Uttar Aadhunikta Aur Samkalin Katha-Sahitya
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Author:
Lakshmi GautamPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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यह पुस्तक ‘उत्तर-आधुनिकता व समकालीनता बोध’ को भारतीय सन्दर्भ में प्रस्तुत करने का मौलिक प्रयास है। मौलिक इस दृष्टि में, क्योंकि यह विमर्श का विखंडनवादी स्वर लेकर उपस्थित होता है जो केन्द्र व हाशिया दोनों की स्थिति को एक साथ लेकर चलता है, जिसमें टकराहट की त्रासदी से उत्पन्न परिस्थितियों की निर्मिति है। यहाँ ‘महाआख्यानों के अन्त’ के साथ, नवीन लघुता बोध व हाशिए का केन्द्रवर्ती स्वर ही प्रमुखता प्राप्त करता है। इस कृति का मूल मन्तव्य यही रहा है कि हिन्दी जगत आयातित उत्तर-आधुनिक चिन्तन से बचते हुए भारतीय परिदृश्य में उत्तर-आधुनिकता को किसी पूर्वग्रह से मुक्त हो ‘स्वतंत्र विमर्श’ के रूप में उपस्थित करता है।
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यह पुस्तक ‘उत्तर-आधुनिकता व समकालीनता बोध’ को भारतीय सन्दर्भ में प्रस्तुत करने का मौलिक प्रयास है। मौलिक इस दृष्टि में, क्योंकि यह विमर्श का विखंडनवादी स्वर लेकर उपस्थित होता है जो केन्द्र व हाशिया दोनों की स्थिति को एक साथ लेकर चलता है, जिसमें टकराहट की त्रासदी से उत्पन्न परिस्थितियों की निर्मिति है। यहाँ ‘महाआख्यानों के अन्त’ के साथ, नवीन लघुता बोध व हाशिए का केन्द्रवर्ती स्वर ही प्रमुखता प्राप्त करता है। इस कृति का मूल मन्तव्य यही रहा है कि हिन्दी जगत आयातित उत्तर-आधुनिक चिन्तन से बचते हुए भारतीय परिदृश्य में उत्तर-आधुनिकता को किसी पूर्वग्रह से मुक्त हो ‘स्वतंत्र विमर्श’ के रूप में उपस्थित करता है।
Book Details
-
ISBN9788180317989
-
Pages191
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भूमिकाओं में यदि ‘विश्व प्रपंच’ की भूमिका आचार्य शुक्ल के जीवन–दर्शन के वैज्ञानिक पक्ष को जानने के लिए अनिवार्य दस्तावेज़ है तो ‘शेष स्मृतियाँ’ की ‘प्रवेशिका’ उनकी ऐतिहासिक अनुसन्धान में रुचि तथा गति के लिए। साहित्य–चिन्तक शुक्ल जी हिन्दी भाषा—मुख्यत: काव्यभाषा की भाषावैज्ञानिक तथा व्याकरणिक समस्याओं में कितनी अन्तर्दृष्टि रखते थे, इसका प्रमाण है ‘बुद्धचरित की भूमिका’ में ब्रजभाषा, अवधी और खड़ी बोली के स्वरूप का व्यतिरेकी विश्लेषण। इन भूमिकाओं के अतिरिक्त दो ऐतिहासिक भाषण भी संकलित हैं जिनसे आचार्य के व्यक्तित्व का एक नया पक्ष सामने आता है। इस प्रकार यह पुस्तक एक चिरकांक्षित आवश्यकता की पूर्ति का सारस्वत प्रयास है, जिसके महत्त्व का आभास सम्पादक की शोधपूर्ण भूमिका से हो सकता है।
Vivah Ki Museebaten
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

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यह पुस्तक राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के चिन्तनपूर्ण, लोकोपयोगी निबन्धों का श्रेष्ठ संकलन है। दिनकर जी के चिन्तन-स्वरूप का विस्मयकारी साक्षात्कार करानेवाले ये निबन्ध पाठक के ज्ञान-क्षितिज का विस्तार भी करते हैं। इन निबन्धों में जहाँ एक ओर विवाह, प्रेम, काम, नैतिकता और शिक्षा जैसे विषयों पर विद्वान कृतिकार का सन्तुलित दृष्टिकोण उद्घाटित होता है, वहीं दूसरी ओर लोकतंत्र, धर्म और विज्ञान तथा मूल्य-ह्रास जैसे ज्वलन्त प्रश्नों पर उनकी प्रगतिशील दृष्टि मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है।
भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति-पद पर कार्य करते हुए दिनकर जी ने जो अनुभव किया, उसका लेखा-जोखा प्रस्तुत है ‘शिक्षा : तब और अब’ निबन्ध में इस चेतावनी के साथ कि ‘शिक्षा का स्तर अभी भी बहुत नीचा है। अगर वह और भी नीचे लाया गया तो बेकारों की फ़ौज बढ़ेगी और उनकी फ़ौज भी, जिन्हें कोई भी काम नहीं सौंपा जा सकता।’
इसी तरह ‘पुरानी और नई नैतिकता’, ‘लोकतंत्र : कुछ विचार’, ‘धर्म और विज्ञान’, ‘मूल्य-ह्रास के पच्चीस वर्ष’ निबन्धों में सारगर्भित विचार-सूक्तियाँ ही नहीं, एक प्रबुद्ध विचारक की सामयिक चेतावनी भी है।
ये निबन्ध राष्ट्रकवि दिनकर के व्यक्तित्व को भी समझने में सहायक सिद्ध होते हैं।
समाज में अनन्त काल से प्रेम के प्रति सन्तों, चिन्तकों और शास्त्रकारों का व्यवहार पुलिस का-सा रहा है। और उन्हीं के भय से मनुष्य ने अपने चेहरे पर पवित्रता का नक़ाब लगाना मंज़ूर कर लिया, यद्यपि इस नक़ाब का उसे अभ्यास नहीं था। अथवा यों कहें कि यह नक़ाब जितने अच्छे सूत का है, उतने बारीक और महीन सूत आदमी की भीतरी ज़िन्दगी में नहीं काते जाते।
Hindi Navjagaran Ka Aarthik Chintan
- Author Name:
Jay Singh Neerad
- Book Type:

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हिन्दी नवजागरण भारतीय नवजागरण से प्रेरित और प्रभावित होते हुए भी इस दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण है कि वह हिन्दी पट्टी के सामाजिक-सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जनजागरण का वाहक बना रहा। विशेष रूप से सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में ही उसकी विवेचना भी की गई लेकिन पता नहीं क्यों विद्वानों का ध्यान इस वास्तविकता की ओर नहीं गया कि हिन्दी पट्टी में सामाजिक-सांस्कृतिक जागरण के साथ जो स्वातंत्र्य आन्दोलन परवान चढ़े उनके मूल में विद्यमान हिन्दी नवजागरण का आर्थिक चिन्तन उनकी अपरिहार्य प्रेरणा-भूमि है। इस दौर के अधिकांश लेखकों और साहित्यकारों ने राष्ट्रीय और सामाजिक उद्देश्यों के लिए अपने आर्थिक चिन्तन को हथियार की तरह इस्तेमाल किया। इस आर्थिक चिन्तन को आत्मसात किए बिना हिन्दी नवजागरण को सम्पूर्णता से नहीं समझा जा सकता।
इस पुस्तक में लेखक ने हिन्दी नवजागरण के आर्थिक चिन्तन के अनुशीलन का प्रयास किया है। इस चिन्तन को आधुनिक युग के आर्थिक परिप्रेक्ष्य से जोड़ने की कोशिश भी की गई है। इस अध्ययन से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि उत्तर भारत के स्वातंत्र्य आन्दोलनों और सामाजिक जागरण को औपनिवेशिक शासन द्वारा किए गए भारतीयों के आर्थिक शोषण ने अपने ढंग से प्रेरित और प्रभावित किया। यही कारण है कि तत्कालीन राजनीतिक परिप्रेक्ष्य भी इस आर्थिक चिन्तन से अनिवार्यतः जुड़ा रहा है।
वर्तमान में यह आवश्यक है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था को हिन्दी नवजागरणकालीन औपनिवेशिक शोषण के परिप्रेक्ष्य में भी समझा जाए। यह पुस्तक इसी दिशा में पहल करने का एक प्रयास है।
Dakshina
- Author Name:
Sirpi Balasubramaniam
- Rating:
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- Description: A literary digest of South Indian Languages.
