Jo Gopi Madhu Ban Gayi
Author:
RameshraajPublisher:
Rachnaye FulfilledLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics2 Ratings
Price: ₹ 34
₹
40
Available
श्रीकृष्ण और राधा के अलौकिक प्रेम को लेकर, यमक अलंकार से युक्त एक अद्भुत दोहा-शतक
ISBN: RF-RR-JGMBG
Pages: 10
Avg Reading Time: 0 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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लम्बी कविता की अवधारणा छायावाद काल की है। कोई इसे ‘परिवर्तन’ से आरम्भ मानता है तो कोई इसे ‘प्रलय की छाया’ से। माना जाता है कि कुछ आलोचक ‘राम की शक्ति-पूजा’ से लम्बी कविता का आरम्भ मानते हैं। बावजूद इसके इतना तो तय है कि लम्बी कविताओं की एक सुदृढ़ एवं नियमित परम्परा मुक्तिबोध से आरम्भ होती है।
लम्बी कविता की परम्परा को मुक्तिबोध के बाद राजकमल चौधरी की ‘मुक्ति प्रसंग’ और धूमिल की ‘पटकथा’ आगे बढ़ाती है। राजकमल चौधरी की ‘मुक्ति प्रसंग’ कविता एक ऐसे आदमी के भटकाव की कविता है, जो सार्थकता की तलाश में निरर्थक होते जाने की पीड़ा को पीठ पर लादे घूम रहा है। धूमिल की कविता ‘पटकथा’ भी राजनीति-केन्द्रित कविता है। यह कविता आज़ादी के बाद की हालत का बखान करती है। कविता का आरम्भ आज़ादी के मोह और आकर्षण से होता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दी की लम्बी कविताएँ युग-बोध की उपज हैं और इस काव्यरूप का भविष्य आगे भी उज्ज्वल है। आज भी लम्बी कविताओं का लेखन जारी है। इस पुस्तक में चार कवियों की नौ लम्बी कविताओं की विवेचना शामिल है। पहले कवि निराला हैं जिनकी चार कविताएँ आलोचना के लिए चुनी गई हैं। उनके बाद अज्ञेय, मुक्तिबोध और धूमिल की कविताओं का विश्लेषण किया गया है।
Zamane Se Do Do Hath
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

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Description:
प्रो. नामवर सिंह हिन्दी का चेहरा हैं। उनमें हिन्दी समाज, साहित्य-परम्परा और सर्जना की संवेदना रूपायित होती है। वे न सीमित अर्थों में साहित्यकार हैं और न आलोचक। वे हिन्दी में मानवतावादी, लोकतांत्रिक और समाजवादी विचारों की व्यापक स्वीकृति के लिए सतत संघर्षशील प्रगतिशील आन्दोलन के अग्रणी विचारक थे। स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज और राजनीति की जनपक्षधर शक्तियों को उन्होंने अपनी वैचारिकता, आलोचकीय प्रतिभा और लोकसंवेदी-तर्कप्रवण वक्तृता से निरन्तर मज़बूत किया। वे देश में समतावादी समाज का सपना सँजोये रखनेवाली सामाजिक शक्तियों के पक्ष में सामन्तवादी-पुनरुत्थानवादी शक्तियों और पूँजीवादी शक्तियों से निरन्तर मुठभेड़ जारी रखनेवाले वैचारिक योद्धा थे। उन्होंने जहाँ एक ओर धर्म, लोक, परम्परा और संस्कृति के मानवीय मूल्यों पर ज़ोर देनेवाली विरासत की सटीक व्याख्या की है, वहीं इनको उपकरण बनाकर सामाजिक भेदों को स्वीकृत करानेवाले बौद्धिक प्रयत्नों के ख़िलाफ़ हमलावर तेवर भी अपनाए। उन्होंने परम्परा और आधुनिकता के मूल्यांकन की प्रगतिशील परम्परा को आगे बढ़ाया।
प्रस्तुत संग्रह में नामवर जी के विगत दो दशकों में दिए गए अनेक व्याख्यानों एवं वाचिक टिप्पणियों के साथ दो आलेख शामिल हैं, जिनमें भूमंडलीकरण, फासीवाद, साम्प्रदायिकता भाषा और संस्कृति के ज्वलन्त सवालों पर नामवर जी के विचार हिन्दी समाज की जड़ता को तोड़ने के क्रम में हमारे सामने आते हैं।
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