Uttar Aadhunikta Aur Samkalin Katha-Sahitya
(0)
Author:
Lakshmi GautamPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
500
400 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
यह पुस्तक ‘उत्तर-आधुनिकता व समकालीनता बोध’ को भारतीय सन्दर्भ में प्रस्तुत करने का मौलिक प्रयास है। मौलिक इस दृष्टि में, क्योंकि यह विमर्श का विखंडनवादी स्वर लेकर उपस्थित होता है जो केन्द्र व हाशिया दोनों की स्थिति को एक साथ लेकर चलता है, जिसमें टकराहट की त्रासदी से उत्पन्न परिस्थितियों की निर्मिति है। यहाँ ‘महाआख्यानों के अन्त’ के साथ, नवीन लघुता बोध व हाशिए का केन्द्रवर्ती स्वर ही प्रमुखता प्राप्त करता है। इस कृति का मूल मन्तव्य यही रहा है कि हिन्दी जगत आयातित उत्तर-आधुनिक चिन्तन से बचते हुए भारतीय परिदृश्य में उत्तर-आधुनिकता को किसी पूर्वग्रह से मुक्त हो ‘स्वतंत्र विमर्श’ के रूप में उपस्थित करता है।
Read moreAbout the Book
यह पुस्तक ‘उत्तर-आधुनिकता व समकालीनता बोध’ को भारतीय सन्दर्भ में प्रस्तुत करने का मौलिक प्रयास है। मौलिक इस दृष्टि में, क्योंकि यह विमर्श का विखंडनवादी स्वर लेकर उपस्थित होता है जो केन्द्र व हाशिया दोनों की स्थिति को एक साथ लेकर चलता है, जिसमें टकराहट की त्रासदी से उत्पन्न परिस्थितियों की निर्मिति है। यहाँ ‘महाआख्यानों के अन्त’ के साथ, नवीन लघुता बोध व हाशिए का केन्द्रवर्ती स्वर ही प्रमुखता प्राप्त करता है। इस कृति का मूल मन्तव्य यही रहा है कि हिन्दी जगत आयातित उत्तर-आधुनिक चिन्तन से बचते हुए भारतीय परिदृश्य में उत्तर-आधुनिकता को किसी पूर्वग्रह से मुक्त हो ‘स्वतंत्र विमर्श’ के रूप में उपस्थित करता है।
Book Details
-
ISBN9788180317989
-
Pages191
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Bisvin Shatabdi Ka Hindi Sahitya
- Author Name:
Vijay Mohan Singh
- Book Type:

-
Description:
‘बीसवीं शताब्दी का हिन्दी साहित्य’ विजयमोहन सिंह की नवीनतम समीक्षा-कृति है। लगभग ढाई सौ पृष्ठों के अपने सीमित आकार में, एक पूरी सदी के साहित्य की पड़ताल करने वाली यह एक ऐसी किताब है, जिसे एक सर्जक-आलोचक के सुदीर्घ अध्ययन तथा मनन का परिपाक कहा जा सकता है। पिछले कुछ समय से पश्चिम में और अपने यहाँ भी, साहित्येतिहास के लेखन की परम्परा कुछ ठहर-सी गई है—बल्कि कुछ हलकों में तो ऐसे लेखन की क्रमबद्ध पद्धति को सन्देह की दृष्टि से भी देखा गया है। ऐसी स्थिति में इस प्रश्न का उठना स्वाभाविक है कि इक्कीसवीं सदी के जिस बिन्दु पर हम खड़े हैं वहाँ साहित्य के विकास की प्रक्रिया को किस तरह देखा-परखा जाए या फिर उसकी पद्धति क्या हो? इस पुस्तक को पढ़ते हुए मेरे मन पर पहला प्रभाव यही पड़ा कि यह उसी प्रश्न के उत्तर की दिशा में की गई एक कोशिश है—शायद पहली मगर गम्भीर कोशिश।
अपनी भूमिका में लेखक ने ज़ोर देकर कहा है कि ‘इस पुस्तक को किसी भी अर्थ में इतिहास न माना जाए’— क्योंकि न तो यहाँ तिथियों का अंकगणित मिलेगा, न किसी तरह के फुटनोट, न ही पूर्वापर सम्बन्धों की क्रमिकता। यदि मिलेगी तो कुछ अलक्षित अन्तःसूत्रों की निशानदेही और कई बार कुछ स्थापित मान्यताओं के बरक्स कोई सर्वथा नया विचार और हाँ, वह नैतिक साहस भी जो किसी नए विचार की प्रस्तावना के लिए ज़रूरी होता है।
अनुभव पकी दृष्टि, गहरी सूझ-बूझ और विश्लेषणपरक पद्धति के साथ किया गया, पिछली सदी के साहित्य का यह पुनरवलोकन, साहित्य के अध्येताओं का ध्यान तो आकृष्ट करेगा ही—शायद कुछ प्रश्नों पर नए सिरे से सोचने के लिए उत्प्रेरित भी करे।
—केदारनाथ सिंह
Ramchandra Shukla
- Author Name:
Malayaj
- Book Type:

-
Description:
विस्मरण के इस हाहाकारी उत्सवी दौर में भुला दिए गए विलक्षण कवि-आलोचक मलयज और उनकी पुस्तक ‘रामचन्द्र शुक्ल’ की पुनर्प्रस्तुति का साहित्यिक और अकादमिक महत्त्व निर्विवाद है। मलयज की आलोचना पद्धति के कायल वे सब लोग हैं, जिन्होंने उनका लिखा कुछ भी पढ़ा है। भौतिक रूप से मिले छोटे से जीवन में मलयज ने सृजन के कई मानक स्थापित किए। यह पुस्तक भी अपने संक्षिप्त कलेवर में ही एक प्रतिमान की तरह है। मलयज ने एक अपूर्व आलोचक-चिन्तक के रूप में रामचन्द्र शुक्ल का जिस प्रकार मूल्यांकन किया है, उसका सानी कोई दूसरा नहीं है। यह अकारण नहीं है कि इस पुस्तक को सम्पादित करने वाले सुप्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने अपनी भूमिका का शीर्षक ही दिया था—मलयज की संघर्ष मीमांसा। मलयज रामचन्द्र शुक्ल की ‘रस-मीमांसा’ के बड़े प्रशंसक थे। उनकी अन्तर्दृष्टि मलयज की अन्तर्दृष्टि में उसी प्रकार घुली है जिस प्रकार दाल में नमक घुल जाता है। लेकिन यहाँ यह याद रखना ज़रूरी है कि दाल में नमक का बहुत महत्त्व है लेकिन वह पूरी दाल नहीं है। वह उसका एक घटक भर है। कहने की आवश्यकता नहीं कि रामचन्द्र शुक्ल के दाय को स्वीकार करते हुए मलयज ने नया बहुत कुछ जोड़ा और हिन्दी आलोचना को गहरी विश्वसनीयता भी दी। हिन्दी के युवा आलोचकों के लिए मलयज की विश्लेषण पद्धति और भाषा में सीखने के लिए बहुत कुछ है। उनकी आलोचना एक पाठशाला की तरह है।
—जितेन्द्र श्रीवास्तव
Philhal
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

