Bogi Number 2003
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"‘बोगी नंबर 2003’ इतिहास का वह हिस्सा है जहाँ संस्कृति, शिक्षा, जन सेवाएँ, राजनीति और समाज केविभिन्न वर्गों के कालापन से उपजी विसंगतियाँ, विडंबनाएँ और विद्रूपताएँ इस उपन्यास में रोचकतापूर्ण मनोरंजन सहित ढली हैं। इस व्यंग्य-उपन्यास में की पीढ़ी उस राजनीतिक काल की पीढ़ी है, जब देश के नियामक रक्षक से भक्षक बनने लगे थे। बहुत से राजनेता धन जमा करने की होड़ में जुटने लगे थे और भ्रष्टाचार जीवन का मूलमंत्र बनने लगा था। ‘काले धन की बैसाखी’ शासन-कर्ताओं को अनिवार्य लगने लगी थी। इन्हीं भ्रष्ट जन का अनुकरण जीवन का व्यवहार बनने लगा था, जिससे बेईमानी का कद बढ़ रहा था। इसके अतिरिक्त इस पीढ़ी पर फिल्मों का प्रभाव बेहद रहा। विवेकानंद, स्वामी दयानंद, सुभाष, भगतसिंह, चंद्रशेखर से कहीं अधिक यह पीढ़ी फिल्मी सितारों को चाहने लगी। महात्मा गांधी तो केवल दो अक्तूबर तक सीमित रह गए, गांधी के नाम पर लूट-खसोट करनेवालों को देख यह पीढ़ी उनकी तरह तुरंत अमीर होना और अय्याशी परस्ती पसंद करने लगी थी। प्रस्तुत कृति में इसका विशद चित्रण आप प्रत्यक्ष भी और परोक्ष भी पाएँगे। "
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"‘बोगी नंबर 2003’ इतिहास का वह हिस्सा है जहाँ संस्कृति, शिक्षा, जन सेवाएँ, राजनीति और समाज केविभिन्न वर्गों के कालापन से उपजी विसंगतियाँ, विडंबनाएँ और विद्रूपताएँ इस उपन्यास में रोचकतापूर्ण मनोरंजन सहित ढली हैं।
इस व्यंग्य-उपन्यास में की पीढ़ी उस राजनीतिक काल की पीढ़ी है, जब देश के नियामक रक्षक से भक्षक बनने लगे थे। बहुत से राजनेता धन जमा करने की होड़ में जुटने लगे थे और भ्रष्टाचार जीवन का मूलमंत्र बनने लगा था। ‘काले धन की बैसाखी’ शासन-कर्ताओं को अनिवार्य लगने लगी थी। इन्हीं भ्रष्ट जन का अनुकरण जीवन का व्यवहार बनने लगा था, जिससे बेईमानी का कद बढ़ रहा था। इसके अतिरिक्त इस पीढ़ी पर फिल्मों का प्रभाव बेहद रहा। विवेकानंद, स्वामी दयानंद, सुभाष, भगतसिंह, चंद्रशेखर से कहीं अधिक यह पीढ़ी फिल्मी सितारों को चाहने लगी। महात्मा गांधी तो केवल दो अक्तूबर तक सीमित रह गए, गांधी के नाम पर लूट-खसोट करनेवालों को देख यह पीढ़ी उनकी तरह तुरंत अमीर होना और अय्याशी परस्ती पसंद करने लगी थी। प्रस्तुत कृति में इसका विशद चित्रण आप प्रत्यक्ष भी और परोक्ष भी पाएँगे।
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Book Details
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ISBN9789387968820
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Pages136
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Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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भारत में आधुनिक विज्ञान का नक़्शा बनाने में हिन्दुओं से ज़्यादा मुसलमानों और मुसलमानों से ज़्यादा भूमिका अंग्रेज़ों की रही। आज़ादी के पूर्व से ही भारत जात-पाँत और ऊँच-नीच के दलदल में फँसा हुआ है। आधुनिक भारतीय इतिहास पर भारत में जितनी पुस्तकें लिखी गईं, उनमें से अधिकांश के लेखक हिन्दू रहे। उनके द्वारा अधिकांश पुस्तकें भारत के प्रमुख नेताओं के पक्ष में, अंग्रेज़ों के विरोध में, मुसलमानों के योगदान और वैज्ञानिक गतिविधियों को नज़रअन्दाज़ करते हुए लिखी गईं।
