Patrakarita : Mission se Media tak
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Author:
Vandana Mishra, Akhilesh MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
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यह पुस्तक अपने पेशे के सहकर्मियों और पाठकों के साथ एक ऐसे व्यक्ति की बहस, नोक-झोंक है जो चीजों को उनके सही नाम से पुकारता है, धुँधलके में रहना और किसी को रखना पसंद नहीं करता। वह व्यक्ति थेµ अखिलेश मिश्र, जिनकी धर्म-संस्कृति विषयक पुस्तक ‘धर्म का मर्म’ पाठक पढ़ चुके हैं।</p> <p>इस पुस्तक में अखिलेश जी के वे लेख संकलित हैं जिनमें उन्होंने पत्रकारिता के विविध आयामों, उसकी समस्याओं, संकटों, उसके विचलनों, उसकी ताकत और कमजोरियों की चर्चा की है। पुस्तक चार खंडों में है। पहले खंड में वे लेख हैं जिनमें पत्रकारिता सम्बन्धी विविध विषयों, समस्याओं का गहन विश्लेषण है। द्वितीय खंड में ‘वर्कर्स हेरल्ड’ में लिखे उनके वे संपादकीय हैं जिनका विषय पत्रकार अथवा पत्रकारिता है। इस खंड का पहला आलेख ‘स्वतंत्र भारत’ में लगभग सत्रह वर्ष तक अनवरत चले उनके पाक्षिक स्तम्भ ‘दिल्ली का रंगमंच’ से लिया गया है। इसमें श्री मिश्र ने लोकतान्त्रिाक मूल्यों में गहरी आस्था के लिए जाने जानेवाले नेहरू जैसे प्रधानमंत्राी की भी अखबारों की उस आजादी के प्रति नाराजगी को पकड़ा है जो सत्ता के लिए परेशानी पैदा कर दे।</p> <p>खंड तीन में ‘वर्कर्स हेरल्ड’ में ही संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित वे लेख लिये गए हैं जिनमें पत्रकारिता के सरोकारों की चर्चा है। इस खंड में अन्य अनेक समस्याएँ उठाने के अतिरिक्त लेखक ‘श्रम नीति का दुरंगापन’ बेपर्दा करते हुए ‘पत्रकारों की सुरक्षा’ के सवाल से जुड़ी पेचीदगियों से दो-चार होता है। खंड चार में दो लेख शामिल हैं, जिनमें समाचार क्या है, कैसे लिखे जाते हैं, आदि व्यावहारिक पहलुओं पर उनके विचार हैं।</p> <p>पत्रकारिता इस समय एक संकट के दौर में है। पुराने दबावों (मालिक और सत्ता) तथा अपनी कमजोरियों के अतिरिक्त भूमंडलीकरण के इस दौर में अब एक नया खतरा उसके सामने हैµअखबारी उद्योग में विदेशी पूँजी निवेश जिसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। हमारा विश्वास है कि अखिलेश जी की यह पुस्तक न केवल धुँधलका छाँटकर परिदृश्य स्पष्ट करेगी बल्कि अपनी स्पष्ट दृष्टि से आगामी पत्रकारिता का मार्गदर्शन भी करेगी।
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यह पुस्तक अपने पेशे के सहकर्मियों और पाठकों के साथ एक ऐसे व्यक्ति की बहस, नोक-झोंक है जो चीजों को उनके सही नाम से पुकारता है, धुँधलके में रहना और किसी को रखना पसंद नहीं करता। वह व्यक्ति थेµ अखिलेश मिश्र, जिनकी धर्म-संस्कृति विषयक पुस्तक ‘धर्म का मर्म’ पाठक पढ़ चुके हैं।</p>
<p>इस पुस्तक में अखिलेश जी के वे लेख संकलित हैं जिनमें उन्होंने पत्रकारिता के विविध आयामों, उसकी समस्याओं, संकटों, उसके विचलनों, उसकी ताकत और कमजोरियों की चर्चा की है। पुस्तक चार खंडों में है। पहले खंड में वे लेख हैं जिनमें पत्रकारिता सम्बन्धी विविध विषयों, समस्याओं का गहन विश्लेषण है। द्वितीय खंड में ‘वर्कर्स हेरल्ड’ में लिखे उनके वे संपादकीय हैं जिनका विषय पत्रकार अथवा पत्रकारिता है। इस खंड का पहला आलेख ‘स्वतंत्र भारत’ में लगभग सत्रह वर्ष तक अनवरत चले उनके पाक्षिक स्तम्भ ‘दिल्ली का रंगमंच’ से लिया गया है। इसमें श्री मिश्र ने लोकतान्त्रिाक मूल्यों में गहरी आस्था के लिए जाने जानेवाले नेहरू जैसे प्रधानमंत्राी की भी अखबारों की उस आजादी के प्रति नाराजगी को पकड़ा है जो सत्ता के लिए परेशानी पैदा कर दे।</p>
