा।</p> <p>ये कविताएँ अपने आधे सिर के दर्द के साथ कभी ईश्वर से संवाद करती हैं, कभी अपनी देह से, कभी-कभी उन लोगों से भी जो चले गए, लेकिन जो हमारी देह की किसी टीसती नस में अभी भी जीवित बहते हैं।</p> <p>ये कविताएँ उन ततैयों के बारे में भी हैं जो जीवन की दीप्ति में प्रकाशमान हमारे माथों के भीतर चुपचाप बैठे रहते हैं, और व्यर्थताबोध की किसी तीखी कौंध में अचानक भन्नाने लगते हैं, और बेशक उनके बारे में भी जो चुप बैठते ही नहीं, रात-दिन भन्नाते ही रहते हैं—हर साँस पर और तेज़।</p> <p>दुख के खोटे सिक्के को बचाने को व्याकुल इन कविताओं में प्रेम का दुख भी है, आत्मा और देह के दुख भी हैं, इतिहास के दुख भी हैं, जीवन की दैनिंदिनी की मशीन से झरते दुख भी हैं...और वह दुख भी है जो बस इसीलिए होता है, क्योंकि हम होते हैं, जिसे बुद्ध ने देखा।
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उनींद, अवसाद, शोक, स्मृतियाँ, आत्मा के ख़ाली पात्र को भरता एकान्त और उसे वापस सोख लेता अकेलापन, मृत्यु, बिछोह और दुख, ‘अँधेरे में बुद्ध’ की कविताएँ ऐसे ही तत्वों से बनी हैं। ये कविताएँ जितनी अपने बारे में हैं उतनी ही दूसरों के बारे में, और उन चीज़ों के बारे में जो सबकी हैं, जैसे सपने, जैसे हताशाएँ, जैसे पीड़ा।</p>
<p>ये कविताएँ अपने आधे सिर के दर्द के साथ कभी ईश्वर से संवाद करती हैं, कभी अपनी देह से, कभी-कभी उन लोगों से भी जो चले गए, लेकिन जो हमारी देह की किसी टीसती नस में अभी भी जीवित बहते हैं।</p>
<p>ये कविताएँ उन ततैयों के बारे में भी हैं जो जीवन की दीप्ति में प्रकाशमान हमारे माथों के भीतर चुपचाप बैठे रहते हैं, और व्यर्थताबोध की किसी तीखी कौंध में अचानक भन्नाने लगते हैं, और बेशक उनके बारे में भी जो चुप बैठते ही नहीं, रात-दिन भन्नाते ही रहते हैं—हर साँस पर और तेज़।</p>
<p>दुख के खोटे सिक्के को बचाने को व्याकुल इन कविताओं में प्रेम का दुख भी है, आत्मा और देह के दुख भी हैं, इतिहास के दुख भी हैं, जीवन की दैनिंदिनी की मशीन से झरते दुख भी हैं...और वह दुख भी है जो बस इसीलिए होता है, क्योंकि हम होते हैं, जिसे बुद्ध ने देखा।
Book Details
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ISBN9789360861049
-
Pages158
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘नींद थी और रात थी’ की कविताओं में आकुल यथार्थ और स्वप्नमयता का द्वन्द्व है जिसकी गतिमानता हमारे समय के मानवीय मूल्यों वाले यथार्थ को विकृत करनेवाली या कि उसके रूपों को धुँधला करनेवाली ताक़तों के ख़िलाफ़ बड़ी सावधानी से अपना काम करती है। ये कविताएँ काफ़ी कुछ तोड़ती हैं, लेकिन तोड़ने के पश्चात् या कई बार ज़रूरत होने पर उसके साथ-साथ ही, रचती भी चलती हैं। इस दुहरी ज़िम्मेदारी वाली सक्रियता के ज़रिए सविता सिंह की कविताएँ हिन्दी जाति के सामूहिक मन का, उस मन के मर्म का, पुनर्संस्कार करती हैं—आत्मविश्वास से दीप्त विनम्रता के साथ, जिसमें दृष्टि की सफ़ाई और उद्देश्य की दृढ़ता प्रभुतावादी सत्ताओं के वर्चस्व को ही नहीं, कई बार उनके छल-भरे उदार-भाव को भी नेस्तनाबूद करने पर आमादा दीखती हैं।
‘नींद थी और रात थी’ की कविताओं में पीड़ा और अवसाद का भाव भी दम तोड़ता आख़िरी अहसास नहीं है, बल्कि अपने आवेग-संवेग से हमें आत्मा के उस सूने में ले जाता है जहाँ शायद हम कभी गए न थे और सच के वे बिम्ब पाए न थे जो अचानक ख़ुद को वहाँ प्रकट करने लगते हैं। इन कविताओं में प्रकृति, समय के स्त्रीकरण और ऐसी ही अन्य प्रविधियों के माध्यम से अपने ‘आत्मचेतस आत्मन्’ के आविष्कार की कोशिश है।
