🇮🇳 India’s home-grown full-stack ecosystem for Publishers, Authors, Writers, and Readers. 🎊🎊 Celebrate Your Language, Authors from Your Own Land, with Rachnaye!!! 🎊🎊 Enjoy 🎧 Audiobooks at Rachnaye, download the Rachnaye App from Play Store or App Store

Shahar Mein Curfew

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


About the book

पिछले तीन-चार दशकों में साम्प्रदायिकता का ज़हर तेजी से फैला है। परिणाम यह हुआ कि आज देश की राजनीति साम्प्रदायिक विचारधारा के इर्द-गिर्द संगठित हो गई है। साम्प्रदायिक हिंसा का तांडव देश को बेचैन बनाए हुए है। विभूति नारायण राय का चर्चित उपन्यास ‘शहर में कर्फ़्यू’ इसी विकराल समस्या से टकराता है। ‘शहर में कर्फ़्यू’ साम्प्रदायिक दंगे की चपेट में आए एक शहर के कर्फ़्यूग्रस्त मुहल्ले और ख़ासकर उससे पीड़ित एक परिवार की तीन दिनों की व्यथा-कथा है। यह कर्फ़्यू कुछ लोगों के लिए जीवन-मरण का सवाल है तो कुछ अन्य के लिए राजनीतिक नफ़ा-नुक़सान का खेल। दो जून की रोटी के लिए रोज़ चौदह घंटे खटनेवाले बीड़ी मज़दूर परिवार की बहू सईदा की बीमार बेटी की मौत इलाज के अभाव में हो जाती है। हर तरह से लाचार इस परिवार पर क्या क़हर टूटता है और उसे कैसे-कैसे दहशत भरे अनुभवों से गुजरना पड़ता है, लेखक ने इस सब का चित्रण अत्यन्त गहरी संवेदनशीलता के साथ किया है। अभावग्रस्त माँ सईदा अपनी मृत बेटी को याद करने की कोशिश करती है तो उसे ‘जो चीज़ याद आ रही थी वह भूख, धूल और बहती नाक का ऐसा मिला-जुला समिश्रण था जिससे फ़िल्मी माँ के वात्सल्य का कोई माहौल नहीं बन पा रहा था।’ कंट्रास्ट के द्वारा लेखक ने सईदा की नारकीय व्यथा को मर्मभेदी बना दिया है। उपन्यास में कई मार्मिक स्थल हैं। इनसानों के गली-मुहल्ले में दिन-दहाड़े एक बच्ची का बलात्कार ऐसा ही स्तब्ध करने वाला प्रसंग है। ऐसा पाशविक कृत्य किसी भी समाज का सबसे बड़ा कलंक है। ऐसे प्रसंगों की रचना में लेखक ने विलक्षण संवेदनशीलता के साथ वैचारिक सन्तुलन साधने में असाधारण दक्षता का परिचय दिया है। ‘शहर में कर्फ़्यू’ के माध्यम से लेखक ने समाज और राजनीति में लगातार सक्रिय साम्प्रदायिक विचारधारा के ख़तरों के प्रति जागरूक और सावधान किया है और उसे सिरे से ख़ारिज कर अपनी पक्षधरता की मुखर घोषणा भी की है। आकस्मिक नहीं कि कई दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा इस उपन्यास की प्रतियाँ जलाई गई थीं। इससे प्रमाणित है कि उपन्यास ने सिर्फ़ वैचारिक उत्तेजना ही नहीं पैदा की है बल्कि सही जगह पर चोट भी की है। —कृष्ण कुमार सिंह

Read more

₹ 225

₹ 180 20% off

Available

Rachnaye membership

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format

Frequently bought together
Shahar Mein Curfew This book ₹180
Hashimpura 22 May Vibhuti Narayan Rai ₹199
Sampradayik Dange Aur Bhartiya Police Vibhuti Narayan Rai ₹199
3 books selected ₹623 ₹578

100% Original

Fast Dispatch

Secure Payment

About the Book

पिछले तीन-चार दशकों में साम्प्रदायिकता का ज़हर तेजी से फैला है। परिणाम यह हुआ कि आज देश की राजनीति साम्प्रदायिक विचारधारा के इर्द-गिर्द संगठित हो गई है। साम्प्रदायिक हिंसा का तांडव देश को बेचैन बनाए हुए है। विभूति नारायण राय का चर्चित उपन्यास ‘शहर में कर्फ़्यू’ इसी विकराल समस्या से टकराता है।

‘शहर में कर्फ़्यू’ साम्प्रदायिक दंगे की चपेट में आए एक शहर के कर्फ़्यूग्रस्त मुहल्ले और ख़ासकर उससे पीड़ित एक परिवार की तीन दिनों की व्यथा-कथा है। यह कर्फ़्यू कुछ लोगों के लिए जीवन-मरण का सवाल है तो कुछ अन्य के लिए राजनीतिक नफ़ा-नुक़सान का खेल। दो जून की रोटी के लिए रोज़ चौदह घंटे खटनेवाले बीड़ी मज़दूर परिवार की बहू सईदा की बीमार बेटी की मौत इलाज के अभाव में हो जाती है। हर तरह से लाचार इस परिवार पर क्या क़हर टूटता है और उसे कैसे-कैसे दहशत भरे अनुभवों से गुजरना पड़ता है, लेखक ने इस सब का चित्रण अत्यन्त गहरी संवेदनशीलता के साथ किया है। अभावग्रस्त माँ सईदा अपनी मृत बेटी को याद करने की कोशिश करती है तो उसे ‘जो चीज़ याद आ रही थी वह भूख, धूल और बहती नाक का ऐसा मिला-जुला समिश्रण था जिससे फ़िल्मी माँ के वात्सल्य का कोई माहौल नहीं बन पा रहा था।’ कंट्रास्ट के द्वारा लेखक ने सईदा की नारकीय व्यथा को मर्मभेदी बना दिया है। उपन्यास में कई मार्मिक स्थल हैं। इनसानों के गली-मुहल्ले में दिन-दहाड़े एक बच्ची का बलात्कार ऐसा ही स्तब्ध करने वाला प्रसंग है। ऐसा पाशविक कृत्य किसी भी समाज का सबसे बड़ा कलंक है। ऐसे प्रसंगों की रचना में लेखक ने विलक्षण संवेदनशीलता के साथ वैचारिक सन्तुलन साधने में असाधारण दक्षता का परिचय दिया है।

‘शहर में कर्फ़्यू’ के माध्यम से लेखक ने समाज और राजनीति में लगातार सक्रिय साम्प्रदायिक विचारधारा के ख़तरों के प्रति जागरूक और सावधान किया है और उसे सिरे से ख़ारिज कर अपनी पक्षधरता की मुखर घोषणा भी की है। आकस्मिक नहीं कि कई दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा इस उपन्यास की प्रतियाँ जलाई गई थीं। इससे प्रमाणित है कि उपन्यास ने सिर्फ़ वैचारिक उत्तेजना ही नहीं पैदा की है बल्कि सही जगह पर चोट भी की है।

—कृष्ण कुमार सिंह

Book details

Fast dispatchShips within 48 hours
Secure paymentOnline, or cash on delivery on eligible orders
100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2024
Weight
150 grams
ISBN-13
9788197989629
Pages
120
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
15 × 22 cm
Language
Hindi

Recommended for you

Customer reviews

Be the first to write a review

Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

Offers

Loading offers…

whatsapp