Aadhi Duniya Ki Poori Patrakarita
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हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा में विविध भूमिकाओं में महिलाओं की सहभागिता स्वतंत्रता के बाद लगातार बढ़ती गई है। महिला पत्रकारिता का आरंभ महिलाओं को आदर्श माँ और आदर्श पत्नी बनाने की समझाइश भरे आलेखन के साथ हुआ। परंतु जैसे-जैसे समय बढ़ता और बदलता गया वैसे-वैसे समसामयिक संदर्भो से महिला पत्रकारिता जुड़ती गई। कोई विषय, कोई क्षेत्र उससे अछूता नहीं रहा। आज महिला पत्रकारिता उस मोड़ पर पहुँच गई है, जहाँ वह अपेक्षा करती है कि हम समाज में अपनी योग्यता, प्रतिभा, दक्षता, लगन और कृतित्व के बलबूते समान महत्त्व और अवसरों की अधिकारी हों। जरूरत इस बात की है कि महिला पत्रकारों को किन्हीं खास चौहद्दियों में न समेटकर कार्यक्षेत्र का विशाल फलक सहज उपलब्ध हो। मूल तत्त्व यह कि पत्रकारों के बीच ऐसी किसी विभाजक रेखा का कोई औचित्य नहीं होता, जिसे महिला पत्रकार अथवा पुरुष पत्रकार के रूप में चिह्नित किया जाए। महिला पत्रकारिता पर एकाग्र पहला विशद विवेचन।
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हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा में
विविध भूमिकाओं में महिलाओं की सहभागिता स्वतंत्रता के बाद लगातार बढ़ती गई है। महिला पत्रकारिता का आरंभ महिलाओं को आदर्श माँ और आदर्श पत्नी बनाने की समझाइश भरे आलेखन के साथ हुआ। परंतु जैसे-जैसे समय बढ़ता और बदलता गया वैसे-वैसे समसामयिक संदर्भो से महिला पत्रकारिता जुड़ती गई। कोई विषय, कोई क्षेत्र उससे अछूता नहीं रहा। आज महिला पत्रकारिता उस मोड़ पर पहुँच गई है, जहाँ वह अपेक्षा करती है कि हम समाज में अपनी योग्यता, प्रतिभा, दक्षता, लगन और कृतित्व के बलबूते समान महत्त्व और अवसरों की अधिकारी हों। जरूरत इस बात की है कि महिला पत्रकारों को किन्हीं खास चौहद्दियों में न समेटकर कार्यक्षेत्र का विशाल फलक सहज उपलब्ध हो। मूल तत्त्व यह कि पत्रकारों के बीच ऐसी किसी विभाजक रेखा का कोई औचित्य नहीं होता, जिसे महिला पत्रकार अथवा पुरुष पत्रकार के रूप में चिह्नित किया जाए।
महिला पत्रकारिता पर एकाग्र पहला विशद विवेचन।
Book Details
-
ISBN9789386871879
-
Pages264
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अरसे तक ‘राष्ट्रीय मीडिया’ मानी जानेवाली अंग्रेजी मीडिया के वर्चस्व को, अपने व्यापक जमीनी जुड़ाव की बदौलत किनारे कर, देश के कोने-कोने तक पहुँच बना चुकी हिन्दी मीडिया का यह ऐतिहासिक सफर अत्यन्त चुनौतीपूर्ण रहा है, जिसका ब्योरा मृणाल पाण्डे ने इस किताब में दर्ज किया है। इसमें औपनिवेशिक काल में बढ़ती राष्ट्रीय भावना से उपजे अखबार और अंग्रेजी की अधीनता से लेकर, आजादी के बाद के दौर में विज्ञापन और निजी कॉरपोरेटों की बढ़ती मौजूदगी से आए उन बदलावों का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है जिन्होंने पत्रकारिता का परिदृश्य आमूल बदल दिया। आगे डिजीटलीकरण, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के बढ़ते प्रभावों और विज्ञापनों पर भारी निर्भरता ने बदलावों को और तेज किया। और अब, राजनीति, कारपोरेट और मीडिया के बीच स्पष्ट किन्तु जटिल रिश्तों की छाया में यह सवाल सामने है कि एक समय भारतीय लोकतंत्र को आगे बढ़ाने का जरिया बनी हिन्दी मीडिया आज हमारे संविधान प्रदत्त सूचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक को आगे बढ़ा पाने में किस हद तक सक्षम है? जरूरी जानकारियों से भरी यह किताब पत्रकारिता के छात्रों, प्रोफेसरों और मीडियाकर्मियों के साथ-साथ उन सबके लिए एक विचारोत्तेजक पाठ है जो मीडिया और भारतीय लोकतंत्र के इतिहास, वर्तमान और भविष्य में दिलचस्पी रखते हैं।
