Samay-Ashva Belagam
(0)
₹
250
₹ 200 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
<span style="font-weight: 400;">कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की पृष्ठभूमि में यह उपन्यास अपनी सांस्कृतिक जड़ों से विच्छिन्न मनों की पीड़ा तथा ग्लोबलाइजेशन से बौराए हमारे मौजूदा वक़्त की कथा है। एक तरफ़ लोग कहीं मजबूरन तो कहीं नए दौर के प्रवाह में अपनी जड़ों से उखड़ रहे हैं तो दूसरी तरफ़ जीना एक वैश्विक स्पर्धा होता जा रहा है। </span></p> <p><span style="font-weight: 400;">कश्मीर से जान बचाकर निकला एक पंडित परिवार अपने जैसे अनेक लोगों के साथ राजधानी दिल्ली में आकर नए सिरे से जीवन शुरू करता है। धीरे-धीरे उनके पैर नई ज़मीन पर अपनी जगह भी बनाने लगते हैं लेकिन यह अहसास कि अगर हम अपने ही देश में शरणार्थी हैं तो फिर दुनिया में कहीं भी रहें, क्या फ़र्क़ पड़ता है; भावी पीढ़ी के लिए निर्णायक बन जाता है। </span></p> <p><span style="font-weight: 400;">कश्मीरी संस्कृति और मूल्यों में रसे-पगे माता-पिता का प्रशिक्षण परिवार को बिखरने तो नहीं देता लेकिन अपने घर-ज़मीन से दूर, महानगरों के परायेपन में सम्बन्धों को उस तरह जीना भी सम्भव नहीं जैसे अपनी भूमि पर अपनी संस्कृति, अपने माहौल के बीच हो सकता था। </span></p> <p><span style="font-weight: 400;">वरिष्ठ कथाकार चन्द्रकान्ता अपने इस नए उपन्यास में कश्मीर से विस्थापित परिवार की कहानी के माध्यम से जैसे वर्तमान का पूरा चित्र ही खींच देती हैं। बुज़ुर्गों का अकेलापन, नई पीढ़ी के भटकाव, सतत एक होड़ में डूबे युवाओं का तनाव, बिखरता दाम्पत्य, पश्चिमी संस्कृति और तकनीक के दबाव, विश्व के अलग-अलग हिस्सों में हो रहा विस्थापन, सार्वजनिक स्पेस में स्त्रियों पर होनेवाले हमले और वह सब जो इस दौर को एक शान्त धारा नहीं, भीषण भँवर का रूप देता है; इन सबको लेकर एक गम्भीर चेतावनी यहाँ मौजूद है।</span></p> <p><span style="font-weight: 400;">उपन्यास के मुख्य पात्र सुरेन्द्रनाथ का यह कथन कि 'यह समय बूढ़ों का नहीं है' जैसे इस पूरे परिदृश्य पर एक सम्पूर्ण टिप्पणी है। अर्थात धीरता, गम्भीरता, ठहराव, गहराई और प्रकृति के हमक़दम चलने का यह समय नहीं है। देश से लेकर विदेश तक बेलगाम बहती एक गति है जिसके बने रहने के लिए हर किसी की साँसें उखड़ी जा रही हैं। चन्द्रकान्ता की सधी हुई क़लम एक-एक पंक्ति में वैश्विक विडम्बना की एक-एक परत खोलती है।</span>
Read moreAbout the Book
<span style="font-weight: 400;">कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की पृष्ठभूमि में यह उपन्यास अपनी सांस्कृतिक जड़ों से विच्छिन्न मनों की पीड़ा तथा ग्लोबलाइजेशन से बौराए हमारे मौजूदा वक़्त की कथा है। एक तरफ़ लोग कहीं मजबूरन तो कहीं नए दौर के प्रवाह में अपनी जड़ों से उखड़ रहे हैं तो दूसरी तरफ़ जीना एक वैश्विक स्पर्धा होता जा रहा है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कश्मीर से जान बचाकर निकला एक पंडित परिवार अपने जैसे अनेक लोगों के साथ राजधानी दिल्ली में आकर नए सिरे से जीवन शुरू करता है। धीरे-धीरे उनके पैर नई ज़मीन पर अपनी जगह भी बनाने लगते हैं लेकिन यह अहसास कि अगर हम अपने ही देश में शरणार्थी हैं तो फिर दुनिया में कहीं भी रहें, क्या फ़र्क़ पड़ता है; भावी पीढ़ी के लिए निर्णायक बन जाता है। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कश्मीरी संस्कृति और मूल्यों में रसे-पगे माता-पिता का प्रशिक्षण परिवार को बिखरने तो नहीं देता लेकिन अपने घर-ज़मीन से दूर, महानगरों के परायेपन में सम्बन्धों को उस तरह जीना भी सम्भव नहीं जैसे अपनी भूमि पर अपनी संस्कृति, अपने माहौल के बीच हो सकता था। </span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वरिष्ठ कथाकार चन्द्रकान्ता अपने इस नए उपन्यास में कश्मीर से विस्थापित परिवार की कहानी के माध्यम से जैसे वर्तमान का पूरा चित्र ही खींच देती हैं। बुज़ुर्गों का अकेलापन, नई पीढ़ी के भटकाव, सतत एक होड़ में डूबे युवाओं का तनाव, बिखरता दाम्पत्य, पश्चिमी संस्कृति और तकनीक के दबाव, विश्व के अलग-अलग हिस्सों में हो रहा विस्थापन, सार्वजनिक स्पेस में स्त्रियों पर होनेवाले हमले और वह सब जो इस दौर को एक शान्त धारा नहीं, भीषण भँवर का रूप देता है; इन सबको लेकर एक गम्भीर चेतावनी यहाँ मौजूद है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उपन्यास के मुख्य पात्र सुरेन्द्रनाथ का यह कथन कि 'यह समय बूढ़ों का नहीं है' जैसे इस पूरे परिदृश्य पर एक सम्पूर्ण टिप्पणी है। अर्थात धीरता, गम्भीरता, ठहराव, गहराई और प्रकृति के हमक़दम चलने का यह समय नहीं है। देश से लेकर विदेश तक बेलगाम बहती एक गति है जिसके बने रहने के लिए हर किसी की साँसें उखड़ी जा रही हैं। चन्द्रकान्ता की सधी हुई क़लम एक-एक पंक्ति में वैश्विक विडम्बना की एक-एक परत खोलती है।</span>
Book Details
-
ISBN9789393768308
-
Pages198
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Ek Gandharv Ka Duswapna
- Author Name:
Haricharan Prakash
- Book Type:

-
Description:
अक्सर देखा गया है कि संगीत, कला और साहित्य से जुड़े लोग अपनी एक निजी और आन्तरिक दुनिया में रमे रहते हैं। वे बाहरी दुनिया की बड़ी-से-बड़ी घटनाओं को भी निरपेक्ष भाव से लेते हैं। उनके भीतरी संसार में बाहर के घटनाचक्र का, यथार्थ का प्रवेश कुछ विचित्र क़िस्म के ऊहापोह और उथल-पुथल पैदा करता है।
उपन्यास का नायक भवनाथ ऐसा ही एक संगीतज्ञ है—बजाने-गाने में मस्त। चारों ओर की चीख़-पुकार में उसे खोए हुए सुरों का ख़याल आता है। वह दिव्यास्त्रों की तरह दिव्यरागों की कल्पना करता है। गन्धर्व कौन-सा सुर जगाते होंगे, कौन-सा राग मूर्त करते होंगे, हमसे कहीं ऊपर उनका सुर होगा—ऐसा सोचता रहता है। संगीत की खोई हुई दुनिया के झिलमिले सपने आते और चले जाते।
गन्धर्व के बहाने हरी चरन प्रकाश द्वारा रचा गया एक बेहद मार्मिक और रोचक उपन्यास है—‘एक गन्धर्व का दुःस्वप्न’।
स्वतंत्रता-प्राप्ति से लेकर आज तक के सामाजिक-राजनीतिक घटनाचक्रों को इस उपन्यास में बड़ी बेबाकी से रेखांकित किया गया है। चाहे वह महात्मा गांधी की हत्या हो या फिर बाबरी मस्जिद के विध्वंस से उपजे दंगे-फ़साद, वह मंडल-कमंडल की राजनीति हो या फिर जाति-धर्म की—देश की सम्प्रभुता को ख़तरे में डालनेवाले तत्त्वों को बड़ी संजीदगी से बेनक़ाब किया गया है इस उपन्यास में।
Nadi
- Author Name:
Usha Priyamvada
- Book Type:

-
Description:
‘बस—बहने दो जीवन सरिता को कहीं-न-कहीं—जल्दी या देरी से—कोई-न-कोई हल तो निकलेगा।' यही सूत्र है 'नदी' उपन्यास का। हिन्दी कथा-साहित्य में अविस्मरणीय ख्याति प्राप्त कर चुकीं उषा प्रियम्वदा का यह नया उपन्यास पठनीयता का पुनर्नवन है। नियति, अबूझ जीवन, प्रारब्ध—क्या नाम दें उस घटनाक्रम को जो 'नदी' की नायिका आकाशगंगा को जाने किस-किस रूप में कहाँ-कहाँ से विस्थापित करता है।
विदेश में निवास करती आकाशगंगा पुत्र भविष्य की मृत्यु के लिए इस सीमा तक अपने पति द्वारा उत्तरदायी मानी जाती है कि परिवार से विच्छिन्न कर दी जाती है। पति गगनेन्द्र दो बेटियों सहित भारत आ जाते हैं। यहीं से एकाकी छूट गई आकाशगंगा का संघर्ष प्रारम्भ होता है। वह अर्जुन सिंह और एरिक के प्रगाढ़ सम्पर्क में आती है। भारत लौटकर सास-ससुर, बेटियों की आत्मीयता में घिरने लगती है कि एक प्राय: अप्रत्याशित स्थिति उसे दूरदेश ले आती है।
प्रवीण दम्पति के साथ रहकर गंगा जीवन का नया अध्याय शुरू करती है। और एरिक के साहचर्य से उत्पन्न उसका बेटा स्तव्य स्टीवेन! आकाशगंगा अपने जीवन-प्रवाह में जिन ऊँचाइयों, गहराइयों, मैदानों, घाटियों, संकीर्ण-पथों प्रशस्त पाटों से गुज़रती है, उन्हें उषा प्रियम्वदा ने जीवन्त कर दिया है।
उषा प्रियम्वदा ने आकाशगंगा के बहाने स्त्री-जीवन के कटु-कठोर यथार्थ का मार्मिक चित्रण किया है। भाषा और शैली के लिए तो वे अलग से पहचानी ही जाती हैं।
‘नदी' जीवन-प्रवाह का ऐसा दृश्य...जिसमें अदृश्य के अँधेरे देर तक चमकते रहते हैं।
Saathi
- Author Name:
Harsh Ranjan
- Book Type:

- Description: आते हैं और आते रहेंगे- हर साल ये फाल्गुन की हवाऐं जेठ की दुपहरी आषाढ के बादल भाद्र की फुहार और काँपती-कँपकँपाती पूस की पछिया बयार... हर बार एक परदेसी कोई आएगा, लौटकर अपने देस; झांकेगा, ताकेगा, हर गली-हर मुहल्ला लिए, दबाए, छाती में हूक एक... हर साल, हर बार जो आएगा, झांकता जाएगा, थोड़ा घबराकर, थोड़ा ठहरकर, सरसरी निगाहों से या कि संग लंबी आहों के ये राहें ...ये चौराहे, आ बैठेगा फिर कोई हर साल, हर बार मन के आंगन में ... चुप...चुप...चुप... एक अनकहा आश्वासन देंगे वो, पाएंगे हम ,थामे रखना! आऐंगे ही हम बाँटने ये सब-कुछ हर साल-हर बार.....
Jaankidas Tejpal Mansion
- Author Name:
Alka Saraogi
- Book Type:

-
Description:
जो सतह पर दिखता है, वह अवास्तविक है। कलकत्ता के सेंट्रल एवेन्यू पर 'जानकीदास तेजपाल मैनशन’ नाम की अस्सी परिवारों वाली इमारत सतह पर खड़ी दिखती है, पर उसकी वास्तविकता मेट्रो की सुरंग खोदने से ढहने और ढहाए जाने में है। अंग्रेज़ी में एक शब्द चलता है ‘अंडरवर्ल्ड’, जिसका ठीक प्रतिरूप हिन्दी में नहीं है। अंडरवर्ल्ड ग़ैरक़ानूनी ढंग से धन कमाने, सौदेबाज़ी और जुगाड़ की दुनिया है। इस दुनिया के ढेर सारे चरित्र हमारे जाने हुए हैं, पर अक्सर हम नहीं जानते कि वे किस हद तक हमारे जीवन को चलाते हैं और कब हमें अपने में शामिल कर लेते हैं। तब अपने बेदख़ल किए जाने की पीड़ा दूसरों को बेदख़ल करने में आड़े नहीं आती।
जयगोविन्द 1970 के दशक में अमेरिका से पढ़कर कलकत्ता लौट आया एक कम्प्यूटर इंजीनियर है। वह अपना एक जीवन जयदीप के रूप में अपने अधूरे उपन्यास में जीता है, तो दूसरा जीवन नक्सलबाड़ी आन्दोलन से लेकर भारत के एक बड़े बाज़ार में बदलने या ‘नेशन स्टेट’ से ‘रीयल इस्टेट’ बनने के यथार्थ में। विडम्बना यह नहीं है कि जयगोविन्द का जीवन जयदीप से असम्पृक्त है; बल्कि यह है कि दोनों को अलग करना मुश्किल है। फ़र्क़ इतना भर है कि एक वस्तुनिष्ठ आत्मकथा लिखने की कोशिश में बार-बार अपने को बचाने की मुहिम चली आती है, जो अपने ही लिखे को नहीं मानती। इसी क्रम में आज़ादी के बाद इस देश की जवान हुई पहली पीढ़ी को मिले धोखे और नाकाम 'सिस्टम’ की दास्तानें अमेरिका के वियतनाम-युद्ध से लेकर विकीलीक्स के धोखे तक फैली हैं।
‘अमेरिका’ इस उपन्यास में एक ‘मोटिफ़’ की तरह है जिसमें विस्थापन के कई स्तर हैं—वहाँ कुछ साल बिताकर लौटा जयदीप है जो न इधर का है न उधर का; उसके एन.आर.आई. मित्र हैं जो इंफ़ेक्शन के डर से इंडिया नहीं आते; वे हैं जो लौटने के लिए तड़प रहे हैं; उसका बेटा रोहित है जो इंडिया को चिड़ियाघर कहता है।
सड़क पर गुज़रती हर बस के साथ हिलता 'जानकीदास तेजपाल मैनशन’ एक नया अर्थ-संकेत है—पूरे देश का, जिसका ढहाया जाना तय है। राजनीति, प्रशासन, पुलिस और पूँजी के बीच बिचौलियों का तंत्र सबसे कमज़ोर को सबसे पहले बेदख़ल करने में लगा हुआ है।
Kusum Kumari
- Author Name:
Devakinandan Khatri
- Book Type:

-
Description:
‘चन्द्रकान्ता’ और ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’—जैसी महान उपन्यासमाला के सुविख्यात रचनाकार देवकीनन्दन खत्री का एक और महत्त्वपूर्ण उपन्यास, जिसमें उन्होंने रहस्य-रोमांच से भरपूर अपनी सुपरिचित शैली में कुसुमकुमारी और रनबीरसिंह के प्रेम, विरह और मिलन की मुग्धकारी कथा को जीवन्त किया है। कुसुम और रनबीर दो राज्यों के वारिस हैं, जिनके पिता भी परस्पर मित्रता के सूत्र में बँधे थे और जिन्होंने कुसुम-रनबीर को बचपन में ही विवाह-सूत्र में बाँध दिया था। लेकिन बाद में एक प्रबल शत्रु द्वारा धोखे से उन दोनों के पिताओं को बन्दी बना लिया गया और उसी के द्वारा कुसुम और रनबीरसिंह को भी न मिलने देने के अनेक धूर्ततापूर्ण षड्यंत्र किए गए, जिन्हें अन्तत: कुसुमकुमारी ने ही अपनी बुद्धिमत्ता से विफल कर दिया। खत्री जी ने इस कथा को जिस विस्तार और रहस्यात्मक तरीक़े से बुना है, वह पाठक को आख़िर तक बाँधे रहता है।
निश्चय ही खत्री जी के उपन्यासों का आज ऐतिहासिक महत्त्व है, और यह कृति उनकी उपन्यास कला के विभिन्न स्तरों को रेखांकित करती है।
Waiting Based On What Could Have Happened
- Author Name:
Prashant Gupta
- Book Type:

- Description: "It is 2017, and the world is getting crazy about a new security system “, The finger-print security”. It is by far theoretically the best security system to be produced and applied to this mass scale. No one now has ever to remember and care to protect their password anymore. Kaushal shares with his two best friends the hack he has found. A year later, it turns out that the company they are working for has stolen money, using the same hack that Kaushal had discovered and shared only with his friends. Victims have now filed a police complaint against the company. But to everyone's surprise, the firm's CEO, Mr Sanjay keer, has absconded. Without any trace of his existence ever in the city, he vanishes...".
Chalni Mein Amrit
- Author Name:
Kamala Markande
- Book Type:

-
Description:
‘चलनी में अमृत’ यशपाल द्वारा अनूदित एक उपन्यास है जो 1950 के दशक में कमला पूर्नईया टेलर द्वारा ‘नेक्टर इन सीव’ नाम से अंग्रेज़ी में लिखा गया। यह लेखिका का पहला ही उपन्यास था, फिर भी इसे बेस्ट सेलर के रूप में ख्याति मिली और 1955 में अमेरिकन लाइब्रेरी एसोसिएशन ने इस उपन्यास को वर्ष की महत्त्वपूर्ण कृति कहते हुए दर्ज किया। कमला पूर्नईया को संस्कृतियों के टकराव पर लिखने के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।
‘चलनी में अमृत’ उपन्यास विपन्नता, भूख और व्यवस्थागत शोषण की मार्मिक कथा सामने लाता है। फ़्लैश बैक से खुलता हुआ यह उपन्यास कथा पात्र रुक्मिणी यानी रुकू की विवाह स्मृति से आरम्भ होता है। उसका विवाह तब हुआ था जब वह केवल बारह वर्ष की थी और सौभाग्य का एकमात्र टुकड़ा उसके हिस्से यही था कि उसका पति नाथन एक सज्जन व्यक्ति था। रुकू के जीवन में सपने और ख़ुशियाँ एक झलक-भर को आती हैं और फिर आर्थिक सामाजिक त्रासदी उन्हें झपट लेती है। खेती को निगलती हुई उद्योग की आहट भी इस उपन्यास में है, जो एक टेनरी (चमड़े का कारख़ाना) की तरह आकर रुकू के जीवन की यातना बनती है। विपन्नता की पराकाष्ठा है कि रुकू की बेटी देह व्यापार के लिए विवश होती है और एक माँ के रूप में रुकू को यह नियति सह लेनी पड़ती है। परिवार में शिशु का जन्म जो आह्लाद लाता है, उसे बच्चों की असमय मृत्यु, उनका पलायन क्रूरता से मिटा भी देता है। कठिन जीवन-यापन के दौरान समय के सच को नकारती सामाजिक मान्यताएँ रुकू और उसके पति दोनों को ब्लैकमेल होने को मजबूर करती हैं। इस तरह इनका पूरा जीवन बूँद-बूँद क्षणिक ख़ुशियों के बीच से गुज़रता है लेकिन कोई भी ख़ुशी इनके पास ठहरने नहीं पाती। इस त्रासदी के पीछे प्रकृति भी है और समाज रचित व्यवस्था भी।
इस तरह, यह उपन्यास अपने समाज के यथार्थ पर भी संवेदनापूर्वक उँगली रखता है। उपन्यास का अनुवाद अपने आस्वाद में इस कृति को मूलतः हिन्दी रचना-सा ही आभास देता है। ‘चलनी में अमृत’ अपने मुख्य सरोकार में आज भी एक प्रासंगिक कृति है।
Shesh Yatra
- Author Name:
Usha Priyamvada
- Book Type:

-
Description:
अनु प्रणव के अपने फ़ैसले का शिकार हुई, वरना वैसा घर, वैसा वर न तो उसके सपनों में था, न सामर्थ्य में। गली-मोहल्लों वाले क़स्बाई परिवार से निकलकर वह लड़की अचानक अमेरिका जा बसी—डॉ. प्रणवकुमार की परिणीता बनकर। सब कुछ जैसे पलक झपकते बदल गया—घर-परिवेश, रहन-सहन, खान-पान। अनु ने बड़ी मुश्किल से अपने को सँभाला और प्रणव की आकांक्षाओं, रुचियों के अनुरूप ढाल लिया। दिन-दिन डूबती चली गई प्यार की गहराइयों में। लेकिन शीघ्र ही उसे लगने लगा कि वह वहाँ अकेली है। प्रणव की तो छाया तक उन गहराइयों में नहीं। वह तो मात्र तैराक है—भावमयी लहरों को रौंदकर प्रसन्न होनेवाला एक महत्त्वाकांक्षी और अस्थिर पुरुष।
ठगी गई अनु अपनी सुन्दरता, अपने संस्कार और सहज विश्वासी मन से। लेकिन आत्महत्या वह नहीं करेगी। टूट-बिखरकर भी जोड़ने की कोशिश करेगी स्वयं को, क्योंकि दलित-आश्रित रहना ही नारी-जीवन का यथार्थ नहीं है। यथार्थ है उसकी निजता और स्वावलम्बन।
विरल कथाकार उषा प्रियम्वदा की अनु वस्तुतः नारी-मन की समस्त कोमलताओं के बावजूद उसके जागते स्वाभिमान और कठोर जीवन-संघर्ष का प्रतीक है, जिसे इस उपन्यास में गहरी आत्मीयता से उकेरा गया है। उच्च-मध्यवर्गीय प्रवासी भारतीय समाज यहाँ अपने तमाम अन्तर्विरोधों, व्यामोहों और कुंठाओं के साथ मौजूद है। अनु, प्रणव, दिव्या और दीपांकर जैसे पात्रों का लेखिका ने जिस गहन अन्तरंगता से चित्रण किया है, उससे वे पाठकीय अनुभव का अविस्मरणीय अंग बन जाते हैं।
Aksharo Ke Aage
- Author Name:
Bhairavprasad Gupt
- Book Type:

- Description: 'अज्ञानवश अन्धविश्वास में फँसना एक बात है और ज्ञान होते हुए भी अन्धविश्वास का शिकार होना दूसरी बात है। अन्धविश्वास के कारण मनुष्य का आत्म- विश्वास क्षीण होता है, शक्ति तथा क्रियाशीलता में शिथिलता आती है, यहाँ तक कि वह एकदम निकम्मा तथा असमाजिक भी हो जाता है, जैसे लाखों साहू, सन्त, फ़क़ीर, आवारे, चोर, डाकू, हत्यारे, अन्य अपराधकर्मी आदि। सबसे गम्भीर बात तो यह है कि अन्धविश्वासों के कारण समाज के विकास में बड़ी रुकावटें आती हैं, आदमी की सामाजिक चेतना तक कुंठित हो जाती है, जिसके चलते आदमी समाज के विकास की नई दिशा में अथवा नए मार्ग पर चलने से इनकार कर देता है।... हमारी ज़िन्दगी ऐसी क्यों है, हम क्यों अंधविश्वासों, कुप्रथाओं से जकड़े हुए हैं, हम क्यों अपने अनुभवों से भी कुछ नहीं सीखते?'
Devki Ka Athwa Beta
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Data Peer
- Author Name:
Hrishikesh Sulabh
- Book Type:

-
Description:
‘दाता पीर’ विविधताओं से भरे भारतीय समाज के ऐसे एक हिस्से से रू-ब-रू कराता है जो हमारी नजरों से लगभग ओझल रहा है।
यह सवाल अकसर पूछा जाता रहा है कि आधुनिक हिन्दी साहित्य में मुस्लिम जनजीवन की उपस्थिति इतनी विरल क्यों है, और अगर उसका उल्लेख होता भी है तो प्रायः साम्प्रदायिकता जैसे मसलों के साथ ही क्यों होता है। इस सन्दर्भ में ‘दाता पीर’ निश्चय ही एक उल्लेखनीय कृति है। इसमें मुजाविरों और शहनाई बजाने वाले एक घराने की कथा है जो, अपने आस-पड़ोस को समेटती हुई चलती है और आम भारतीय जनजीवन का आख्यान बनकर सामने आती है। यह उनके जीवन संघर्ष को उनकी धार्मिक पहचान तले नहीं दबाती, न ही कथा को मौजूदा दौर के बँधे-बँधाए विमर्श के खाँचे में फिट कर कोई ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ फॉर्मूला पेश करती है। उपन्यासकार जीवन का सूत्र पकड़कर पाठक को विशाल भारतीय समाज के उन हिस्सों तक ले जाता है, और ऐसी सचाइयाँ दिखलाता है जिसे मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक परिवेश पर तेजी से हावी हो रही संकीर्णता के कारण देख पाना आज आसान नहीं रहा।
इस उपन्यास में स्मृतियों की कई पेंचदार गलियाँ हैं जिनमें खानकाहों-दरगाहों-मज़ारों और पीर-फकीरों की कहानियाँ बिखरी पड़ी हैं तो मौसिकी के सदियों पुराने सिलसिले के सुर भी। साथ ही इसमें मौजूद हैं वर्तमान की ऐसी धड़कनें जहाँ कब्रिस्तान में भी प्रेम के बिरवे फूट पड़ते हैं।
वस्तुतः उपन्यासकार ने इस कृति में बिना किसी बड़बोलेपन के ऐसा एक अर्थगर्भी संसार रचा है जिसमें प्रवेश कर पाठक मनुष्य के जीवनानुभव को उसकी सम्पूर्णता में देख सकता है। यह उपन्यास बतलाता है कि जीवन का राग हो या विराग, अन्ततः एक मानवीय जीवनदृष्टि ही जीने की राह निर्मित करती है।
एक अत्यन्त पठनीय और संग्रहणीय उपन्यास।
Krishnavtar : Vol. 4 : Mahabali Bheem
- Author Name:
K. M. Munshi
- Book Type:

-
Description:
कोई द्रष्टा साहित्यकार जब इतिहास को देखता है तो उसे उसकी समग्रता में दिखाता भी है, और ऐतिहासिक-पौराणिक चरित्रों को आधार बनाकर गुजराती में अनेक श्रेष्ठ उपन्यासों की रचना करनेवाले सुविख्यात उपन्यासकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी भारतीय कथा-साहित्य में ऐसे ही द्रष्टा साहित्यकार के रूप में समादृत हैं।
‘कृष्णावतार’ मुंशी जी की कई खंडों में प्रकाशित और कई भाषाओं में अनूदित बृहत् औपन्यासिक कृति है। ‘महाबली भीम’ इसका चौथा खंड है।
महाभारतकालीन योद्धाओं में भीम का चरित्र सर्वाधिक रोमांचक है और इस खंड में उसके विभिन्न आयामों का अविस्मरणीय अंकन हुआ है। यों समूचे उपन्यास की तरह यह खंड भी कृष्ण-सरीखे नीतिज्ञ और महायोद्धा की उपस्थिति से अछूता नहीं है, पर द्रौपदी-स्वयंवर से महाभारत युद्ध-पर्व तक का राजनीतिक परिदृश्य भीम से जिस तरह अनुप्राणित है, उससे उसका रुक्ष और कोमल, विनोदी और गम्भीर तथा सर्वोपरि यौद्धेय स्वभाव मुग्धकारी रूप में सामने आता है। साथ ही तत्कालीन राजनीति को समाज की जिस विस्तृत पटभूमि पर चित्रित किया गया है, उससे पाठक के सामने अनेकानेक सुपरिचित चरित्रों का एक नया ही रूप उद्घाटित होता है और वे अपने साथ जुड़ी तमाम पौराणिकता के बावजूद अपनी ऐतिहासिकता में ज़्यादा वास्तविक और विश्वसनीय लगते हैं।
Chal Khusaro Ghar Aapne
- Author Name:
Shivani
- Book Type:

-
Description:
...‘कैसी विचित्र पुतलियाँ लग रही थीं मालती की। जैसे दगदगाती हीरे की दो कनियाँ हों, बार-बार वह अपनी पतली जिह्वा को अपने रक्तवर्णी अधरों पर फेर रही थी, यह तो नित्य की सौम्य-शान्त स्वामिनी नहीं, जैसे भयंकर अग्निशिखा लपटें ले रही थी...।’ यह कहानी है कुमुद की, जिसे बिगड़ैल भाई-बहनों और आर्थिक, पारिवारिक परिस्थितियों ने सुदूर बंगाल जाकर एक राजासाहब की मानसिक रूप से बीमार पत्नी की परिचर्या का दुरूह भार थमा दिया है।
मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों का मनोसंसार, निम्न-मध्यवर्गीय परिवार की कमासुत अनब्याही बेटी और उसकी ग्लानि से दबी जाती माँ का मनोविज्ञान, शिवानी के पारस स्पर्श से समृद्ध होकर इस उपन्यास को एक अद्भुत नाटकीय कलेवर और पठनीयता देते हैं।
PT. RAJENDRA ARUN : RAM KAAJ KARIBE KO AATUR
- Author Name:
Dr. Vinod Bala Arun
- Book Type:

- Description: "मॉरीशस के हिंदू समाज के मन में श्री राजेंद्र अरुण के प्रति अत्यंत स्नेह, सम्मान और आत्मीय भाव है। सन् 1974 में वे प्रधानमंत्री सर शिवसागर रामगुलाम के साप्ताहिक पत्र ‘जनता’ के प्रबंध संपादक बने। सन् 1982 में उनके जीवन में एक नया मोड़ आया। एम.बी.सी. रेडियो पर उन्होंने रामायण की व्याख्या पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम ‘मंथन’ आरंभ किया। लोगों ने इसे खूब सराहा। यह कार्यक्रम अब तक ‘मानस मंथन’ नाम से जारी है। उनके रेडियो कार्यक्रम की लोकप्रियता से ‘रामकथा’ का आरंभ हुआ। सन् 2000 के लगभग से श्री अरुणजी के मन में यह विचार आने लगा कि एक संस्था बनाकर रामकथा का विश्व स्तर पर प्रचार-प्रसार करें। सन् 2001 में उनके इस विचार को ‘रामायण सेंटर’ की स्थापना के साथ ठोस आधार प्राप्त हुआ। जन-मन के हृदय में रामायण गुरु के रूप में प्रतिष्ठित पं. राजेंद्र अरुण के 70वें जन्मदिन पर उन्हें उपहार रूप में भेंट करने के लिए इस पुस्तक के प्रकाशन का विचार हमारे मन में आया। इस पुस्तक में आत्मीय जनों द्वारा अरुणजी पर लिखे गए लेख, अरुणजी द्वारा लिखी गई कविताएँ, उनके चित्र, पत्र-पत्रिकाएँ जिनमें उन पर या उनका कुछ प्रकाशित है, ‘जनता’ समाचार-पत्र की कुछ कतरनें और उनकी कुछ पुस्तकों के अंश तथा एक लंबा साक्षात्कार और अरुणजी को प्राप्त कुछ सम्मान और पुरस्कार आदि संकलित हैं। ‘मॉरीशस के तुलसी’ पं. राजेंद्र अरुण के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व के सम्यक् रूप का दिग्दर्शन करानेवाला संपूर्ण ग्रंथ। "
Zanani Dyodhi
- Author Name:
Pearl S. Buck
- Book Type:

-
Description:
पर्ल एस. बक के ज़्यादातर उपन्यासों की विषयवस्तु परिवार और विवाह के इर्द-गिर्द घूमती है। ‘ज़नानी ड्योढ़ी’ भी इसका अपवाद नहीं है, लेकिन स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर जितने क्रान्तिधर्मी नज़रिए से इस उपन्यास में उठाया गया है, वह अभूतपूर्व है। 20वीं सदी के चौथे दशक में जब यह उपन्यास आया था, तब नारी-स्वातंत्र्य का विचार अपनी शुरुआती अवस्था में ही था। पर्ल एस. बक ने मैडम वू की इस कथा के माध्यम से जिस साहस और कौशल के साथ स्त्री-जीवन, सेक्स, परिवार और रिश्तों के जितने पहलुओं को उठाया था, वह आश्चर्यजनक है।
मैडम वू एक सम्पन्न चीनी परिवार की महिला है जो अपनी चालीसवीं वर्षगाँठ पर फ़ैसला करती है कि वह परिवार की ज़िम्मेदारियों से मुक्त होकर शान्ति के साथ अपना जीवन व्यतीत करेगी और इसके लिए वह अपने पति के लिए दूसरी पत्नी का प्रस्ताव रखती है। उसके इस फ़ैसले से उस भरे-पूरे परिवार में हड़कम्प मच जाता है। उसके बेटे और बहुओं के बीच के अभी तक दबे-छुपे द्वन्द्व भी सामने आने लगते हैं और इस प्रक्रिया में लेखिका विवाह संस्था और स्त्री-पुरुष सम्बन्ध को हर कोण से देखने-समझने का ‘स्पेस’ रच देती है।
चीनी पृष्ठभूमि में शाश्वत मानवीय प्रश्नों से जूझता यह उपन्यास विश्वसाहित्य की एक अमूल्य निधि है।
Hindutva : Ek Jeevan Shaili
- Author Name:
Ed. Kalraj Mishra
- Book Type:

- Description: आज भारत के राजनीतिक परिवेश में चारों ओर संकट दिखाई दे रहा है। देश में भ्रष्टाचार चरम पर है। धर्म-जाति के नाम पर वोट पाने हेतु राष्ट्रीय हितों को तिलांजलि दी जा रही है। छद्म धर्म-निरपेक्षता के नाम पर संप्रदायवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। आज के इस कलुषित वातावरण में हिंदुत्व की अप्रतिम जीवन-शैली को अपनाकर ही समाज में एक जन-जागरण पैदा किया जा सकता है, जिससे अपने संकीर्ण मतभेदों से ऊपर उठकर एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण हो सके। जीवनपर्यंत राष्ट्रवाद की राजनीति के आदर्शों पर चलनेवाले वरिष्ठ राजनेता पं. कलराज मिश्र ने हिंदुत्व की परंपराओं, वेद, पुराणों और स्मृतियों के माध्यम से सभी समस्याओं का हल खोजने का प्रयास किया है। इस पुस्तक में सम्मिलित अनेक आध्यात्मिक गुरुओं, राजनेताओं, लेखकों के मर्मस्पर्शी लेख बालविवाह, जातिप्रथा, टूटते परिवार, भ्रष्टाचार, महिलाओं के प्रति दुराचार जैसी बुराइयों को दूर करने में अवश्य सफल होंगे। हिंदुत्व की व्यापक अवधारणा, उसकी अप्रतिम जीवन-शैली, उसकी संस्कृति का दिग्दर्शन कराती एक श्रेष्ठ कृति।
Magical Note
- Author Name:
Aviral Adeeb
- Book Type:

- Description: बचपन में खरीदे गए एक नकली नोट में चमकती हरी रौशनी से शुरू होती है- आरव की कहानी। एक ऐसा सफर जो उसे स्कूल से लेकर IIT (ISM) धनबाद तक ले जाता है। जहाँ हर मोड़ पर उसे अपने “मैजिकल नोट" की ताकत और उसके परिणामों का सामना करना पड़ता है। “मैजिकल नोट” जादू और मानवीय फैसलों की कहानी है। ऐसी कहानी जिसमे अंततः यह साबित होता है कि नियत ही नियति तय करती है।
Amma
- Author Name:
Kamleshwar
- Book Type:

- Description: वरिष्ठ उपन्यासकार कमलेश्वर का यह उपन्यास एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था की वकालत करता है जिसमें अपने बेरियों के लिए भी स्नेह व सम्मान की गुंजाइश हो। इस उपन्यास का कथा-फ़लक यों तो विस्तृत है लेकिन कमलेश्वर जी ने अपने रचनात्मक कौशल से इसे जिस तरह कम शब्दों में सम्भव किया है, वह क़ाबिले-तारीफ़ है। इस उपन्यस में स्वाधीनता के संघर्षकाल से लेकर सती-प्रथा विरोध तक की अनुगूँजें सुनी जा सकती हैं। इसमें अंग्रेज़ सिपाहियों की क्रूरता और रूढ़िवादी पारम्परिक समाज में विधवा स्त्री की त्रासद स्थिति का बड़ा ही मार्मिक चित्रण हुआ है जो पाठको के मन में करुणा का भाव जगाता है। लोकप्रिय रचनाकार की क़लम से निकली एक अनूठी कृति।
Unread 2020
- Author Name:
Various Authors
- Book Type:

- Description: Unread is an anthology published by platform for artists featuring 99 writers across the country who have shared their writings in the form of poetry and short stories. It contains both English and Hindi writings which is a collection of diverse experiences, emotions, and knowledge shared by the writers. To name a few, we have a man deep Singh, helly Shah, Mehak Mirza Prabhu, aakash ranison, Naveen kukreja, shakti Shetty, Abbas Dalal and others who are looked up to by thousands of aspiring writers the 100th title of the book is kept blank for the reader to be a part of the book and complete it with their art. You can write, draw, paint, sketch or even stick pictures to express your creativity on the last part. This makes the book very dynamic and inclusive which is the spirit of platform for artists since the start. The entire project was intended to be experimental as well as collaborative hence the book cover was designed by nine different designers as a relay of creative expressions where it was passed on from one to the other to add their element. You can know more about the book through www.Pfaindia.Com/unread. Feel free to connect with us via Instagram/ face book @platform for artists to share your reviews. Happy unreading!.
Circus
- Author Name:
Sanjeev
- Book Type:

-
Description:
सर्कस आज एक ख़त्म होती हुई कला है। सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन के अभाव, आधुनिक टेक्नोलॉजी-आधारित मनोरंजन के प्रभुत्व और उसकी अपनी आन्तरिक समस्याओं के चलते वह अपनी पारम्परिक जगह को खोता जा रहा है। लेकिन आज भी वह न सिर्फ़ एक बड़े दर्शक वर्ग को आकर्षित करता है, बल्कि एक कौतूहल की रचना भी करता है।
उस विशाल तम्बू के भीतर जहाँ शो शुरू होते ही जैसे ज़िन्दगी और ख़ुशी नाचने लगती है, सुख-दु:ख, आशा-निराशा, यातना और उत्पीड़न का एक भरा-पूरा संसार भी रहता है। ख़ास तौर से भारतीय सर्कस अपने अभावों और भविष्यहीनता के चलते एक बहुस्तरीय यंत्रणा का परकोटा है।
हमारे समय के वरिष्ठ कथाकार संजीव का यह उपन्यास उस दुनिया के भीतर उतरता है; और सर्कस के उन पहलुओं को हमें दिखाता है, जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। वह चाहे वहाँ काम करनेवाले लोगों की पीड़ा हो, या जानवरों की, हमें ऐसे अनुभव से रूबरू कराती है जो दर्शक के रूप में हमारे लिए अलभ्य रहे आए हैं।
सर्कस सिर्फ़ शामियाने के भीतर चलनेवाला तमाशा ही नहीं, देश का विराट रूपक भी है जहाँ अभिनेता अपनी-अपनी आकांक्षाओं, द्वन्द्वों और छद्म में साँस लेते हुए दर्शक का मनोरंजन करते हैं।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book