‘नींद थी और रात थी’ की कविताओं में स्त्री-विमर्श की तर्कशीलता का काव्यात्मक आभ्यन्तर, स्त्री-अस्मिता की पीड़ा, उदग्र ऐन्द्रीयता, सान्द्रता और संघर्ष सहजता की जिस ज़मीन पर उजागर हुए हैं, वह सचमुच नई खोज और आश्वस्ति की ज़मीन है।
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थोड़ा भी दु:ख नहीं
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इसके बाद राजा रतनसेन से मित्रता कर छलपूर्वक उन्हें मरवा दिया। पति का शव देखकर रानी पद्मावती सती हो गईं।
अन्त में जब अलाउद्दीन अपनी सेना के साथ चित्तौड़गढ़ पहुँचता है तो रानी पद्मावती की चिता की राख देखकर दु:ख एवं ग्लानि का अनुभव करता है।
इस महाकाव्य में प्रेमतत्त्व-विरह का निरूपण तथा प्रेम-साधना का सम्यक् प्रतिपादन तथा सूक्तियों, लोकोक्तियों, मुहावरे तथा कहावतों का प्रयोग बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
MUJHE UDNA HAI
- Author Name:
Arjun Singh Negi
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- Description: Collection of Poems
Musaddas-E-Hali
- Author Name:
Khwaja Altaf Hussain 'Hali'
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Description:
‘मुसद्दस’ के काव्यात्मक पक्ष पर टिप्पणी करते हुए शमशेर कहते हैं : ‘उसका संगठन अद्भुत रूप से पुष्ट जान पड़ता है। कोई एक भाव बिलकुल उसी रूप में दोहराया नहीं गया। पूरी कविता की लड़ियाँ आपस में इस तरह गुँथी हुई हैं कि अगर एक को भी तोड़कर अलग करें तो पूरी कविता का सौन्दर्य उसी परिणाम में टूटता और बिखरता है।’
‘मुसद्दस-ए-हाली’ की रचना 1879 में उस समय हुई जब भारतीय समाज 1857 के विद्रोह में पराजित होने के बाद पस्ती और हताशा के दौर से गुज़र रहा था। ख़ास तौर पर भारतीय मुस्लिम समाज। मौलाना अल्ताफ़ हुसैन ‘हाली’ ने इसकी रचना सर सैयद अहमद ख़ाँ के आग्रह पर क़ौम को इस हालात से जगाने के लिए की। इस कृति की अहमियत का अनुमान सर सैयद के इस कथन से लगाया जा सकता है कि ‘अगर ख़ुदा ने मुझसे पूछा कि दुनिया में तुमने क्या किया तो मैं जवाब दूँगा कि मैंने हाली से ‘मुसद्दस-ए-हाली’ लिखवाई।’
इसी से प्रेरित होकर मैथिलीशरण गुप्त ने हिन्दू समाज को ध्यान में रखकर अपनी प्रसिद्ध कृति ‘भारत भारती’ की रचना की जो 1913 में प्रकाशित हुई। दोनों ही रचनाएँ अपने-अपने ढंग से भारत के लोगों को अपने वैभवशाली अतीत का स्मरण करने और अशिक्षा, अज्ञान तथा मानसिक दासता से मुक्त होने का आह्वान करती हैं।
यह ‘मुसद्दस-ए-हाली’ का प्रामाणिक पाठ है जिसे हिन्दी के प्रतिष्ठित कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह ने सम्पादित किया है। दस्तावेज़ी महत्त्व की इस प्रस्तुति में प्रयास किया गया है कि मुसद्दस के मूल पाठ के साथ-साथ इसकी पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक महत्ता भी पाठकों के सामने मौजूद रहे। यह काम करता है कवियों के कवि कहे जानेवाले शमशेर बहादुर सिंह का एक महत्त्वपूर्ण आलेख जो उन्होंने ‘भारत भारती’ और ‘मुसद्दस-ए-हाली’ को साथ-साथ पढ़ते हुए लिखा था। हाली द्वारा लिखी गईं पहले और दूसरे संस्करणों की भूमिकाओं का लिप्यन्तरण भी इसमें शामिल है।
Ghadi Do Ghadi
- Author Name:
Basant Tripathi
