Arthat Rashtravaad
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भारत की आजादी के बाद से ही कुछ मुट्ठी भर राष्ट्रविरोधी छद्म विचारकों द्वारा राष्ट्रवाद का प्रयोग संकुचित और सीमित अर्थों में किया जाने लगा, जबकि राष्ट्रवाद किसी भी देश के नागरिकों की अपने देश के प्रति वह रागात्मक भावना है, जिसके कारण वह बिना किसी निजी स्वार्थ के राष्ट्र की प्राकृतिक, भौतिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक अस्मिता से एक स्वाभाविक प्रेम रखता है। यही वह भावना है जो एक ही राष्ट्र में विविध भाषाओं, वर्गों और संस्कृतियों को एक सूत्र में जोड़ते हुए उसे राष्ट्रप्रेम की ओर उन्मुख करती है। दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि तथाकथित बड़े-बड़े लेखकों और चिंतकों ने भी भारतीय राष्ट्रवाद की नकारात्मक व्याख्या की, जबकि इसकी वैश्विक कल्याणकारी दृष्टि विश्व के प्राचीनतम साहित्य में भी उपलब्ध है। राष्ट्रवाद, और विशेष रूप से भारतीय राष्ट्रवाद क्या है, इसकी व्यापकता और इतिहास क्या है, इन सब बिंदुओं पर छाए हुए धुंध को दूर करना आवश्यक था, इसलिए यह पुस्तक की आवश्यकता प्रतीत हुई। राष्ट्रवाद को सही मायने में उसके सभी पक्षों के साथ संपूर्णता में व्याख्यायित करती विदुषी नीरजा माधव की यह पुस्तक वास्तव में एक चिंतनपरक राष्ट्रीय प्रकाश-स्तंभ है, जिसकी उपादेयता सार्वकालिक है।
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भारत की आजादी के बाद से ही
कुछ मुट्ठी भर राष्ट्रविरोधी छद्म विचारकों द्वारा राष्ट्रवाद का प्रयोग संकुचित और सीमित अर्थों में किया जाने लगा, जबकि राष्ट्रवाद किसी भी देश के नागरिकों की अपने देश के प्रति वह रागात्मक भावना है, जिसके कारण वह बिना किसी निजी स्वार्थ के राष्ट्र की प्राकृतिक, भौतिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक अस्मिता से एक स्वाभाविक प्रेम रखता है। यही वह भावना है जो एक ही राष्ट्र में विविध भाषाओं, वर्गों और संस्कृतियों को एक सूत्र में जोड़ते हुए उसे राष्ट्रप्रेम की ओर उन्मुख करती है। दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि तथाकथित बड़े-बड़े लेखकों और चिंतकों ने भी भारतीय राष्ट्रवाद की नकारात्मक व्याख्या की, जबकि इसकी वैश्विक कल्याणकारी दृष्टि विश्व के प्राचीनतम साहित्य में भी उपलब्ध है।
राष्ट्रवाद, और विशेष रूप से भारतीय राष्ट्रवाद क्या है, इसकी व्यापकता और इतिहास क्या है, इन सब बिंदुओं पर छाए हुए धुंध को दूर करना आवश्यक था, इसलिए यह पुस्तक की आवश्यकता प्रतीत हुई। राष्ट्रवाद को सही मायने में उसके सभी पक्षों के साथ संपूर्णता में व्याख्यायित करती विदुषी नीरजा माधव की यह पुस्तक वास्तव में एक चिंतनपरक राष्ट्रीय प्रकाश-स्तंभ है, जिसकी उपादेयता सार्वकालिक है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Prabhat Prakashan
- Weight
- 250 grams
- ISBN-13
- 9789390923229
- Pages
- 176
- Reading time
- ~6 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 22 cm
- Language
- Hindi
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"‘हाशिए पर हसरत’ एक ऐसे कटु यथार्थ का दस्तावेज है, जो हमारे समाज के लिए आज भी शर्म का बायस है। भारतीय समाज की संरचना में जाति-वर्ण की विभाजक रेखा इतनी प्रतिगामी और अमानवीय साबित हुई है कि एक सभ्य समाज उससे जितनी जल्द मुक्त होगा, उसका उतना ही भला होगा। यह पुस्तक उसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था में अस्पृश्य जातियों की अंतिम पंक्ति में खड़े मुसहर जाति की स्थिति से रू-ब-रू कराने की कोशिश है। भीम सिंह भवेश की यह पुस्तक वस्तुतः समाज विज्ञान में एक शोध है। यह पुस्तक मुसहरों के जीवन, उनकी जीवन-दृष्टि, आपसी संबंधों, दशा-दिशा, भविष्य और समाज की मुख्यधारा के प्रति उनकी धारणाओं का प्रामाणिक दस्तावेज है। मुसहर-टोलों के जीवन को जिस संवेदना के साथ भवेश ने उकेरा है, उसका एहसास इसे