<p>खंड तीन में ‘वर्कर्स हेरल्ड’ में ही संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित वे लेख लिये गए हैं जिनमें पत्रकारिता के सरोकारों की चर्चा है। इस खंड में अन्य अनेक समस्याएँ उठाने के अतिरिक्त लेखक ‘श्रम नीति का दुरंगापन’ बेपर्दा करते हुए ‘पत्रकारों की सुरक्षा’ के सवाल से जुड़ी पेचीदगियों से दो-चार होता है। खंड चार में दो लेख शामिल हैं, जिनमें समाचार क्या है, कैसे लिखे जाते हैं, आदि व्यावहारिक पहलुओं पर उनके विचार हैं।</p>
<p>पत्रकारिता इस समय एक संकट के दौर में है। पुराने दबावों (मालिक और सत्ता) तथा अपनी कमजोरियों के अतिरिक्त भूमंडलीकरण के इस दौर में अब एक नया खतरा उसके सामने हैµअखबारी उद्योग में विदेशी पूँजी निवेश जिसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। हमारा विश्वास है कि अखिलेश जी की यह पुस्तक न केवल धुँधलका छाँटकर परिदृश्य स्पष्ट करेगी बल्कि अपनी स्पष्ट दृष्टि से आगामी पत्रकारिता का मार्गदर्शन भी करेगी।
Book Details
-
ISBN9788126709687
-
Pages287
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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आधुनिक कम्प्यूटर के सहारे परवान चढ़ा सूचना युग आज सर्वव्यापी है। सूचना प्रौद्योगिकी और उसका इंटरनेट-महाजाल आज समाज के बड़े भाग की रोज़मर्रा ज़िन्दगी को प्रभावित कर रहे हैं। अनेक चिन्तकों ने इसकी भविष्यवाणी दशकों पहले ही कर दी थी, पर जो सामने आया वह भविष्यवाणियों से कहीं ज़्यादा था। इंटरनेट, जो नए मीडिया के रूप में उभरा, पुराने प्रिंट मीडिया के लिए ख़तरे की घंटी के रूप में देखा जाने लगा। एक समय में अख़बारों के प्रसार और विज्ञापन में लगभग स्थिरता से प्रिंट मीडिया में चिन्ता की लहरें छा गईं, किन्तु उनसे उबरते देर भी नहीं लगी क्योंकि एक सार्वजनिक मीडिया के रूप में इंटरनेट जन-जन में ग्राह्य नहीं हो पाया और छपे हुए शब्द की महत्ता बनी रही। यह पुस्तक इन तथ्यों और विषय-उपविषयों को वर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक रूप में अध्याय-दर-अध्याय रखते हुए अपने निष्कर्ष की ओर बढ़ती है।
इसमें सूचना क्रान्ति और सूचना युग की विशेषता और कतिपय ज़रूरी तकनीकी शब्दों से परिचित कराते हुए देश-विदेश में इंटरनेट के विकास का जायजा लिया गया है। पुराने (प्रिंट) और (इंटरनेट) मीडिया की तुलना है तो यह भी शामिल है कि इंटरनेट पर भारतीय अख़बार और पत्रिकाओं का पदार्पण कैसे हुआ, इसमें भाषा की समस्या क्या थी और उसे सुलझाने के क्या उपाय हुए। पहले-पहल जो अख़बार और पत्रिकाएँ इंटरनेट पर आए, उनकी एक सूची और हिन्दी के कुछ अख़बारों के इंटरनेट संस्करणों के नमूने भी इसमें हैं। इंटरनेट बनाम अख़बार के तहत जहाँ एक तुलनात्मक अध्ययन किया गया है, वहीं इंटरनेट और बाज़ारवाद के दोहरे प्रहारों के चलते अख़बारों के विज्ञापन, प्रसार और विषय-वस्तु में आ रहे बदलावों का भी विश्लेषण है।
