Masi Kagad
(0)
₹
350
280 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
‘जनसत्ता’ के प्रारम्भिक वर्षों में छपे प्रभाष जोशी के सैकड़ों लेखों और सम्पादकीय टिप्पणियों में से किया गया एक चयन है—‘मसि कागद’। ज़ाहिर है इन लेखों में वे सभी विशेषताएँ प्रतिबिम्बित हैं, जिनके चलते ‘जनसत्ता’ ने पाठकों की आत्मीयता प्राप्त की।</p> <p>ये रचनाएँ प्रभाष जोशी की ख़ास शैली का उदाहरण तो हैं ही, वे यह भी बताती हैं कि राजनीति हो या खेल, समाज हो या संस्कृति, संगीत हो या सिनेमा—लेखक की निगाह घटनाओं के नए सन्दर्भ देखती है, उनके अनदेखे पहलुओं को परखती है और उन्हें लोक-जीवन और विवेक की कसौटी पर कसती है।</p> <p>इन लेखों में प्रभाष जोशी राजनीति को नैतिक सवालों में बदलते हैं। सिनेमा को समाज से जोड़ते हैं। उनकी पत्रकारिता सत्ता के गलियारों में नहीं भटकती। वे अपने लेखन में पाठकों के प्रति अपनी जवाबदेही को सर्वाधिक महत्त्व देते हैं। इन लेखों में समाज के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त हुआ है। इनमें सामाजिक विसंगतियों को बदलने की बेचैनी भी दिखाई देती है।
Read moreAbout the Book
‘जनसत्ता’ के प्रारम्भिक वर्षों में छपे प्रभाष जोशी के सैकड़ों लेखों और सम्पादकीय टिप्पणियों में से किया गया एक चयन है—‘मसि कागद’। ज़ाहिर है इन लेखों में वे सभी विशेषताएँ प्रतिबिम्बित हैं, जिनके चलते ‘जनसत्ता’ ने पाठकों की आत्मीयता प्राप्त की।</p>
<p>ये रचनाएँ प्रभाष जोशी की ख़ास शैली का उदाहरण तो हैं ही, वे यह भी बताती हैं कि राजनीति हो या खेल, समाज हो या संस्कृति, संगीत हो या सिनेमा—लेखक की निगाह घटनाओं के नए सन्दर्भ देखती है, उनके अनदेखे पहलुओं को परखती है और उन्हें लोक-जीवन और विवेक की कसौटी पर कसती है।</p>
<p>इन लेखों में प्रभाष जोशी राजनीति को नैतिक सवालों में बदलते हैं। सिनेमा को समाज से जोड़ते हैं। उनकी पत्रकारिता सत्ता के गलियारों में नहीं भटकती। वे अपने लेखन में पाठकों के प्रति अपनी जवाबदेही को सर्वाधिक महत्त्व देते हैं। इन लेखों में समाज के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त हुआ है। इनमें सामाजिक विसंगतियों को बदलने की बेचैनी भी दिखाई देती है।
Book Details
-
ISBN9788126719396
-
Pages319
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Patrakarita : Mission se Media tak
- Author Name:
Akhilesh Mishra
- Book Type:

-
Description:
यह पुस्तक अपने पेशे के सहकर्मियों और पाठकों के साथ एक ऐसे व्यक्ति की बहस, नोक-झोंक है जो चीजों को उनके सही नाम से पुकारता है, धुँधलके में रहना और किसी को रखना पसंद नहीं करता। वह व्यक्ति थेµ अखिलेश मिश्र, जिनकी धर्म-संस्कृति विषयक पुस्तक ‘धर्म का मर्म’ पाठक पढ़ चुके हैं।
इस पुस्तक में अखिलेश जी के वे लेख संकलित हैं जिनमें उन्होंने पत्रकारिता के विविध आयामों, उसकी समस्याओं, संकटों, उसके विचलनों, उसकी ताकत और कमजोरियों की चर्चा की है। पुस्तक चार खंडों में है। पहले खंड में वे लेख हैं जिनमें पत्रकारिता सम्बन्धी विविध विषयों, समस्याओं का गहन विश्लेषण है। द्वितीय खंड में ‘वर्कर्स हेरल्ड’ में लिखे उनके वे संपादकीय हैं जिनका विषय पत्रकार अथवा पत्रकारिता है। इस खंड का पहला आलेख ‘स्वतंत्र भारत’ में लगभग सत्रह वर्ष तक अनवरत चले उनके पाक्षिक स्तम्भ ‘दिल्ली का रंगमंच’ से लिया गया है। इसमें श्री मिश्र ने लोकतान्त्रिाक मूल्यों में गहरी आस्था के लिए जाने जानेवाले नेहरू जैसे प्रधानमंत्राी की भी अखबारों की उस आजादी के प्रति नाराजगी को पकड़ा है जो सत्ता के लिए परेशानी पैदा कर दे।
खंड तीन में ‘वर्कर्स हेरल्ड’ में ही संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित वे लेख लिये गए हैं जिनमें पत्रकारिता के सरोकारों की चर्चा है। इस खंड में अन्य अनेक समस्याएँ उठाने के अतिरिक्त लेखक ‘श्रम नीति का दुरंगापन’ बेपर्दा करते हुए ‘पत्रकारों की सुरक्षा’ के सवाल से जुड़ी पेचीदगियों से दो-चार होता है। खंड चार में दो लेख शामिल हैं, जिनमें समाचार क्या है, कैसे लिखे जाते हैं, आदि व्यावहारिक पहलुओं पर उनके विचार हैं।
पत्रकारिता इस समय एक संकट के दौर में है। पुराने दबावों (मालिक और सत्ता) तथा अपनी कमजोरियों के अतिरिक्त भूमंडलीकरण के इस दौर में अब एक नया खतरा उसके सामने हैµअखबारी उद्योग में विदेशी पूँजी निवेश जिसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। हमारा विश्वास है कि अखिलेश जी की यह पुस्तक न केवल धुँधलका छाँटकर परिदृश्य स्पष्ट करेगी बल्कि अपनी स्पष्ट दृष्टि से आगामी पत्रकारिता का मार्गदर्शन भी करेगी।
Bhartiya Cine-Siddhant
- Author Name:
Anupam Ojha
- Book Type:

