Nemat Khana

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Author:

Khalid Javed

Language:

Hindi

749

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ऐसे बहुत कम, लगभग नहीं के बराबर उपन्यास होते हैं जिन्हें पढ़ते हुए आप अपनी दुनिया के अँधेरों को अपनी चेतना के उजाले में सिहरते हुए महसूस कर पाते हैं। ‘नेमतख़ाना’ अपने पाठकों को उनकी दुनिया और अस्तित्व को देखने की ऐसी नज़र प्रदान करता है जिससे उन्हें वो काली सच्चाइयाँ दिखाई देने लगती हैं जिनके होने की उन्होंने दूर-दूर तक कल्पना भी नहीं की होगी। ये उपन्यास हमें बताता है कि जिस प्रकार के हम खाने खाते हैं, उसका हमारी तर्ज़-ए-ज़िन्दगी और कार्यशैली पर क्या असर पड़ता है। हिन्दुस्तानी अदब में ऐसे उपन्यास कम ही लिखे गए हैं जो खानों, अलग-अलग तरह के पकवानों और उनसे होने वाले बदलाव जो कि इंसान और उसकी अन्दरूनी दुनिया पर असर-अन्दाज़ होते हैं, पर रौशनी डालते हों। उनमें भी ख़ालिद जावेद जैसे उपन्यासकार कम ही होते हैं जो एक महान उपन्यास की तख़लीक़ कर पाते हैं।

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ISBN
9789394494626
Pages
450
Avg Reading Time
15 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

Piracy Free

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Secure Payment

About the Book

ऐसे बहुत कम, लगभग नहीं के बराबर उपन्यास होते हैं जिन्हें पढ़ते हुए आप अपनी दुनिया के अँधेरों को अपनी चेतना के उजाले में सिहरते हुए महसूस कर पाते हैं। ‘नेमतख़ाना’ अपने पाठकों को उनकी दुनिया और अस्तित्व को देखने की ऐसी नज़र प्रदान करता है जिससे उन्हें वो काली सच्चाइयाँ दिखाई देने लगती हैं जिनके होने की उन्होंने दूर-दूर तक कल्पना भी नहीं की होगी। ये उपन्यास हमें बताता है कि जिस प्रकार के हम खाने खाते हैं, उसका हमारी तर्ज़-ए-ज़िन्दगी और कार्यशैली पर क्या असर पड़ता है। हिन्दुस्तानी अदब में ऐसे उपन्यास कम ही लिखे गए हैं जो खानों, अलग-अलग तरह के पकवानों और उनसे होने वाले बदलाव जो कि इंसान और उसकी अन्दरूनी दुनिया पर असर-अन्दाज़ होते हैं, पर रौशनी डालते हों। उनमें भी ख़ालिद जावेद जैसे उपन्यासकार कम ही होते हैं जो एक महान उपन्यास की तख़लीक़ कर पाते हैं।

Book Details

  • ISBN
    9789394494626
  • Pages
    450
  • Avg Reading Time
    15 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Nemat Khana is among the rarest kind of Hindi literary fiction — a novel that makes the invisible architecture of daily life suddenly, disturbingly visible. Where most fiction treats food as backdrop or metaphor, this work positions what we eat as the organizing principle of identity, caste hierarchy, and moral consciousness in contemporary India. The novel operates on a premise that sounds simple but unfolds with unsettling complexity: the dishes we consume don't just nourish our bodies, they script our beliefs, our prejudices, our entire tarz-e-zindagi. Published by Rekhta Publications, it belongs to a tradition of Hindi writing that refuses comfort, choosing instead to confront readers with truths about their own complicity in systems they never questioned. This is not a novel about recipes; it is about the violence and tenderness encoded in every meal, every ritual of eating, every boundary drawn at the dining table.

नेमतख़ाना पढ़ने से मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?

यह उपन्यास आपको असहज और सचेत करने वाला अनुभव देता है। यह धीरे-धीरे आपकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में छिपी उन सच्चाइयों को उजागर करता है जिन्हें आपने कभी देखा नहीं। पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि भोजन सिर्फ़ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान, जातीय बँटवारे और नैतिक चेतना को गढ़ने का माध्यम है। यह किताब आपको अपने खाने की थाली में समाज की काली सच्चाइयाँ दिखाएगी।

यह उपन्यास किस तरह के पाठकों के लिए उपयुक्त है?

  • जो पाठक साहित्य से सवाल पूछने की अपेक्षा रखते हैं, न कि सिर्फ़ मनोरंजन की
  • जो भारतीय समाज में जाति, भोजन और पहचान के जटिल रिश्तों को समझना चाहते हैं
  • जो अपने रोज़मर्रा के जीवन को नई नज़र से देखने के लिए तैयार हैं
  • जो हिन्दी साहित्य में प्रयोगधर्मी और विचारोत्तेजक लेखन की तलाश में रहते हैं

भारतीय पाठकों के लिए इस उपन्यास की विषयवस्तु आज क्यों प्रासंगिक है?

आज जब भारत में भोजन को लेकर हिंसा, घृणा और राजनीति लगातार बढ़ रही है, यह उपन्यास बेहद ज़रूरी है। यह दिखाता है कि खाने की पसंद कैसे सामाजिक विभाजन को गहरा करती है। नेमतख़ाना हमें याद दिलाता है कि हमारी थाली सिर्फ़ निजी पसंद नहीं, बल्कि एक सामाजिक-राजनीतिक बयान है जो जाति, धर्म और वर्ग की सीमाएँ तय करता है।

इस लेखक का नज़रिया इस विषय पर दूसरे लेखकों से कैसे अलग है?

यह उपन्यास भोजन को केवल संस्कृति या परम्परा के रूप में नहीं देखता, बल्कि इसे शक्ति, नियंत्रण और चेतना के निर्माण के औज़ार के रूप में प्रस्तुत करता है। लेखक ने भोजन और अस्तित्व के बीच के रिश्ते को इतनी गहराई से उकेरा है कि पाठक अपनी रोज़मर्रा की आदतों में छिपे सामाजिक पूर्वाग्रहों को पहचानने लगता है।

यह उपन्यास पढ़ने के बाद पाठक के मन में क्या रह जाता है?

इस किताब को ख़त्म करने के बाद आप अपनी थाली को पहले जैसी नज़र से नहीं देख पाएँगे। यह एक स्थायी बेचैनी छोड़ता है — यह अहसास कि आपकी रोज़ाना की पसंद और नापसंद सामाजिक असमानता को बनाए रखने में योगदान देती हैं। यह आत्म-परीक्षण की माँग करता है और आपको अपनी पहचान के बारे में असुविधाजनक सवाल पूछने के लिए मजबूर करता है।

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