Hindi Sahitya Ka Uttarvarti Kaal
Author:
Satyadev MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 320
₹
400
Available
इस कृति में आधुनिक हिन्दी साहित्य की अन्यान्य विधाओं (कविता, नाटक, उपन्यास, कहानी, निबन्ध, आलोचना, पत्रकारिता, जीवनी, आत्मकथा, रिपोर्ताज, रेखाचित्र, संस्मरण, यात्रा-वृत्तान्त, डायरी आदि) के उद्विकास का संक्षिप्त किन्तु प्रामाणिक लेखा-जोखा है। हिन्दी गद्य-पद्य की इन आधुनिक विधाओं के उत्स और विकास में पौर्वात्य के साथ पाश्चात्य साहित्य-समीक्षा का अनुप्रभाव भी यथास्थान रेखांकित किया गया है।</p>
<p>पुस्तक पाठक में सहज भाव-बोध अंकुरित करती है क्योंकि विषयाभिव्यक्ति प्रांजल है। इसलिए यह कृति हिन्दी के विश्वविद्यालयी स्तर के पाठकों के लिए नितान्त उपादेय एवं मूल्यवान है।</p>
<p>इस कृति में सूचनाएँ, प्रस्तुतियाँ और स्थापनाएँ प्रामाणिक हैं और यह हिन्दी के सुविख्यात साहित्येतिहास-लेखकों, साहित्यकारों और समीक्षकों की मान्यताओं पर आधारित तथा अनुभावित है।
ISBN: 9788180316821
Pages: 307
Avg Reading Time: 10 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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दिनकर आधुनिक हिन्दी कविता के उत्तर–छायावादी व नवस्वच्छन्दतावादी दौर के सर्वश्रेष्ठ कवि थे। कवि–रूप में उनकी दो विशेषताएँ थीं। एक तो यह कि उनकी कविता के अनेक आयाम हैं और दूसरी यह कि उनमें अन्त–अन्त तक विकास होता रहा। ‘प्रण–भंग’ से लेकर ‘हारे को हरिनाम’ तक की काव्य–यात्रा जितनी ही विविधवर्णी है, उतनी ही गतिशील भी। दिनकर रचनावली के अवलोकन के बाद डॉ. नामवर सिंह ने उचित ही यह टिप्पणी की कि कुल मिलाकर दिनकर जी का रचनात्मक व्यक्तित्व बहुत कुछ निराला की तरह है।
दिनकर की कविता के उल्लेखनीय आयाम हैं राष्ट्रीयता, सामाजिकता, प्रेम और शृंगार तथा आत्मपरकता एवं आध्यात्मिकता। इन आयामों का अतिक्रमण करते हुए उन्होंने अच्छी संख्या में ऐसी कविताएँ लिखी हैं, जिन्हें किसी खाने में नहीं रखा जा सकता। वस्तुत: ऐसी कविताएँ ही उन्हें महान कवि बनाती हैं। सबसे ऊपर उनकी विशेषता है उनके व्यक्तित्व की ओजस्विता, जो उनकी प्रत्येक प्रकार की कविताओं में अभिव्यंजित होती है। स्वभावत: उनकी प्रेम–शृंगार और आध्यात्मिक कविताओं में जो लावण्य है, उसे एक आलोचक के शब्द लेकर ‘ओजस्वी लावण्य’ कहा जा सकता है।
‘नई कविता’ के दौर में दिनकर जी को वह सम्मान न मिला, जिसके वे अधिकारी थे। उन्हें वक्तृतामूलक और प्रचारवादी कवि कहा गया, जबकि सच्चाई यह है कि ये दोनों बातें स्वतंत्रता–आन्दोलन के प्रवक्ता कवि के लिए स्वाभाविक थीं, लेकिन ज्ञातव्य यह है कि उन्होंने श्रेष्ठ कविता का दामन कभी नहीं छोड़ा।
दूसरे, समय के साथ उनकी कविता का तर्ज बदलता गया और वे भी ‘महीन’ कविताएँ लिखने लगे, जिनमें एक नई आभा है। निश्चय ही उनकी कविता हिन्दी की कालजयी कविता है, उसे नया विस्तार और तनाव देनेवाली।
