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Koi Ek Syeda

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‘कोई एक सईदा’ किताब में नेहा दीक्षित ने एक साधारण और बेनाम भारतीय मह‌िला की कहानी असाधारण ढंग से लिखी है। बाबरी मस्ज‌िद ध्वंस के चलते हुए दंगों के बाद सईदा अपने छोटे बच्चों और पति के साथ बनारस को छोड़कर दिल्ली आ जाती है। एक ग़रीब विस्थापित मज़दूर के रूप में वह दिल्ली में अनेक कामों को आज़माती है—जींस के धागों की तुरपाई से लेकर नमकीन बनाने तक, बादामों से गिरी निकालने से लेकर चाय की छलनी बनाने तक—पचास से ज़्यादा काम, ताकि उसकी घरेलू ज़रूरतें पूरी होती रहें। ऐसे काम जिनमें एक दिन की छुट्टी लेने का मतलब है काम से हाथ धो बैठना। एक दशक के शोध और लगभग नौ सौ लोगों से साक्षात्कारों के बाद तैयार हुई इस किताब में हमें अनेक तरह के लोग मिलते हैं—चाँदनी चौक का एक रिक्शेवाला जिसकी ज़िन्दगी एक आतंकी हमले की भेंट चढ़ जाती है, एक डॉक्टर जिसे ‌लिंग निर्धारण टेस्ट के लिए गिरफ़्तार किया जाता है, एक गोरक्षक जिसकी बहन सईदा के बेटे के साथ भाग जाती है और पुलिसवाले जिन्हें मुस्ल‌िम‌‌ युवकों को पीटने में बहुत ज़्यादा मज़ा आता है। दिल्ली में हुए 2020 के दंगों के साथ सईदा की ज़िन्दगी का जैसे एक चक्र पूरा हो जाता है। उसे फिर उखड़ना पड़ता है। लेकिन वह अब इसकी अभ्यस्त हो गई है। उसे पता है कि एक ग़रीब, एक मुस्ल‌िम और एक औरत होने के नाते उसे क्या झेलना है। गहन अन्तर्दृष्ट‌ि से युक्त यह किताब उस कठोर, कड़वे यथार्थ की अक्कासी करती है जो भारत के अभ‌िजात तबक़े की आँखों से बहुत दूर रहता है। यह उन लाखों लोगों की कहानी है जिनकी कहानी कभी नहीं कही जाती। यह ‘नये भारत’ के शहरी जीवन का ऐसा चित्र है जो किसी भी संवेदनशील मन को चीरकर रख देता है।

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‘कोई एक सईदा’ किताब में नेहा दीक्षित ने एक साधारण और बेनाम भारतीय मह‌िला की कहानी असाधारण ढंग से लिखी है। बाबरी मस्ज‌िद ध्वंस के चलते हुए दंगों के बाद सईदा अपने छोटे बच्चों और पति के साथ बनारस को छोड़कर दिल्ली आ जाती है। एक ग़रीब विस्थापित मज़दूर के रूप में वह दिल्ली में अनेक कामों को आज़माती है—जींस के धागों की तुरपाई से लेकर नमकीन बनाने तक, बादामों से गिरी निकालने से लेकर चाय की छलनी बनाने तक—पचास से ज़्यादा काम, ताकि उसकी घरेलू ज़रूरतें पूरी होती रहें। ऐसे काम जिनमें एक दिन की छुट्टी लेने का मतलब है काम से हाथ धो बैठना।

एक दशक के शोध और लगभग नौ सौ लोगों से साक्षात्कारों के बाद तैयार हुई इस किताब में हमें अनेक तरह के लोग मिलते हैं—चाँदनी चौक का एक रिक्शेवाला जिसकी ज़िन्दगी एक आतंकी हमले की भेंट चढ़ जाती है, एक डॉक्टर जिसे ‌लिंग निर्धारण टेस्ट के लिए गिरफ़्तार किया जाता है, एक गोरक्षक जिसकी बहन सईदा के बेटे के साथ भाग जाती है और पुलिसवाले जिन्हें मुस्ल‌िम‌‌ युवकों को पीटने में बहुत ज़्यादा मज़ा आता है।

दिल्ली में हुए 2020 के दंगों के साथ सईदा की ज़िन्दगी का जैसे एक चक्र पूरा हो जाता है। उसे फिर उखड़ना पड़ता है। लेकिन वह अब इसकी अभ्यस्त हो गई है। उसे पता है कि एक ग़रीब, एक मुस्ल‌िम और एक औरत होने के नाते उसे क्या झेलना है। गहन अन्तर्दृष्ट‌ि से युक्त यह किताब उस कठोर, कड़वे यथार्थ की अक्कासी करती है जो भारत के अभ‌िजात तबक़े की आँखों से बहुत दूर रहता है। यह उन लाखों लोगों की कहानी है जिनकी कहानी कभी नहीं कही जाती। यह ‘नये भारत’ के शहरी जीवन का ऐसा चित्र है जो किसी भी संवेदनशील मन को चीरकर रख देता है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2026
Weight
400 grams
ISBN-13
9789360860066
Pages
384
Reading time
~13 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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