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बसंत त्रिपाठी संभावनाओं की कविता लिखते हैं—वह अपनी समकालीनता के अनुवादक नहीं, उसके मर्माहत निर्वचक हैं। उनकी कविता अपने को खोजने की कविता है। इस खोज में क्या वह अपने को पा लेते हैं? दरअस्ल, अपने को खोने और पाने का यह असमंजस उनकी कविता का केन्द्रीय स्वर है। और, अपने को पाना अन्तस के किसी अमूर्तन को नहीं एक ज़िम्मेदार नागरिक नैतिकता को आयत्त करना है। अपने को खोजने वाली इस कविता में गहनता और मार्मिकता ऐसी है कि कविता अतिक्रमण और अतिलंघन से बची रहती है। बसन्त त्रिपाठी कविता की एक लम्बी यात्रा पूरी कर चुके हैं। इसके बावजूद उनकी कविता में महत्त्वाकांक्षा की अतिशयता और अतिरिक्तता नहीं है। महत्त्वाकांक्षा नहीं, यह आकांक्षा से भरी कविता है। एषणा, प्रेम और फूलों, बादलों, शामों और उसके तमाम तरह के रंगों, हवाओं, पक्षियों, उनके कलरवों, जल और उसकी तरह-तरह की आवाज़ों से बनी उनकी कई कविताओं में प्रकृति मनुष्य के अनन्य और अपरिहार्य कॉमरेड की तरह मौजूद है। मानवीय हताशा से ये कविताएँ बचती नहीं हैं लेकिन हैं ये कविताएँ मानवीय जिजीविषा के अन्यतम वृत्तान्त, जो अपनी मृदुलता और बाज़ दफ़ा गीतमयता में उपस्थित हैं, जिसकी अन्तर्लय है तो सूक्ष्म लेकिन बेहद आलोड़नकारी। कहना पड़ेगा कि बसंत त्रिपाठी उस उद्देश्य को जानना चाहते हैं जिसकी वजह से मनुष्य का अस्तित्व अर्थवान हो सकता है। अराजनीतिक होने का संभ्रम पैदा करने वाली ये कविताएँ अपने विन्यास, मंतव्य और विधान में एक उन्नायक मानवीयता को पाने की कविताएँ हैं। किसी चिन्तित अकेलेपन से निकलती ये कविताएँ जनक्षेत्र और समूह के दुख और जिजीविषा की आदिमता और आधुनिकता को एक साथ अनुभूत और अभिव्यक्त करती हैं।
—देवी प्रसाद मिश्र
Gitanjali
- Author Name:
Rabindranath Thakur
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- Description: गीतांजलि’ महान् रचनाकार नोबल पुरस्कार विजेता कवींद्र रवींद्रनाथ टैगोर का प्रसिद्ध महाकाव्य है। एक शताब्दी पूर्व जब इसकी रचना हुई, तब भी यह एक महाकाव्य था और एक शताब्दी के बाद भी यह महाकाव्य है तथा आनेवाली शताब्दियों में भी यह एक महाकाव्य ही रहेगा। इस महाकाव्य की उपयुक्तता तब तक रहेगी जब तक मानव सभ्यता जीवित है। उन्नीसवीं सदी में विश्व साहित्य के क्षेत्र में भारतीयों की पहचान इस महाकाव्य के माध्यम से हुई। यह महाकाव्य हर भारतीय की अनुभूतियों से अंतरंग रूप से जुड़ा है। यह अपने आप में एक अनूठा महाकाव्य है, जो साधारण व्यक्ति से लेकर प्रकांड विद्वान् के लिए समान रूप से प्रेरणादायी है। इस काव्य की रचना न किसी विशेष समाज, प्रांत या देश विशेष के लिए है। यह महाकाव्य मानव संस्कृति एवं सभ्यता के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा। किसी महाकाव्य का अनुवाद दूसरी भाषा में करना तथा उसी भाषा में उसका शाब्दिक अर्थ मात्र करना काफी नहीं होता। अनुवाद से पूर्व यह आवश्यक है कि उस महाकाव्य में अंतर्निहित भावों को समझकर सम्यक् रूप में उसका मंथन किया जाए। गीतांजलि, जिसका अनुवाद विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं एवं सभी भारतीय भाषाओं में हो चुका है, ऐसे महाकाव्य का फिर से अनुवाद करने का साहस जुटाना अपने आप में अत्यंत प्रशंसनीय कार्य है।
Zameen Par Chand
- Author Name:
Hira Lal Mishr
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