- Description: “मैं अक्सर महसूस करता हूँ कि हमारी जनता एक तरफ़ व्यावसायिक विकृतियों का शिकार है तो दूसरी तरफ़ उन विशिष्टतावादी फ़िल्मकारों का जिनके शब्दों का उस पर कोई असर नहीं होता और जो उसे और उलझा देते हैं। मैं सोचता था कि हमारे भी गम्भीर फ़िल्मकार इस देश के मिथकों और लोक-परम्परा को उसी तरह आत्मसात् कर सकेंगे, जैसे अकीरा कुरोसावा ने जापान के क्लासिकी परम्परा को किया है और फिर एक नया लोकप्रिय फ़ॉर्म विकसित हो सकेगा। उलटे हम पाते हैं कि पश्चिम के विख्यात फ़िल्मकारों में ही उलझे हैं हमारे लोग और कभी-कभी उनकी नाजायज नक़ल भी करते हैं। हमें पहले ही नहीं मान लेना चाहिए कि जनता प्रयोग और नवीकरण के मामले में तटस्थ है।” —उत्पल दत्त हिन्दी सिनेमा एक साथ ढेर सारे मिले-जुले प्रभावों से परिचालित है। एक तरफ़ हॉलीवुड सिनेमा, लोकनाट्य रूपों तथा पारसी थियेटर की खिचड़ी, दूसरी तरफ़ पौराणिक मिथकों का लोक-लुभावन स्वरूप, तीसरी तरफ़ इटैलियन नवयथार्थवादी सिनेमा का प्रभाव। इन सबके बीच भारतीय सिनेमा के अपने मूल गुणों को पहचानने-परखने की कोशिश ही इस पुस्तक का ध्येय है। दादा साहब फाल्के ने भारतीय सिनेमा को व्याकरण के साँचे में कसने के लिए एक भारतीय सिने-सिद्धान्त की आवश्यकता महसूस की थी लेकिन वे स्वयं ऐसा कर नहीं पाए और आगे भी नहीं किया जा सका। भारतीय सिने-सिद्धान्त और सिने-कला, इतिहास, पटकथा की संरचना आदि पर छिटपुट टिप्पणियों, लेखों, विचारों को एकत्रित कर सिने-सिद्धान्त का अवलोकन इस पुस्तक के मुद्दों में केन्द्रीय है। सिनेमा की कला-भाषा का ठीक से शिक्षण नहीं होने के चलते एक दृष्टिहीन सिनेमा का व्यावसायिक लुभावना सम्मोहन समाज पर हावी है। यह पुस्तक भारतीय सिने-सिद्धान्त को लेकर किंचित् भी चिन्तित व्यक्तियों को गम्भीरता से सोचने के लिए तथ्य उपलब्ध कराएगी, साथ ही एक सामूहिक प्रयास के लिए प्रेरित करेगी।
Sirf Patrakarita
- Author Name:
Dr. Ajay Kumar Singh
- Book Type:

-
Description:
नई सदी की पत्रकारिता के समक्ष विभिन्न चुनौतियाँ हैं। मिशन पत्रकारिता का स्थान पेशेवर पत्रकारिता ने लिया है। ऐसे में वही समाचार-पत्र, मीडिया हाउस और संवाददाता अपने को स्थापित कर पाएगा, जो प्रशिक्षण के साथ-साथ अत्याधुनिक तकनीकों में दक्ष होगा। पत्रकारिता के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन के कारण प्रशिक्षण की आवश्यकता अनिवार्य हो चुकी है। वर्तमान में युवा पीढ़ी काफ़ी संख्या में पत्रकारिता का प्रशिक्षण ले रही है। यह पुस्तक पत्रकारिता के क्षेत्र में युवा समुदाय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर लिखी गई है।
इस पुस्तक में पत्रकारिता के स्वरूप, संचार प्रक्रिया तथा मॉडल, समाचार एवं उसके तत्त्व, तथा प्रिंट पत्रकारिता में समाचार सम्पादन, मुद्रण एवं पृष्ठ सज्जा, फ़ोटो पत्रकारिता, प्रेस सम्बन्धी क़ानून समेत पत्रकारिता के विविध आयामों को अत्यन्त सहज तरीक़े से समझाने का प्रयास किया गया है। पुस्तक में प्रिंट पत्रकारिता को भली-भाँति समझने के लिए पारिभाषिक शब्दावली भी दी गई है जो कि इसकी उपादेयता बढ़ाती है। यह पुस्तक विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता में स्नातक (बी.जे.एम.सी.), स्नातकोत्तर (एम.जे.एम.सी.) कर रहे विद्यार्थियों के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध हो, ऐसा प्रयास किया गया है।
Television Lekhan
- Author Name:
Asghar Wajahat
- Book Type:

-
Description:
उपन्यासकारों और कहानीकारों के लिए फ़िल्म व टेलीविज़न जैसे अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यमों के लिए लेखन-कार्य चुनौतीपूर्ण रहा है। उपन्यास और कहानी से सम्पृक्ति बनाए रखने के बावजूद पटकथा-लेखन थोड़ा अलग है। यहाँ ‘दो आँखों को चार’ बनाने की ज़रूरत पड़ती है। रचनात्मक प्रतिभा, बुनियादी जानकारी, अभ्यास और अनुशासन ही सफल पटकथा का राज़ है। यह पुस्तक विषयगत प्राथमिक जानकारियाँ देने के साथ उक्त सभी गुर बनाती है और प्रेरित भी करती है।
टेलीविज़न लेखन में व्यावहारिक पक्षों को सोदाहरण मित्रवत् शिक्षक की तरह समझाया गया है। पुस्तक हमें बताती है कि बुद्धि, विचार, संवेदना तथा प्रतिक्रिया को किस तरह गुंफित कर उसे ‘विजुलाइज’ करना है। यहाँ पृष्ठभूमि सम्बन्धित तमाम वांछित जानकारियाँ हैं। टेलीविज़न लेखन की संरचना और उसके निर्माण की सभी प्रविधियों के उल्लेख के साथ महत्त्पूर्ण और चर्चित पटकथाओं के अंश भी दिए गए हैं। जिनकी पटकथाएँ आज मानक की हैसियत अख़्तियार कर चुकी हैं, ऐसे नामचीन पटकथा लेखकों—कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, अशोक चक्रधर और अरुण प्रकाश से लिए गया साक्षात्कार विषयगत कई बारीकियाँ खोलता है। अन्त में दी गई तकनीकी शब्दावली पुस्तक को महत्त्पूर्ण बनाती है।
Samwad Samiti Ki Patrakarita
- Author Name:
Kashinath Govindrao Joglekar
- Book Type:

- Description: जानकारी शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत है। आज की व्यवस्था में जानकारी एकत्र करने और बाँटने के काम पर कुछ सीमित मीडिया समूहों और अख़बारों का एकाधिकार-सा है। छोटे अख़बार इनके मुक़ाबले टिक नहीं पाते क्योंकि वे देश-भर में संवाददाताओं का वह जाल नहीं फैला सकते जो ऐसी प्रतिस्पर्धा के लिए ज़रूरी है। संवाद समितियाँ-संवाद एजेंसियाँ कम खर्च में व्यापक क्षेत्र से विश्वसनीय समाचार एकत्र करने के महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं। उनके प्रभावी उपयोग से छोटे अख़बार बड़े और व्यापक क्षेत्र को कवर कर सकते हैं। सच कहा जाए तो लोकतांत्रिक व्यवस्था को मज़बूत करने के लिए सूचना तंत्र के विकेन्द्रीकरण में संवाद समितियों की महती भूमिका हो सकती है। पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए यह रोज़गार का महत्त्वपूर्ण माध्यम भी हो सकती हैं। संवाद समितियों के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी सरल ढंग से देनेवाली यह पुस्तक निश्चय ही पत्रकारिता से जुड़े सभी लोगों के काम आएगी, विशेषकर युवा पत्रकार वर्ग के।
Feature Lekhan : Swarup Aur Shilpa
- Author Name:
Manohar Prabhakar
- Book Type:

-
Description:
माखनलाल चतुर्वेदी कवि थे, नाटककार थे, निबन्ध लेखक भी थे, अर्थात् उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं पर अपनी क़लम चलाई थी। वे देश की स्वतंत्रता के लिए लेखनी चलानेवाले एक अग्रणी पत्रकार भी थे। उनकी पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। साहित्य और पत्रकारिता का यह संगम हमारी परम्परा में हमेशा रहा है। फिर भी यह दुर्भाग्य की बात है कि आजकल पत्रकारिता और साहित्य को दो अलग-अलग खाँचों में बाँटा जाता है। इस विभाजक रेखा को भी लाँघनेवाली विधाएँ हैं। उनमें से कुछ हैं—फ़ीचर, रिपोर्ताज, यात्रा-वृत्तान्त एवं संस्मरण।
इस पुस्तक के ज़रिए फ़ीचर लेखन के कौशल को सरल ढंग से पेश करने की कोशिश की गई है। उम्मीद है कि इससे पाठक साहित्य और पत्रकारिता की विभाजक रेखा को जोड़कर इन दोनों के सम्मिश्रण को नए सिरे से स्थापित कर सकेंगे। फ़ीचर लेखन जितनी अधिक मात्रा में होगा, उतनी ही मात्रा में साहित्य और पत्रकारिता को जनमानस में भी जुड़ा हुआ देखने की प्रवृत्ति विकसित होगी।
डॉ. मनोहर प्रभाकर ने, जो स्वयं उच्च कोटि के फ़ीचर लेखक रहे हैं और जिन्होंने ‘राजस्थान पत्रिका’, ‘नवज्योति’ एवं अन्य समाचार पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपने लेखन कौशल को पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है, इस पुस्तक में अपने अनुभवों का सार इस ढंग से प्रस्तुत किया है कि उसे सरलता से व्यवहार में लाया जा सके।
Maine Danga Dekha
- Author Name:
Manoj Mishra
- Book Type:

-
Description:
बीसवीं सदी के आख़िरी वर्ष भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में साम्प्रदायिकता और जाति के उभार के वर्ष भी रहे हैं। समय के इस मोड़ पर हमने अचानक पाया कि जैसे आधुनिकता और प्रगतिशीलता के मूल्य सहसा हमारा साथ छोड़ गए और हम विकल होकर धर्मों और जातियों की शरण ढूँढ़ने लगे। इसी प्रक्रिया में हमने असहिष्णुता और हिंसा के अनेक रूप भी देखे।
यह पुस्तक 1989 से 1996 तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों, क़स्बों और गाँवों में हुए साम्प्रदायिक और जातीय दंगों की रिपोर्टिंग का संकलन है। ये उस दौर के दंगे हैं जब मंडल और कमंडल (अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण और राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद) आन्दोलन अपने चरम पर थे। इसके परिणामस्वरूप पहले साम्प्रदायिक दंगे हुए, फिर जातीय दंगे।
यह पुस्तक पत्रकारिता में रुचि रखनेवाले सामान्य पाठकों और पत्रकारिता के छात्रों के लिए भी उपयोगी है, क्योंकि लेखक ने दंगों की रिपोर्टिंग कैसे की जाती है, इसका वर्णन इसमें किया है।
Patrakarita Ka Mahanayak : Surendra Pratap Singh
- Author Name:
Surendra Pratap
- Book Type:

-
Description:
“तो ये थीं ख़बरें आज तक, इन्तज़ार कीजिए कल तक।” एसपी यानी सुरेन्द्र प्रताप सिंह के कई परिचयों में यह भी एक परिचय था। दूरदर्शन पर प्रसारित कार्यक्रम ‘आज तक’ के सम्पादक रहते हुए एसपी सिंह सरकारी सेंसरशिप के बावजूद जितना यथार्थ बताते रहे, उतना फिर कभी किसी सम्पादक ने टीवी के परदे पर नहीं बताया।
एसपी ‘आज तक’ के सम्पादक ही नहीं थे। अपने दमखम के लिए याद की जानेवाली ‘रविवार’ पत्रिका के पीछे सम्पादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह की ही दृष्टि थी। ‘दिनमान’ की ‘विचार’ पत्रकारिता को ‘रविवार’ ने खोजी पत्रकारिता और स्पॉट रिपोर्टिंग से नया विस्तार दिया। राजनीतिक-सामाजिक हलचलों के असर का सटीक अन्दाज़ा लगाना और सरल, समझ में आनेवाली भाषा में साफ़गोई से उसका खुलासा करके सामने रख देना, उनकी पत्रकारिता का स्टाइल था। एक पूरे दौर में पाखंड और आडम्बर से आगे की पत्रकारिता एसपी के नेतृत्व में ही साकार हो रही थी।
शायद इसी वजह से उन्हें अभूतपूर्व लोकप्रियता मिली और कहा जा सकता है कि एसपी सिंह पत्रकारिता के पहले और आख़िरी सुपरस्टार थे। यह बात दावे के साथ इसलिए कही जा सकती है क्योंकि अब का दौर महानायकों का नहीं, बौने नायकों और तथाकथित नायकों का है। एसपी जब-जब सम्पादक रहे, उन्होंने कम लिखा। वैसे समय में पूरी पत्रिका, पूरा समाचार-पत्र, पूरा टीवी कार्यक्रम, उनकी ज़ुबान बोलता था। लेकिन उन्होंने जब लिखा तो ख़ूब लिखा, समाज और राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए लिखा।
जन-पक्षधरता एसपी सिंह के लेखन की केन्द्रीय विषयवस्तु है, जिससे वे न कभी बाएँ हटे, न दाएँ। इस मामले में उनके लेखन में ज़बर्दस्त निरन्तरता है। एसपी सिंह अपने लेखन से साम्प्रदायिक, पोंगापंथी, जातिवादी और अभिजन शक्तियों को लगातार असहज करते रहे। बारीक राजनीतिक समझ और आगे की सोच रखनेवाले इस खाँटी पत्रकार का लेखन आज भी सामयिक है।
यह सुरेन्द्र प्रताप सिंह की रचनाओं का पहला संचयन है।
Khabrein Vistar Se
- Author Name:
Shyam Kashyap +1
- Book Type:

-
Description:
भारतीय भाषाओं में टीवी पत्रकारिता के बारे में पढ़ने-पढ़ाने के लिए किताबें या तो लिखी ही नहीं गईं या फिर वे ऐसी नहीं हैं जो इस कमी को पूरी तरह भर सकें। हिन्दी में तो एक भी ढंग की किताब नहीं है। ‘ख़बरें विस्तार से’ का प्रकाशन इस दिशा में सार्थक प्रयास है।
टेलीविज़न के समाचारों का संकलन, सम्पादन, प्रस्तुतीकरण, वाचन और प्रसारण कैसे और किस तरह से होता है—यानी वे कौन लोग हैं जो ख़बरें लाते, बनाते और दिखाते हैं? एंकर, रिपोर्टर, प्रोड्यूसर, कैमरामैन, वीडियो एडिटर आदि बनने के लिए कहाँ जाएँ, क्या करें? या फिर समाचार चैनलों में कैसे काम होता है? ख़बरों की शूटिंग से लेकर प्रसारित होने तक में किस तरह की तकनीक का प्रयोग होता है? इन सारे सवालों का जवाब पाठक को ‘ख़बरें विस्तार से’ में मिल सकता है। इसे ठेठ भारतीय सन्दर्भ को ध्यान में रखकर लिखा गया है। यह किताब टीवी और ख़बरों की दुनिया को पूरी तरह समझने में मदद करती है। पुस्तक की रूपरेखा इस ढंग से तैयार की गई है कि पाठकों का परिचय टीवी न्यूज़ की बदलती दुनिया से भी हो और ख़बरें बनने की प्रक्रिया को समझने में भी उन्हें सुविधा हो। पुस्तक में न्यूज़ चैनलों की सम्पादकीय और तकनीकी कार्यप्रणाली की विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है। ‘ख़बरें विस्तार से’ टेलीविज़न पत्रकारिता के छात्रों व शिक्षकों के साथ सामान्य पाठकों के लिए भी उपयोगी होगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
Patrakarita : Naya Daur, Naye Pratiman
- Author Name:
Santosh Bhartiya
- Book Type:

-
Description:
संतोष भारतीय ने महत्त्वपूर्ण पत्रकारिता की है। वे कुशल संवाददाता रहे हैं और ‘चौथी दुनिया’ से सम्पादन की निपुणता भी दिखा चुके हैं। मगर फ़ैज़ के भाव में ‘कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया’ की उधेड़बुन के चलते शायद वे कहीं ठहर-से गए। राजनीति की तरफ़ वे ज़्यादा न झुकते तो और सार्थक काम करते। बहरहाल, उनकी किताब ‘पत्रकारिता : नया दौर, नए प्रतिमान’ सिरे से पढ़ने के क़ाबिल है। इसमें उनके ‘रविवार’ और ‘चौथी दुनिया’ के दिनों के संस्मरण हैं, अपने रपट-रिपोर्ताज हैं और साथ में सम्पादक-उपसम्पादक और संवाददाता आदि की ज़िम्मेवारियों का विवेचन है। इस तरह एक मायने में किताब पत्रकारिता की पाठ्य-पुस्तक बन गई है। साफ़गोई और बेबाक टिप्पणियों के लिए यह किताब अलग से जानी जाएगी। हालाँकि उनके कुछ निष्कर्ष भावुकता-भरे हैं, कुछ से आप शायद सहमत न हों। पर वे बहुत दिलचस्प हैं और हमें हिन्दी पत्रकारिता के एक अहम दौर की घटनाओं पर फिर से सोचने को उकसाते हैं।
—ओम थानवी
Jab Top Mukabil Ho
- Author Name:
Prabhash Joshi
- Book Type:

-
Description:
‘जब तोप मुकाबिल हो’ पुस्तक में प्रभाष जोशी के पत्रकारिता और मीडिया के दूसरे माध्यमों से सम्बन्धित लेखों के अलावा भाषा, अर्थ, जगत और महिलाओं से जुड़े लेख संकलित हैं। पुस्तक की भूमिका में प्रभाष जोशी लिखते हैं :
“ जब तोप मुकाबिल हो’ तो अख़बार निकालो’—ऐसा अकबर इलाहाबादी ने कहा है। आज लोग तोप का मुक़ाबला करने को अख़बार नहीं निकालते। वे पैसा और थोड़ा-बहुत पव्वा कमाने के लिए अख़बार निकालते हैं। इसलिए छापने के पैसे माँगने में भी उन्हें कोई हिचक नहीं होती। अपन ऐसी पत्रकारिता करने नहीं आए थे। आज़ादी के बाद के दूसरे दशक में लगता था कि पत्रकारिता समाज बदलने और नया समतावादी और न्याय आधारित समाज बनाने का एक माध्यम है। आज आप ऐसी बातें करें तो लोग हँसने लगते हैं। फिर भी नरसिंह राव के कहने पर मनमोहन सिंह जब सन् इक्यानबे में नवउदार आर्थिक व्यवस्था लाए तब तक भारतीय पत्रकारिता में समाज परिवर्तन की वाहक बनने की इच्छा थी। आज जो प्रवृत्तियाँ आप देख रहे और दुखी हो रहे हैं, वे सब इसके बाद की हैं।
लेकिन यहाँ जो लेख संकलित हैं, वे आज की पत्रकारिता की आलोचना में नहीं हैं। ये पत्रकारिता करने या उसे कॉलेजों में पढ़ानेवालों के लिए भी नहीं हैं। मुझे हमेशा लगता रहा कि पत्रकारिता करने और करके दिखाने की चीज़ है, उपदेश देने या सिखाने की नहीं। यह अपने काम की आत्मालोचन है और जो कर न पाए, उसका अफ़सोस भी। लेकिन यह पत्रकारिता को जनसम्पर्क अभियान या प्रकाशन उद्योग बना देने के विरुद्ध तो है ही। मुझे अब कोई पचास साल हो जाएँगे लेकिन कभी मुझे नहीं लगा कि पत्रकारिता बेकार का काम है। ऐसा होता तो अपने अख़बार में मैं लगातार लिखता नहीं रह सकता था—न दैन्यम् न पलायनम्!”
New Media : Internet ki bhashai chunotiyan aur sambhavanayen
- Author Name:
R. Anuradha
- Book Type:

-
Description:
अमरीका के रक्षा विभाग में आँकड़ों और सूचनाओं के लेन-देन को आसान बनाने के लिए स्थापित किया गया इंटरनेट अब आम आदमी तक पहुँच चुका है। समाचार माध्यमों के सहयोगी और कई जगह विकल्प के रूप में यह नए समाचार और सूचना माध्यम का रूप ले चुका है।
पत्रकारिता के इतिहास में यह एक ज़बर्दस्त मोड़ है कि यह सिर्फ़ ‘पत्रकार’ का गढ़ नहीं रह गई है। पत्रकार और पत्रकारिता की परिभाषाएँ भी बदल रही हैं। नए संचार माध्यम तकनीकी रूप से बेहद समृद्ध हैं, लेकिन भिन्न आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों में इन तक लोगों की वास्तविक पहुँच, इनके उपयोग और असर की सीमाएँ हो सकती हैं। लेकिन निश्चित रूप से न्यू मीडिया की परिघटना क्षणिक आवेग या अस्थायी या किसी भौगोलिक क्षेत्र की सीमा में बँधी हुई नहीं है। एक ख़ास बात यह भी है कि इस सार्वभौम नेटवर्क के रूप, उपयोग के तरीक़ों में बदलाव भी सतत होता रहेगा।
नए माध्यमों का आना हमारे देश को किस तरह से प्रभावित कर रहा है? यह सिर्फ़ एक विकल्प है या फिर मुख्यधारा का सशक्त पत्रकारीय औज़ार? जन सूचना माध्यम के रूप में इसकी क्या सीमाएँ और शक्तियाँ हैं और इसके आगे बढ़ने के रास्ते में कौन-सी चुनौतियाँ इस समय देखी जा रही हैं? हमारे अपने देश की भाषाओं में इसके इस्तेमाल के लिए क्या सुविधाएँ उपलब्ध हैं और तकनीकी स्तर पर इसमें क्या रुकावटें हैं? ऐसे कई सवाल इस समय किसी भी मीडियाकर्मी या जिज्ञासु के सामने हैं। इन सवालों पर नए माध्यमों के कुछ सशक्त उपयोगकर्ताओं और विशेषज्ञों ने अपने पक्ष इस पुस्तक के विभिन्न अध्यायों के रूप में रखे हैं।
—‘पुस्तक परिचय’ से
Hindi Patrakarita Ka Pratinidhi Sankalan
- Author Name:
Tarushikha Surjan
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी पत्रकारिता की डेढ़ सदी की यात्रा को एक पुस्तक में समाहित करने का यह प्रयास सराहनीय है। देश और समाज के निर्माण में हिन्दी पत्रकारिता की अपनी एक विशिष्ट और महती भूमिका रही है। यह संकलन न केवल महत्त्वपूर्ण सम्पादकों व पत्रकारों की लेखनी से परिचय कराता है, बल्कि पत्रकारिता के वास्तविक व आदर्श स्वरूप का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ भी प्रस्तुत करता है। हिन्दी पत्रकारिता अपने उद्भव काल से अभी तक जिन-जिन पड़ावों से गुज़री है, उनका भी दिग्दर्शन इस संकलन में होता है।
यह संकलन हिन्दी पत्रकारिता के अध्ययन और अध्यापन से जुड़े वर्ग के लिए भी एक मानक सन्दर्भ पुस्तक सिद्ध होगी—ऐसा मेरा विश्वास है। इस वृहद् कालखंड को समूची समग्रता के साथ अपने भीतर समेटे हुए इस संकलन में सम्मिलित किए गए मूर्धन्य पत्रकारों के सम्पादकीय वस्तुतः देश, समाज और विश्व को समझने के लिए भी एक उजली खिड़की उपलब्ध कराते हैं।
—भीष्म नारायण सिंह
(भूतपूर्व राज्यपाल एवं केन्द्रीय मंत्री)
Web Patrikarita : Naya Media Aur Rujhan
- Author Name:
Shalini Joshi +1
- Book Type:

-
Description:
एक ऐसे दौर में जब मीडिया प्रिंट, रेडियो और टीवी से होता हुआ वेब पर उतर आया है और वहाँ भी उसके कई रूप दिखने लगे हैं, ऐसे न्यू मीडिया के दौर में जर्नलिज़्म से जुड़े छात्रों, शोधकर्ताओं और अध्यापकों, पेशेवरों और विशेषज्ञों के सामने कुछ नई चुनौतियाँ और सवाल भी आए हैं। न्यू मीडिया कमोबेश उसी समय प्रकट हुआ जब ग्लोबल विलेज की अवधारणा ज़ोर मार रही थी, भूमंडलीकरण ने आकार ग्रहण कर लिया था और नवउदारवादी शर्तें व्यापक कॉरपोरेट मिज़ाज का निर्माण कर रही थीं।
आधुनिकतम तकनीकी से लैस इस मीडिया सिस्टम में नए सवाल और नई पेचीदगियाँ भी जुड़ती जा रही हैं। उन्हें समझने, उनके हल के औज़ार तैयार करने के लिए एक बिलकुल ही नए तेवर वाले मुस्तैद जर्नलिस्ट की दरकार है। कहने को वे मल्टीमीडिया न्यूज़पर्सन होंगे लेकिन उन्हें सिर्फ़ स्किल्स में ही दक्षता हासिल नहीं करनी होगी बल्कि उन्हें समाचार के बुनियादी मूल्यों और अपने पेशे की बुनियादी नैतिकताओं पर भी फिर से नज़र डालनी होगी। उन्हें नए ढंग से विश्वसनीयता और प्रामाणिकता हासिल करनी होगी जो इधर कॉरपोरेट मीडिया के विभिन्न क़िस्मों के दबावों, स्वार्थों और लालचों में कमज़ोर पड़ गई है या बिखर गई है या मिटा ही दी जा रही है।
न्यू मीडिया सिर्फ़ वेब का ही मीडिया नहीं माना जाना चाहिए, इसे विश्वास का भी न्यू मीडिया समझना चाहिए। ऐसा करते हुए हमें डॉ. शिलर का यह कथन भी नहीं भूलना चाहिए कि कथित विविधता सांस्कृतिक परजीवीपन है। इसे सांस्कृतिक वैविध्य नहीं समझना चाहिए। प्रस्तुत किताब इंटरनेट की इन तात्कालिक कमज़ोरियों और अन्तर्विरोधों की ओर भी इशारा करती है। यह किताब वेब मीडिया के छात्रों और प्रशिक्षुओं को इस माध्यम की बारीकियों के बारे में बताते हुए लिखी गई है। यह उन सहूलियतों का भी विवरण पेश करती है जो न्यू मीडियाकर्मी के लिए हो सकती हैं। और इसमें पत्रकारिता के बुनियादी उसूल, समाचार ज़रूरतें, भाषा और प्रयोग की विविधताओं जैसे पाठ तो स्वाभाविक रूप से शामिल हैं ही।
Photo Patrakarita
- Author Name:
Dhananjai Chopra
- Book Type:

- Description: हमारा समय विजुअल कम्युनिकेशन यानी दृश्य संचार का समय है। वास्तविक दुनिया हो या आभासी दुनिया, हर तरफ छवियां ही छवियां हैं। कास्टिंग के लगभग सारे उपक्रम यानी प्रिंटकास्ट, ब्रॉडकास्ट, टेलीकास्ट, वेबकास्ट और ह्यूमनकास्ट अनायास ही छवियों के अधिकाधिक प्रयोग की होड़ में शामिल हो गए हैं। संचार के क्षेत्र में छवियों यानी दृश्यों के इस तरह प्रयोग से जन-संप्रेषण की दुनिया में बड़ा बदलाव आया है। इस बदलाव का कारण बना, हमारे मोबाइल फोन में कैमरे का आ जाना। इक्वींसवीं सदी के प्रारंभ से ही लोगों ने अपने आसपास के दृश्यों को सहेजना शुरू कर दिया था। दृश्यों के माध्यम से जन इतिहास का लिखा जाना यह बता रहा था कि आने वाले समय में शब्दों से कहीं अधिक दृश्य पढ़े जाएंगे। हुआ भी यही, हमने एक ऐसे समाज की रचना कर ली है, जिसमें दृश्य संचार के बिना रह पाना मुश्किल हो रहा है। टेक्नोलॉजी के बलबूते बदलती दुनिया और बदलते समय में दृश्य संस्कृति विकसित हो रही है। दृश्य गढ़े जा रहे हैं, रचे जा रहे हैं, प्रस्तुत किए जा रहे हैं और पढ़े जा रहे हैं। अब से पहले इतने अधिक दृश्यों का आदान-प्रदान कभी नहीं हुआ था। दरअसल यह दृश्य विस्फोट यानी विजुअल एक्सप्लोजन का समय है। यह फोटोग्राफी और फोटो पत्रकारिता को सीखने, समझने, सहेजने और संचरित करने का अप्रतिम समय है।
Khel Patrakarita
- Author Name:
Sushil Doshi +1
- Book Type:

-
Description:
आजकल मीडिया में क्रिकेट इस क़दर छाया हुआ है कि वह खेल का पर्याय-सा बन गया है। सौभाग्यवश इस देश के कुछ हिस्सों में, कुछ व्यक्तियों में, और दुनिया के बहुत से देशों में दूसरे खेलों की लोकप्रियता खेल के व्यापक फलक को सही ढंग से उजागर करती है। खेल पत्रकारिता के लिए आप में एक अच्छे पत्रकार के सभी गुण होने चाहिए, परन्तु उसके अलावा खेल के क्षेत्र की विशिष्टताओं को ध्यान में रखते हुए कुछ और बातें भी ज़रूरी हैं। खेल पत्रकारिता केवल वर्णनात्मक नहीं है, उसमें विश्लेषण और मौलिकता के लिए भी एक बड़ा दायरा उपलब्ध रहता है। खेल अपने आप में तो दिलचस्प होता ही है, परन्तु समाचार-पत्रों में उसकी प्रस्तुति उसे और अधिक दिलचस्प बना देती है। खेल के रस और आनन्द को शब्दों के माध्यम से ऐसे पेश करना जिसमें खेल देखने से अधिक उसका समाचार पढ़ने में रस और आनन्द आए सफल खेल पत्रकारिता का मापदंड है।
अच्छी खेल पत्रकारिता के लिए ज़रूरी ज्ञान और कौशल देनेवाली यह पुस्तक उन सबके लिए उपयोगी है जो खेल के निरन्तर लोकप्रिय हो रहे क्षेत्र में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं।
Soochana Praudyogikee Aur Samachar Patra
- Author Name:
Ravindra Shukla
- Book Type:

-
Description:
आधुनिक कम्प्यूटर के सहारे परवान चढ़ा सूचना युग आज सर्वव्यापी है। सूचना प्रौद्योगिकी और उसका इंटरनेट-महाजाल आज समाज के बड़े भाग की रोज़मर्रा ज़िन्दगी को प्रभावित कर रहे हैं। अनेक चिन्तकों ने इसकी भविष्यवाणी दशकों पहले ही कर दी थी, पर जो सामने आया वह भविष्यवाणियों से कहीं ज़्यादा था। इंटरनेट, जो नए मीडिया के रूप में उभरा, पुराने प्रिंट मीडिया के लिए ख़तरे की घंटी के रूप में देखा जाने लगा। एक समय में अख़बारों के प्रसार और विज्ञापन में लगभग स्थिरता से प्रिंट मीडिया में चिन्ता की लहरें छा गईं, किन्तु उनसे उबरते देर भी नहीं लगी क्योंकि एक सार्वजनिक मीडिया के रूप में इंटरनेट जन-जन में ग्राह्य नहीं हो पाया और छपे हुए शब्द की महत्ता बनी रही। यह पुस्तक इन तथ्यों और विषय-उपविषयों को वर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक रूप में अध्याय-दर-अध्याय रखते हुए अपने निष्कर्ष की ओर बढ़ती है।
इसमें सूचना क्रान्ति और सूचना युग की विशेषता और कतिपय ज़रूरी तकनीकी शब्दों से परिचित कराते हुए देश-विदेश में इंटरनेट के विकास का जायजा लिया गया है। पुराने (प्रिंट) और (इंटरनेट) मीडिया की तुलना है तो यह भी शामिल है कि इंटरनेट पर भारतीय अख़बार और पत्रिकाओं का पदार्पण कैसे हुआ, इसमें भाषा की समस्या क्या थी और उसे सुलझाने के क्या उपाय हुए। पहले-पहल जो अख़बार और पत्रिकाएँ इंटरनेट पर आए, उनकी एक सूची और हिन्दी के कुछ अख़बारों के इंटरनेट संस्करणों के नमूने भी इसमें हैं। इंटरनेट बनाम अख़बार के तहत जहाँ एक तुलनात्मक अध्ययन किया गया है, वहीं इंटरनेट और बाज़ारवाद के दोहरे प्रहारों के चलते अख़बारों के विज्ञापन, प्रसार और विषय-वस्तु में आ रहे बदलावों का भी विश्लेषण है।
इसके अलावा यह पुस्तक इंटरनेट और लोगों के प्रजातांत्रिक अधिकारों के अन्तर्सम्बन्धों पर भी दृष्टिपात करती है। कई लब्धप्रतिष्ठ पत्रकारों के साक्षात्कारों, विभिन्न रिपोर्टों और कृतियों से लिए गए उद्धरणों और सांख्यिकी के ज़रिए विवेचना को पुष्ट बनाया गया है, जिसका निष्कर्ष कुछ रोचक दृष्टान्तों के साथ मन्थन में है। इसका सार वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी की इस समापन टिप्पणी में है कि ‘जब तक मनुष्य की लिखने-पढ़ने में रुचि रहेगी तब तक काग़ज़ और क़लम से उसका जुड़ाव रहेगा और तब तक अख़बारों को भी कोई समाप्त नहीं कर सकेगा।’
Patkatha Lekhan : Vyavaharik Nirdeshika
- Author Name:
Asghar Wajahat
- Book Type:

- Description: फ़िल्मों और टी.वी. के सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम, धारावाहिक के लिए पटकथा अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त डाक्यूड्रामा और डाक्यूमेंट्री फ़िल्मों के लिए भी दृश्य-श्रव्य केन्द्रित लेखन आवश्यक है। फ़िल्म और टेलीविज़न के व्यापक होते क्षेत्र में शिक्षापरक/ज्ञानपरक मल्टीमीडिया कार्यक्रम भी आकर जुड़ गए हैं। ज्ञान और शिक्षा के अपार भंडार को दृश्य-श्रव्य माध्यम से उपलब्ध कराने की चुनौती भारत सरकार के मानव-संसाधन मंत्रालय के अतिरिक्त अनेक अन्य संगठनों ने ली है। प्रोग्राम प्रोडक्शन के क्षेत्र में यदि अभाव है तो पटकथा लेखकों का है। इसके कई कारण हैं। प्रोग्राम प्रोडक्शन सम्बन्धी तकनीकी प्रशिक्षण देने की तुलना में पटकथा-लेखन के पाठ्यक्रम बहुत कम हैं। जिन संस्थानों में पटकथा-लेखन के कार्यक्रम चलाए जाते हैं, वहाँ प्रायः अच्छे शिक्षकों की कमी बनी रहती है और यह भी ज़रूरी नहीं है कि अच्छा पटकथा लेखक अच्छा शिक्षक भी हो। प्रस्तुत पुस्तक में सिनेमा के इतिहास, सैद्धान्तिकी और समीक्षा इत्यादि पर कोई चर्चा नहीं की गई है, क्योंकि पुस्तक का उद्देश्य पटकथा के व्यावहारिक पक्ष को सामने लाना है। यह पुस्तक पटकथा-लेखन में रुचि लेनेवाले विद्यार्थियों तथा अन्य सभी पाठकों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। इस व्यावहारिक निर्देशिका में पटकथा के एक-एक बिन्दु की चर्चा की गई है। पुस्तक का उद्देश्य है कि इसके माध्यम से पटकथा-लेखन की तकनीक सीखी जा सके।
Vigyapan Aur Jansampark
- Author Name:
Mukti Nath Jha
- Book Type:

-
Description:
यह पुस्तक विज्ञापन और जनसम्पर्क संचार की विधा को रेखांकित करती है। इस पुस्तक में विज्ञापन के विविध स्वरूपों की विस्तार से चर्चा की गई है। विज्ञापन को परिभाषित करते हुए इसके विविध प्रकार, माध्यमों एवं लाभ की विस्तृत विवेचना की गई है। जनसम्पर्क की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए जनसम्पर्क की विविध विधाओं पर विस्तार से चर्चा की है। कारपोरेट जनसम्पर्क की आवश्यकता और उपयोगिता की विस्तृत विवेचना इस पुस्तक को और भी उपयोगी बनाती है।
भारत सरकार की नई शिक्षा नीति के पाठ्यक्रमानुसार लिखित यह पुस्तक जहाँ एक ओर पत्रकारिता एवं जनसंचार के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी वहीं दूसरी ओर विज्ञापन एवं जनसम्पर्क के क्षेत्र में कार्यरत लोगों के लिए भी मार्गदर्शक के रूप में लाभप्रद होगी।
Idea Se Parde Tak : Kaise Sochta Hai Film Ka Lekhak?
- Author Name:
Ramkumar Singh +1
- Book Type:

- Description: यह किताब सिनेमा के एक सहयोगी पेशेवर के रूप में फ़िल्म-लेखक के कामकाज का सिलसिलेवार वृत्तान्त प्रस्तुत करती है। फ़िल्म का अपना तौर-तरीक़ा है, जिसके दायरे में रहकर ही फ़िल्म-लेखक को काम करना पड़ता है। इसलिए एक हद तक अपनी स्वायत भूमिका रखने के बावजूद उसको अपना काम करते हुए निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, कैमरा-निर्देशक आदि अनेक सहयोगी पेशेवरों के साथ संगति का ख़याल रखना पड़ता है। ज़ाहिर है, फ़िल्म-लेखन जिस हद तक कला है, उसी हद तक शिल्प और तकनीक भी। एक सफल फ़िल्म लेखक बनने के लिए जितनी ज़रूरत प्रतिभा की है, उतनी ही परिश्रम, कौशल, अनुशासन और समन्वय की। सबसे लोकप्रिय कला के रूप में अपनी जगह बना चुका सिनेमा आज एक महत्त्वपूर्ण इंडस्ट्री भी है जो लाखों-लाख युवाओं के सपनों का केन्द्र बन चुकी है। ऐसे में फ़िल्म-लेखन की दिशा में कदम बढ़ाने वालों के लिए यह किताब एक अपरिहार्य हैण्डबुक की तरह है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book