Kusma-Salhes aa Anya Chhao Got Natak
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कुसुमा-सलहेस आ अन्य छह गोट नाटक लगभग पैंतालीस वर्ष सँ निर्देशक रूप मे आ तीस वर्ष सँ नाट्यकार रूप मे मैथिली रंगमंच सँ जुड़ल कुणाल एक टा प्रयोगधर्मी नाटककार रूप मे जानल-मानल नाम छथि। हिनक अनेक नाटकक अनेक सराहनीय प्रदर्शन भेल अछि। मुदा पुस्तकाकार मैथिली मे हिनक पहिल नाट्य-पुस्तक यैह छनि, जखन कि ओ सत्तरि वर्षक भेलाह अछि। एहि पुस्तक मे कुणालक सात गोट पूर्णकालिक मौलिक नाटक संग्रहित अछि। पहिल नाटक 'चालीस चोर आ गोनू झा उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा' अछि जे 'भंगिमा' मे छपल छल, बाकी छओ गोट नाटक 'विदापत', 'कुसुमा-सलहेस', 'प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय', 'विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह', 'प्रेमक विस्तार उर्फ श्वेताक आविष्कार' आ 'प्रेमक परीक्षा उर्फ सुप्रभा आ अष्टावक्र' नाटक 'अंतिका' मे 2003 सँ 2014क बीच छपल। '...उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा' मे अपना ठाम प्रचलित गोनू झाक खिस्साक रचनात्मक उपयोग करैत नाट्यकार अतीतक कथा कहैतो वर्तमान मे छथि। 'विदापत' नाटक कुलीन समाज सँ अलग साधारण लोक-मानस मे कवि विद्यापतिक पहिचान आ महत्त्व केँ प्रभावी ढंग सँ रखैत अछि। 'कुसुमा-सलहेस' दलित समाजक एक टा सर्व-स्वीकृत योद्धा नायकक वीरताक संग-संग प्रेमक अद्भुत आख्यान अछि, जकर ई नाट्य-रचना हरदम मन रहैवला अछि। शेष चारि गोट सुखांत नाटक पौराणिक आख्यान पर आधारित अछि, मुदा ई चारो स्त्रीक छवि आ वैचारिक आदर्शक जे रूप प्रदर्शित करैत अछि ओ एकरा समकालीन बनबैत अछि। सं —गौरीनाथ
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कुसुमा-सलहेस आ अन्य छह गोट नाटक लगभग पैंतालीस वर्ष सँ निर्देशक रूप मे आ तीस वर्ष सँ नाट्यकार रूप मे मैथिली रंगमंच सँ जुड़ल कुणाल एक टा प्रयोगधर्मी नाटककार रूप मे जानल-मानल नाम छथि। हिनक अनेक नाटकक अनेक सराहनीय प्रदर्शन भेल अछि। मुदा पुस्तकाकार मैथिली मे हिनक पहिल नाट्य-पुस्तक यैह छनि, जखन कि ओ सत्तरि वर्षक भेलाह अछि। एहि पुस्तक मे कुणालक सात गोट पूर्णकालिक मौलिक नाटक संग्रहित अछि। पहिल नाटक 'चालीस चोर आ गोनू झा उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा' अछि जे 'भंगिमा' मे छपल छल, बाकी छओ गोट नाटक 'विदापत', 'कुसुमा-सलहेस', 'प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय', 'विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह', 'प्रेमक विस्तार उर्फ श्वेताक आविष्कार' आ 'प्रेमक परीक्षा उर्फ सुप्रभा आ अष्टावक्र' नाटक 'अंतिका' मे 2003 सँ 2014क बीच छपल। '...उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा' मे अपना ठाम प्रचलित गोनू झाक खिस्साक रचनात्मक उपयोग करैत नाट्यकार अतीतक कथा कहैतो वर्तमान मे छथि। 'विदापत' नाटक कुलीन समाज सँ अलग साधारण लोक-मानस मे कवि विद्यापतिक पहिचान आ महत्त्व केँ प्रभावी ढंग सँ रखैत अछि। 'कुसुमा-सलहेस' दलित समाजक एक टा सर्व-स्वीकृत योद्धा नायकक वीरताक संग-संग प्रेमक अद्भुत आख्यान अछि, जकर ई नाट्य-रचना हरदम मन रहैवला अछि। शेष चारि गोट सुखांत नाटक पौराणिक आख्यान पर आधारित अछि, मुदा ई चारो स्त्रीक छवि आ वैचारिक आदर्शक जे रूप प्रदर्शित करैत अछि ओ एकरा समकालीन बनबैत अछि। सं —गौरीनाथ
Book Details
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ISBN9789388799775
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Pages288
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Avg Reading Time10 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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स्वाधीनता प्राप्ति के बाद हमारे देश में उपजी एक ज्वलन्त समस्या है मानवमूल्य-संक्रमण। डॉ. ज्योतीश्वर मिश्र ने स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटकों में दर्शित इस मूल्य-संक्रमण का गम्भीर और प्रामाणिक विवेचन ग्रन्थ में किया है। इसमें स्वतंत्रता के बाद लिखे गए लगभग सौ नाटकों को उपयुक्त उद्धरणों सहित सन्दर्भित किया गया है। स्पष्ट है कि अध्ययन कुछ इने-गिने चर्चित नाटकों तक ही सीमित नहीं रहा। यह लेखक की श्रमशीलता का तथा ग्रंथ की विवेचन-पद्धति उसकी प्रौढ़ दृष्टि का स्पष्ट परिचय देती है। नाटकों के कथ्य तथा शिल्प पर लेखक द्वारा की गई टिप्पणियाँ बहुत ही सार्थक एवं व्यंजक हैं। ग्रंथ की भाषा विषयवस्तु के सर्वथा अनुरूप, प्रभावशाली तथा प्रवाहपूर्ण है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि साहित्य और समाजशास्त्र दोनों विषयों के अध्येता इस ग्रंथ से बहुत लाभान्वित होंगे।
—प्रोफ़ेसर मोहन अवस्थी
Tughalaq
- Author Name:
Girish Karnad
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मोहम्मद तुग़लक चारित्रिक विरोधाभास में जीनेवाला एक ऐसा बादशाह था जिसे इतिहासकारों ने उसकी सनकों के लिए ख़ब्ती करार दिया। जिसने अपनी सनक के कारण राजधानी बदली और ताँबे के सिक्के का मूल्य चाँदी के सिक्के के बराबर कर दिया। लेकिन अपने चारों ओर कट्टर मज़हबी दीवारों से घिरा तुग़लक कुछ और भी था। उसने मज़हब से परे इंसान की तलाश की थी। हिंदू और मुसलमान दोनों उसकी नज़र में एक थे। तत्कालीन मानसिकता ने तुग़लक की इस मान्यता को अस्वीकार कर दिया और यही ‘अस्वीकार’ तुग़लक के सिर पर सनकों का भूत बनकर सवार हो गया। नाटक का कथानक मात्र तुग़लक के गुण-दोषों तक ही सीमित नहीं है। इसमें उस समय की परिस्थितियों और तज्जनित भावनाओं को भी अभिव्यक्त किया गया है, जिनके कारण उस समय के आदमी का चिंतन बौना हो गया था और मज़हब तथा सियासत के टकराव में हरेक केवल अपना उल्लू सीधा करना चाहता है। 3 अप्रैल, 1983, हिंदुस्तान, नयी दिल्ली
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