-
Description:
पचास साल पहले प्रकाशित यह पुस्तक ऐसे समीक्षात्मक लेखों का संग्रह है, जिससे हिन्दी आलोचना में एक ‘रेडिकल चेंज’ आया, और आज भी इसका महत्त्व अपनी उल्लेखनीय भूमिका में बना हुआ है।
पुस्तक में शामिल अपने लेखों के बारे में अशोक वाजपेयी ने ख़ुद ‘दृश्यालेख’ में स्पष्ट किया है कि ये लेख ‘जब-तब लिखे गए हैं और इसलिए इनमें बहुत स्पष्ट तारतम्य नहीं है’। पर अपनी समग्रता में ये ‘उन खोजों और आग्रहों को’ उजागर करते हैं जो समकालीन कविता के मूल में हैं। युवा कविता के घटाटोप से बौखलाकर जब सिद्ध और प्रतिष्ठित समीक्षक आँख मींच बैठे हों, तब उस ढेर में से सही और सार्थक कविता की पहचान करने-कराने का अशोक वाजपेयी का यह प्रयत्न कल भी आत्यन्तिक महत्त्व रखता था, आज भी रखता है।
इस पुस्तक में अपने समय के युवा-लेखन की गड़बड़ियों और उनके स्रोतों को स्पष्ट करते हुए अशोक वाजपेयी अच्छे कवियों की रचना की मूल्यवत्ता को रेखांकित करने में सफल हुए हैं। वैज्ञानिक समझ और बेलाग सफ़ाई से उन्होंने काव्य-सृजन को परखा है और मुक्तिबोध, कमलेश, धूमिल आदि समकालीन कवियों की कविता की विशेषताओं को सही रोशनी में रखा है। अपने लेखन से उन्होंने समकालीन आलोचना को जो नई समझ और उसके लिए जो ज़रूरी मुहावरा दिया, उसके बल पर हम कह सकते हैं कि इस पुस्तक के प्रकाशन का हिन्दी समीक्षा पर ही नहीं, हिन्दी कविता पर भी गहरा प्रभाव पड़ा।
निस्सन्देह, आलोचना साहित्य में एक बहुमूल्य और विरल कृति का नाम है ‘फ़िलहाल’।
Ajneya Ke Samajik-Sanskritik Sarokar
- Author Name:
Dr. Krishna Dutt Paliwal
- Book Type:

- Description: सप्रसिद्ध आलोचक प्रो. कृष्णदत्त पालीवाल की नई पुस्तक के आलोचनात्मक निबंधों में अज्ञेय के रचनाकर्म को लेकर हिंदी आलोचना में हुई तमाम साहित्यिक, गैर-साहित्यिक बहसों और साहित्य की, राजनीति की चर्चा करते हुए उस पर तर्कसंगत प्रश्न उठाए गए हैं। अज्ञेय के साहित्यिक-सांस्कृतिक अवदान को उद्घाटित करते हुए स्थापित किया गया है कि अज्ञेय के सृजन-चिंतन से किस तरह हिंदी आलोचना में बहसों की शुरुआत हुई तथा समकालीन साहित्य-संवेदना और साहित्यिक परंपरा के अध्ययन-मूल्यांकन की नई आलोचना-संस्कृति का विकास हुआ। अज्ञेय के निबंधों, भूमिकाओं, स्मरण-लेखों, यात्रा-साहित्य तथा उनके द्वारा आयोजित व्याख्यानमालाओं और यात्रा शिविरों में लेखकों, विद्वानों, कला-मर्मज्ञों के व्याख्यानों का अंतर्पाठ करते हुए इस पुस्तक में दिखाया गया है कि किस प्रकार उन्होंने भारतीय समाज, हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति को औपनिवेशिक आधुनिकता से मुक्त कराने और भारतीय आधुनिकता को दिशा प्रदान करने का प्रयास किया। अज्ञेय-साहित्य के अध्येताओं के लिए एक पठनीय पुस्तक।
Nirala Aur Muktibodh : Chaar Lambi Kavitayen
- Author Name:
Nandkishore Naval
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी में लम्बी कविता का इतिहास नया नहीं है, भले उसे पारिभाषिक अभिधा मुक्तिबोध की लम्बी कविताओं से प्राप्त हुई हो। पुराने कवियों को छोड़ दें, तो लम्बी कविता द्विवेदी-युग के कवियों से लेकर समवर्ती युग के कवियों तक ने लिखी है। हिन्दी के महत्त्वपूर्ण युवा आलोचक नंदकिशोर नवल ने अध्ययन के लिए चार लम्बी कविताएँ चुनी हैं। उनमें से दो निरालाकृत हैं और दो मुक्तिबोधकृत। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये चारों कविताएँ हिन्दी की चर्चित और विवादास्पद ही नहीं, महान कविताएँ भी हैं, जिनके सोपानों पर चरण रखते हुए हिन्दी कविता ने ऊँचाई प्राप्त की है।
लम्बी कविता का सम्बन्ध निश्चय ही केवल आकार से न होकर प्रकार से भी है। इसे संयोग ही कहेंगे कि लेखक द्वारा चुनी गई चारों कविताएँ चार तरह की हैं। ‘सरोज-स्मृति’ के चित्रों को यदि स्मृति का सूत्र गुम्फित करता है, तो 'राम की शक्ति-पूजा' कथा के सहारे आगे बढ़ती है। ‘ब्रह्मराक्षस’ और ‘अँधेरे में’ दोनों ही फ़ैंटास्टिक कविताएँ हैं, लेकिन एक की फ़ैंटेसी जहाँ एक अखंड रूपक के रूप में है, वहीं दूसरे की फ़ैंटेसी एक पूरी चित्रशाला है। नवल ने बड़ी सूक्ष्मता से चारों लम्बी कविताओं के शिल्पगत वैशिष्ट्य को उद्घाटित करते हुए उनकी उस अन्तर्वस्तु पर प्रकाश डाला है, जो कि उससे अभिन्न है।
समकालीन हिन्दी आलोचना में रचना से साक्षात्कार की बहुत बात की जाती है, लेकिन उसका सामना होने पर प्राय: आलोचक बग़ल से निकल जाते हैं। नवल ने रचना के अन्तर्लोक में प्रवेश करते हुए उसके उस बृहत्तर सन्दर्भ को हमेशा याद रखा है, जिसमें ही कोई रचना अपनी सार्थकता अथवा प्रासंगिकता प्राप्त करती है। ‘निराला और मुक्तिबोध : चार लम्बी कविताएँ’ नामक उनकी यह आलोचना-पुस्तक हिन्दी कविता के मर्मग्राहियों के लिए निश्चय ही उपयोगी बनी रहेगी।
Hindi Samudaay Aur Rashtrawad
- Author Name:
Sudhir Ranjan Singh
- Book Type:

-
Description:
सुधीर रंजन सिंह की यह पुस्तक हिन्दी समुदाय की बौद्धिक-साहित्यिक गतिविधियों और राष्ट्रवाद से जुड़े विचारों की समीक्षा है। हिन्दीभाषी समुदाय जातीय पहचान की दृष्टि से अधूरी अवस्था में है। देश के दूसरे आधुनिक भाषा-भाषी समुदायों की तुलना में इसमें जातीय अनुभूति के स्तर पर अधिक असमानताएँ और विभाजन हैं।
इस पुस्तक में उन सभी प्रसंगों की पड़ताल की गई है जिनके कारण हिन्दीभाषी समुदाय आज यह कहने में असफल है कि ‘हम हैं’। इसमें हिन्दी समुदाय की न केवल अधूरेपन का आख्यान है, बल्कि उसके संघर्ष की गाथा भी है। इस रूप में यह उन समकालीन विवादों में प्रभावशाली हस्तक्षेप है जो हिन्दी समुदाय के निर्माणकाल की अधिकांश गतिविधियों में संकीर्ण अन्तर्वस्तु की खोज को मुख्य विषय बनाते हैं। भाषायी अस्मिता का संघर्ष इस पुस्तक के अध्ययन के केन्द्र में है। राष्ट्रीय समुदायों की भाषाओं से उनकी अस्मिता निर्धारित होती है। उन्हें दबाने का अर्थ राष्ट्रबोध को कमज़ोर करना है। अपनी भाषाओं की रक्षा सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा मामला है, और यह राष्ट्रवादी कार्य है। इस रूप में राष्ट्रवाद एक व्यावहारिक विचारधारा है जो सामान्य नागरिक को जाति और धर्म की संकीर्णता से ऊपर उठाती है। पुस्तक की मुख्य स्थापना है कि देश के सबसे बड़े समुदाय को आत्म-पहचान से दूर रखने का अर्थ होगा जाति और धर्म से जुड़ी पहचानों को बढ़ावा देना और राष्ट्रीयता की रीढ़ को कमज़ोर करना। ‘आत्म-पहचान’, हमारी समझ से, राष्ट्रीयता की जान है। इसी से किसी देश का चौतरफ़ा विकास होता है। आर्थिक, वैज्ञानिक, कलात्मक, साहित्यिक सभी क्षेत्रों में।
पुस्तक में हिन्दी लेखकों की असाधारण छवि प्रस्तुत की गई है। सुधीर रंजन सिंह का विश्वास है कि हिन्दी के लेखकों में अपनी सामुदायिक अस्मिता को लेकर जैसी चिन्ता है, और उसके साथ ही दूसरी भाषाओं के साहित्य और राष्ट्रीय जीवन की समस्याओं से जुड़े विषयों से जैसा लगाव है—यह बात सामान्य जन में और दूसरी जगहों पर भी उसी अनुपात में दिखाई पड़े तो सभी राष्ट्रीय समूहों की पहचान निखरेगी, और राष्ट्रव्यापी चेतनागत असमानताएँ भी कम होंगी।
Sammukh
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

-
Description:
‘सम्मुख’ नामवर सिंह के साक्षात्कारों की महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। नामवर सिंह आधुनिक हिन्दी के सबसे बड़े संवादी थे। जिस अर्थ में महात्मा गाँधी आधुनिक भारत के। वाद-विवाद-संवाद को अनिवार्य मानते हुए संवाद के प्रत्येक रूप के लिए प्रस्तुत। संवादी आलोचक। साहित्य-समाज में छिड़ी चर्चाओं में अपनी मान्यताओं और तर्कों के साथ उपस्थित होकर उसमें अपने ढंग से हस्तक्षेप करना उन्हें ज़रूरी लगता था। सम्भवतः इसीलिए उन्होंने ‘साक्षात्कार’ विधा को उसके उभार के दौर से ही गम्भीरता से लिया। साक्षात्कार विधा के उभार का गहरा सम्बन्ध आठवें दशक में पत्रकारिता और साहित्य की आन्तरिक ज़रूरतों और उनके रिश्तों के साथ ही भारतीय लोकतंत्र में आए बुनियादी परिवर्तन से है।
पुस्तक में संकलित साक्षात्कारों का विषय क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। मार्क्सवाद, समकालीन विश्व, पूँजीवाद, नवसाम्राज्यवाद, नवफासीवाद और भारतीय लोकतंत्र के विरूपीकरण से लेकर कविता और कहानी तक। साहित्य और देश-दुनिया की उनकी समझ का एक स्पष्ट प्रतिबिम्ब यहाँ मिलता है। उनकी विश्वदृष्टि का रूपायन इनमें हुआ है। पुस्तक दो खंडों में है। दीर्घ और विषय केन्द्रित साक्षात्कार पहले खंड में हैं। इनमें एक तरह की तार्किक पूर्णता है। उठाए गए प्रश्नों पर नामवर जी का अभिमत समग्रता के साथ अभिव्यक्त हुआ है। दूसरे खंड में प्रकाशित साक्षात्कारों में ‘तेज चाल बातचीत’ का बोध होता है। इनमें एक तरह की क्षिप्रता है। विलक्षण नुकीलापन। ये साक्षात्कार हिन्दी के शीर्ष आलोचक नामवर सिंह की विचार-प्रक्रिया को भी रेखांकित करते हैं।
Vichar Ka Aina : Kala Sahitya Sanskriti : Ramchandra Shukla
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
- Book Type:

-
Description:
विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है।
रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी साहित्य के ऐसे प्रस्थान बिन्दु हैं जिनसे टकराए बिना हिन्दी साहित्य का कोई इतिहास मुमकिन नहीं हैं। इसी तरह वे हिन्दी आलोचना के भी आदि पूर्वज हैं। हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखते हुए उन्होंने तार्किक ढंग से न सिर्फ उसका काल-विभाजन प्रस्तुत किया बल्कि मध्यकालीन कवियों के पाठ-भेद के बीच सही पाठ तक पहुँचने की राह भी दिखाई। आलोचना को अधुनातन विचारों से जोड़ते हुए एक मान्य कैनन दिया। उनके निबन्धों ने भारतीय चित्त की मीमांसा के नए द्वार खोले। वे हिन्दी साहित्य की अनेक बहसों के भी प्रस्थान बिन्दु हैं। हमें उम्मीद है कि उनके कला, साहित्य और संस्कृति सम्बन्धी लेखन को पढ़ते हुए हिन्दी समाज की निर्मिति को समझने के सही और सटीक सूत्र मिलेंगे।
Kahani Ki Rachana Prakriya
- Author Name:
Parmanand Srivastav
- Book Type:

-
Description:
प्रस्तुत पुस्तक ‘कहानी की रचना-प्रक्रिया’ में पुरानी कहानी और नई कहानी की रचना-प्रक्रिया के सूक्ष्म भेदों को समझने का प्रयत्न किया गया है और पहली बार रचना की प्रक्रिया से सम्बन्धित समस्याओं को कहानी-साहित्य की समीक्षा के क्षेत्र में उठाया गया है।
कहानी-साहित्य की रचनात्मक प्रक्रिया के अध्ययन-क्रम के आरम्भ में क्रमश: रचना-प्रक्रिया की ‘आधारभूमि’ रचना-प्रक्रिया के मनोवैज्ञानिक आधार, रचना-प्रक्रिया के साहित्यिक आधार, कहानी के प्राचीन रूप, कहानी के नए रूप, रचनात्मक चेतना का कहानी नामक साहित्यिक विधा में उपयोग, शास्त्रीय समीक्षा द्वारा निर्धारित कहानी-कला के प्रमुख तत्त्वों के रचनात्मक उपयोग की सम्भावना तथा रचना-प्रक्रिया और आधुनिकता के प्रमुख स्तर, रचनाकार, रचना-प्रक्रिया और पाठक आदि विषयों पर विचार किया गया है और प्रतिपादित किया गया है कि रचना-प्रक्रिया कोई जड़ यंत्र नहीं है, बल्कि वह रचनाकार की मानसिक संवेदना, सामाजिक परिवेश तथा उसके कलात्मक अनुभवों से सम्बन्धित एक जागरूक प्रक्रिया है जिसमें रचनाकार न केवल रचनात्मक अनुभवों को सम्प्रेषित करता है, बल्कि अपने को पाता भी है, उपलब्ध भी करता है।
दूसरे, तीसरे और चौथे अध्यायों में पूर्व प्रेमचन्द, प्रेमचन्द युग के पूर्वार्द्ध की कहानी, उत्तर प्रेमचन्द-युग की हिन्दी कहानी की विशेषताओं और सीमाओं की व्याख्या की गई है।
पाँचवें अध्याय में हिन्दी कहानी के विविध युगों की रचना-प्रक्रिया की चेतना का अध्ययन प्रस्तुत करते हुए कथा की चेतना या साक्षात्कार के प्रति विभिन्न युगों के कृतिकारों के दृष्टिकोणों में व्याप्त मौलिक अन्तर की व्याख्या की गई है।
छठे और अन्तिम अध्याय में जहाँ आज की कहानी की नई दिशाओं की ओर संकेत किया गया है, वहीं उसके परिशिष्ट में रचना-प्रक्रिया की चेतना पर समूचे अध्ययन के आधार पर पुनर्विचार की आवश्यकता का अनुभव किया गया है।
पुस्तक में साठोत्तर कहानी और आज की कहानी पर कई निबन्ध इस दृष्टि से दिए गए हैं कि आज के पाठक को यह कृति कथा आलोचना के क्षेत्र में सार्थक प्रस्थान दिखे।
Dwabha
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