इसके अलावा यह पुस्तक इंटरनेट और लोगों के प्रजातांत्रिक अधिकारों के अन्तर्सम्बन्धों पर भी दृष्टिपात करती है। कई लब्धप्रतिष्ठ पत्रकारों के साक्षात्कारों, विभिन्न रिपोर्टों और कृतियों से लिए गए उद्धरणों और सांख्यिकी के ज़रिए विवेचना को पुष्ट बनाया गया है, जिसका निष्कर्ष कुछ रोचक दृष्टान्तों के साथ मन्थन में है। इसका सार वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी की इस समापन टिप्पणी में है कि ‘जब तक मनुष्य की लिखने-पढ़ने में रुचि रहेगी तब तक काग़ज़ और क़लम से उसका जुड़ाव रहेगा और तब तक अख़बारों को भी कोई समाप्त नहीं कर सकेगा।’
Patrakarita Ka Mahanayak : Surendra Pratap Singh
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Surendra Pratap +2
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“तो ये थीं ख़बरें आज तक, इन्तज़ार कीजिए कल तक।” एसपी यानी सुरेन्द्र प्रताप सिंह के कई परिचयों में यह भी एक परिचय था। दूरदर्शन पर प्रसारित कार्यक्रम ‘आज तक’ के सम्पादक रहते हुए एसपी सिंह सरकारी सेंसरशिप के बावजूद जितना यथार्थ बताते रहे, उतना फिर कभी किसी सम्पादक ने टीवी के परदे पर नहीं बताया।
एसपी ‘आज तक’ के सम्पादक ही नहीं थे। अपने दमखम के लिए याद की जानेवाली ‘रविवार’ पत्रिका के पीछे सम्पादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह की ही दृष्टि थी। ‘दिनमान’ की ‘विचार’ पत्रकारिता को ‘रविवार’ ने खोजी पत्रकारिता और स्पॉट रिपोर्टिंग से नया विस्तार दिया। राजनीतिक-सामाजिक हलचलों के असर का सटीक अन्दाज़ा लगाना और सरल, समझ में आनेवाली भाषा में साफ़गोई से उसका खुलासा करके सामने रख देना, उनकी पत्रकारिता का स्टाइल था। एक पूरे दौर में पाखंड और आडम्बर से आगे की पत्रकारिता एसपी के नेतृत्व में ही साकार हो रही थी।
शायद इसी वजह से उन्हें अभूतपूर्व लोकप्रियता मिली और कहा जा सकता है कि एसपी सिंह पत्रकारिता के पहले और आख़िरी सुपरस्टार थे। यह बात दावे के साथ इसलिए कही जा सकती है क्योंकि अब का दौर महानायकों का नहीं, बौने नायकों और तथाकथित नायकों का है। एसपी जब-जब सम्पादक रहे, उन्होंने कम लिखा। वैसे समय में पूरी पत्रिका, पूरा समाचार-पत्र, पूरा टीवी कार्यक्रम, उनकी ज़ुबान बोलता था। लेकिन उन्होंने जब लिखा तो ख़ूब लिखा, समाज और राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए लिखा।
जन-पक्षधरता एसपी सिंह के लेखन की केन्द्रीय विषयवस्तु है, जिससे वे न कभी बाएँ हटे, न दाएँ। इस मामले में उनके लेखन में ज़बर्दस्त निरन्तरता है। एसपी सिंह अपने लेखन से साम्प्रदायिक, पोंगापंथी, जातिवादी और अभिजन शक्तियों को लगातार असहज करते रहे। बारीक राजनीतिक समझ और आगे की सोच रखनेवाले इस खाँटी पत्रकार का लेखन आज भी सामयिक है।
यह सुरेन्द्र प्रताप सिंह की रचनाओं का पहला संचयन है।
Feature Lekhan : Swarup Aur Shilpa
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Manohar Prabhakar +1
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माखनलाल चतुर्वेदी कवि थे, नाटककार थे, निबन्ध लेखक भी थे, अर्थात् उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं पर अपनी क़लम चलाई थी। वे देश की स्वतंत्रता के लिए लेखनी चलानेवाले एक अग्रणी पत्रकार भी थे। उनकी पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। साहित्य और पत्रकारिता का यह संगम हमारी परम्परा में हमेशा रहा है। फिर भी यह दुर्भाग्य की बात है कि आजकल पत्रकारिता और साहित्य को दो अलग-अलग खाँचों में बाँटा जाता है। इस विभाजक रेखा को भी लाँघनेवाली विधाएँ हैं। उनमें से कुछ हैं—फ़ीचर, रिपोर्ताज, यात्रा-वृत्तान्त एवं संस्मरण।