Television Ki Kahani : Part-1
- Author Name:
Shyam Kashyap +1
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टेलीविज़न की कहानी वर्तमान समय सूचना-समाचारों के विस्फोट का है। हर घर-आँगन में चौबीस घंटे की टेलीविज़न-उपस्थिति है। चकमक करती रौशनियाँ हैं, दमक-हुमक-भरे चेहरे हैं। हर्ष, विषाद, रुदन की आक्रामकता है। कहीं समाचार, कहीं फ़िल्म और घर-घर की कहानी बयान करते रंग-बिरंगे धारावाहिक। लेकिन क्या आप जानते हैं, इस चमक-दमक के आविष्कारक कौन थे? टेलीविज़न का कब और कैसे आविष्कार हुआ? टेलीविज़न के अतीत-वर्तमान को ही जानने-समझने का सार्थक प्रयत्न करती है यह पुस्तक। वरिष्ठ लेखक-पत्रकार डॉ. श्याम कश्यप और चर्चित युवा टीवी पत्रकार मुकेश कुमार की क़लम-जुगलबन्दी ने टेलीविज़न की कहानी को आप तक पहुँचाने का सफल प्रयास किया है।
टेलीविज़न के विभिन्न आयामों का समावेश करती इस पुस्तक में कुल बारह अध्याय हैं, जिनमें टेलीविज़न की ईजाद और उसके क्रमिक विकास की कहानी के साथ उनके विशिष्ट आन्तरिक संरचना, चरित्र और सामाजिक प्रभावों की भी प्रभावी पड़ताल की गई है। इसमें प्रसंगवश उन तमाम समकालीन प्रश्नों से भी मुठभेड़ करने का प्रयास किया गया है, जिनका सामना टीवी पत्रकार को अक्सर करना पड़ता है।
पुस्तक में टीवी पत्रकारिता से जुड़ी उन तमाम बातों का ज़िक्र है, जिसकी ज़रूरत इस क्षेत्र के छात्रों और पत्रकारों को पड़ती है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए मददगार साबित होगी। न सिर्फ़ छात्रों और पत्रकारों के लिए बल्कि आम पाठक, जो टेलीविज़न के इतिहास और उसके संसार को जानना और समझना चाहते हैं, उनके लिए भी उपयोगी और रुचिकर पुस्तक।
Sanchar Ke Mool Siddhant
- Author Name:
Omprakash Singh
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संचार एक आधारभूत सामाजिक विज्ञान है। इसी से जुड़कर समस्त सामाजिक विज्ञान अपनी विकास यात्रा में है। संचार को हम सामाजिक विज्ञानों एवं धरती के समस्त ज्ञान की प्राणवायु भी कह सकते हैं।
यह पुस्तक संचार के प्रकार, प्रक्रिया तथा विविध सिद्धान्तों पर केन्द्रित है। संचार और अन्य सामाजिक विज्ञानों के परस्पर सम्बन्धों का विस्तृत विवेचन प्रथम बार इस पुस्तक में प्रस्तुत है। संचार के क्षेत्र एवं उपयोगिता के विवेचन के साथ-साथ संचार के विभिन्न प्रकारों का व्यापक वर्णन भी इसमें है। इस पुस्तक की सहायता से अध्येता आभ्यन्तर संचार, अन्तर्वैयक्तिक संचार, समूह संचार एवं जनसंचार के अतिरिक्त ग्रामीण तथा परम्परागत संचार के सम्बन्ध में भी व्यापक दृष्टि का विकास कर सकता है।
उक्त आधारभूत तथ्यों के ज्ञान के साथ-साथ इस पुस्तक के द्वारा भारतीय संचार सिद्धान्त का भी ज्ञान सरलतापूर्वक मिल सकता है।
यह पुस्तक संचार एवं पत्रकारिता के अध्येताओं के अतिरिक्त भाषा-विज्ञान, मानवशास्त्र तथा अन्य सामाजिक विज्ञानों के अध्येताओं के लिए उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण है। इस पुस्तक की सहायता से संचार को समग्र रूप में समझा तथा आत्मसात् किया जा सकता है। उक्त विशेषताओं के कारण यह पुस्तक संचार के अध्येताओं के लिए उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी, ऐसी धारणा एवं विश्वास के साथ यह पुस्तक आपके बीच प्रस्तुत है।
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