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Dharti Aaba

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...“इतने दिन बीत गए और मैं आज तक मुंडाओं को उनका राज नहीं दिला सका। गुलामी का अँधेरा उनके ऊपर पहले की तरह ही छाया हुआ है। ...पर कुछ दरवाज़े तो खुले हैं।...थोड़ी उजास तो आ रही है। मैंने उनके कई बन्धनों को खोल दिया है। अब वे असुरों की पूजा नहीं करते। अब वे प्रेतों से नहीं डरते। अब उन्होंने पहानों-ओझाओं को भेंट चढ़ाना बन्द कर दिया है।...पर मैंने यह कैसी राह चुन ली। इतनी कठिन राह! क्या वे सब इस राह पर चल सकेंगे? जानता हूँ मैं, यह एक कठिन राह है। जब पैर बढ़ाओ, तब काँटे। पर यही एक राह है जिस पर चलकर मुंडा गोरे साहबों के डर और पकड़ से आज़ाद हो सकते हैं। यह जो कुछ हो रहा है, क्या यह सब मैं कर रहा हूँ? नहीं, मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता।...मैं तो बस उनकी साँसों में...उनके मन में,...उनकी आत्माओं में...उनकी नसों में एक तेज़ तूफ़ान की तरह रहना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे अपना पिता कहा और मैंने उनका पिता बनना स्वीकार किया। वे ग़ुलामी के बन्धन से छूटना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें भरोसा चाहिए, और उन्होंने उस भरोसे को मेरे भीतर पाया।...उन्हें एक भगवान चाहिए, वे धर्म के बिना न तो जी सकते हैं और न ही मर सकते हैं। जनम-जनम से वे सिंबोङा को पूजते रहे, पर सिंबोङा ने उनकी सुधि नहीं ली। मेरे ऊपर उनके भरोसे ने उन्हें मेरे भीतर भगवान दिखाया। उन्होंने मुझे अपना भगवान माना और मुझे उनका भगवान बनना पड़ा। क्या करता मैं? उनके भरोसे को कैसे तोड़ता? मैं जानता हूँ दिकुओं, ज़मींदारों, साहेबों की ताक़त को। पर बिना लड़े कुछ नहीं हो सकता। हार के डर से लड़ने को रोका नहीं जा सकता। मैं जानता हूँ बन्दूक की ताक़त। मालूम है मुझे कि संथाल हूल में हारे, कोल, खरुआ और सरदार हारे, पर लड़ाई सिर्फ़ हार-जीत नहीं होती।...मुझे अपना अन्त मालूम है, पर मैं जानता हूँ कि उनकी जीत उनके भरोसे में ही छिपी है।...हाँ मैं आबा हूँ इस धरती का...भगवान हूँ मुंडाओं का...। मैंने मिशन में प्रभु यीशु की प्रशंसा में सुना था कि एक रोटी में उन्होंने हज़ारों-हज़ार लोगों की भूख मिटाई थी। आनन्द पांडे के घर सुना था कि भक्त प्रह्लाद के लिए भगवान ने सिंह का रूप धरा और खम्भा से निकलकर उसके मामा को मार डाला। मैं भी उन्हीं की तरह हूँ। लँगोटी पहने, तीर-धनुही लिये, भूखे पेट मुंडाओं को मैंने निडर किया है। आज हर मुंडा निडर है और दुनिया पर राज करनेवाले साहेबों के सामने छाती ताने खड़ा है।” —इसी पुस्तक से

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...“इतने दिन बीत गए और मैं आज तक मुंडाओं को उनका राज नहीं दिला सका। गुलामी का अँधेरा उनके ऊपर पहले की तरह ही छाया हुआ है। ...पर कुछ दरवाज़े तो खुले हैं।...थोड़ी उजास तो आ रही है। मैंने उनके कई बन्धनों को खोल दिया है। अब वे असुरों की पूजा नहीं करते। अब वे प्रेतों से नहीं डरते। अब उन्होंने पहानों-ओझाओं को भेंट चढ़ाना बन्द कर दिया है।...पर मैंने यह कैसी राह चुन ली। इतनी कठिन राह! क्या वे सब इस राह पर चल सकेंगे? जानता हूँ मैं, यह एक कठिन राह है। जब पैर बढ़ाओ, तब काँटे। पर यही एक राह है जिस पर चलकर मुंडा गोरे साहबों के डर और पकड़ से आज़ाद हो सकते हैं। यह जो कुछ हो रहा है, क्या यह सब मैं कर रहा हूँ? नहीं, मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता।...मैं तो बस उनकी साँसों में...उनके मन में,...उनकी आत्माओं में...उनकी नसों में एक तेज़ तूफ़ान की तरह रहना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे अपना पिता कहा और मैंने उनका पिता बनना स्वीकार किया। वे ग़ुलामी के बन्धन से छूटना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें भरोसा चाहिए, और उन्होंने उस भरोसे को मेरे भीतर पाया।...उन्हें एक भगवान चाहिए, वे धर्म के बिना न तो जी सकते हैं और न ही मर सकते हैं। जनम-जनम से वे सिंबोङा को पूजते रहे, पर सिंबोङा ने उनकी सुधि नहीं ली। मेरे ऊपर उनके भरोसे ने उन्हें मेरे भीतर भगवान दिखाया। उन्होंने मुझे अपना भगवान माना और मुझे उनका भगवान बनना पड़ा। क्या करता मैं? उनके भरोसे को कैसे तोड़ता? मैं जानता हूँ दिकुओं, ज़मींदारों, साहेबों की ताक़त को। पर बिना लड़े कुछ नहीं हो सकता। हार के डर से लड़ने को रोका नहीं जा सकता। मैं जानता हूँ बन्दूक की ताक़त। मालूम है मुझे कि संथाल हूल में हारे, कोल, खरुआ और सरदार हारे, पर लड़ाई सिर्फ़ हार-जीत नहीं होती।...मुझे अपना अन्त मालूम है, पर मैं जानता हूँ कि उनकी जीत उनके भरोसे में ही छिपी है।...हाँ मैं आबा हूँ इस धरती का...भगवान हूँ मुंडाओं का...। मैंने मिशन में प्रभु यीशु की प्रशंसा में सुना था कि एक रोटी में उन्होंने हज़ारों-हज़ार लोगों की भूख मिटाई थी। आनन्द पांडे के घर सुना था कि भक्त प्रह्लाद के लिए भगवान ने सिंह का रूप धरा और खम्भा से निकलकर उसके मामा को मार डाला। मैं भी उन्हीं की तरह हूँ। लँगोटी पहने, तीर-धनुही लिये, भूखे पेट मुंडाओं को मैंने निडर किया है। आज हर मुंडा निडर है और दुनिया पर राज करनेवाले साहेबों के सामने छाती ताने खड़ा है।”

—इसी पुस्तक से

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
3rd
Publication year
2010
Weight
120 grams
ISBN-13
9789388933407
Pages
96
Reading time
~1 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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