Rajdarshan
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“कितने ही राजा तो पिशाच होते हैं। अब एक पिशाच ही राजा हो गया तो क्या बिगड़ जाएगा? सुनिए कुमार, सुनिए रानी माँ! देश के चारों ओर विद्रोह की आग धधक रही है। वृषल की ताक़त दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही है। ऐसी हालत में यदि यह बात फैल गई कि हमारे राजा जाली राजा हैं तो वह आग भक् से दावानल बन जाएगी। नन्दवंशियों का सिंहासन विद्रोहियों के पेट में चला जाएगा। आप लोग सोचकर देखिए, क्या उससे अच्छा यह न होगा कि इस पिशाच को ही हम लोग और शक्तिशाली बनाएँ? पिशाच के कन्धों पर धनुष रखकर विद्रोहियों का नाश करें? सिंहासन का बड़ा शत्रु कौन है कुमार—पिशाच या वृषल?’’</p> <p>—इसी पुस्तक से
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“कितने ही राजा तो पिशाच होते हैं। अब एक पिशाच ही राजा हो गया तो क्या बिगड़ जाएगा? सुनिए कुमार, सुनिए रानी माँ! देश के चारों ओर विद्रोह की आग धधक रही है। वृषल की ताक़त दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही है। ऐसी हालत में यदि यह बात फैल गई कि हमारे राजा जाली राजा हैं तो वह आग भक् से दावानल बन जाएगी। नन्दवंशियों का सिंहासन विद्रोहियों के पेट में चला जाएगा। आप लोग सोचकर देखिए, क्या उससे अच्छा यह न होगा कि इस पिशाच को ही हम लोग और शक्तिशाली बनाएँ? पिशाच के कन्धों पर धनुष रखकर विद्रोहियों का नाश करें? सिंहासन का बड़ा शत्रु कौन है कुमार—पिशाच या वृषल?’’</p>
<p>—इसी पुस्तक से
Book Details
-
ISBN9788180311826
-
Pages111
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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नए नाटककारों की पीढ़ी में अभिषेक मजूमदार एक बहुचर्चित हस्ताक्षर हैं। वे मूलतः चरित्रों के नाटककार हैं। उनके नाटकों के पात्र अलग होते हुए भी अपनी अभिज्ञता में परिपूर्ण और तार्किक स्तर पर जागरूक होते हैं। चरित्रों को इस तरह माँजने की यह क्रिया कथानक में अपेक्षित नाटकीयता और द्वन्द्व पैदा करती है। अभिषेक के नाटकों के विषय और कथानक क्लासिक लेखन की परम्परा से प्रेरित हैं। इनमें एक निर्दिष्ट आरम्भ, मध्य और समापन होता है। बावजूद इसके, उनके नाटकों में जिन्न, भूत, दर्शक, आलोचक, नट जैसे 'बाहरी चरित्र' भी रहस्य न पैदा करते हुए नाटक को देखने-समझने में पाठक की मदद करते हैं। इस संकलन में शामिल नाटक ‘कौमुदी’ में वे नाटक के भीतर नाटक खेलते हुए गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र, और पुराने-नए के बीच के द्वन्द्वों की पड़ताल करते हैं। ‘मुक्तिधाम’ बौद्ध धर्म के उदयकाल की पुनर्रचना करता हुआ हिन्दू उग्रवाद की जड़ों का विनिर्माण करता है। वहीं ‘ईदगाह के जिन्नात’ में अभिषेक कश्मीर की हताशा को भाई-बहन, डॉक्टर-मरीज़, और यथार्थ-फन्तासी के बीच के सम्बन्धों के माध्यम से जाँचते-परखते हैं। ‘कौमुदी’ नाटक को कला और वाणिज्य के रूप में देखने के अलग-अलग आग्रहों, और नाटक और उसके दर्शकों के बीच के द्वन्द्वों का एक ‘मेटा प्ले’ बनकर हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है। इसका कारण यह भी है कि नाटक के मुख्य द्वन्द्व का समाधान नाटक के भीतर चल रहे नाटक में होता है, जिसका मैनेजर मूल नाटक का एक महत्त्वपूर्ण पात्र भी है। ‘ईदगाह के जिन्नात’ उनका अत्यन्त चर्चित नाटक है जिसमें तुफ़ैल की मौत और उसके बाद कश्मीर के युवाओं में फैला आक्रोश, दोनों बातों की झलक देखने को मिलती है। ‘मुक्तिधाम’ के ज़रिये नाटककार एक ऐसी विराट राजनीतिक घटना की ओर देखता है जिसकी लम्बी छाया काफ़ी दूर तक भविष्य पर अँधेरा करती है। नाटक का काल और स्थान अतीत में कहीं दबा हुआ है, लेकिन नाटक की घटनाएँ और द्वन्द्व आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। शायद इसी छाया की डोर पकड़कर अभिषेक अतीत में जाकर हिन्दू उग्रवाद की जड़ों का अनुसन्धान करते हैं। इन नाटकों को पढ़ना भी उतना ही रुचिकर है जितना इन्हें मंच पर घटित होते देखना।
Aas-Pados
- Author Name:
Gulzar
