Aabhas
About the book
आभास साहित्य अकादमी से गुजरती भाषा में पुरस्कृत अड़सार उपन्यास का हिन्दी अनुवाद है। इस कृति में कथाकार ने कुष्ठ रोगियों के पुनर्वास और इस बीमारी के साथ जुड़े सामाजिक कलंक की समस्या को उठाया है। यह प्रत्येक संवेंदनशील व्यक्ति को अंतर्मुख करनेवाली तथा जीवन्मूल्यों का अन्वेषण करने के लिए प्रेरित करने वाली कृति है। "अड़सार" का अर्थ है - 'ईश्वर की घंटी'। हर किसी के मन में ईश्वर की एक घंटी होती है। हर एक मन में सत-असत् प्रवृत्तियों का संघर्ष जारी रहता है। संवेदनशील व्यक्ति के मन में जब उस ईश्वर की घंटी की आवाज़ आती है और वह संघर्ष जब अस्तित्व को ही चुनौती देता है, तभी उस घंटी की गूंज सुनाई देती है और मनुष्य की 'मनुष्यता' ही अपनी चरमसीमा तक पहुँचती है। इस उपन्यास में मोह और विमोह के दो ध्रुवों को इस कौशल के साथ स्पर्श किया गया है कि कथाचरित्र का दारुण कष्ट और निर्मोही समाज का वास्तविक चेहरा बयाँ हो जाता है।
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About the Book
आभास साहित्य अकादमी से गुजरती भाषा में पुरस्कृत अड़सार उपन्यास का हिन्दी अनुवाद है। इस कृति में कथाकार ने कुष्ठ रोगियों के पुनर्वास और इस बीमारी के साथ जुड़े सामाजिक कलंक की समस्या को उठाया है। यह प्रत्येक संवेंदनशील व्यक्ति को अंतर्मुख करनेवाली तथा जीवन्मूल्यों का अन्वेषण करने के लिए प्रेरित करने वाली कृति है।
"अड़सार" का अर्थ है - 'ईश्वर की घंटी'। हर किसी के मन में ईश्वर की एक घंटी होती है। हर एक मन में सत-असत् प्रवृत्तियों का संघर्ष जारी रहता है। संवेदनशील व्यक्ति के मन में जब उस ईश्वर की घंटी की आवाज़ आती है और वह संघर्ष जब अस्तित्व को ही चुनौती देता है, तभी उस घंटी की गूंज सुनाई देती है और मनुष्य की 'मनुष्यता' ही अपनी चरमसीमा तक पहुँचती है।
इस उपन्यास में मोह और विमोह के दो ध्रुवों को इस कौशल के साथ स्पर्श किया गया है कि कथाचरित्र का दारुण कष्ट और निर्मोही समाज का वास्तविक चेहरा बयाँ हो जाता है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Sahitya Akademi
- Weight
- 200 grams
- ISBN-13
- 9789389195002
- Pages
- 280
- Reading time
- ~9 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 13 × 20 cm
- Language
- Hindi
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Aabhas is the Hindi translation of the Sahitya Akademi Award-winning Gujarati novel Aḍasār ("God's Bell"), a work that confronts India's enduring stigma around leprosy with unflinching moral clarity. The novel centres on the rehabilitation of leprosy patients and the社会al ostracism that shadows their lives long after the disease is cured. Published by Sahitya Akademi, this is not fiction that sensationalises suffering—it asks what conscience sounds like when society demands silence. The title itself—Aḍasār, the bell of God that rings inside every human heart—frames the narrative as a meditation on the struggle between compassion and cruelty within us all. The author does not offer easy resolutions; instead, the novel insists that every sensitive reader examine their own complicity in systems of exclusion. It is a rare contemporary Hindi work that treats a marginalised medical reality as a site of profound ethical inquiry, making it essential reading for anyone interested in social realism and moral fiction in Indian languages.
यह उपन्यास पढ़ते समय मुझे किस तरह का अनुभव होगा?