आधुनिक काल के क़रीब सभी भारतीय वैज्ञानिक इंग्लैंड से विज्ञान पढ़-लिख-जान कर आए। भारत के निवासियों को अंग्रेज़ों ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा छूत-अछूत अथवा हिन्दू-मुसलमान में कोई भेदभाव न कर सबको एक नाम भारतीय दिया। भारत का मानचित्र भी अंग्रेज़ों ने तैयार किया। अंग्रेज़ी शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाएँ, बैंक, प्रयोगशाला, रेलवे आदि सब अंग्रेज़ों की देन है। कलकत्ता में अंग्रेज़ों ने अपने कर्मचारियों को भारतीय भाषाओं से परिचित कराने के लिए फ़ोर्ट विलियम कॉलेज नमक विशेष विद्यालय की स्थापना की थी, जहाँ भारतीय भाषाओं में अनेक पाठ्य-पुस्तकों की रचना भी की गई। अठारहवीं सदी में महलों, सड़कों, पुलों आदि से युक्त अनेक नए नगर पैदा हुए। अठारहवीं सदी में भारत में विशेष रूप से बंगाल में यूरोपीय शैली के भवन भी बनने लगे थे। 1882 में टेलीफ़ोन आया। 1914 में प्रथम ऑटोमेटिक टेलीफ़ोन एक्सचेंज लगाया गया। अगस्त 1945 से लम्ब्रेटा स्कूटर बनना शुरू हुआ।
प्रस्तुत पुस्तक में आधुनिक वैज्ञानिकों पर संक्षेप में प्रकाश डाला गया है। इन सभी वैज्ञानिकों को सर्वाधिक प्रोत्साहन एवं प्रेरणा इंग्लैंड से मिली। प्रथम अध्याय में आधुनिक भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियों की चर्चा की गई है। प्रथम और द्वितीय महायुद्ध के दौरान भारत में विज्ञान की एक विशेष धारा दिखाई देती है। आधुनिक तकनीक और सामाजिक विकास से भारत किन-किन रूपों में प्रभावित हुआ, इसका विशद वर्णन दूसरे अध्याय में किया गया है। इसके अलावा 'द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान तकनीक एवं समाज’, 'द्वितीय महायुद्ध के उपरान्त’, 'विज्ञान एवं पेट्रोल’, 'प्लास्टिक और चलचित्र तकनीक’, 'आपदा प्रबन्धन’ और 'भारतीय विज्ञान एवं अंग्रेज़ों का योगदान’ आदि अध्यायों में आधुनिक भारत में विज्ञान के विभिन्न चरणों पर संक्षेप में प्रकाश डाला गया है।
Sansad mein Vikas Ki Baaten
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Teen Talaq
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Jatiyon Ka Loktantra : Jati Aur Aarakshan
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- Description: भारत के सामाजिक पदानुक्रम को आरक्षण ने काफी बदला है, लेकिन उतना शायद नहीं जितने की अपेक्षा थी, और जिसको ध्यान में रखकर हमारे संविधान-निर्माताओं ने सामाजिक न्याय को एक आधारभूत मूल्या माना था। आज भी समाज का एक बड़ा हिस्सा सबसे कमजोर भारतवासियों को मिले आरक्षण को वैरभाव से देखता है, आज भी ऊँचे सरकारी पदों पर दलित-आदिवासी बहुत कम हैं और चतुर्थ श्रेणी या सफाई जैसे कामों में उनकी संख्या ज्यादा दिखाई देती है। ‘जातियों का लोकतंत्र’ शृंखला की यह पुस्तक भारत में आरक्षण की अवधारणा के पैदा होने, उसके लागू किए जाने, उसके विरोध और उसके समर्थन आदि हर पहलू पर विचार करती है। इसमें संकलित एक-एक आलेख को आरक्षण पर केन्द्रित प्रामाणिक अध्ययन माना जा सकता है, जिन्हें इसके सम्पादक, अरविन्द मोहन ने निश्चय ही इस उद्देश्य से जुटाया है कि हम आज, जबकि आरक्षण को बस एक चुनावी औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, यह जान सकें कि आरक्षण बतौर एक व्यवस्था और बतौर एक विचार क्या है! यह पुस्तक आरक्षण के पीछे के तर्कों, इसे लेकर हुई बहसों, तथ्यों और विकल्पों, सबसे अवगत कराती है। इसके अध्ययन से एक सामान्य पाठक भी जान सकेगा कि लगातार बहस में रहनेवाले आरक्षण को लेकर हमें एक सामाजिक रूप में कैसे सोचना चाहिए; कि क्या वह महज एक आर्थिक प्रश्न है, या कि उसका कुछ सम्बन्ध मनुष्योचित व्यवहार और सम्मान से भी है!
Supreme Court Mein Ramlala
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