Chitralekha Ka Mahatva
- Author Name:
Madhuresh
- Book Type:

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अपने प्रकाशन के लगभग तत्काल बाद से ही 'चित्रलेखा' किसी-न-किसी रूप में चर्चा और विवादों में रही है। लेकिन उसका खुमार आज भी बना हुआ है। जैसा कि प्राय: कोई न ज़मीन तोड़नेवाली हर रचना के साथ होता है, वह अपने साथ अनेक प्रश्नों और विवादों को भी लेकर आती है। 'चित्रलेखा' के साथ भी यह सच है। एक ओर यदि वैचारिक धरातल पर भगवतीचरण वर्मा और उनकी रचना का विरोध हुआ, वहीं कभी उनके स्त्री पात्रों, कभी बीजगुप्त के प्रेम-दर्शन और जीवन-पद्धति को आधार बनाकर लेखक पर अनेक सवाल उठाए गए।
किसी भी रचना पर विचार और मूल्यांकन की प्रक्रिया में पहला काम उस रचना को वस्तुपरकता के साथ देखना और समझना है। ‘चित्रलेखा’ को सम्पूर्णता में समझने के लिए यहाँ बहुत से ऐसे पक्षों पर लिखवाया गया है जिनके बिना उसका कोई भी मूल्यांकन अधूरा होगा। यहाँ जो सामग्री संकलित है, उसके माध्यम से ‘चित्रलेखा’ को समूचे परिप्रेक्ष्य में अधिक पूर्णता से समझा जा सकेगा।
Jaishankar Prasad
- Author Name:
Nandulare Vajpeyi
- Book Type:

- Description: ‘जयशंकर प्रसाद’ सन् 1939 में प्रकाशित आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की प्रारम्भिक कृति है जो नए संस्करण के साथ साहित्य प्रेमियों, छात्रों के लिए उपलब्ध है। इसमें प्रसाद जी पर लम्बी भूमिका के साथ पन्द्रह निबन्ध हैं। कथा-साहित्य, उपन्यास, काव्य और नाटकों पर प्रसाद जी के विराट व्यक्तित्व का यह समाकलन है। रचनाकार की अन्तःप्रेरणा, अनुसन्धान का परिचय इस पुस्तक में प्राप्त है। इस पुस्तक में कवि, कथाकार, नाटककार प्रसाद को सम्पूर्ण परिवेश में परखा गया है। एक व्यक्ति के इन विभिन्न रंगों में कितनी शालीनता, संस्कार, भाषागत सौष्ठव हमें प्राप्त है, इस पर विस्तृत विवेचन है। अतीत के विशाल चित्रफलक पर पचास वर्षों के लम्बे समय तक उनका साहित्य जगत पर एकच्छत्र एकाधिकार निःसन्देह गौरव का विषय है।
Hindi Gitikavya Parampara Aur Miran
- Author Name:
Manju Tiwari
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मीरां को लेकर अनेक शोध हो चुके हैं लेकिन उनके गीति-काव्य के निकष पर अध्ययन-अनुशीलन की आवश्यकता अभी भी बनी हुई थी। इसके अलावा, मीरां के कृतित्व को लेकर अनेक मतभेद और विवाद भी चलते रहे हैं। उनके चारों ओर अलौकिकता का आवरण भी फैला हुआ है जिसकी वजह से मीरां के मूल्यांकन में एक बड़ी बाधा रहती आई है। मीरां के अनुशीलन में एक भारी समस्या मीरां पदावली के मूल पाठ की भी है। उन पर केन्द्रित आलोचना-ग्रन्थों के स्रोत प्राय: मीरां के लोक प्रचलित पद रहे हैं जिनके आधार पर किए जानेवाले विवेचन काफ़ी भ्रमपूर्ण बनते रहे हैं। इस अध्ययन में मीरां के पदों के मूल पाठ को आधार बनाया गया है। साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि मीरां के गीतों के सहज संगीत को भी आकलन का निकष बनाया जाए।