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यह ‘आस-पड़ोस’फ़िल्मकार, गीतकार, शायर और कहानीकार गुलज़ार के तीन ड्रामों से मिलकर बना-बसा है। गुलज़ार जिस तरह अल्फ़ाज़ से मनचाहा काम लेते हैं, उसी तरह उन्होंने ‘आस-पड़ोस’में फॉर्म्स को नई शक्ल दी है। लेकिन यह बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है वह जो इन ड्रामों में कही गई है, बल्कि बहुत सारी बातें। ‘ख़राशें’का सब्जेक्ट दंगे और उनके बीच जीता-लड़ता-मरता-भागता आम आदमी है, और हिन्दू-मुसलमान, भारत-पाकिस्तान होने की उसकी उलझनें हैं जिन्हें सियासत बीच-बीच में कठिन से कठिनतर करती जाती है। ‘लकीरें’उन्हीं सरहदों के बारे में है जो हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बीच खींची गई हैं। वे लकीरें जिन्हें अवाम के दिलों ने अब तक भी पूरी तरह क़ुबूल नहीं किया, लेकिन सरकारें उन्हीं से अपने कितने काम साधती रहती हैं! ‘अठन्नियाँ’में हमारी मुलाक़ात शहर मुम्बई और उसके तारीक हाशियों में ज़िन्दगी की जंग लड़ते लोगों से होती है। कहानियों और नज़्मों की इस बस्ती में दु:खों की भीड़ी-सीलीं गलियाँ भी हैं, और इनसान के हौसलों और ज़िन्दा रहने की ज़िदों का खुला बहुरंगी आसमान भी है। घने अहसास और हमारे दौर की एक पकी हुई क़लम से उतरी इस बस्ती से आप बार-बार गुज़रना चाहेंगे जिसका ख़ाका कहानियाँ खींचती हैं और उस ख़ाके को साँस की गर्मी और आँखों की नमी देने का काम नज़्में करती हैं।
Gagan Damama Bajyo
- Author Name:
Piyush Mishra
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इस नाटक के लिए दिल्ली के प्रसिद्ध ‘एक्ट-वन नाट्य समूह’ और ख़ुद पीयूष मिश्रा ने इतना शोध और परिश्रम किया था कि भगतसिंह पर इतिहास की कोई पुस्तक बन जाती, लेकिन उन्हें नाटक लिखना था जिसकी अपनी संरचना होती है, सो उन्होंने नाटक लिखा जिसने हमारे मूर्तिपूजक मन के लिए भगतसिंह की एक अलग महसूस की जा सकनेवाली छवि पेश की। सुखदेव से एक न समझ में आनेवाली मित्रता में बँधे भगतसिंह, पंडित आज़ाद के प्रति एक लाड़-भरे सम्मान से ओत-प्रोत भगतसिंह, महात्मा गांधी से नाइत्तफ़ाक़ी रखते हुए भी उनके लिए एक ख़ास नज़रिया रखनेवाले भगतसिंह, नास्तिक होते हुए भी गीता और विवेकानन्द में आस्था रखनेवाले भगतसिंह, माँ-बाप और परिवार से अपने असीम मोह को एक स्थितप्रज्ञ फ़ासले से देखनेवाले भगतसिंह, पढ़ाकू, जुझारू, ख़ूबसूरत, शान्त, हँसोड़, इंटेलेक्चुअल, युगद्रष्टा, दुस्साहसी और...प्रेमी भगतसिंह। यह नाटक हमारे उस नायक को एक जीवित-स्पन्दित रूप में हमारे सामने वापस लाता है जिसे हमने इतना रूढ़ कर दिया कि उनके विचारों के धुर दुश्मन तक आज उनकी छवि का राजनीतिक इस्तेमाल करने में कोई असुविधा महसूस नहीं करते। यह नाटक पढ़ें, और जब खेला जाए, देखने जाएँ और अपने पढ़े के अनुभव का मिलान मंच से करें। नाटक के साथ इस जिल्द में निर्देशक एन.के. शर्मा की टिप्पणी भी है, और पीयूष मिश्रा का शफ़्फ़ाफ़ पानी जैसे गद्य में लिखा एक ख़ूबसूरत आलेख भी, और साथ में भगतसिंह की लिखी कुछ बार-बार पठनीय सामग्री भी।
Maile Hath
- Author Name:
Jean Paul Sartre
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पार्टी की विचारधारा से ‘भटके’ पार्टी प्रमुख के सचिव के तौर पर काम करने और उसे गोली से उड़ाने की ज़िम्मेदारी युवा पार्टी कार्यकर्ता ह्यूगो के कन्धों पर डाली जाती है। वो इस काम को अंजाम भी दे देता है...लेकिन क्या उसने उस राजनीतिक क़त्ल को एक आवेगी अपराध के जामे में छुपाया है? इस सवाल का जवाब तब साफ़ होता है जब दो साल की सज़ा काटकर, जेल से छूटने के बाद, वो अपने पुराने साथियों और ख़ुद अपने-आप से, इस कत्ल को करने के अपने वास्तविक उद्देश्यों का खुलासा करने की कोशिश करता है।
The Listner के शब्दों में ‘ज्याँ पॉल सार्त्र आज दुनिया के सबसे चर्चित लेखक हैं’ और ये उनका सबसे चर्चित नाटक। सर्वप्रथम पेरिस में सन् 1948 में मंचित यह नाटक साम्यवाद की मानसिकता और तौर-तरीक़ों की एक बेहतरीन (क्लासिक) विवेचना करता है।
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