इस पुस्तक के ज़रिए फ़ीचर लेखन के कौशल को सरल ढंग से पेश करने की कोशिश की गई है। उम्मीद है कि इससे पाठक साहित्य और पत्रकारिता की विभाजक रेखा को जोड़कर इन दोनों के सम्मिश्रण को नए सिरे से स्थापित कर सकेंगे। फ़ीचर लेखन जितनी अधिक मात्रा में होगा, उतनी ही मात्रा में साहित्य और पत्रकारिता को जनमानस में भी जुड़ा हुआ देखने की प्रवृत्ति विकसित होगी।
डॉ. मनोहर प्रभाकर ने, जो स्वयं उच्च कोटि के फ़ीचर लेखक रहे हैं और जिन्होंने ‘राजस्थान पत्रिका’, ‘नवज्योति’ एवं अन्य समाचार पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपने लेखन कौशल को पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है, इस पुस्तक में अपने अनुभवों का सार इस ढंग से प्रस्तुत किया है कि उसे सरलता से व्यवहार में लाया जा सके।
Media Ka Underworld
- Author Name:
Dilip Mandal
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- Description:
पेड न्यूज़ वर्तमान मीडिया विमर्श का सबसे चर्चित विषय है। ख़बरें पहले भी बिकती थीं। सरकारों और नेताओं से लेकर कम्पनियाँ और फ़िल्में बनानेवाले तक ख़बरें ख़रीदते रहे हैं। न्यूज़ के स्पेस में विज्ञापन की घुसपैठ नई नहीं है। बदलाव सिर्फ़ इतना है कि पहले खेल पर्दे के पीछे था, अब मीडिया अपना माल दुकान खोलकर और रेट कार्ड लगाकर बेचने लगा है। विलेन के रूप में किसी ख़ास मीडिया हाउस को चिह्नित करना काफ़ी नहीं है। सारा कॉरपोरेट मीडिया ही बाज़ार में बिकने के लिए खड़ा है। समाचार को लेकर जिस पवित्रता, निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और ईमानदारी की शास्त्रीय कल्पना है, उसका विखंडन हम सब अपनी आँखों के सामने देख रहे हैं। मीडिया छवि बनाता और बिगाड़ता है। इस ताक़त के बावजूद भारतीय मीडिया अपनी ही छवि का नाश होना नहीं रोक सका। देखते–ही–देखते पत्रकार आदरणीय नहीं रहे। लोकतंत्र का चैथा खम्भा आज धूल–धूसरित गिरा पड़ा है। मीडिया की बन्द मुट्ठी क्या खुली, एक मूर्ति टूटकर बिखर गई। यह पुस्तक इसी विखंडन को दर्ज करने की कोशिश है।
देश–काल की बड़ी समस्याओं पर लिखी गई पुस्तकों में आम तौर पर समाधान की भी बात होती है। समस्या का विश्लेषण करने के साथ ही अक्सर यह भी बताया जाता है कि समाधान का रास्ता किस ओर है। इस मायने में यह पुस्तक आपको निराश करेगी। हाल के वर्षों में जनसंचार के क्षेत्र के सबसे विवादित और चर्चित विषय पेड न्यूज़ को केन्द्र में रखकर लिखी गई यह पुस्तक समस्या का कोई समान नहीं सुझाती ।
पुस्तक यह समझने की कोशिश भर है कि पेड न्यूज़ ख़ुद एक बीमारी है, या फिर किसी बड़ी और गम्भीर बीमारी का लक्षण मात्र। पुस्तक में मीडिया अर्थशास्त्र और व्यवसाय की समीक्षा के ज़रिए यह बताने की कोशिश की गई है कि अपनी वर्तमान संरचना की वजह से मीडिया के लिए ख़बरें बेचना अस्वाभाविक नहीं है। मीडिया के लिए कमाई के मुक़ाबले छवि की क़ुर्बानी कोई बड़ी क़ीमत नहीं है।
Vigyapan, Bazar Aur Hindi
- Author Name:
Kailash Nath Pandey
- Book Type:

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विज्ञापनों का ख़ासा असर शुरुआती दौर में आहिस्ता-आहिस्ता किन्तु कालान्तर में धूम-धड़ाके के साथ भारतीय समाज में गहरे पसर चुका है। साफ़ शब्दों में, तमाम दर्जनों लांछनाओं के बावजूद आज हम विज्ञापनों के जिस मायावी संसार का सामना कर रहे हैं, उससे बचना हमारे लिए मुश्किल हो गया है। एक ओर अभिव्यक्ति के अधिकांश मंच-मचान और माध्यमों से इसका अटूट रिश्ता स्थापित हो चुका है तो दूसरी ओर यह सम्प्रेषण की मुकम्मल, पुख्ता और आकर्षक विधा और माध्यम तो बन ही गया है। अब यह व्यावसायिक शक्ति, विक्रय कला की प्रणाली, लोकसेवा, घोषणा, उपभोक्ता के लिए सूचना और सुझाव, व्यावसायिक ज़रिया और क्रय-शक्ति के संवर्धक के रूप में अपनी सार्थकता सिद्ध कर रहा है।
विज्ञापनों के बिना, बिलाशक बाज़ार चल नहीं सकता। बाज़ार को यह सुसम्पन्न और लुभावना बनाता है, उसे सजाता और साधता है। बिना इसके मीडिया के सामने अस्तिव का संकट पैदा हो सकता है। इसने भाषा, संस्कृति के साथ जीवन की कई चीज़ों को बदल दिया है।
Ruktapur
- Author Name:
Pushyamitra
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यह किताब एक सजग-संवेदनशील पत्रकार की डायरी है, जिसमें उसकी ‘आँखों देखी’ तो दर्ज है ही, हालात का तथ्यपरक विश्लेषण भी है। यह दिखलाती है कि एक आम बिहारी तरक़्क़ी की राह पर आगे बढ़ना चाहता है पर उसके पाँवों में भारी पत्थर बँधे हैं, जिससे उसको मुक्त करने में उस राजनीतिक नेतृत्व ने भी तत्परता नहीं दिखाई, जो इसी का वादा कर सत्तासीन हुआ था। आख्यानपरक शैली में लिखी गई यह किताब आम बिहारियों की जबान बोलती है, उनसे मिलकर उनकी कहानियों को सामने लाती है और उनके दुःख-दर्द को सरकारी आँकड़ों के सामने रखकर दिखाती है। इस तरह यह उस दरार पर रोशनी डालती है जिसके एक ओर सरकार के डबल डिजिट ग्रोथ के आँकड़े और चमचमाते दावे हैं तो दूसरी तरफ़ वंचित समाज के लोगों के अभाव, असहायता और पीड़ा की झकझोर देने वाली कहानियाँ हैं। इस किताब के केन्द्र में बिहार है, उसके नीति-निर्माताओं की 73 वर्षों की कामयाबी और नाकामी का लेखा-जोखा है, लेकिन इसमें उठाए गए मुद्दे देश के हरेक राज्य की सचाई हैं। सरकार द्वारा आधुनिक विकास के ताबड़तोड़ दिखावे के बावजूद उसकी प्राथमिकताओं और आमजन की ज़रूरतों में अलगाव के निरंतर बने रहने को रेखांकित करते हुए यह किताब जिन सवालों को सामने रखती है, उनका सम्बन्ध वस्तुत: हमारे लोकतंत्र की बुनियाद है।
Television KI Bhasha
- Author Name:
Harish Chandra Barnwal
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अनुमान के मुताबिक़ हिन्दी में लगभग एक लाख पैंतालीस हज़ार शब्द हैं, लेकिन हिन्दी टेलीविज़न पत्रकारिता के लिए महज़ पन्द्रह सौ शब्दों की जानकारी ही काफ़ी है
यानी अगर आपने इतने शब्दों की जानकारी हासिल कर ली तो यक़ीन मानिए, आप भाषा के लिहाज़ से हिन्दी के अच्छे टेलीविज़न पत्रकार तो ज़रूर बन जाएँगे। अफ़सोस की बात है कि ये जानकारी भी टेलीविज़न पत्रकारों को भारी लगती है। शब्दों की सही समझ की कमी, भाषा के आधे–अधूरे ज्ञान की वजह से टेलीविज़न पत्रकार ऐसी ग़लतियाँ कर बैठते हैं कि कई बारगी मज़ाक़ का पात्र तक बन जाते हैं। यही नहीं, शब्दों के ग़लत इस्तेमाल से अर्थ का अनर्थ तक हो जाता है। इसलिए पत्रकारिता के लिहाज़ से भाषा की सही जानकारी बेहद ज़रूरी है।
