Khel Sirf Khel Nahin Hai
Author:
Prabhash JoshiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Media0 Ratings
Price: ₹ 160
₹
200
Available
‘खेल सिर्फ़ खेल नहीं है’ पुस्तक में प्रभाष जोशी द्वारा खेल पर लिखे गए लेख संकलित हैं। इन लेखों से हिन्दी में खेल विश्लेषण का पूरा परिदृश्य ही बदल गया था।</p>
<p>प्रभाष जोशी ने अपनी भूमिका में लिखा है :</p>
<p>“इस पुस्तक में वे लेख दिए गए हैं जो मैंने खेल पर लिखे। अब जिस तरह राजनीति पर सम्पादकीय पेज पर सम्पादकीय या मुख्य लेख या जब ज़रूरी हुआ, पहले पेज पर लिखता रहा। उसी तरह खेल जैसे खेले जाते रहे—पहले पेज, आख़िरी पेज और सम्पादकीय पेज पर कवर करता रहा। ऐसा करते हुए जो बच जाता था या जिसके मानवीय पहलू के लिए ख़बर में गुंजाइश नहीं होती थी, वही कागद कारे में आया।</p>
<p>खेल को महज़ एक मनोरंजन या शारीरिक व्यायाम मैं नहीं मानता। खेल मनुष्य का चरित्र बनाता है लेकिन उससे भी ज़्यादा खेल में मनुष्य का चरित्र व्यक्त और प्रकट होता है। अंग्रेज़ माँ के कैनेडियन बेटे ग्रेग रूज़ेस्की ने अमेरिकी माइकल चांग से एक मैच में एक सेट जीता, एक हारा और तीसरे सेट में चार-चार गेम पर थे। रूज़ेस्की सर्व कर रहा था तीस-तीस पर। गेम जीतने के लिए दो पाइंट और चाहिए थे। किसी तरह वह ड्यूस पर आया और फिर एडवांटेज पर। एक पाइंट के बाद गेम उसका होना था। सर्व करने के पहले रूज़ेस्की ने अपने पर क्रॉस बनाया और गेंद चूमी। तभी मुझे लगा कि गेम यह हार जाएगा। रूज़ेस्की ने सर्विस की और नेट में मार दी और फिर मार के डबन फॉल्ट कर दिया। चांग को मौक़ा मिला और वह गेम और सेट दोनों ले गया। तब रूज़ेस्की की सर्विस गोले जैसे होती थी और उसका कैरियर बन रहा था। मैंने लिखा कि वह कभी कोई ग्रैंड स्लेम जीत नहीं पाएगा। जीता भी नहीं और अब तो खेलता भी नहीं। उस मैच के सबसे नाजुक और निर्णायक मौक़े पर रूज़ेस्की का अपने पर विश्वास नहीं था, इसलिए उसने क्रॉस बनाया और गेंद चूमी। सबसे कठिन घड़ी में जिसका अपने पर विश्वास नहीं होता, उससे कुछ भी जीता नहीं जाएगा।</p>
<p>मैं क्रिकेट, टेनिस, फुटबॉल जैसे खेल इन्हीं नाजुक और कठिन घड़ियों में खिलाड़ियों और टीमों के चरित्र समझने के लिए देखता हूँ। महज़ मन बहलाने के लिए नहीं। खेल सचमुच एक अनुशासन है जो मनुष्य को पूरा बनाता और प्रकट करता है।”
ISBN: 9788126716364
Pages: 352
Avg Reading Time: 12 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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अमरीका के रक्षा विभाग में आँकड़ों और सूचनाओं के लेन-देन को आसान बनाने के लिए स्थापित किया गया इंटरनेट अब आम आदमी तक पहुँच चुका है। समाचार माध्यमों के सहयोगी और कई जगह विकल्प के रूप में यह नए समाचार और सूचना माध्यम का रूप ले चुका है।
पत्रकारिता के इतिहास में यह एक ज़बर्दस्त मोड़ है कि यह सिर्फ़ ‘पत्रकार’ का गढ़ नहीं रह गई है। पत्रकार और पत्रकारिता की परिभाषाएँ भी बदल रही हैं। नए संचार माध्यम तकनीकी रूप से बेहद समृद्ध हैं, लेकिन भिन्न आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों में इन तक लोगों की वास्तविक पहुँच, इनके उपयोग और असर की सीमाएँ हो सकती हैं। लेकिन निश्चित रूप से न्यू मीडिया की परिघटना क्षणिक आवेग या अस्थायी या किसी भौगोलिक क्षेत्र की सीमा में बँधी हुई नहीं है। एक ख़ास बात यह भी है कि इस सार्वभौम नेटवर्क के रूप, उपयोग के तरीक़ों में बदलाव भी सतत होता रहेगा।
