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Ujla Andhera

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उजला अँधेरा उपन्यास को पढ़ना एक ऐसे सच के सामने होना है जिससे पूरी व्यवस्था मुँह चुराती रही है। सामाजिक-व्यवस्था का वह सच  जिसने आज़ाद भारत के उस सपने को निरर्थक कर दिया जो इस देश के नागरिकों को समता, स्वतंत्रता और उजाले का आश्वासन देता था। वह सच है जाति जो हर तरह की सामाजिक-आर्थिक प्रगति को ठेंगा दिखाती हुई हमारे समाज में आज भी जहाँ की तहाँ बनी हुई है। तीन पीढ़ियों के दुःख-दर्द और बदलाव के संघर्षों से रचा हुआ यह पूरा उपन्यास अपने आप में एक तीखा सवाल है जिसे जाति के यथार्थ से आँख मिलाते हुए पूछा गया है। यह उपन्यास पूछता है कि भारत के लोग आज भी एक समान नागरिकता बोध और व्यवहार के अभ्यस्त क्यों नहीं हो पाए हैं; कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी समाज के एक बड़े हिस्से को अपने जन्म, विवाह एवं मृत्यु संस्कारों और उत्सवों को अपने ढंग से मनाने का अधिकार क्यों नहीं मिला; कि यह कैसी व्यवस्था है जिसमें सार्वजनिक सड़क को भी कुछ लोग अपनी निजी सम्पत्ति समझते हैं और चाहते हैं कि कौन उस पर चलेगा, कौन नहीं ये भी वे तय करें? और सबसे बड़ा यह सवाल कि एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र की सरकारें भी क्यों जाति की इस लक्ष्मण रेखा को नहीं लाँघ पातीं? ऐसे तमाम सवालों से उपन्यास के पात्र टकराते हैं। बदलाव की बेचैनी हो या बराबरी के सपने, वे यहाँ एक सुलगती हुई आँच में धीरे-धीरे पकते हैं और सघन सामूहिकता के साथ दर्ज होते हैं। हमारे समय और समाज को समझने के लिए एक ज़रूरी उपन्यास!

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About the Book

उजला अँधेरा उपन्यास को पढ़ना एक ऐसे सच के सामने होना है जिससे पूरी व्यवस्था मुँह चुराती रही है। सामाजिक-व्यवस्था का वह सच  जिसने आज़ाद भारत के उस सपने को निरर्थक कर दिया जो इस देश के नागरिकों को समता, स्वतंत्रता और उजाले का आश्वासन देता था।

वह सच है जाति जो हर तरह की सामाजिक-आर्थिक प्रगति को ठेंगा दिखाती हुई हमारे समाज में आज भी जहाँ की तहाँ बनी हुई है। तीन पीढ़ियों के दुःख-दर्द और बदलाव के संघर्षों से रचा हुआ यह पूरा उपन्यास अपने आप में एक तीखा सवाल है जिसे जाति के यथार्थ से आँख मिलाते हुए पूछा गया है।

यह उपन्यास पूछता है कि भारत के लोग आज भी एक समान नागरिकता बोध और व्यवहार के अभ्यस्त क्यों नहीं हो पाए हैं; कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी समाज के एक बड़े हिस्से को अपने जन्म, विवाह एवं मृत्यु संस्कारों और उत्सवों को अपने ढंग से मनाने का अधिकार क्यों नहीं मिला; कि यह कैसी व्यवस्था है जिसमें सार्वजनिक सड़क को भी कुछ लोग अपनी निजी सम्पत्ति समझते हैं और चाहते हैं कि कौन उस पर चलेगा, कौन नहीं ये भी वे तय करें? और सबसे बड़ा यह सवाल कि एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र की सरकारें भी क्यों जाति की इस लक्ष्मण रेखा को नहीं लाँघ पातीं?

ऐसे तमाम सवालों से उपन्यास के पात्र टकराते हैं। बदलाव की बेचैनी हो या बराबरी के सपने, वे यहाँ एक सुलगती हुई आँच में धीरे-धीरे पकते हैं और सघन सामूहिकता के साथ दर्ज होते हैं। हमारे समय और समाज को समझने के लिए एक ज़रूरी उपन्यास!

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2025
Weight
230 grams
ISBN-13
9789360862312
Pages
216
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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