Kaun Jaat Ho Bhai
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इन सभी कविताओं में आए समकालीन सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक- सांस्कृतिक विमर्श, बहस, संघर्ष और दलित-बहुजन चेतना को आसानी से देखा जा सकता है । बच्चा लाल ‘उन्मेष’ के संग्रह में शामिल तमाम कविताएँ समाज में फैली असमानता, उत्पीड़न, शोषण, दमन को वर्गीय और जातीय दोनों आधार पर चिह्नित करती हैं और उन पर कड़ा प्रहार करती हैं। एक तरफ़ ये कविताएँ मनुवाद पर आधारित ब्राह्मणवाद की पोल खोलती हैं तो दूसरी ओर दलितों, मज़दूरों, किसानों, स्त्रियों पर होने वाले ज़ुल्म और शोषण की मुख़ालिफ़त करते हुए उनके पक्ष में मज़बूती से खड़े होकर अपनी आवाज़ बुलंद करती हैं। भाषा की दृष्टि से कविताएँ बेहद सरल, पठनीय और दिल को छू जाने वाली हैं। कविता में व्यंग्यात्मक शैली कविता को और पठनीय और वैचारिक बना देती है । -अनिता भारती
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इन सभी कविताओं में आए समकालीन सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक- सांस्कृतिक विमर्श, बहस, संघर्ष और दलित-बहुजन चेतना को आसानी से देखा जा सकता है । बच्चा लाल ‘उन्मेष’ के संग्रह में शामिल तमाम कविताएँ समाज में फैली असमानता, उत्पीड़न, शोषण, दमन को वर्गीय और जातीय दोनों आधार पर चिह्नित करती हैं और उन पर कड़ा प्रहार करती हैं। एक तरफ़ ये कविताएँ मनुवाद पर आधारित ब्राह्मणवाद की पोल खोलती हैं तो दूसरी ओर दलितों, मज़दूरों, किसानों, स्त्रियों पर होने वाले ज़ुल्म और शोषण की मुख़ालिफ़त करते हुए उनके पक्ष में मज़बूती से खड़े होकर अपनी आवाज़ बुलंद करती हैं। भाषा की दृष्टि से कविताएँ बेहद सरल, पठनीय और दिल को छू जाने वाली हैं। कविता में व्यंग्यात्मक शैली कविता को और पठनीय और वैचारिक बना देती है ।
-अनिता भारती
Book Details
-
ISBN9789347125874
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age11-18 yrs
-
Country of OriginIndia
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हिन्दी की वरिष्ठ कथाकार नासिरा शर्मा के लेखन की सर्वोपरि विशेषता है सभ्यता, संस्कृति और मानवीय नियति के आत्मबल व अन्तःसंघर्ष का संवेदना-सम्पन्न चित्रण। उनके कथा साहित्य के सरोकार ग्लोबल हैं। उनका कथाकार सन्तप्त और उत्पीड़ित मनुष्यता के पक्ष में पूरी शक्ति के साथ निरन्तर सक्रिय रहा है। ‘अजनबी जज़ीरा’ नासिरा शर्मा का नया उपन्यास है।
‘अजनबी जज़ीरा’ में समीरा और उसकी पाँच बेटियों के माध्यम से इराक़ की बदहाली बयान की गई है। ग़ौरतलब है कि दुनिया में जहाँ कहीं ऐसी दारुण स्थितियाँ हैं, यह उपन्यास वहाँ का एक अक्स बन जाता है। छोटी-से-छोटी चीज़ को तरसते और उसके लिए विरासतों-धरोहरों-यादगारों को बाज़ार में बेचने को मजबूर होते लोग; ज़िन्दगी बचाने के लिए सबकुछ दाँव पर लगाती औरतें और विदेशी आक्रमणकारियों की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष निगरानी में साँस लेते नागरिक—ऐसी अनेक स्थितियों-मनःस्थितियों को नासिरा शर्मा ने इस उपन्यास के पृष्ठों पर साकार कर दिया है।
पतिविहीना समीरा अपनी युवा होती बेटियों के वर्तमान और भविष्य को लेकर फ़िक्रमन्द है। बारूद, विध्वंस और विनाश के बीच समीरा ज़िन्दगी की रोशनी व ख़ुशबू बचाने के लिए जूझ रही है। उपन्यास समीरा को चाहनेवाले अंग्रेज़ फ़ौजी मार्क के पक्ष से क्षत-विक्षत इराक़ की एक मार्मिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। समीरा और मार्क की प्रेमकहानी अद्भुत है, जिसमें ज़िम्मेदारियों के हस्सास रंग शिद्दत से शामिल हैं। घृणा और प्रेम का सघन अन्तर्द्वन्द्व इसे अपूर्व बनाता है। लेखिका यह भी रेखांकित करती है कि ऐसे परिदृश्य में स्त्री-विमर्श के सारे निहितार्थ सिरे से बदल जाते हैं।