-
Description:
नामवर सिंह जीते-जी विशिष्ट शख़्सियत की देहरी लाँघकर एक लिविंग ‘लीजेंड' हो चुके थे। तमाम तरह के विवादों, आरोपों और विरोध के साथ असंख्य लोगों की प्रसंशा से लेकर ‘भक्ति-भाव तक को समान दूरी से स्वीकारने वाले नामवर जी ने पिछले दशकों में मंच से इतना बोला कि शोधकर्ता लगातार उनके व्याख्यानों को एकत्रित कर रहे हैं और पुस्तकों के रूप में पाठकों के सामने ला रहे हैं। यह पुस्तक भी इसी तरह का एक प्रयास है लेकिन इसे किसी शोधार्थी ने नहीं उनके पुत्र विजय प्रकाश ने संकलित किया है।
इस संकलन में मुख्यत: उनके व्याख्यान हैं और साथ ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखे-छपे उनके कुछ आलेख भी हैं। नामवर जी ने अपने जीवन-काल में कितने विषयों को अपने विचार और मनन विषय बनाया होगा, कहना मुश्किल है। अपने अपार और सतत अध्ययन तथा विस्मयकारी स्मृति के चलते साहित्य और समाज से लेकर दर्शन और राजनीति तक पर उन्होंने समान अधिकार से सोचा और बोला। इस पुस्तक में संकलित आलेख और व्याख्यान पुन: उनके सरोकारों की व्यापकता का प्रमाण देते हैं। इनमें हमें सांस्कृतिक बहुलतावाद, आधुनिकता, प्रगतिशील आन्दोलन, भारत की जातीय विविधता जैसे सामाजिक महत्त्व के विषयों के अलावा अनुवाद, कहानी का इतिहास, कविता और सौन्दर्यशास्त्र, पाठक और आलोचक के आपसी सम्बन्ध जैसे साहित्यिक विषयों पर भी आलेख और व्याख्यान पढ़ने को मिलेंगे।
पुस्तक में हिन्दी और उर्दू के लेखकों-रचनाकारों पर केन्द्रित आलेखों के लिए एक अलग खंड रखा गया है जिसमेँ पाठक मीरा, रहीम, संत तुकाराम, प्रेमचन्द, राहुल सांकृत्यायन, त्रिलोचन, हजारीप्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, परसाई, श्रीलाल शुक्ल, ग़ालिब और सज्जाद ज़हीर जैसे व्यक्तित्वों पर कहीं संस्मरण के रूप में तो कहीं उन पर आलोचकीय निगाह से लिखा हुआ गद्य पढ़ेंगे।
बानगी के रूप में देश की सांस्कृतिक विविधता पर मँडरा रहे संकट पर नामवर जी का कहना है : ‘संस्कृति एकवचन शब्द नहीं है, संस्कृतियाँ होती हैं...सभ्यताएँ दो-चार होंगी लेकिन संस्कृतियाँ सैकड़ों होती हैँ...सांस्कृतिक बहुलता का नष्ट होते हुए देखकर चिन्ता होती है और फिर विचार के लिए आवश्यक स्रोत ढूँढ़ने पड़ते हैं।’ यह पुस्तक ऐसे ही विचार-स्रोतों का पुंज है।
1857 Ke Pratham Swatantrata Sangram Ki Patrakarita
- Author Name:
Prof. Neeraj Karna Singh +1
- Book Type:

- Description: प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास का एक ऐसा दिव्य तथा भव्य अध्याय है, जिसमें धर्म, वर्ग, जातियों की सभी दीवारें ध्वस्त हो जाती हैं और जनसमूह के रूप में भारत की आत्मा मुखर होती है| अंग्रेजी तथा वामपंथी इतिहासकार भले ही इस महासमर को गदर या विद्रोह की संज्ञा दें, परंतु यह भारतीय आत्मा की आवाज थी। इस आवाज का स्पंदन सनातन राष्ट्र की पावन माटी के कण-कण में सुरभि- स्वरूप अनुभूत किया जा सकता है।जंग-ए-आजादी में जनचेतना और मनचेतना का कार्य हर स्तर पर हुआ। उस वक्त की व्रतधारी पत्रकारिता ने भी आजादी के पहले समर में क्रांति का बीजारोपण किया | जन-जन तक, मन-मन तक आजादी के समर को पहुँचाया और फिरंगी हुकूमत के खिलाफ उठ खड़े होने का शंखनाद किया | ऐसा शंखनाद, जिसने अनंत नभ में आजादी की क्रांति को हवा दी | उसी हवा को महसूस और आत्मसात् करने के लिए, इस युग के कोठि-कोटि जनों में समझ पैदा करने के उद्देश्य से और क्रांति की उस सुगंध से जोड़ने के लिए पत्रकारिता व्रत तथा दायित्व का दस्तावेज पुस्तक के रूप में आपके हाथों में है । यह पुस्तक केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि राष्ट्र और राष्ट्रगायकों को हमारी ओर से सादर शब्दांजलि है, भावांजलि है|
Aaj Ki Kahani
- Author Name:
Vijay Mohan Singh
- Book Type:

-
Description:
आज की कहानी अगर रचना और आलोचना, दोनों को एक नई प्राण-प्रतिष्ठा देती जान पड़े तो आश्चर्य नहीं। ज़हीन, संवेदनशील और जागरूक कथाशिल्पी विजयमोहन सिंह ने यहाँ जिस लगाव और शिद्दत के साथ शब्दों के अर्थ और अर्थ के सन्दर्भों की तलाश की है, यह उसका स्वाभाविक परिणाम है। प्रामाणिकता, प्रासंगिकता, भोगा हुआ यथार्थ, रूमानीपन, फ़ैंटेसी और रूपक जैसे तमाम शब्द रोज़मर्रा आलोचना में निरर्थक ढंग से फेंके जाते रहे हैं। पर हिन्दी के कथा-साहित्य और उससे जुड़े हमारे देश-काल के व्यापक बुनियादी सवालों से मुठभेड़ होने पर वे यहाँ कुछ और ही रंग-रूप में सामने आते हैं। शिल्प, कला-रूपों, जीवन-दर्शनों की इस गम्भीर, दायित्वपूर्ण लेकिन जानदार पड़ताल में विजयमोहन सिंह की मूलतः मार्क्सवादी दृष्टि कठमुल्लापन, खेमाबंदी या सरलीकृत वर्गीकरण की धुंध से मुक्त है। इसलिए इन समीक्षात्मक निबन्धों को भी किसी बने-बनाए खाँचे में रखना मुश्किल है।
तिलमिला देने की हद तक तीखी यह उधेड़बुन नुस्ख़ों, नक़्क़ाल मूढ़ताओं, भोथरे इकहरेपनों, अतिनाटकीयताओं और छद्म गम्भीरताओं पर भारी पड़ती है। यह बेलौसपन अपने समय की सच्चाई को जीने की ईमानदार कोशिश है, और जहाँ भी लेखक को कुछ मूल्यवान लगा है, उसे रेखांकित करने में संकोच नहीं है।
एक तरह से यह हिन्दी कहानी की वर्णमाला है : प्रेमचन्द से लेकर ‘नई कहानी’, ‘अ-कहानी’ और ‘साठोत्तरी कहानी’ तक का परिदृश्य। एक ऐसा परिदृश्य, जिसमें उपस्थित-अनुपस्थित, प्रिय या अप्रिय महत्त्वपूर्ण कथाकार कहीं-न-कहीं एक-दूसरे से, अपने समय और परम्परा से, भाषा-रचना-अभिव्यक्ति-चिन्तन के धरातल पर टकराते हैं, जुड़ते-टूटते हैं। इन सम्बन्ध-सूत्रों की बारीकियाँ, और नितान्त नए कोणों से कृती और कृतित्व को परखने की कसौटियाँ आज की कहानी में मिलेंगी। उम्मीद शायद ग़लत न हो कि इससे केवल विवाद की नहीं, एक नए संवाद की भी शुरुआत होगी।
—गिरधर राठी
Nagarjuna Aur Unki Kavita
- Author Name:
Nandkishore Naval
- Book Type:

-
Description:
खड़ीबोली कविता की परम्परा भी प्रचुर समृद्ध है। नागार्जुन इस परम्परा की महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं। उनकी कविता के अनेक पक्ष हैं, यथा—आत्माभिव्यक्ति, प्रगतिशीलता, राजनीति, प्रकृति आदि। कुछ कथात्मक कविताओं में उन्होंने पौराणिक आख्यानों को भी आधार बनाया है, पर उसे आधुनिक संवेदना से नया बना दिया है।
नागार्जुन के प्रत्येक पक्ष की कविता में गजब का वैविध्य है। यह वैविध्य अन्तर्वस्तु के स्तर पर भी है और रूप के स्तर पर भी। उनकी तरह अनेक प्रकार की भाषाओं का प्रयोग करनेवाले कवि आधुनिक काल में निराला के अलावा शायद ही कोई हुए हों।
आम तौर पर उन्हें जन-कवि माना जाता है, लेकिन वे उसके साथ-साथ अभिजन-कवि भी थे। अभी कुछ दिन पहले ‘कवि अज्ञेय’ नामक डा. नवल की आलोचना-पुस्तक प्रकाशित हुई है। उससे स्पष्ट हो जाता है कि अज्ञेय और नागार्जुन एक-दूसरे के उलट नहीं थे, बल्कि उनमें मिलन के अनेक बिन्दु थे। अज्ञेय की कविता का नायक भी जनसाधारण था और नागार्जुन ने भी अनेक स्थलों पर अभिजात संवेदना का परिचय दिया है।
उनकी कविता के सम्बन्ध में ज्यादा न कहकर उनकी कुछ पंक्तियाँ उद्धृत की जाती हैं, जिससे उनकी अभिजात संवेदना और भाषा-शैली का भी पता चल सके। एक कविता में उन्होंने राष्ट्रगान की याद दिलानेवाला यह चित्र अंकित किया है: ‘दक्षिण में है नारिकेल-पूगीवन वलयित केरल जनपद/ तमिलनाडु की धनुष्कोटि-कन्याकुमारिका/पश्चिम जलनिधि सिंध-कच्छ-सौराष्ट्र/और गुर्जर- परिशोभित/उत्तर का दिक्पाल तुम्हारा महानाम उत्तुंग भाल/गौरीपति शंकर-तपःपूत कैलाश शिखर दंडायमान है/प्राची में है वरुणालय वह वंग-विभूषण/और वक्ष पर कौस्तुभ मणि-सा विंध्य पड़ा है/जाने कब से!’
डा. नवल की यह पुस्तक निश्चय ही लोकप्रियता प्राप्त करेगी, ऐसा विश्वास है।
Sher-E-Garhwal : Azadi Ke Aandolan Ke Ek Gumnaam Nayak Ki Kahani
- Author Name:
Kranti Nautiyal
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Kabir-Kavya Main Kaalbodh
- Author Name:
Sumita Kukreti
- Book Type:

-
Description:
कबीर का कालविषयक चिन्तन अद्वितीय है। कबीर ने काल के सन्दर्भ को साधारण मनुष्यों से लेकर सुलतानों अर्थात् सत्ता-प्रतिष्ठानों तक कुशलता से जोड़े और यह दिखाया कि सज्जनों को काल त्रस्त नहीं करता, वे कालभय से मुक्त जीवन व्यतीत करते हैं लेकिन अन्यायी और अत्याचारी हमेशा कालभय से गहरे सन्त्रस्त रहते हैं। इस पुस्तक में सुमीता कुकरेती ने यह रेखांकित किया है कि कबीर जैसे कालजयी कवि ने जनमानस को पहचान कर काल का रचनात्मक विश्लेषण किया। कबीर के लिए मृत्यु मानव-जीवन का ऐसा शाश्वत सत्य है जिसके माध्यम से उन्होंने जीवन की महत्ता का प्रतिपादन किया। कबीर का मुख्य उद्देश्य तदयुगीन मानवीय मूल्यों के क्षरण, सामाजिक विषमताओं और अपसंस्कृतियों के बरक्स सही जीवन जीने में विश्वास, समता और न्याय को रखना था। इसीलिए कबीर करुणा का अचूक इस्तेमाल करते हैं और कहीं-कहीं तीखी फटकार लगाते हैं। वह शोषक और अन्यायी वर्ग को उनके जीवन की क्षणभंगुरता समझाकर डराते भी हैं और मानवीय जीवन को उचित तरीके से जीने की राह भी दिखाते हैं।
‘कबीर-काव्य में कालबोध’ पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें अध्ययन-क्षेत्र को केवल युग-विशेष तक सीमित नहीं रखा गया है बल्कि कबीर के समकालीन कवियों के अतिरिक्त देशी-विदेशी आधुनिक कवियों और आलोचकों की दृष्टियों का गहरा अध्ययन और उनका तार्किक प्रयोग भी किया गया है। यह इसका वह उल्लेखनीय पक्ष है जो इसे परम्परित शुष्क और प्रायः नकलची शोध-प्रबन्धों और कथित आलोचनात्मक ग्रन्थों से अलग करता है। कबीर की कविता की अनउद्घाटित खूबियों को उद्घाटित करने वाला यह मौलिक कार्य कबीर-काव्य के पैराडाइम को विस्तृत करता है और ऐसा निर्भ्रान्त विमर्श भी रचता है जिससे सार्थक बहस सम्भव होती है। यहाँ हम कबीर के माध्यम से पूर्व मध्यकाल यानी भक्तिकालीन कविता को समझने की विशिष्ट आलोचनात्मक सरणी से भी परिचित होते हैं। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि ‘कबीर-काव्य में कालबोध’ एक महान रचनाकार को समझने की नई साहित्यिक पहल है।
पाण्डित्यपूर्ण दार्शनिक विषय को पठनीय बनाते हुए सुमीता कुकरेती ने कबीर का विचार-सम्पन्न समाजशास्त्रीय विवेचन किया है। उन्होंने कबीर काव्य के वास्तविक स्वभाव को जिस गहरी विश्लेषण-दृष्टि के साथ उकेरा है उसमें विचारोत्तेजक बौद्धिक परामर्श मौजूद है। उनके वस्तुनिष्ठ निष्कर्ष और मौलिक स्थापनाएँ विशेष अर्थ रखती हैं।
Carabiaee Deshon Mein Hindi-Shiksha Aur Suriname Hindi Parishad Ka Itihas
- Author Name:
Pushpita Awasthi
- Book Type:

-
Description:
विश्व के समुद्रतटीय देशों और द्वीपों में विदेशी सत्ताधारियों के द्वारा गिरमिटिया मज़दूरों के रूप में ले जाए गए भारतीय पुरखों ने जीविका और जीवन का संघर्ष करते हुए भारतीयता और भारत की संस्कृति बनाए रखी। इसी के ज़रिए उन्होंने विदेश में स्वदेश रचाए रखा। भारतवंशियों के घरों के आँगन और अहातों में गड़ी हुई झंडियाँ, मन्दिरों में फहराती हुई पताकाएँ और अन्य जाति, धर्म के समुदायों के साथ आनन्ददायी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध सूरीनामी आप्रवासी भारतवंशियों की आत्मीयता की गाथा का गान करते हैं। संस्कृति भाषा से जन्म लेती है और भाषा संस्कृति से अपनी पहचान बनाती है। विश्व के आप्रवासी भारतवंशियों की मातृभाषा आज भी किसी-न-किसी रूप में हिन्दी है, जिनके रक्त में संस्कृति की शक्ति है, वे अपनी भावी पीढ़ियों को येन-केन-प्रकारेण हिन्दी सिखाना चाहते हैं।
विश्व के दक्षिणी-पश्चिमी गोलार्द्ध के कैरेबियाई देशों के भारतवंशियों की बोली-बानी सरनामी हिन्दी है जिसे सूरीनाम गयानी देशों के आप्रवासी भारतीयों ने तुलसी, कबीर और लोकगीतों के साहित्य के सहारे हिन्दुस्तानी अवधी हिन्दी के आधार पर रचा।
विदेशों में हिन्दी की बोलियों के रूप में पुरखों की स्मृतियाँ बची और बसी हुई हैं। सूरीनाम में बसे पुरखों की हिन्दीतर पीढ़ियों ने सरनामी हिन्दी द्वारा हिन्दी भाषा को बचाए रखने का संघर्ष किया। गत पच्चीस वर्षों में सूरीनाम हिन्दी परिषद की अहम भूमिका है जिसने नीदरलैंड में बस रहे सूरीनामी भारतवंशियों के भीतर भी हिन्दी भाषा और हिन्दुस्तानी संस्कृति के संस्कार बसाए। भाषा के ऐसे ऐतिहासिक कार्यकर्ताओं का इतिहास प्रस्तुत है, क्योंकि इतिहास बनानेवाले इतिहास नहीं लिखा करते हैं।
Uth Naari Ab To Jaag Jaag
- Author Name:
Neeta Awasthi
- Rating:
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत संग्रह में नीता जी की अनुक्रमानुसार दोहा छंद, सर्प कुंडली राज छंद, मुक्तक विन्यास, पद शैली,और नव कुण्डलिया राज छंद में लिखी गई इन तेवरियों में हर सामाजिक विकृति के के प्रति तीखी असहमति और क्षुब्धता है और तीखापन है। समाज में जहां भी क्रंदन है, अभाव है, व्यवस्था का दिया हुआ घाव है। वहां एक करुणा के भाव के साथ ये तेवरियां वंचित शोषित उत्पीड़ित के आंसू पोंछने को गहन संवेदना के साथ दिखलाई देती हैं।
Urdu Ka Arambhik Yug
- Author Name:
Shamsurrahman Farooqui
- Book Type:

-
Description:
उर्दू भाषा की उत्पत्ति दिल्ली के आसपास हुई, लेकिन आरम्भ में इसमें साहित्य की पैदावार गुजरात और दकन में हुई। ऐसा क्यों हुआ, इस पर इस पुस्तक में प्रकाश डाला गया है। फिर गुजरात और दकन में सैद्धान्तिक आलोचना और काव्यशास्त्र के उदय तथा इस सिलसिले में अमीर खुसरो और संस्कृत की केन्द्रीय भूमिका को भी इसमें रेखांकित किया गया है। इसके अलावा इस पुस्तक में जिन विषयों की जाँच-पड़ताल की गई है, वे हैं : दिल्ली का साहित्यिक परिप्रेक्ष्य पर देर से प्रकट होना, दिल्ली के साहित्यिक साम्राज्यवादी स्वभाव के कारण ग़ैर दिल्ली और बाहरी साहित्यकारों का उर्दू की प्रामाणिक सूची से बाहर रहना और अठारहवीं सदी की दिल्ली में नई साहित्यिक संस्कृति और काव्यशास्त्र का उदय।
दिल्ली में भाषा की शुद्धता की मुहिम और अन्योक्ति (ईहाम) के आन्दोलनों की वास्तविकता क्या है, उस्तादी/शागिर्दी का इदारा दिल्ली के अलावा कहीं और क्यों न वजूद में आया? इन प्रश्नों के अलावा ‘दिल्ली स्कूल’ और ‘लखनऊ स्कूल’ पर भी इसमें विचार किया गया है। इसका संक्षिप्त रूप शेलडन पॉलक की सम्पादित पुस्तक में प्रकाशित हो चुका है। हमें उम्मीद है कि हिन्दी के पाठकों को यह पुस्तक बेहद उपयोगी और सूचनापरक लगेगी।
Hindi Kahani Vaya Alochana
- Author Name:
Neeraj Khare
- Book Type:

-
Description:
बीसवीं शताब्दी की समय-गाथा हिन्दी कहानी की गौरवमयी विरासत और विस्मयकारी विस्तार में मौजूद है। उसके विभिन्न मुकाम, उपलब्धियों और कहानीकारों के मूल्यांकन पर अनेक पुस्तकें हैं। लोकप्रिय विधा कहानी की आलोचना परम्परा भी विकसित हुई। ऐसे प्रयासों से कहानी आलोचना का नया सौंदर्यशास्त्र निर्मित हुआ। प्रायः उनमें कथा प्रवृत्तियों, कहानियों के उल्लेख और कहानीकारों पर सघन विवेचन तो हैं, पर कहानियों के एकल पाठ यानी उन पर एकाग्र आलोचनाएँ कम ही हैं। नीरज खरे द्वारा सम्पादित ‘हिन्दी कहानी वाया आलोचना’ कहानी आलोचना की ऐसी पहली किताब है, जिसमें बीसवीं सदी की सत्तर प्रतिनिधि कहानियों पर अलग-अलग आलोचनाएँ एक साथ हैं। हिन्दी कहानी के आरम्भिक काल, विभिन्न पड़ाव, नई कहानी, साठोत्तरी आन्दोलन और उत्तर सदी में मुक्त प्रवाह के मुताबिक़ किताब के तीन खंड हैं—‘बढ़ते क़दमों के निशान’, ‘कहानी : नई होने की डगर’ तथा ‘कहानी : साठोत्तरी और उत्तर सदी’। इन खंडों में क्रमशः रखी गई आलोचनाएँ पैंतालीस लेखकों की विचार-दृष्टि और लेखन दक्षता का प्रतिफल हैं—जिनमें कहानियों के नए मूल्यांकन और आलोचना-पद्धतियों के बदलाव भी परिलक्षित हैं।
सम्पादक ने लम्बी भूमिका में विधागत प्रवाह पर अत्यन्त सतर्क नज़र रखी है—जिससे ‘बीसवीं सदी की हिन्दी कहानी परम्परा’ का सुव्यवस्थित संज्ञान, प्रवृत्तियों की पहचान या संकलित आलोचनाओं तक जाने का कोई रास्ता या सूत्र भी हासिल हो जाता है। पिछले दो दशकों से कथालोचना में नीरज खरे की सक्रिय उपस्थिति रही है। इस पूरे उपक्रम में उनकी आलोचकीय समझदारी और सम्पादकीय अभिरुचि प्रतिबिम्बित है। आलोच्य कहानियाँ एक सदी के सफ़र की नुमाइंदगी करती हैं और अनेक विश्वविद्यालयों के स्नातक या स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में भी शामिल हैं। आलोचना की ऐसी किताब का अभाव लम्बे समय से महसूस किया जा रहा था; जिसमें परम्परा की प्रतिनिधि कहानियों पर मुकम्मल विचार हो। बीसवीं सदी की यात्रा में कहानी की रचना मुद्रा, संरचना के बदलाव और संवेदना के परिवर्तन ग़ौरतलब हैं। इसीलिए बेहतर और बोधगम्य आलोचनाओं का यह सुविचारित चयन समावेशी है। कहानी के पाठकों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और अध्येताओं के लिए उनकी ज़रूरतों, रुचियों और उद्देश्यों के मुताबिक़ यह किताब बहुउपयोगी ही नहीं; अत्यन्त सार्थक और स्थायी महत्त्व की है।
Samkaleen Kavya Yatra
- Author Name:
Nandkishore Naval
- Book Type:

-
Description:
मुक्तिबोध ने अपनी एक प्रसिद्ध कविता में कहा है : ‘नहीं होती, कहीं भी खतम कविता नहीं होती/कि वह आवेग-त्वरिता काल-यात्री है।’ इसका एक प्रमाण यह भी है कि आधुनिक हिन्दी कविता अज्ञेय और स्वयं मुक्तिबोध के साथ ही समाप्त नहीं हो जाती और काल के साथ वेग से उसकी यात्रा जारी रहती है। जिस कवि की रचना का स्रोत उसका अपना जीवन होता है, उसका एक न एक दिन चुकना तय है, लेकिन जो कविता इतिहासाश्रित होती है, उसका प्रवाह अजस्र रहता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इतिहास केवल काल-बोध नहीं, देश-बोध भी है। प्रस्तुत पुस्तक में हिन्दी के सुपरिचित आलोचक डॉ. नंदकिशोर नवल ने विजयदेव नारायण साही से लेकर धूमिल तक की कविता का गहन, विशद और वस्तुपरक अध्ययन कर यह सिद्ध कर दिया है कि आधुनिक हिन्दी कविता न केवल निरन्तर गतिशील है, बल्कि वह विकासशील भी है।
अज्ञेय-मुक्तिबोध-परवर्ती इस कविता की विशेषता यह है कि यह बहुआयामी और बहुवर्णी है, जिस कारण इसका अध्ययन जनवादिता अथवा कलावादिता की किसी संकीर्ण कसौटी पर नहीं हो सकता। नवल जी ने इन दोनों कसौटियों को अपर्याप्त मानकर सर्वप्रथम उस प्रतिमान पर प्रत्येक कवि की परीक्षा की है, जो उसकी कविता से प्राप्त होता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उन्होंने अपने मूल मानववादी दृष्टि को छोड़ दिया है। वस्तुतः इस दृष्टि में जन और कला दोनों की स्वीकृति है, पर वह इन दोनों की सीमाओं का अतिक्रमण भी करती है।
इस अध्ययन और मूल्यांकन का निष्कर्ष यह है कि हिन्दी कविता बड़े पेचीदे ढंग से कल्पना से यथार्थ की ओर, व्यक्ति से समय की ओर और असाधारण से साधारण की ओर विकसित हुई है। ‘समकालीन काव्य-यात्रा’ पाठकों के बीच लोकप्रियता प्राप्त कर अब संशोधित और परिष्कृत रूप में सामने आ रही है। निश्चय ही यह पुस्तक नवल जी के आलोचनात्मक लेखन की ही नहीं, समकालीन काव्यालोचन की भी एक उपलब्धि है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book