नए माध्यमों का आना हमारे देश को किस तरह से प्रभावित कर रहा है? यह सिर्फ़ एक विकल्प है या फिर मुख्यधारा का सशक्त पत्रकारीय औज़ार? जन सूचना माध्यम के रूप में इसकी क्या सीमाएँ और शक्तियाँ हैं और इसके आगे बढ़ने के रास्ते में कौन-सी चुनौतियाँ इस समय देखी जा रही हैं? हमारे अपने देश की भाषाओं में इसके इस्तेमाल के लिए क्या सुविधाएँ उपलब्ध हैं और तकनीकी स्तर पर इसमें क्या रुकावटें हैं? ऐसे कई सवाल इस समय किसी भी मीडियाकर्मी या जिज्ञासु के सामने हैं। इन सवालों पर नए माध्यमों के कुछ सशक्त उपयोगकर्ताओं और विशेषज्ञों ने अपने पक्ष इस पुस्तक के विभिन्न अध्यायों के रूप में रखे हैं।
—‘पुस्तक परिचय’ से
Chautha Khambha (Private) Limited
- Author Name:
Dilip Mandal
- Book Type:

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Description:
जनविरोधी होना मीडिया का षड्यंत्र नहीं, बल्कि उसकी संरचनात्मक मजबूरी है। एक समय था जब मास मीडिया पर यह आरोप लगता था कि वह कॉरपोरेट हित में काम करता है। 21वीं सदी में मीडिया ख़ुद कॉरपोरेट है और अपने हित में काम करता करता है। कॉरपोरेट मीडिया यानी अख़बार, पत्रिकाएँ, चैनल और अब बड़े वेबसाइट भी प्रकारान्तर में पूँजी की विचारधारा, दक्षिणपन्थ, साम्प्रदायिकता, जातिवाद और तमाम जनविरोधी नीतियों के पक्ष में वैचारिक गोलबन्दी करने की कोशिश करते नज़र आते हैं। पश्चिमी देशों के मीडिया तंत्र को समझने के लिए नोम चोम्स्की और एडवर्ड एस. हरमन ने एक प्रोपेगंडा मॉडल दिया था। इसके मुताबिक़, मीडिया को परखने के लिए उसके मालिकाना स्वरूप, उसके कमाई के तरीक़े और ख़बरों के उसके स्रोत का अध्ययन किया जाना चाहिए। इस मॉडल के आधार पर चोम्स्की और हरमन इस नतीजे पर पहुँचे कि अमेरिकी और यूरोपीय मीडिया का पूँजीपतियों के पक्ष में खड़ा होना और दुनिया-भर के तमाम हिस्सों में साम्राज्यवादी हमलों का समर्थन करना किसी षड्यंत्र के तहत नहीं है। मीडिया अपनी आन्तरिक संरचना के कारण यही कर सकता है। साम्राज्यवाद को टिकाए रखने में मीडिया कॉरपोरेशंस का अपना हित है। उसी तरह, पूँजीवादी विचार को मज़बूत बनाए रखने में मीडिया का अपना स्वार्थ है।
भारत के सन्दर्भ में चोम्स्की और हरमन के प्रोपेगंडा मॉडल में एक तत्त्व और जुड़ता है। वह है भारत की सामाजिक संरचना। इस नए आयाम की वजह से भारतीय मुख्यधारा का मीडिया पूँजीवादी के साथ-साथ जातिवादी भी बन जाता है। उच्च और मध्यवर्ग में, ऊपर की जातियों की दख़ल ज़्यादा होने के कारण मीडिया के लिए आर्थिक रूप से भी ज़रूरी है कि वह उन जातियों के हितों की रक्षा करे। आख़िर इन्हीं वर्गों से ऐसे लोग ज़्यादा आते हैं, जो महत्त्वपूर्ण ख़रीदार हैं और इनकी वजह से विज्ञापनदाताओं को मीडिया में इनकी उपस्थिति चाहिए। यह एक ऐसा दुश्चक्र है, जिसकी वजह से भारतीय मीडिया न सिर्फ़ गरीबों, किसानों, ग्रामीणों और मज़दूरों बल्कि पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों की भी अनदेखी करता है। मीडिया के इस स्वरूप के पीछे किसी की बदमाशी या किसी का षड्यंत्र नहीं है। यह मीडिया और समाज की संरचनात्मक बनावट और इन दोनों के अन्तर्सम्बन्धों का परिणाम है। प्रस्तुत किताब इन्हीं अन्तर्सम्बन्धों को समझने की कोशिश है। इसे जानना मीडिया के विद्यार्थियों के साथ ही तमाम भारतीय नागरिकों के लिए आवश्यक है, क्योंकि जाने-अनजाने हम सब मीडिया से प्रभावित हो रहे हैं।
Photo Patrakarita
- Author Name:
Dhananjai Chopra
- Book Type:

- Description: हमारा समय विजुअल कम्युनिकेशन यानी दृश्य संचार का समय है। वास्तविक दुनिया हो या आभासी दुनिया, हर तरफ छवियां ही छवियां हैं। कास्टिंग के लगभग सारे उपक्रम यानी प्रिंटकास्ट, ब्रॉडकास्ट, टेलीकास्ट, वेबकास्ट और ह्यूमनकास्ट अनायास ही छवियों के अधिकाधिक प्रयोग की होड़ में शामिल हो गए हैं। संचार के क्षेत्र में छवियों यानी दृश्यों के इस तरह प्रयोग से जन-संप्रेषण की दुनिया में बड़ा बदलाव आया है। इस बदलाव का कारण बना, हमारे मोबाइल फोन में कैमरे का आ जाना। इक्वींसवीं सदी के प्रारंभ से ही लोगों ने अपने आसपास के दृश्यों को सहेजना शुरू कर दिया था। दृश्यों के माध्यम से जन इतिहास का लिखा जाना यह बता रहा था कि आने वाले समय में शब्दों से कहीं अधिक दृश्य पढ़े जाएंगे। हुआ भी यही, हमने एक ऐसे समाज की रचना कर ली है, जिसमें दृश्य संचार के बिना रह पाना मुश्किल हो रहा है। टेक्नोलॉजी के बलबूते बदलती दुनिया और बदलते समय में दृश्य संस्कृति विकसित हो रही है। दृश्य गढ़े जा रहे हैं, रचे जा रहे हैं, प्रस्तुत किए जा रहे हैं और पढ़े जा रहे हैं। अब से पहले इतने अधिक दृश्यों का आदान-प्रदान कभी नहीं हुआ था। दरअसल यह दृश्य विस्फोट यानी विजुअल एक्सप्लोजन का समय है। यह फोटोग्राफी और फोटो पत्रकारिता को सीखने, समझने, सहेजने और संचरित करने का अप्रतिम समय है।
Electronic Patrakarita
- Author Name:
Dr. Ajay Kumar Singh
- Book Type:

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Description:
सूचना क्रान्ति के इस युग में, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र जैसे रेडियो, एफएम. चैनल, टेलीविज़न, फ़ोटोग्राफ़ी तथा टेलीविज़न प्रोडक्शन के क्षेत्र में, रोज़गार के अवसर निरन्तर बढ़ते जा रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के तकनीकी एवं प्रायोगिक पक्ष को समझने के लिए हिन्दी की ऐसी पुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं, जो भावी पत्रकारों को इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता का आधुनिक एवं प्रायोगिक ज्ञान उपलब्ध करा सकें।
यह पुस्तक विशेष रूप से टेलीविज़न, रेडियो, फ़ोटोग्राफ़ी, फ़िल्म एवं इंटरनेट के क्षेत्र में क़दम रखनेवाले युवा पत्रकारों को ध्यान में रखकर लिखी गई है।
