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Hindi Sahitya Aur Nari Samaj

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संसार के समस्त प्राणियों में 'स्त्री' मानव समाज की अपनी दुनिया है। यह जानने, समझने के बावजूद स्त्री घर के भीतर और बाहर समाज में उपेक्षित, अपमानित और प्रताड़ित होती रही है। कभी उसने प्रतिरोध किया तो कभी विरोध। हर हाल में झेलना स्त्री को ही पड़ा है। कभी परिस्थितियों की प्रतिकूलता ने उसे संघर्षमय बनाया तो कभी अपनों की अनाकुलता के कारण उसे विषमताओं को झेलना पड़ा। यदि वह उनसे उभरती तो कोई न कोई कलंक उसे कलुषित करता। मानो स्त्री कोई वस्तु है, जिसे प्रत्येक स्तर पर अपने आपको ढालना है। स्त्री, स्त्री है तभी वह ऐसा करने में सक्षम है। नारी मानव समाज का अभिन्न अंग है। समाज की ही भाँति साहित्य में भी नारी को लेकर कई विचारधाराएँ हैं। समय चाहे कोई भी रहा हो नारी के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। परिणामस्वरूप समय-समय पर नारी की स्थिति में परिवर्तन आया। सामाजिक रूप से नारी की स्थिति में आए परिवर्तन का प्रभाव हिन्दी साहित्य पर भी पड़ा, क्योंकि साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब होता है। साहित्य मानव जीवन की ही प्रतिछाया है। समाज में नारी की गतिविधियों, चित्तवृत्तियों के अनुरूप हिन्दी साहित्य में भी नारी का चित्रण मिलता है। इस पुस्तक में नारी की सामाजिक और साहित्यिक स्वरूप को समझने और समझाने का प्रयास किया गया है। यह पुस्तक समाज और साहित्य दोनों दृष्टियों से नारी के स्वरूप को एकत्र करने का सत्प्रयत्न है।

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संसार के समस्त प्राणियों में 'स्त्री' मानव समाज की अपनी दुनिया है। यह जानने, समझने के बावजूद स्त्री घर के भीतर और बाहर समाज में उपेक्षित, अपमानित और प्रताड़ित होती रही है। कभी उसने प्रतिरोध किया तो कभी विरोध। हर हाल में झेलना स्त्री को ही पड़ा है। कभी परिस्थितियों की प्रतिकूलता ने उसे संघर्षमय बनाया तो कभी अपनों की अनाकुलता के कारण उसे विषमताओं को झेलना पड़ा। यदि वह उनसे उभरती तो कोई न कोई कलंक उसे कलुषित करता। मानो स्त्री कोई वस्तु है, जिसे प्रत्येक स्तर पर अपने आपको ढालना है। स्त्री, स्त्री है तभी वह ऐसा करने में सक्षम है। नारी मानव समाज का अभिन्न अंग है। समाज की ही भाँति साहित्य में भी नारी को लेकर कई विचारधाराएँ हैं। समय चाहे कोई भी रहा हो नारी के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। परिणामस्वरूप समय-समय पर नारी की स्थिति में परिवर्तन आया। सामाजिक रूप से नारी की स्थिति में आए परिवर्तन का प्रभाव हिन्दी साहित्य पर भी पड़ा, क्योंकि साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब होता है। साहित्य मानव जीवन की ही प्रतिछाया है। समाज में नारी की गतिविधियों, चित्तवृत्तियों के अनुरूप हिन्दी साहित्य में भी नारी का चित्रण मिलता है। इस पुस्तक में नारी की सामाजिक और साहित्यिक स्वरूप को समझने और समझाने का प्रयास किया गया है। यह पुस्तक समाज और साहित्य दोनों दृष्टियों से नारी के स्वरूप को एकत्र करने का सत्प्रयत्न है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2019
Weight
232 grams
ISBN-13
9789389243598
Pages
116
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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