Deshaj adhunikta
Author:
Anupam AnandPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 476
₹
595
Available
यहापि आधुनिक मूल्यों के प्रति हिन्दी साहित्य में पाई जानेवाली तीव्र चेतना पाश्चात्य प्रभावों से अधिक जुड़ी प्रतीत होती है, परन्तु क्या इन मूल्यों की जड़े अपने पारम्परिक साहित्य में नहीं थीं? क्या आदिकाल से प्रगतिवाद के पूर्व तक का सम्पूर्ण साहित्य आधुनिकता के चेतना से मुक्त था? क्या भक्तिकाल में निर्गुण-सगुण, आत्मा-परमात्मा, जड़-चेतन से परे सामाजिक चेतना का अभाव था? इन सभी प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए हमें अत्यन्त गहराई से अपनी देशज बोलियों में रचे गए साहित्य का सूक्ष्म अवलोकन करना होगा। संवेदनात्मक स्तर पर इस साहित्य के अवलोकन के उपरान्त यहाँ प्रत्येक कवि व लेखक की रचना में कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में आधुनिकता अवश्य पाई जाएगी ।<br>क्या तुलसी के राम साम्राज्यवाद विस्तार के लिए संघर्षरत रहते हैं? नहीं, तुलसी के राम बुराई पर अच्छाई को स्थापित करने के लिए संघर्षशील रहते हैं। इस रूप में यह संघर्ष आधुनिकता का सन्दर्भ है।
ISBN: 9789393603838
Pages: 168
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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हिन्दी की आधुनिक संस्कृति का विकास भारतीय सभ्यता को एक आधुनिक औद्योगिक राष्ट्र में रूपान्तरित कर देने के वृहत् अभियान के हिस्से के रूप में हुआ। इस प्रक्रिया में गांधी जैसे चिन्तकों के विचारों की अनदेखी तो की ही गई, मार्क्स के चिन्तन को भी बहुत ही सपाट और यांत्रिक ढंग से समझने और लागू करने का प्रयास किया गया। यह पुस्तक गांधी और मार्क्स का एक नया भाष्य ही नहीं प्रस्तुत करती, बल्कि भारतीय आधुनिकता की विलक्षणताओं को भी रेखांकित करने का उपक्रम करती है। आधुनिकता की परियोजना के संकटग्रस्त हो जाने और उत्तर-आधुनिक-उत्तर-औपनिवेशिक चिन्तकों द्वारा उसकी विडम्बनाओं को उजागर कर दिए जाने के उपरान्त गांधी और मार्क्स का ग़ैर-पश्चिमी समाज के परिप्रेक्ष्य में पुनर्पाठ एक राजनीतिक और रणनीतिक ज़रूरत है। इस ज़रूरत का एहसास भारतीय और पश्चिमी समाज वैज्ञानिकों के लेखन में इन दिनों बहुत शिद्दत से उभरकर आ रहा है। विडम्बना ये है कि हिन्दी की दुनिया ने अभी भी इस प्रकार के चिन्तन को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी है। इस दृष्टि से विचार करने पर आधुनिकता के साथ पूँजीवाद, उपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद, विज्ञान, तर्कबुद्धि और लोकतंत्र का वैसा सम्बन्ध ग़ैर-पश्चिमी सभ्यताओं के साथ नहीं बनता है, जैसा पश्चिमी सभ्यताओं के साथ दिखाई पड़ता है। इस बात का एहसास गांधी को ही नहीं, हिन्दी नवजागरण के यशस्वी लेखक प्रेमचन्द को भी था। यह अकारण नहीं है कि प्रेमचन्द ने आधुनिकता से जुड़े हुए राष्ट्रवाद समेत सभी अनुषंगों की तीखी आलोचना की और उसके विकल्प के रूप में कृषक संस्कृति, देशज कौशल, शिक्षा और न्याय-व्यवस्था के महत्त्व पर ज़ोर दिया। देशज ज्ञान को महत्त्व देनेवाला व्यक्ति ज्ञान के स्रोत के रूप में सिर्फ़ अंग्रेज़ी के माहात्म्य को स्वीकार नहीं कर सकता था। इसलिए गांधी और प्रेमचन्द ने हिन्दी और भारतीय भाषाओं के उत्थान पर इतना ज़ोर दिया। लेकिन, हिन्दी की साहित्यिक संस्कृति के अधिकांश में, भारतीय भाषाओं की अस्मिता और उनके साहित्य का अध्ययन भी यूरोपीय राष्ट्रों के साहित्य के वज़न पर किया गया। आधुनिक साहित्यिक विधाओं का चुनाव और विकास भी बहुत कुछ पश्चिमी देशों के साहित्य के निकष पर हुआ। यह सब हुआ जातीय साहित्य और जातीय परम्परा का ढिंढोरा पीटने के बावजूद। यह पुस्तक साहित्य के इतिहास-अध्ययन की इस प्रवृत्ति और साहित्यिक विधाओं के विकास की सीमाओं और विडम्बनाओं को भी अपनी चिन्ता का विषय बनाती है और सही मायने में अपनी जातीय साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्परा को एक उच्चतर सर्जनात्मक स्तर पर पुनराविष्कृत करने की विचारोत्तेजक पेशकश करती है।