Kavita Ke Aar Par
- Author Name:
Nandkishore Naval
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Description:
हिन्दी में कृति की राह से गुज़रने की बहुत बात की जाती है, लेकिन सच्चाई यह है कि उसमें आलोचना और रचना का आपसी सम्बन्ध काफी कुछ टूट चुका है। जहाँ तक कविता की बात है, ज़्यादा शक्ति उसके सामाजिक और राजनीतिक सन्दर्भों को स्पष्ट करने में ख़र्च की जा रही है। जब कविता से अधिक उसके कारणों को महत्त्व दिया जाएगा, तो अनिवार्यतः उसके सम्बन्ध में जो निष्कर्ष निकाले जाएँगे, वे पूरी तरह से सही नहीं होंगे। कविता अन्ततः एक कलात्मक सृष्टि है, जिसमें उसके देश और कालगत सन्दर्भ स्वयं छिपे होते हैं। आलोचना का काम रचना से ही आरम्भ कर उन सन्दर्भों तक पहुँचना है, न कि उन सन्दर्भों को अलग से लाकर उनमें रचना को विलीन कर देना। प्रस्तुत पुस्तक में इस कठिन काम को अंजाम देने का भरसक प्रयास किया गया है।
निराला, शमशेर और मुक्तिबोध हिन्दी के ऐसे कवि हैं, जिनकी कविता का पाठ अत्यधिक जटिल है। हिन्दी काव्यालोचन उस पाठ से उलझने से बचता रहा है, जबकि संज्ञान और सौन्दर्य दोनों का मूल स्रोत वही है। डॉ. नंदकिशोर नवल निराला और मुक्तिबोध के विशेष अध्येता हैं और शमशेर में उनकी गहरी दिलचस्पी है। स्वभावतः उन्होंने इस पुस्तक के लेखों में उक्त कवियों की कुछ प्रसिद्ध कविताओं का पाठ-विश्लेषण करते हुए उनके सौन्दर्योन्मीलन की चेष्टा की है। उनका कहना है कि पाठ-विश्लेषण काव्यालोचन का प्रस्थानबिन्दु है। निश्चय ही उससे शुरू करके वे वहीं तक नहीं रुके हैं।
अज्ञेय, केदार और नागार्जुन अपेक्षाकृत सरल कवि हैं, लेकिन चूँकि कविता-पात्र एक जटिल वस्तु है, इसलिए प्रस्तुत पुस्तक में उनकी कुछ कविताओं से भी आत्मिक साक्षात्कार किया गया है। नमूने के रूप में रघुवीर सहाय की एक कविता की भी पाठ-केन्द्रित आलोचना दी गई है। इस तरह की पुस्तक हिन्दी काव्य-प्रेमियों के लिए एक ज़रूरी पुस्तक है, जो उनकी आस्वादन क्षमता को विकसित करेगी।
Mohan Rakesh Aur Unke Natak
- Author Name:
Girish Rastogi
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- Description: मोहन राकेश के नाटकों का यह अध्ययन वस्तुत: हिन्दी नाटक और रंगमंच की पूर्व स्थिति, उसकी उपलब्धियों और सीमाओं को भी सामने लाता है। नाट्य-भाषा और रंगमंच के अनेक पक्षों पर विचार करने के लिए यह सम्भवत: विवश करे। नाट्य-समीक्षा का स्वरूप भी इस पुस्तक में परम्परा से एकदम भिन्न है। नाट्य-समीक्षा के नए मापदंड सामने लाने में ही मोहन राकेश के नाटकों पर यह पुस्तक निश्चय ही मदद करेगी।
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