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केवल एक कथा नहीं, बल्कि धर्म, संयम और त्याग की अमर पुनर्गाथा है। यह उस आत्मा की कहानी है जो शस्त्र उठाती है, पर मर्यादा नहीं छोड़ती; जो सत्ता त्यागती है, पर राजधर्म नहीं। भागीरथी गंगा और सम्राट शांतनु के पुत्र देवव्रत, बाल्यकाल से ही ऋषि-संस्कारों, शस्त्रविद्या और आत्मविजय के पथ पर अग्रसर होते हैं। सिंहासन और ब्रह्मचर्य का उनका त्याग एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि युगों को दिशा देने वाला संकल्प बन जाता है-जो उन्हें राजा नहीं, धर्म का संरक्षक बनाता है। कुरुक्षेत्र में भीष्म केवल महारथी नहीं, वचन और विवेक के प्रहरी बनकर खड़े होते हैं। जानते हुए भी कि धर्म पाण्डवों के साथ है, वे अपने संकल्प से विचलित नहीं होते। बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म मृत्यु नहीं, उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हैं और मानवता को धर्म का अंतिम उपदेश देते हैं। यह पुस्तक स्मरण कराती है- जो अपने वचन पर अडिग रहता है, वही वास्तव में कालजयी होता है।
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केवल एक कथा नहीं, बल्कि धर्म, संयम और त्याग की अमर पुनर्गाथा है। यह उस आत्मा की कहानी है जो शस्त्र उठाती है, पर मर्यादा नहीं छोड़ती; जो सत्ता त्यागती है, पर राजधर्म नहीं।
भागीरथी गंगा और सम्राट शांतनु के पुत्र देवव्रत, बाल्यकाल से ही ऋषि-संस्कारों, शस्त्रविद्या और आत्मविजय के पथ पर अग्रसर होते हैं। सिंहासन और ब्रह्मचर्य का उनका त्याग एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि युगों को दिशा देने वाला संकल्प बन जाता है-जो उन्हें राजा नहीं, धर्म का संरक्षक बनाता है।
कुरुक्षेत्र में भीष्म केवल महारथी नहीं, वचन और विवेक के प्रहरी बनकर खड़े होते हैं। जानते हुए भी कि धर्म पाण्डवों के साथ है, वे अपने संकल्प से विचलित नहीं होते। बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म मृत्यु नहीं, उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हैं और मानवता को धर्म का अंतिम उपदेश देते हैं।
यह पुस्तक स्मरण कराती है- जो अपने वचन पर अडिग रहता है, वही वास्तव में कालजयी होता है।
Book Details
-
ISBN9789349931794
-
Pages274
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIN
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