हिन्दी न्यूज़ चैनलों की दुनिया भले ही समय के साथ काफ़ी व्यापक होती चली गई हो, लेकिन हक़ीक़त यही है कि आज भी टीवी पत्रकारिता में भाषा को लेकर एक भी ऐसी किताब नहीं है, जो भाषा और पत्रकारिता को जोड़ते हुए एक मुकम्मल जानकारी दे सके। यही परेशानी टीवी पत्रकारिता की पढ़ाई करनेवाले छात्र–छात्राओं के साथ है। हिन्दी के प्रोफ़ेसर ही पत्रकारिता के बच्चों को भी पढ़ाते हैं, ऐसे में पत्रकारिता की भाषा का व्यावहारिक ज्ञान कभी भी विद्यार्थियों को सही से नहीं हो पाता और इसका ख़मियाज़ा टेलीविज़न पत्रकारिता को होता है।
टेलीविज़न की अपनी एक अलग ही दुनिया होती है। इसकी भाषा आम बोलचाल की भाषा होते हुए भी अलग है। इसकी भाषा मानकता के क़रीब रहते हुए भी इसके नियमों का पालन कभी नहीं करती। नए–नए शब्द समय और ज़रूरत के हिसाब से गढ़े जाते हैं तो कई शब्दों को हमेशा के लिए त्याग दिया जाता है। इस भाषा को अंग्रेज़ी, उर्दू और दूसरी भाषाओं से कोई परहेज़ नहीं। इसकी भाषा मीडिया के अन्य माध्यमों मसलन अख़बार या फिर रेडियो की भाषा से बेहद अलग है।
TRP : Media Mandi Ka Mahamantra
- Author Name:
Mukesh Kumar
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पिछले ढाई दशकों में टेलीविज़न की सामग्री बड़े पैमाने पर बदली है। ख़ासतौर पर न्यूज़ चैनलों का चरित्र बुनियादी रूप से बदल गया है। मीडिया संस्थानों के स्वामित्व में आया बदलाव, बड़े कार्पोरेट घरानों का बढ़ता नियंत्रण और हस्तक्षेप, बाज़ार का प्रभाव इसके प्रमुख कारण हैं। आर्थिक उदारवाद के दौर में सत्ता के चरित्र में आए परिवर्तनों का भी इसमें योगदान रहा है। सत्ता के निरंकुशतावादी स्वरूप ने एक आतंक भी पैदा किया है, जिसके सामने मीडिया को नतमस्तक होना पड़ा है।
कार्पोरेट तथा सत्ता के अपने गणित भी हैं और मीडिया को उनसे तालमेल बैठाने के लिए भी बाध्य होना पड़ा है। मगर जहाँ तक बाज़ार का सवाल है तो उसका सबसे बड़ा हथियार है विज्ञापन। वह विज्ञापनों पर भारतीय मीडिया की निर्भरता का लाभ उठाता है। इसके लिए उसके पास एक बहुत ही कारगर हथियार है–टीआरपी यानी टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट।
टीआरपी दरअसल क्या है, वह क्यों है और न्यूज़ चैनलों की सामग्री को कैसे नियंत्रित और संचालित करती है, इस बारे में ठोस जानकारियाँ कम ही उपलब्ध हैं। यही नहीं, अत्यधिक चर्चाओं में रहने के बावजूद टीआरपी मापने की प्रणाली में क्या ख़ामियाँ हैं, उसमें कैसे धाँधली की जाती है और वह कितनी विश्वसनीय है, है भी या नहीं, इस बारे में सामग्री का अभाव रहता है, जबकि इन सब पहलुओं के बारे में जाने बगैर न टीआरपी को समझा जा सकता है और न ही बाज़ार के ऑपरेट करने के तरीक़े को। यह किताब टीआरपी के इन तमाम रहस्यों से परदा उठाती है।
यह सवाल भी बड़ी अहमियत रखता है कि टीवी न्यूज़ या न्यूज़ चैनल टीआरपी के दुष्चक्र से निकल सकते हैं या नहीं? इस पुस्तक में इन प्रश्नों पर विचार करके कुछ रास्ते सुझाने की कोशिश भी की गई है।
शैक्षणिक, अकादमिक और पत्रकारिता तीनों ही क्षेत्रों में सक्रिय लोगों के लिए तो पुस्तक उपयोगी है ही, वे पाठक भी इससे लाभ उठा सकेंगे जिनकी दिलचस्पी मीडिया में आई विसंगतियों या नई प्रवृत्तियों को जानने-समझने में रहती है।
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