Rang Saptak
Author:
Kavalam Narayana PanickerPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Plays0 Ratings
Price: ₹ 320
₹
400
Available
‘रंग सप्तक’—पणिक्कर जी के बहुआयामी सात नाटकों का संकलन है। मान लीजिए उनके सात सुरों के समान सात मोतियों को एक धागे में पिरोकर, एक सरगम-धुन रूपी माला बनाने का प्रयास।</p>
<p>इसमें दो खंड हैं। खंड-1 में मूलत: संस्कृत के महान नाटकों के चयनित अंशों को आधार बनाकर पुनर्रचित नाट्यालेखों का समावेश किया गया है। इसकी पुनर्रचना में पणिक्कर जी और नाट्य-लेखक दोनों का सम्मिलित योगदान है। इस खंड में स्वप्नकथा, उत्तररामचरितम् एवं माया समाविष्ट हैं। खंड-2 में पणिक्कर जी के मौलिक, मलयालम में रचित नाटकों के हिन्दी अनुवादों का समावेश किया गया है। इसमें 'तैया-तैयम', 'कलिवेषम्', 'अपना-अपना कडम्बा' एवं 'स्थित है सूर्य' समाविष्ट हैं।</p>
<p>पणिक्कर जी के नाटकों में मिथकों, धार्मिक अनुष्ठानों, पारम्परिक एवं लोककथाओं और सामाजिक-राजनैतिक भूमिकाओं का पुनर्व्याख्यान, पुनरोद्धार एवं रूपान्तरण होता है, जो अपने वर्तमान को भूतकाल के माध्यम से खोजने का एक नितान्त मौलिक संसाधन बनता है। पणिक्कर जी इन भूमिकाओं का, परम्परा से लेकर आधुनिक विस्फोटक संक्रमणों पर सटीक टिप्पणी करने के लिए तत्पर रहते हैं। साथ ही वह इन भूमिकाओं के ज़रिए समाज में हो रही घटनाओं के बारे में प्रश्न उठाते हैं, जिसे विशिष्ट वातावरण में प्रस्तुत करके बहुआयामी नाट्यालोक (वैश्विक नाट्य) का परिचय देते हैं, किन्तु अन्तत: नैतिक उत्तर खोजने के लिए दर्शक को उत्प्रेरित कर देते हैं।</p>
<p>पणिक्कर जी की रंग-यात्रा कविता से रंगमंच तक और रंगमंच से कविता तक की एक अन्तर्यात्रा है। वह अपने नाटकों को सही मायने में दृश्यकाव्य के रूप में ढालते हैं। वे अपने गाँव के निजी अनुभवों को काव्यात्मक बनाकर, नाटक के माध्यम से विषयानुरूप दृश्यात्मकता प्रदान कर सौन्दर्यमूलक बनाते हैं। मान लो कि गाँव ही पूर्ण रूप से उनकी रंग-यात्रा का प्रमुख गोमुख है।
ISBN: 9788126725151
Pages: 180
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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सच की बेहतरीन नाट्य-प्रस्तुति।
–‘सन्डे गार्डियन’
‘बर्फ़’ जितना भयानक है उतना ही मानवीय भी है। सौरभ ने एक पतली रस्सी पर चलने जैसा ख़तरनाक काम किया है, जिसमे वे पूरी तरह सफल हुए हैं। रंगमंच की दुनिया का यह चकित करनेवाला काम है।
–सुधीर मिश्रा
Wah Re Govinda Wah
- Author Name:
Dinesh Sahu
- Book Type:

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Description:
प्रस्तुत नाट्य शृंखला समाज के विभिन्न किरदारों को माध्यम बनाकर समाज के अमानवीय कृत्यों को उजागर कर यथार्थ को परदे के सामने लाती है। साथ ही जहाँ नाटक ‘वाह रे गोविन्दा वाह में’, मर्द दिवस की गुदगुदाने वाली परिकल्पना से पाठक और दर्शकों का जमकर मनोरंजन करती है वहीं ‘मैं इकबाल’ नाटक की रचना समाज के दिग्भ्रमित युवाओं को सच्ची और उजियारी राह पर लाने के लिए मशाल का काम करती है। नाटक की विषयवस्तु में किसी तरह का पांडित्य प्रदर्शन नहीं बल्कि अनछुए विषयों को बड़ी ही रोचकता के साथ स्पर्श किया गया है।
नाटक के हर दृश्य को मंच पर बड़ी सुगमता से दर्शाया जा सकता है। इसमें सन्देह नहीं। एक में हास्य रस की चाशनी है तो दूसरे में यथार्थ का कड़ुवा घूँट...।
Son Sagar
- Author Name:
Habib Tanvir
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- Description: सोन सागर को हबीब तनवीर ने सन् 1981 में श्रीराम सेंटर, नई दिल्ली में प्रस्तुत किया था। इस नाटक की नायिका चन्दा एक सशक्त महिला चरित्र के रूप में सामने आती है। वह जीवनसाथी स्वयं चुनने के अधिकार की बात उठाकर एक खुली सोच का उदाहरण रखती है। यह नाटक मूलकथा लोरिक और चन्दा की प्रेम-कहानी है जो छत्तीसगढ़ में ‘चन्दैनी’ और बिहार में ‘लोरिकायन’ के नाम से प्रसिद्ध है। मूलत: एक ही कथा होने के बावजूद अलग-अलग क्षेत्रों में इसके भिन्न-भिन्न रूप मिलते हैं। नाटक में ढालने के लिए मूल कथा में रचनात्मक बदलाव किया गया। कथा एवं चरित्रों के कुछ खास पक्षों पर जोर देकर इसे समकालीन परिप्रेक्ष्य प्रदान करने के लिए इसमें गीत रखे गए। वस्तुत: गीतों में टिप्पणी के जरिये यह काम किया गया। नाटक में कहानी के ग्राम्य तत्वों को प्रमुखता दी गई है तथा कहानी के अलौकिक पक्ष को छोड़ दिया गया है। कुछेक गीतों की धुनें तो चन्दैनी की पारम्परिक धुनों पर ही आधारित हैं।
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