इस पुस्तक में इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के फ़ोटोग्राफ़ी, रेडियो तथा टेलीविज़न चैनलों की कार्यप्रणाली, प्रयोग होनेवाले उपकरण, प्रोडक्शन टीम की भूमिका, स्क्रिप्ट राइटिंग, कैमरे एवं लाइटिंग का प्रयोग तथा वीडियो एडिटिंग को सरल-सहज तरीक़े से समझाया गया है। पुस्तक में इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रयोग होनेवाले शब्दों एवं उपकरणों का शब्दकोश भी दिया गया है जिससे कि टेलीविज़न, फ़ोटोग्राफ़ी तथा रेडियो के क्षेत्र में प्रशिक्षण प्राप्त करनेवाले छात्रों के साथ जनमानस भी इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता की दुनिया को भली-भाँति समझ सकें।
Mitata Bharat Banta India
- Author Name:
Shashi Shekhar Tiwari
- Book Type:

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Description:
20वीं सदी के अन्तिम दशक में भारत की राजसत्ता द्वारा अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में उदारीकरण की नीति अपनाई गई। धीरे-धीरे बाज़ार मुक्त किया जाने लगा तथा अनेक महत्त्वपूर्ण सरकारी क्षेत्रों के निजीकरण होने लगे। इस पहल का भारतीय समाज की संरचना पर गहरा असर हुआ। उसके आधार पर ऊपरी ढाँचे में अनेक निर्णायक परिवर्तन घटित होने लगे। उसका प्रभाव राजनीति, समाज, शिक्षा, जीवन-शैली तथा अन्तरराष्ट्रीय मामलों पर सीधे दिखाई देने लगा। 21वीं सदी के पहले दशक में इस परिवर्तन को जिन लोगों ने सबसे पहले पहचानने की कोशिश की, उनमें शशि शेखर पहली क़तार में हैं।
उदारीकरण की आँधी में मिटते भारत और बनते इंडिया की गूँज अगर सुननी हो तो शशि शेखर की इस पुस्तक के इन लेखों को पढ़ जाइए। 2001 से 2010 के बीच उन्होंने लगभग हर हफ़्ते अपने कॉलम ‘आजकल’ में अपने समय का साप्ताहिक इतिहास दर्ज किया है। यह पुस्तक इस कॉलम के उन्हीं लेखों का संकलन है। इन लेखों के द्वारा आप शशि शेखर के नज़रिए से 21वीं सदी के पहले दशक की धड़कनों की समग्रता में महसूस कर सकेंगे। इन लेखों में समय पर बहस है। समय से शिकायत है। समय की प्रशंसा है। समय की कठोरता को जीत लेने का दम-खम है। समय के वास्तविक स्वरूप को पहचानने का तीक्ष्ण विवेक भी है।
Naye Jan-Sanchar Madhyam Aur Hindi
- Author Name:
Sudhish Pachauri
- Book Type:

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Description:
नए जन-संचार माध्यमों में हिन्दी का प्रयोग बढ़ रहा है। हर प्रक्रिया में माध्यम बदल रहे हैं, हिन्दी भी बदल रही है। नए रूप बन रहे हैं। माध्यमों में भाषा ने स्वयं एक संचार किया है।
बदलती भाषा संचार की अनन्त अन्तर्क्रियाओं को जन्म दे रही है। हिन्दी के सामने नई चुनौतियाँ उपस्थित हैं और उतनी ही चुनौतियाँ माध्यमकर्मियों के सामने हैं।
बी.बी.सी. ने नए जन-संचार माध्यमों में हिन्दी के स्वरूप को लेकर इसीलिए एक राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया। सेमिनार की सामग्री इस किताब में पाठकों के लिए उपलब्ध है।
यहाँ पाठकों को पहली बार बी.बी.सी. वेबसाइट की ‘स्टाइल बुक’ का परिचय मिलेगा। मीडिया का हिन्दी शब्दकोश होना चाहिए; एक पदावली कोश भी—इस तरफ़ कुछ इशारे यहाँ दिए गए हैं।
उम्मीद है कि यह किताब नए जन-संचार माध्यमों के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।
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