सभ्य कहे जानेवाले आधुनिक विश्व में विध्वंस का यह यथार्थ स्तब्ध कर देता है। विध्वंस की इस राजनीति में क्या-क्या नष्ट होता है, इसे नासिरा शर्मा की बेजोड़ रचनात्मक सामर्थ्य ने ‘अजनबी जज़ीरा’ में अभिव्यक्त किया है।
ज़रूरी वैश्विक प्रश्नों के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनाता एक अद्भुत उपन्यास।
Mobile
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- Description: ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ उस गुरुदत्त के दुःख और सृजनात्मक उल्लास की कथा है जिसने अपने वक़्त से आगे बढ़कर ‘प्यासा’, ‘काग़ज़ के फूल’ और ‘साहब बीबी और गुलाम’ जैसी फिल्में भारतीय सिनेमा को दीं। उस गुरुदत्त की जिसने बहुत कम उम्र में अपनी उम्मीदों-आकांक्षाओं के बाग़ों को खिलते भी देखा, और बहुत कम ही उम्र में अपने तमाम हासिल को परे रखकर उदासी की ऐसी राह पकड़ी जो कभी पलट न सकी। गुरुदत्त की दास्तान समाज के पाखंड और इनसान के पैदा किए रिवाज़ों से असहमत हर उस बेचैन रूह की दास्तान है जो इस दुनिया को, बड़े होने के इसके तमाम दावों से इतर, वास्तविक अर्थों में इसे बड़ा देखना चाहती है। ऐसी दुनिया जहाँ कोई किसी का ग़ुलाम न हो, कोई किसी का शिकार न हो। इस दास्तान में गुरुदत्त नाम की उस विकट पहेली की ज़िन्दगी के दृश्य भी हैं, उसकी जो फ़िल्में आज क्लासिक कही जाती हैं, उनके बनने की कहानी भी है, उसकी शादीशुदा ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव, इश्क़, उसके शौक़ और उसकी ख़ुदकुश रचनात्मकता के क़िस्से भी, साथ ही हिन्दी सिनेमा के उस निर्णायक दौर की दिलचस्प जानकारी भी। और यह दास्तान कही दास्तानगोई के उस्ताद महमूद फ़ारूक़ी ने!
Bisat Par Jugnu
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Description:
‘बिसात पर जुगनू’ सदियों और सरहदों के आर-पार की कहानी है। हिन्दुस्तान की पहली जंगे-आज़ादी के लगभग डेढ़ दशक पहले के पटना से शुरू होकर यह 2001 की दिल्ली में ख़त्म होती है। बीच में उत्तर बिहार की एक छोटी रियासत से लेकर कलकत्ता और चीन के केंटन प्रान्त तक का विस्तार समाया हुआ है। गहरे शोध और एतिहासिक अन्तर्दृष्टि से सम्पन्न इस कथा में इतिहास के कई विलुप्त अध्याय और उनके वाहक चरित्र जीवन्त हुए हैं। यहाँ 1857 के भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम की त्रासदी है तो पहले और दूसरे अफीम युद्ध के बाद के चीनी जनजीवन का कठिन संघर्ष भी। इनके साथ-साथ चलती है, समय के मलबे में दबी पटना कलम चित्र-शैली की कहानी, जिसे ढूँढ़ती हुई ली-ना, एक चीनी लड़की, भारत आई है। यहाँ फिरंगियों के अत्याचार से लड़ते दोनों मुल्कों के दु:खों की दास्तान एक-सी है और दोनों ज़मीनों पर संघर्ष में कूद पड़नेवाली स्त्रियों की गुमनामी भी एक-सी है। ऐसी कई गुमनाम स्त्रियाँ इस उपन्यास का मेरुदंड हैं। ‘बिसात पर जुगनू’ कालक्रम से घटना-दर-घटना बयान करनेवाला सीधा (और सादा) उपन्यास नहीं है। यहाँ आख्यान समय में आगे-पीछे पेंगें भरता है और पाठक से, अक्सर ओझल होते किंवा प्रतीत होते कथा-सूत्र के प्रति अतिरिक्त सजगता की माँग करता है।
—संजीव कुमार
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