Janos Arany : Kathageet evam Kavitayen

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हंगरी में उस समय एक संघर्ष चला जिसके अन्तर्गत हंगेरियन संस्कृति एवं साहित्य की स्वायत्त और जीवन्त सांस्कृतिक जड़ों का महत्त्व प्रस्तुत किया गया। इन प्रयासों में हंगेरियन राष्ट्रीय अभिजात वर्ग की भूमिका अहम रही। राष्ट्रीय आदर्श यानोश आरन्य और पैतोफ़ि के कार्यों में प्रकट थे। राष्ट्रीय आभिजात्यवाद, मौखिक परम्परा और साहित्यिक कार्य में जनता, किसान और अन्य सामाजिक समूहों को शामिल किया गया। ये अठारहवीं शताब्दी में शुरू हुआ और पैतोफ़ि और यानोश आरन्य के कार्यों में प्रभावशील रहा। पचास, साठ और सत्तर के दशक में पाल ज्युलोई (1826-1909) किश्फालुदी साहित्यिक संस्था के अध्यक्ष थे और बुडापेस्ट विश्वविद्यालय के प्राध्यापक रहे। पैतोफ़ि की मृत्यु के बाद पचास, साठ और सत्तर के दशक में राष्ट्रीय आभिजात्यवाद के प्रस्तुत होने के बाद आरन्य की कविताओं में परिपक्वता आई जोकि उनकी लघु कविताओं और अनुवाद-कार्य में दृष्टिगोचर होती है।</p> <p>नाज्यकोरोश में स्थायी कार्य मिलने से पूर्व उन्हें तिसा परिवार में अध्यापन का कार्य मिला।</p> <p>इस संग्रह में संकलित अधिकतर कविताएँ पचास के दशक में रची गई थीं मसलन ‘करार’, ‘मूँछ’ और ‘वो भी क्या दिन थे’; हालाँकि ‘विद्वान की बिल्ली’ कविता का रचनाकाल सन् 1847 है।</p> <p>स्वतंत्रता-संग्राम की विफलता के बाद हंगेरियन साहित्यकारों ने काव्य-अभिव्यक्ति के नए रूपों की तलाश की। यह तलाश राष्ट्रीय आभिजात्यवाद के लिए भी महत्त्वपूर्ण थी जिसके तहत हंगेरियन पारिवारिक हालात को एक आदर्श रूप में दर्शाया गया। 'घरेलू गुफ़्तगू' कविता इसका एक उदाहरण है।

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हंगरी में उस समय एक संघर्ष चला जिसके अन्तर्गत हंगेरियन संस्कृति एवं साहित्य की स्वायत्त और जीवन्त सांस्कृतिक जड़ों का महत्त्व प्रस्तुत किया गया। इन प्रयासों में हंगेरियन राष्ट्रीय अभिजात वर्ग की भूमिका अहम रही। राष्ट्रीय आदर्श यानोश आरन्य और पैतोफ़ि के कार्यों में प्रकट थे। राष्ट्रीय आभिजात्यवाद, मौखिक परम्परा और साहित्यिक कार्य में जनता, किसान और अन्य सामाजिक समूहों को शामिल किया गया। ये अठारहवीं शताब्दी में शुरू हुआ और पैतोफ़ि और यानोश आरन्य के कार्यों में प्रभावशील रहा। पचास, साठ और सत्तर के दशक में पाल ज्युलोई (1826-1909) किश्फालुदी साहित्यिक संस्था के अध्यक्ष थे और बुडापेस्ट विश्वविद्यालय के प्राध्यापक रहे। पैतोफ़ि की मृत्यु के बाद पचास, साठ और सत्तर के दशक में राष्ट्रीय आभिजात्यवाद के प्रस्तुत होने के बाद आरन्य की कविताओं में परिपक्वता आई जोकि उनकी लघु कविताओं और अनुवाद-कार्य में दृष्टिगोचर होती है।</p>
<p>नाज्यकोरोश में स्थायी कार्य मिलने से पूर्व उन्हें तिसा परिवार में अध्यापन का कार्य मिला।</p>
<p>इस संग्रह में संकलित अधिकतर कविताएँ पचास के दशक में रची गई थीं मसलन ‘करार’, ‘मूँछ’ और ‘वो भी क्या दिन थे’; हालाँकि ‘विद्वान की बिल्ली’ कविता का रचनाकाल सन् 1847 है।</p>
<p>स्वतंत्रता-संग्राम की विफलता के बाद हंगेरियन साहित्यकारों ने काव्य-अभिव्यक्ति के नए रूपों की तलाश की। यह तलाश राष्ट्रीय आभिजात्यवाद के लिए भी महत्त्वपूर्ण थी जिसके तहत हंगेरियन पारिवारिक हालात को एक आदर्श रूप में दर्शाया गया। 'घरेलू गुफ़्तगू' कविता इसका एक उदाहरण है।

Book Details

  • ISBN
    9789387462182
  • Pages
    104
  • Avg Reading Time
    3 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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