यह उपन्यास आपको भीतर की ओर मोड़ता है, न कि केवल कहानी में खींचता है। आभास एक शांत, गंभीर पाठ-अनुभव देता है जो आपको असहज कर सकता है—क्योंकि यह समाज के उस क्रूर पक्ष को दिखाता है जिसे हम अनदेखा करते हैं। यह तेज़-रफ़्तार उपन्यास नहीं है, बल्कि विचार और संवेदना की माँग करता है। पढ़ने के बाद आप खुद से सवाल पूछेंगे—मेरी अपनी पूर्वाग्रह क्या हैं? मैं किसी को अदृश्य कब बना देता हूँ? यह किताब मन में एक घंटी बजाती है, जो लंबे समय तक गूँजती रहती है।
यह किताब किस तरह के पाठक के लिए सबसे उपयुक्त है और इसे पढ़ने के लिए क्या तैयारी चाहिए?
यह उपन्यास उन पाठकों के लिए है जो साहित्य को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि नैतिक चुनौती मानते हैं। यदि आप सामाजिक यथार्थवाद, हाशिये के समुदायों की कथाएँ, या मानवीय गरिमा पर केंद्रित कथा-साहित्य में रुचि रखते हैं, तो यह आपके लिए है। इसे पढ़ने के लिए किसी चिकित्सा ज्ञान की आवश्यकता नहीं, लेकिन खुले मन और धैर्य की ज़रूरत है। यह किताब उन्हें भी आकर्षित करेगी जो भारतीय भाषाओं में अनुवादित साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कृतियों को खोजते हैं।
कुष्ठ रोग और सामाजिक कलंक का यह विषय आज के भारतीय पाठकों के लिए क्यों प्रासंगिक है?
भारत में कुष्ठ रोग चिकित्सकीय रूप से लगभग समाप्त हो चुका है, लेकिन सामाजिक कलंक आज भी जीवित है। पूर्व रोगी और उनके परिवार अभी भी भेदभाव, अलगाव और अधिकारों से वंचना का सामना करते हैं। आभास यह दिखाता है कि बीमारी से ज़्यादा घातक समाज की नफ़रत है। यह किताब आज के भारत में पुनर्वास, समावेश और मानवाधिकार की बहसों से सीधे जुड़ती है। यह हमें याद दिलाती है कि किसी को "अछूत" मानना केवल इतिहास नहीं—यह वर्तमान की नैतिक विफलता है।
इस लेखक का दृष्टिकोण इस विषय को कैसे अलग बनाता है?
लेखक ने कुष्ठ रोगियों को दया का पात्र नहीं, बल्कि नैतिक दर्पण बनाया है। वे पाठक से यह नहीं कहते कि "इन पर दया करो"—वे कहते हैं, "अपने भीतर देखो, तुम्हारे मन में ईश्वर की घंटी क्या कहती है?" यह कोण—आंतरिक संघर्ष और विवेक का—इस उपन्यास को केवल सामाजिक-समस्या कथा से ऊपर उठाता है। अड़सार (ईश्वर की घंटी) शीर्षक ही बताता है: यह किताब हर संवेदनशील व्यक्ति के भीतर की आवाज़ को जगाने के लिए लिखी गई है।
यह किताब पढ़ने के बाद पाठक के मन में क्या रह जाता है—भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से?
- भावनात्मक रूप से: एक बेचैनी, एक जागरूकता कि हम सभी किसी न किसी को अदृश्य बनाते हैं।
- बौद्धिक रूप से: पुनर्वास केवल चिकित्सा नहीं—यह समाज की नैतिक परीक्षा है, यह समझ बनती है।
- सांस्कृतिक रूप से: यह याद दिलाती है कि भारतीय साहित्य में हाशिये की आवाज़ें साहित्य अकादमी जैसी संस्थाओं द्वारा मान्यता पाती रही हैं, और हिंदी अनुवाद उन्हें व्यापक पाठकों तक लाते हैं।