—पुरुषोत्तम अग्रवाल
Nayi Kavita Ka Aatmasangharsh
- Author Name:
Gajanan Madhav Muktibodh
- Book Type:

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कोई रचनाकार, रचनाकार होने की सारी शर्तों को पूरा करता हुआ अपने समय और साहित्य के लिए कैसे और क्यों महत्त्वपूर्ण हो जाता है, मुक्तिबोध इन सवालों के अकेले जवाब हैं। एक सर्जक के रूप में वे जितने बड़े कवि हैं, समीक्षक के नाते उतने ही बड़े चिन्तक भी।
‘कामायनी : एक पुनर्विचार’ तथा ‘समीक्षा की समस्याएँ’ नामक कृतियों के क्रम में ‘नयी कविता का आत्मसंघर्ष’ मुक्तिबोध की बहुचर्चित आलोचना-कृति है, जिसका यह नया संस्करण पाठकों के सामने परिवर्तित रूप में प्रस्तुत है। छायावादोत्तर हिन्दी कविता के तात्त्विक और रूपगत विवेचन में इस कृति का विशेष महत्त्व रहा है। इसमें मुख्य निबन्ध शामिल हैं, जिनमें नयी कविता के सामने उपस्थित तत्कालीन चुनौतियों, ख़तरों और युगीन वास्तविकताओं के सन्दर्भ में उसकी द्वन्द्वात्मकता का गहन विश्लेषण किया गया है। कविता को मुक्तिबोध सांस्कृतिक प्रक्रिया मानते हैं और कवि को एक संस्कृतिकर्मी का दर्जा देते हुए यह आग्रह करते हैं कि अनुभव-वृद्धि के साथ-साथ उसे सौन्दर्याभिरुचि के विस्तार और उसके पुनःसंस्कार के प्रति भी जागरूक रहना चाहिए। उनकी मान्यता है कि आज के कवि की संवेदन-शक्ति में विश्लेषण-प्रवृत्ति की भी आवश्यकता है, क्योंकि कविता आज अपने परिवेश के साथ सर्वाधिक द्वन्द्व-स्थिति में है।
नई कविता के आत्मद्वन्द्व या आत्मसंघर्ष को मुक्तिबोध ने त्रिविध संघर्ष कहा है, अर्थात—1. तत्त्व के लिए संघर्ष, 2. अभिव्यक्ति को सक्षम बनाने के लिए संघर्ष और 3. दृष्टि-विकास का संघर्ष। इनका विश्लेषण करते हुए वे लिखते हैं—‘प्रथम का सम्बन्ध मानव-वास्तविकता के अधिकाधिक सक्षम उद्घाटन-अवलोकन से है। दूसरे का सम्बन्ध चित्रण-दृष्टि के विकास से है, वास्तविकताओं की व्याख्याओं से है।’ वस्तुतः समकालीन मानव-जीवन और युग-यथार्थ के मूल मार्मिक पक्षों के रचनात्मक उद्घाटन तथा आत्मग्रस्त काव्य-मूल्यों के बजाय आत्मविस्तारपरक काव्यधारा की पक्षधरता में यह कृति अकाट्य तर्क की तरह मान्य है।
Kalam Ka Majdoor : Premchand
- Author Name:
Madan Gopal
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- Description: हिन्दी के जीवनी-साहित्य में बहुचर्चित यह पुस्तक स्वयं लेखक के अनुसार उसके करीब बीस वर्षों के परिश्रम का परिणाम है। ‘राजकमल’ से इसका पहला संस्करण 1965 में प्रकाशित हुआ था और यह एक महत्त्वपूर्ण कृति का पाँचवाँ संशोधित संस्करण है। इस पुस्तक की तैयारी में समस्त उपलब्ध सामग्रियों का उपयोग करने के अतिरिक्त मुख्य रूप से प्रेमचन्द की ‘चिट्ठी-पत्री’ का सहारा लिया गया है, जिसके संग्रह के लिए मदन गोपाल ने वर्षों तक देश के विभिन्न भागों में सैकड़ों व्यक्तियों से पत्र-व्यवहार किया या भेंट की। इस दुर्लभ और अनुपलब्ध सामग्री के द्वारा प्रेमचन्द के जीवन-सम्बन्धी अनेक नए तथ्य प्रकाश में आए हैं। प्रेमचन्द के जीवन और कृतियों के रचना-काल एवं प्रकाशन-सम्बन्धी जो बहुत-सी भूलें अभी तक दुहराई जाती रही हैं, उन्हें भी लेखक ने यथासाध्य छानबीन करके ठीक करने का प्रयास किया है। इस प्रकार ‘कलम का मज़दूर : प्रेमचन्द’ हिन्दी में प्रेमचन्द की पहली प्रामाणिक और मुकम्मल जीवनी है, जिसमें आधुनिक युग के सबसे समर्थ कथाकार की कृतियों का जीवन्त ऐतिहासिक सन्दर्भ और सामाजिक परिवेश प्रस्तुत किया गया है। जैसा कि इस पुस्तक के नाम ‘कलम का मज़दूर : प्रेमचन्द’ से ही स्पष्ट है, इसमें प्रेमचन्द के वास्तविक व्यक्तित्व को पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ उभारकर रखने का प्रयास किया गया है। प्रेमचन्द के व्यक्तित्व के अनुरूप ही सीधी-सादी अनलंकृत शैली में लिखी हुई इस पुस्तक की शक्ति स्वयं तथ्यों में है। कुछ दुर्लभ चित्र पुस्तक का अतिरिक्त आकर्षण हैं।
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