Main Janak Nandini
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भारतीय मानस का अर्थ केवल पढ़े-लिखे शिक्षितों का मानस नहीं है, उसका मूल अभिप्राय है—लोक मानस। इस लोक मानस की भारतीयता का लक्षण है—काल के आदिहीन, अन्तहीन प्रवाह की भावना...। जनमानस में आज तक सीता का मूक (मौन) स्वरूप ही विद्यमान है। सौम्यस्वरूपा आज्ञाकारी पुत्री का, जो बिना तर्क-वितर्क या प्रतिरोध किए पिता का प्रण पूर्ण करने हेतु या पुत्र-धर्म के निर्वाह हेतु उस किसी भी पुरुष के गले में वरमाला डाल देती, जो शिव के विशाल पिनाक पर प्रत्यंचा का सन्धान कर देता। उस समर्पिता, सहधर्मिणी या सह-गामिनी पत्नी का जो सहजभाव से सारा राज्य सुख तथा वैभव त्यागकर पति राम की अनुगामिनी बनकर उनके संग चल देती है चुनौती-भरे वन्य जीवन के दु:खों को अपनाने। सीता के चरित पर अनेक ग्रन्थ लिखे गए हैं, अधिकांश में उन्हें जगजननी, शक्तिस्वरूपा या देवी मानकर पूजनीया बनाया गया। किन्तु मानवी मानकर उनके मर्म के अन्तस्थल तक पहुँचने...उनके मर्म की थाह लेने की चेष्टा न के बराबर की गई। उनके प्रति किए गए राम के सारे निर्णय को उनकी मौन स्वीकृति मानकर राम की महानता, मर्यादा तथा उत्तमता को और महिमामंडित किया गया। क्या वास्तव में ऐसा था? क्या सीता के पास अपने प्रति किए जा रहे अविचार के प्रति प्रतिरोध के स्वर का अभाव था? अपने जीवन-जनित अभीष्ट अपने कर्मों में निहित कर जीती सीता क्या मात्र पाषाण प्रतिमा थीं? क्या उनका अन्तस संवेदनशून्य था या उन्हें हर्ष-विषाद तथा शोक-सन्ताप नहीं व्याप्तता था? और क्या हर स्थिति-परिस्थिति को उन्होंने सहज स्वीकार लिया था, शिरोधार्य कर लिया था बिना प्रतिवाद किए? यह उपन्यास ऐसे ही अनेक प्रश्नों का सन्धान है।
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भारतीय मानस का अर्थ केवल पढ़े-लिखे शिक्षितों का मानस नहीं है, उसका मूल अभिप्राय है—लोक मानस। इस लोक मानस की भारतीयता का लक्षण है—काल के आदिहीन, अन्तहीन प्रवाह की भावना...। जनमानस में आज तक सीता का मूक (मौन) स्वरूप ही विद्यमान है। सौम्यस्वरूपा आज्ञाकारी पुत्री का, जो बिना तर्क-वितर्क या प्रतिरोध किए पिता का प्रण पूर्ण करने हेतु या पुत्र-धर्म के निर्वाह हेतु उस किसी भी पुरुष के गले में वरमाला डाल देती, जो शिव के विशाल पिनाक पर प्रत्यंचा का सन्धान कर देता। उस समर्पिता, सहधर्मिणी या सह-गामिनी पत्नी का जो सहजभाव से सारा राज्य सुख तथा वैभव त्यागकर पति राम की अनुगामिनी बनकर उनके संग चल देती है चुनौती-भरे वन्य जीवन के दु:खों को अपनाने।
सीता के चरित पर अनेक ग्रन्थ लिखे गए हैं, अधिकांश में उन्हें जगजननी, शक्तिस्वरूपा या देवी मानकर पूजनीया बनाया गया। किन्तु मानवी मानकर उनके मर्म के अन्तस्थल तक पहुँचने...उनके मर्म की थाह लेने की चेष्टा न के बराबर की गई। उनके प्रति किए गए राम के सारे निर्णय को उनकी मौन स्वीकृति मानकर राम की महानता, मर्यादा तथा उत्तमता को और महिमामंडित किया गया।
क्या वास्तव में ऐसा था? क्या सीता के पास अपने प्रति किए जा रहे अविचार के प्रति प्रतिरोध के स्वर का अभाव था? अपने जीवन-जनित अभीष्ट अपने कर्मों में निहित कर जीती सीता क्या मात्र पाषाण प्रतिमा थीं? क्या उनका अन्तस संवेदनशून्य था या उन्हें हर्ष-विषाद तथा शोक-सन्ताप नहीं व्याप्तता था? और क्या हर स्थिति-परिस्थिति को उन्होंने सहज स्वीकार लिया था, शिरोधार्य कर लिया था बिना प्रतिवाद किए?
यह उपन्यास ऐसे ही अनेक प्रश्नों का सन्धान है।
Book Details
-
ISBN9788126730216
-
Pages320
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: सीता बनाम राम(वाल्मीकि रामायण पर आधारित रामकथा का वैकल्पिक पाठ) वनगमन के समय सीता को अयोध्या में रहकर भरत को 'विशेष यत्नपूर्वक' प्रसन्न रखने के राम के सुझाव की निंदा करते हुए सीता द्वारा राम को स्त्री की कमाई खाने वाले नट की संज्ञा देना (शैलूष इव मां राम परेभ्यो दातुमिच्छसि), अरण्यकांड में 'अकारण' हिंसा के विरुद्ध सीता का राम के साथ वाद-विवाद करना, अग्नि-परीक्षा के समय देह को ही सर्वोपरि मानने वाले राम के आरोपों का उत्तर देते हुए सीता का हृदय और आत्मा में बसे प्रेम को देह से परे बताना (मदधीनं तु यत् तन्मे हृदयं त्वयि वर्तते। पराधीनेषु गात्रेषु किं करिष्याम्यनीश्वरी॥); ये कुछ ऐसे तथ्य हैं, जिनसे दोनों के सोच और व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर दिखाई देता है। और आखिर में अश्वमेध यज्ञ के समय जनसमुदाय के समक्ष राम जिस प्रकार सीता के सामने शुद्धता की शपथ लेने के बाद ही उन्हें अपनाने की शर्त रखते हैं; और उत्तर में राम की ओर देखे बिना वे खामोशी के साथ जिस प्रकार भूमि-प्रवेश कर जाती हैं (जो प्रेम के समाप्त होने का संकेत माना जा सकता है), वह उन दोनों के वैचारिक अंतर को स्पष्ट कर देता है।सीता और राम अपने सोच और आचरण में ही नहीं, जन्म और मृत्यु में भी एक-दूसरे के प्रतिकूल हैं। सीता का जन्म राम की तरह किसी माँ के गर्भ से नहीं, धरती से होता है और वे अंत में धरती में समा जाती हैं। वह न तो जन्म लेती हैं और न (राम की भाँति) मरती हैं। राम आकाश में स्थित विष्णुलोक से अवतार लेकर आते हैं और वापस आकाश में चले जाते हैं। दोनों के इस संसार में आने और लौटने के स्थान विपरीत दिशा में हैं। बिछड़ने के बाद राम के साथ वे कभी नहीं मिलतीं। ('सीता बनाम राम' पुस्तक से...)
Pachola
- Author Name:
Pramod Namdevrao Borsare
- Book Type:

- Description: ‘पाचोळा' हा प्रमोद बोरसरे यांचा कथासंग्रह वाचताना मला ग्रेसांच्या ओळी आठवल्यारानातला झरातहानेची बोलीकात टाकलेला सर्पपाचोळ्याच्या खालीग्रेसांच्या ओळींचा श्लेषार्थ वेगळा असला तरीही रानावनातलं दुर्गम, दुर्लक्षित जिणं बाहेरच्या जगाला पाचोळ्यासारखंच वाटतं. मात्र बोरसरेंच्या ‘पाचोळ्या'खाली जो कथात्म ऐवज आहे तो अस्सल कात टाकलेल्या सापासारखा आहे. प्रत्येक कथा दंश करते. प्रत्येक कथेत रानातल्या सावलीत वाहणाऱ्या तहानलेल्या झऱ्यासारख्याच हळव्या ओल्या भावनाही आहेत. आपण आपल्या अक्षर जाणिवांच्या सोवळेपणात जाणिवेच्या पातळीवर वाळीत टाकलेलं एक जगणं जगतो ते बोरसरे विलक्षण ताकदीने मांडतात. झाडीबोलीतल्या अहेव शब्दांनी प्रमाण मराठी भाषाही या कथा समृद्ध करतीलच. त्यांच्या लेखनाला सुगीत असलेला रानातला गर्भार गंध आहे. सुशिक्षित, उच्चभ्रू, अभिजन मध्यमवर्गीयांच्या तालेवार दु:खांनाच गोंजारणाऱ्या साहित्याच्या परिघाबाहेरचे लेखन उजागर होत आता आशयाचेही बहुजनीकरण झाले आहे. बोरसरे अशा लेखकांच्या पिढीतल्या आशा पल्लवित करणारे लेखक आहेत; हे या कथा वाचल्यावर मर्मज्ञांचे मत असेल. अतिलघुकथांची ही शैली सआदत हसन मंटोची आठवण करून देणारी अन् परिणामकारकतेत त्याच्या जवळ पोहचणारी...- श्याम पेठकर Pachola - nakshalgrastanchya ashadayi jaganyacha kolaj | Pramod Borsare पाचोळा - नक्षलग्रस्तांच्या आशादायी जगण्याचा कोलाज | प्रमोद बोरसरे
Devvrat
- Author Name:
Prabhat Sinha
- Book Type:

- Description: केवल एक कथा नहीं, बल्कि धर्म, संयम और त्याग की अमर पुनर्गाथा है। यह उस आत्मा की कहानी है जो शस्त्र उठाती है, पर मर्यादा नहीं छोड़ती; जो सत्ता त्यागती है, पर राजधर्म नहीं। भागीरथी गंगा और सम्राट शांतनु के पुत्र देवव्रत, बाल्यकाल से ही ऋषि-संस्कारों, शस्त्रविद्या और आत्मविजय के पथ पर अग्रसर होते हैं। सिंहासन और ब्रह्मचर्य का उनका त्याग एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि युगों को दिशा देने वाला संकल्प बन जाता है-जो उन्हें राजा नहीं, धर्म का संरक्षक बनाता है। कुरुक्षेत्र में भीष्म केवल महारथी नहीं, वचन और विवेक के प्रहरी बनकर खड़े होते हैं। जानते हुए भी कि धर्म पाण्डवों के साथ है, वे अपने संकल्प से विचलित नहीं होते। बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म मृत्यु नहीं, उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हैं और मानवता को धर्म का अंतिम उपदेश देते हैं। यह पुस्तक स्मरण कराती है- जो अपने वचन पर अडिग रहता है, वही वास्तव में कालजयी होता है।
Adventures of Rama
- Author Name:
Wonder House
- Rating:
- Book Type:

- Description: This delightful collection of stories from Indian mythology introduces young readers to our enriching and ancient culture and wisdom.
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