Koi Ek Syeda
(1)
Author:
Prabhat Singh, Neha DixitPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
499
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‘कोई एक सईदा’ किताब में नेहा दीक्षित ने एक साधारण और बेनाम भारतीय महिला की कहानी असाधारण ढंग से लिखी है। बाबरी मस्जिद ध्वंस के चलते हुए दंगों के बाद सईदा अपने छोटे बच्चों और पति के साथ बनारस को छोड़कर दिल्ली आ जाती है। एक ग़रीब विस्थापित मज़दूर के रूप में वह दिल्ली में अनेक कामों को आज़माती है—जींस के धागों की तुरपाई से लेकर नमकीन बनाने तक, बादामों से गिरी निकालने से लेकर चाय की छलनी बनाने तक—पचास से ज़्यादा काम, ताकि उसकी घरेलू ज़रूरतें पूरी होती रहें। ऐसे काम जिनमें एक दिन की छुट्टी लेने का मतलब है काम से हाथ धो बैठना। एक दशक के शोध और लगभग नौ सौ लोगों से साक्षात्कारों के बाद तैयार हुई इस किताब में हमें अनेक तरह के लोग मिलते हैं—चाँदनी चौक का एक रिक्शेवाला जिसकी ज़िन्दगी एक आतंकी हमले की भेंट चढ़ जाती है, एक डॉक्टर जिसे लिंग निर्धारण टेस्ट के लिए गिरफ़्तार किया जाता है, एक गोरक्षक जिसकी बहन सईदा के बेटे के साथ भाग जाती है और पुलिसवाले जिन्हें मुस्लिम युवकों को पीटने में बहुत ज़्यादा मज़ा आता है। दिल्ली में हुए 2020 के दंगों के साथ सईदा की ज़िन्दगी का जैसे एक चक्र पूरा हो जाता है। उसे फिर उखड़ना पड़ता है। लेकिन वह अब इसकी अभ्यस्त हो गई है। उसे पता है कि एक ग़रीब, एक मुस्लिम और एक औरत होने के नाते उसे क्या झेलना है। गहन अन्तर्दृष्टि से युक्त यह किताब उस कठोर, कड़वे यथार्थ की अक्कासी करती है जो भारत के अभिजात तबक़े की आँखों से बहुत दूर रहता है। यह उन लाखों लोगों की कहानी है जिनकी कहानी कभी नहीं कही जाती। यह ‘नये भारत’ के शहरी जीवन का ऐसा चित्र है जो किसी भी संवेदनशील मन को चीरकर रख देता है।
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‘कोई एक सईदा’ किताब में नेहा दीक्षित ने एक साधारण और बेनाम भारतीय महिला की कहानी असाधारण ढंग से लिखी है। बाबरी मस्जिद ध्वंस के चलते हुए दंगों के बाद सईदा अपने छोटे बच्चों और पति के साथ बनारस को छोड़कर दिल्ली आ जाती है। एक ग़रीब विस्थापित मज़दूर के रूप में वह दिल्ली में अनेक कामों को आज़माती है—जींस के धागों की तुरपाई से लेकर नमकीन बनाने तक, बादामों से गिरी निकालने से लेकर चाय की छलनी बनाने तक—पचास से ज़्यादा काम, ताकि उसकी घरेलू ज़रूरतें पूरी होती रहें। ऐसे काम जिनमें एक दिन की छुट्टी लेने का मतलब है काम से हाथ धो बैठना।
एक दशक के शोध और लगभग नौ सौ लोगों से साक्षात्कारों के बाद तैयार हुई इस किताब में हमें अनेक तरह के लोग मिलते हैं—चाँदनी चौक का एक रिक्शेवाला जिसकी ज़िन्दगी एक आतंकी हमले की भेंट चढ़ जाती है, एक डॉक्टर जिसे लिंग निर्धारण टेस्ट के लिए गिरफ़्तार किया जाता है, एक गोरक्षक जिसकी बहन सईदा के बेटे के साथ भाग जाती है और पुलिसवाले जिन्हें मुस्लिम युवकों को पीटने में बहुत ज़्यादा मज़ा आता है।
दिल्ली में हुए 2020 के दंगों के साथ सईदा की ज़िन्दगी का जैसे एक चक्र पूरा हो जाता है। उसे फिर उखड़ना पड़ता है। लेकिन वह अब इसकी अभ्यस्त हो गई है। उसे पता है कि एक ग़रीब, एक मुस्लिम और एक औरत होने के नाते उसे क्या झेलना है।
गहन अन्तर्दृष्टि से युक्त यह किताब उस कठोर, कड़वे यथार्थ की अक्कासी करती है जो भारत के अभिजात तबक़े की आँखों से बहुत दूर रहता है। यह उन लाखों लोगों की कहानी है जिनकी कहानी कभी नहीं कही जाती। यह ‘नये भारत’ के शहरी जीवन का ऐसा चित्र है जो किसी भी संवेदनशील मन को चीरकर रख देता है।
Book Details
-
ISBN9789360860066
-
Pages384
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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“मैं अपनी तरफ़ से इस कहानी में कहानी भी नहीं जोड़ सकता था। इसीलिए इस कहानी में आपको हदें भी दिखाई देंगी और सरहदें भी। नफ़रतों की आग में मोहब्बत के छींटे दिखाई देंगे। सपने दिखाई देंगे तो उनका टूटना भी।...और इन सबके पीछे दिखाई देगी सियासत की काली स्याह दीवार। हिन्दुस्तान की आज़ादी को जिसने निगल लिया। जिसने राज को कभी भी सु-राज नहीं होने दिया। जिसे हम रोज़ झंडे और पहिए के पीछे ढूँढ़ते रहे कि आख़िर उसका निशान कहाँ है? गाँव मदरसा ख़ुर्द और लछमनपुर कलाँ महज़ दो गाँव-भर नहीं हैं और अली ज़ामिन खाँ और मुस्लिम मियाँ की अदावत बस दो ख़ालाज़ाद भाइयों की अदावत नहीं है। ये तो मुझे मुल्कों की अदावत की तरह दिखाई देती है, जिसमें कभी एक का पलड़ा झुकता दिखाई देता है तो कभी दूसरे का और जिसमें न कोई हारता है, न कोई जीतता है। बस, बाक़ी रह जाता है नफ़रत का एक सिलसिला... “मैं शुक्रगुज़ार हूँ उस नीम के पेड़ का जिसने मुल्क को टुकड़े होते हुए भी देखा और आज़ादी के सपनों को टूटे हुए भी देखा। उसका दर्द बस इतना है कि वह इन सबके बीच मोहब्बत और सुकून की तलाश करता फिर रहा है।”
Saanjh Hui Ghar Aaye
- Author Name:
Om Prakash Sharma
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अशोक के जीवन में अचानक आई दौलत उसे वह सब कुछ दे देती है, जिसकी कभी उसने कल्पना की थी—लेकिन सुख नहीं। अतीत की स्मृतियाँ, बेला का निश्छल स्नेह, हेमावती का चंचल प्रेम और संतोष की ममता उसके भीतर चल रहे द्वंद्व को और गहरा कर देते हैं। रिश्तों, प्रेम, त्याग और सामाजिक मर्यादाओं के बीच अशोक बार-बार ऐसे मोड़ पर खड़ा होता है जहाँ धन से अधिक मूल्यवान इंसानी भावनाएँ साबित होती हैं। जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का यह सामाजिक उपन्यास प्रेम, परिवार और जीवन के कटु-सुखद यथार्थ को बेहद संवेदनशील और रोचक ढंग से प्रस्तुत करता है।
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