मीरां के गीतों की सांगीतिकता और राग-रागिनियों में गीतों के सफल नियोजन की बात सभी श्रेष्ठ संगीतकारों ने स्वीकार की है। उनके यहाँ शिल्प एवं शब्दगत अलंकरण के कोई आग्रह नहीं हैं। निश्छल और मधुर भावाभिव्यक्ति के कारण मीरां के गीतों का अपना एक विशिष्ट स्थान है। यह उनके गीतों का ही वैशिष्ट्य है कि सैकड़ों वर्षों के बाद आज भी वे लोक-कंठ में रचे-बसे हुए हैं। यह पुस्तक मीरां के जीवन और विशेष रूप से उनके कृतित्व को एक नई दृष्टि से देखने की प्रेरणा देती है।
Akbar Allahabadi Par Ek Aur Nazar
- Author Name:
Shamsurrahman Farooqui
- Book Type:

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उर्दू के विख्यात आलोचक, उपन्यासकार, कवि शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के ये तीन आलेख अकबर इलाहाबादी को एक नए ढंग से देखते हैं और अकबर की कविता और उनके चिन्तन को बिलकुल नए मायने देते हैं। आमतौर पर व्यंग्य को दूसरी श्रेणी का साहित्य कहा जाता रहा है। यह इस कारण भी हुआ कि अंग्रेज़ी साम्राज्य शिक्षण की रोशनी में अकबर के विचार पुराने, और पुराने ही नहीं पीछे की तरफ़ लौट जाने का तक़ाज़ा करते मालूम होते थे। शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने पहली बार इस भ्रम को तोड़ा है और इन आलेखों में बताया है कि व्यंग्य को दूसरी श्रेणी का साहित्य कहना बहुत बड़ी भूल है। वे अकबर इलाहाबादी को उर्दू के छह सबसे बड़े शायरों में मानते हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि अकबर नई चीज़ों के ख़िलाफ़ नहीं थे, मगर वो यह भी जानते थे कि अंग्रेज़ों ने ये नई चीज़ें हिन्दुस्तानियों के उद्धार के लिए नहीं, बल्कि अपनी उपनिवेशीय शक्तियों को फैलाने और बढ़ाने के लिए स्थापित की थीं। फ़ारूक़ी इन आलेखों में बताते हैं कि कल्चर भी उपनिवेशीय आक्रमण का प्रतीक और माध्यम बन जाता है।
अकबर कहते हैं कि अंग्रेज़ पहले तो तोप लगाकर साम्राज्य को क़ायम करते हैं, फिर ग़ुलामों की ज़हनियत को अपने अनुकूल बनाने के लिए उन्हें अपने ढंग की तालीम देते हैं। फ़ारूक़ी कहते हैं कि इन बातों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि तथाकथित उन्नति लानेवाली चीज़ों के पीछे दरअसल उपनिवेश और साम्राज्य को फैलाने की पॉलिसी थी। उनका कहना है कि अकबर इलाहाबादी पहले हिन्दुस्तानी हैं, जिन्होंने इस बात को पूरी तरह महसूस किया और साफ़–साफ़ बयान किया।
फ़ारूक़ी पहले आलोचक हैं जिन्होंने इन आलेखों में अकबर इलाहाबादी और उनके व्यंग्य को, पोस्ट कोलोनियल दृष्टिकोण से देखने की भरपूर कोशिश की है।
फ़ज़्ले हसनैन और ताहिरा परवीन ने उर्दू से हिन्दी में अनुवाद करते समय ग्राह्यता व भाषिक प्रवाह का विशेष ध्यान रखा है ।
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