पढ़ने पर होता है। उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, मान्यताओं और जटिलताओं को लेखक ने बहुत करीब से देखा है। ग्रामीण जीवन के अमर चितेरे फणीश्वर नाथ रेणु के जन्म शताब्दी वर्ष में ‘हाशिए पर हसरत’ का प्रकाशन ‘मैला आँचल’ के लेखक को सबसे अच्छी श्रद्धांजलि भी है। भवेश ने जानकारियाँ जुटाने में मेहनत तो की ही है, उन्हें प्रस्तुत भी रोचक शैली में किया है। इसीलिए यह शुष्क शोध नहीं, बल्कि पठनीय कथ्य के माध्यम से संवेदनशील विषय के प्रति हमारे अंदर संवेदना जगाती है। यही इस पुस्तक की विशेषता है। यह पुस्तक मुसहर जाति को समझने, उनके दारुण दुःखों को महसूस करने और उन्हें उच्च मानवीय गरिमा प्रदान करने के प्रयासों को बल देगी। —अवधेश प्रीत "
Kirtishesh : Mohan Rakesh
- Author Name:
Jaidev Taneja
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मोहन राकेश के समृद्ध और बहुआयामी व्यक्तित्व के अनेक पक्ष थे, जो शायद किसी एक मित्र के साथ पूरी तरह शेयर नहीं किये जा सकते थे। लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने जिस मित्र के साथ जो पहलू शेयर किया, वह पूरी ईमानदारी के साथ किया। फिर भी, आज इतने समय के बाद भी उनके दोस्त और दुश्मन, प्रशंसक और आलोचक, दर्शक, पाठक और इतिहासकार यही तय नहीं कर पाए कि वह व्यक्ति वास्तव में था क्या? उसके कृतित्व का मूल्य और महत्त्व क्या और कितना है? वह असीम भावुक था या चरम बौद्धिक? अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी अवसरवादी था या तमाम उपलब्धियों के मोहपाश को पल-भर में काटकर किसी नये, अज्ञात और बड़े लक्ष्य की ओर निर्भय आगे बढ़ जानेवाला निरासक्त संन्यासी? मोहन राकेश के अन्तर्विरोधी एवं चौंकानेवाले अप्रत्याशित-अनपेक्षित कारनामों को लेकर उनके दोस्त और दुश्मन समान रूप से सच्चे-झूठे किन्तु चकित करनेवाले क़िस्से, प्रसंग, लतीफ़े, कथा-कहानियाँ, ख़बरें और अफ़वाहें रचते रहे हैं। सत्य और कल्पना तथा हक़ीक़त और फ़सानों से उपजी इस धुंध ने राकेश के जीवनकाल में ही उन्हें एक जीवित किंवदन्ती बना दिया था। ‘कीर्तिशेष : मोहन राकेश’ पुस्तक उन्हें, उनके जटिल व्यक्तित्व को एक नये सिरे से समझने का रास्ता खोलती है। यहाँ आप उनके समकालीनों, सहकर्मियों, मित्रों, सम्पादकों, प्रकाशकों, नाट्य-निर्देशकों, अभिनेताओं, फ़िल्मकारों, आलोचकों, मीडिया-कर्मियों और शिष्यों के संस्मरण पढ़ेंगे। उम्मीद है कि इनसे हम मोहन राकेश के व्यक्तित्व को कुछ बेहतर समझ सकेंगे।
Dosti
- Author Name:
Amarkant
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‘दोस्ती’ कथाकार अमरकान्त के संस्मरणों का संग्रह है। इसकी शुरुआत ही एक ऐसे संस्मरण से होती है जिसमें हमें बाद में अत्यन्त प्रतिष्ठित हुए रचनाकारों के शुरुआती दिनों और उनके संघर्षों का विवरण प्राप्त होता है। ‘लेखक की दोस्ती’ शीर्षक इस वृत्तान्त में कमलेश्वर, मार्कण्डेय, भैरवप्रसाद गुप्त, दुष्यन्त कुमार और अन्य समकालीनों की मित्रताओं और निजी व सामाजिक-रचनात्मक द्वन्द्वों का लेखा-जोखा पढ़ते ही बनता है। संस्मरण विधा में प्रवेश करते ही अमरकान्त जी की लेखनी इतनी चुटीली और चुस्त हो जाती है कि उनकी एक-एक पंक्ति आपको पकड़कर रखती है। उपरोक्त के अलावा इस पुस्तक में महादेवी वर्मा, नागार्जुन, रेणु, रवीन्द्र कालिया, मोहन राकेश आदि से सम्बन्धित संस्मरणों के अलावा कुछ यात्रा-वृत्तान्त भी शामिल हैं। ‘मेरा बचपन कब समाप्त हुआ’ शीर्षक लम्बे संस्मरण में अमरकान्त अपने जीवन के उन दिनों को याद करते हैं जब उनकी किशोर चेतना अलग-अलग दिशाओं से समझ और संस्कार ग्रहण कर रही थी। इस आलेख में कई बेहद मनोरंजक घटनाओं के विवरण भी उन्होंने दिए हैं और उस समय के सामाजिक-राजनीतिक हालात के भी। अमरकान्त और उनके समय को जानने-समझने में उनके ये संस्मरण साहित्य के अध्येताओं और पाठकों, दोनों को रुचिकर तथा सार्थक प्रतीत होंगे।
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