Uday Ravi
Author:
B. PuttaswamayyaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 280
₹
350
Unavailable
‘उदय-रवि’, ‘क्रान्ति-कल्याण’ उपन्यास मालिका का पहला खंड है। कन्नड़ के विशिष्ट रचनाकार बी. पुट्टस्वामय्या मूलतः नाटक लिखने में रुचि लेते थे।...किन्तु नाटक की कई सीमाएँ होती हैं। नाटक-मंडली के अभिनेताओं की संख्या, संवाद कहने में उनकी क्षमता आदि बातों की ओर नाटककार को ध्यान देना पड़ता है। उपन्यास में इस प्रकार की कोई सीमा नहीं होती। इसलिए एक बड़ा कैनवस का उपयोग करके एक बृहत् उपन्यास की रचना करने की पुट्टस्वामय्या ने जो योजना बनाई, उसी का परिणाम ‘उदय-रवि’, ‘राज्यपाल’, ‘कल्याणेश्वर’, ‘नागबन्ध’, ‘अधूरा सपना’ तथा ‘क्रान्ति-कल्याण’ उपन्यासों का सिलसिला रहा। ये छह के छह अलग-अलग उपन्यास भी हैं और सब मिलाकर एक ही उपन्यास भी।</p>
<p>बसवेश्वर के युग के जनजीवन का चित्रण करनेवाले इन उपन्यासों की मालिका समवेत रूप में एक विशेष प्रकार का ऐतिहासिक उपन्यास है। सामाजिक जीवन को व्यक्त करनेवाले इस उपन्यास के लिए अभिलेख तथा लिखित साहित्य से सन्दर्भों को चुन लिया गया है। चौंकानेवाली बात यह थी कि इस उपन्यास लेखन के लिए पुट्टस्वामय्या ने एक हज़ार अभिलेखों का अध्ययन किया था।</p>
<p>‘उदय-रवि’—ई.सं. 1950—में तैलप (तृतीय) के सिंहासनारोहण से लेकर बसवेश्वर के मंत्री बनने तक की घटनाओं का चित्रण है।</p>
<p>सिद्धहस्त लेखक बी. पुट्टस्वामय्या ने प्रांजल भाषा में एक युग को साकार कर दिया है। भालचन्द्र जयशेट्टी का सतर्क अनुवाद उपन्यास को मूल आस्वाद से अभिन्न रखने में समर्थ सिद्ध हुआ है।
ISBN: 9788183615587
Pages: 192
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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क़ामयाब पति, दो-दो बुद्धिमान बेटे और अपनी घर-गृहस्थी में डूबी अदिति, उम्र के चालीसवें के मध्य तक पहुँचते-पहुँचते अचानक महसूस करती है कि वह भयंकर अकेली है। पति अपनी नौकरी में व्यस्त है, दोनों बेटे भी अपने-अपने आकाश में पंख फैलाए उड़ने लगे हैं। अकेली अदिति अब अपने दिन या तो अपने आपसे या पिंजरे की मैना से बातें करती हुई गुज़ारती है। उन्हीं दिनों उसकी ज़िन्दगी में हेमेन मामा दाख़िल होते हैं, उन्हीं की प्रेरणा से जाग उठती है—एक नई अदिति धीरे-धीरे वह अपनी रची-गढ़ी दुनिया में मग्न हो जाती है। ब्याह से पहले वह लेखन के क, ख, ग से परिचित हो चुकी थी। अब वह दुबारा लिखना शुरू करती है। अब जब वह अपने पति, सन्तान और गृहस्थी को नई निगाह से तौलना-परखना शुरू कर देती है, तो शुरू होता है—ज़बर्दस्त टकराव। भयंकर दर्द के काले बादल घिर आते हैं।
अदिति क्या सिर्फ़ सुप्रतिम की पत्नी-भर है? मात्रा बच्चों की माँ है? वह क्या सिर्फ़ ख़ून-मांस की मशीन-भर है, जिससे सिर्फ़ यह अपेक्षित है कि बेहद सहज-स्वाभाविक तरीक़े से गृहस्थी की गाड़ी आगे बढ़ाती रहे? इस दायरे से बाहर क्या अदिति का कोई अस्तित्व नहीं?
सुचित्रा भट्टाचार्य की सशक्त क़लम ने ‘हेमन्त का पंछी’ में औरत के इसी सच की बेचैन तलाश को उकेरा है।
Kahi Isuri Faag
- Author Name:
Maitreyi Pushpa
- Book Type:

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Description:
ऋतु डॉक्टर नहीं बन पाई क्योंकि रिसर्च गाइड प्राध्यापक प्रवर पी.के. पांडेय की दृष्टि में ऋतु ने ईसुरी पर जो कुछ लिखा था, वह न शास्त्र-सम्मत था, न शोध-अनुसन्धान की ज़रूरतें पूरी करता था। वह शुद्ध बकवास था क्योंकि ‘लोक’ था।
‘लोक’ में भी कोई एक गाइड नहीं होता। लोक उस बीहड़ जंगल की तरह होता है जहाँ अनेक गाइड होते हैं—जो जहाँ तक का रास्ता बता दे वही गाइड बन जाता है—कभी-कभी तो कोई विशेष पेड़, कुआँ या खँडहर ही गाइड का रूप ले लेते हैं। ऋतु भी ईसुरी-रजऊ की प्रेम-कथा के ऐसे ही बीहड़ों के सम्मोहन की शिकार है। बड़ा ख़तरनाक होता है जंगलों, पहाड़ों और समुद्र का आदिम सम्मोहन...हम बार-बार उधर भागते हैं किसी अज्ञात के ‘दर्शन’ के लिए...‘कही ईसुरी फाग’ भी ऋतु के ऐसे ही भटकावों की दुस्साहसिक कहानी है।
इस उपन्यास का नायक ईसुरी है, मगर कहानी रजऊ की है—प्यार की रासायनिक प्रक्रियाओं की कहानी जहाँ ईसुरी और रजऊ दोनों के रास्ते बिलकुल विपरीत दिशाओं को जाते हैं। प्यार बल देता है तो तोड़ता भी है...
सिद्ध संगीतकार कविता की किसी एक पंक्ति को सिर्फ़ अपना प्रस्थान-बिन्दु बनाता है—बाक़ी ठाठ और विस्तार उसका अपना होता है। ‘बाजूबंद खुल-खुल जाए’ में न बाजूबंद रात-भर खुल पाता है, न कविता आगे बढ़ पाती है क्योंकि कविता की पंक्ति के बाद सुर-साधक की यात्रा अपने संसार की ऊँचाइयों और गहराइयों के अर्थ तलाश करने लगती है। मैत्रेयी पुष्पा की यह कहानी उसी आधार का कथा-विस्तार है—शास्त्रीय दृष्टि के ख़िलाफ़ अवैध लोक का जयगान।
Kala Pahar
- Author Name:
Bhagwandas Morwal
- Book Type:

- Description: उपन्यास का काम समकालीन यथार्थ के प्रतिनिधित्व के माध्यम से अतीत को पुनर्जीवित और भविष्य के मिज़ाज को रेखांकित करना है। भगवान मोरवाल के ‘काला पहाड़’ में ये विशिष्टताएँ हैं। ‘काला पहाड़’ के पात्रों की कर्मभूमि ‘मेवात क्षेत्र’ है। हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश की सीमाओं में विस्तृत यह वह क्षेत्र है, जिसने मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर से टक्कर ली थी और जिसने भारत की ‘मिलीजुली तहज़ीब’ को आज तक सुरक्षित रखा है। ‘काला पहाड़’ एक उपन्यास का शीर्षक नहीं है, वरन् मेवात की भौगोलिक-सांस्कृतिक अस्मिता और समूचे देश में व्याप्त बहुआयामी विसंगतिपूर्ण प्रक्रिया का प्रतीक है। इसके पात्र—सलेमी, मनीराम, रोबड़ा, हरसाय, सुलेमान, छोटेलाल, बाबू ख़ाँ, सुभान ख़ाँ, रुमाली, अंगूरी, रोमदेई, तरकीला, मेमन, चौधरी करीम हुसैन व चौधरी मुर्शीद अहमद आदि ठेठ देहाती हिन्दुस्तान की कहानी कहते हैं। मेवात के ये अकिंचन पात्र अपने में वे सभी अनुभव, त्रासदी, ख़ुशियाँ समेटे हुए हैं, जो किसी दूरदराज़ अनजाने हिन्दुस्तानी की भी जीवन-पूँजी हो सकते हैं। लेखक जहाँ ऐतिहासिक पात्र व मेवात-नायक ‘हसन ख़ाँ मेवाती’ की ओर आकृष्ट है, वहीं वह अयोध्या-त्रासदी की परछाइयों को भी समेटता है, इस त्रासदी में झुलसनेवाली बहुलतावादी संस्कृति को रचनात्मक अभिव्यक्ति देता है। उपन्यास की विशेषता यह है कि इसने समाज के हाशिए के लोगों को अपने कथा-फ़लक पर उन्मुक्त भूमिका निभाने की छूट दी है। मोरवाल की पृष्ठभूमि दलित ज़रूर है लेकिन किरदारों के ‘ट्रीटमेंट’ में वह दलित ग्रन्थि से अछूते हैं।
Tathagat Phir Nahi Aate
- Author Name:
Pradeep Garg
- Book Type:

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सिद्धार्थ सोलह वर्ष की आयु में विवाह के पश्चात् तेरह वर्ष तक नाच-गाना देखते-सुनते हुए राजभवन में ही बैठे रहे। एक दिन जब राजमहल से बाहर निकले तो एक वृद्ध पुरुष, एक रोगी और फिर एक शव को देख ऐसी विरक्ति मन में उत्पन्न हुई कि गृहत्याग कर परिव्रजित हो गये। यह कथा सामान्यतः प्रचलित अवश्य है परन्तु वस्तुतः गौतम बुद्ध के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर प्राचीनतम एवं विद्वानों के मतानुसार सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथों 'त्रिपिटक' के अनुसार इस कथा की सच्चाई में सन्देह करने के पर्याप्त कारण हैं।
तत्कालीन विश्व और भारतवर्ष के समाज तथा उनकी राजनीति को समझने का प्रयास करती हुई यह पुस्तक उन गुरुओं, जिनमें से कई स्वयं को 'बुद्ध घोषित कर चुके थे, के परस्पर तर्क- वितर्क की श्रोता तो बनती ही है; तक्षशिला विश्वविद्यालय में संसार भर से आये ज्ञानपिपासुओं की बौद्धिक चर्चा में सहभागी भी बनती है; और उस अद्भुत वैचारिक आन्दोलन की साझीदार भी जब जम्बूद्वीप के हर नगर, कसबे और गाँव में स्थापित कुतुहलशालाओं में जीवन और अस्तित्व के आधारभूत प्रश्नों पर वाद-विवाद अनवरत ही हो रहा था।साथ ही, कपिलवस्तु, वैशाली, राजगृह, कौशाम्बी, श्रावस्ती इत्यादि नगरों में पड़ाव करते हुए यह यात्रा उस काल के अभूतपूर्व वैभव और जनमानस में विभिन्न कारणों से पनपते विद्रोह की साक्षी बनती है व उस घटनाचक्र की भी जिसने मगध साम्राज्य के जन्म को अवश्यम्भावी कर दिया।
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