Rahul Vangmaya Meri Jeevan Yatra Part-1 (4 Vols)
About the book
हिन्दी में आत्मकथा-साहित्य के क्षेत्र में राहुल जी की 'मेरी जीवन-यात्रा’ एक अविस्मरणीय कृति है। राहुल जी ने अपनी जीवन-यात्रा में, जन्म से लेकर तिरसठवाँ वर्ष पूरा करने तक का वर्णन किया है। उन्होंने आत्मचरित के लिए 'जीवन-यात्रा’ शब्द का प्रयोग किया है। इस विषय में उनका कथन है, ''मैंने अपनी जीवनी न लिखकर 'जीवन-यात्रा’ लिखी है, यह क्यों? अपनी लेखनी द्वारा मैंने उस जगत की भिन्न-भिन्न गतियों और विचित्रताओं को अंकित करने की कोशिश की है, जिसका अनुमान हमारी तीसरी पीढ़ी मुश्किल से करेगी।’’ 'मेरी जीवन-यात्रा’ के प्रथम भाग के कालखंड के विस्तृत वर्ण्य-विषय को लेखक ने चार उपखंडों में विभाजित किया है, और पुस्तक के अन्त में महत्त्वपूर्ण परिशिष्ट भी दिया है। जीवनी के विभाजित खंडों के अनुसार—प्रथम उपखंड : बाल्य (1893-1909), द्वितीय उपखंड: तारुण्य (1910-1914), तृतीय उपखंड : नव प्रकाश (1915-1921), चतुर्थ उपखंड : राजनीति-प्रवेश (1921-1927) है। परिशिष्ट में 1922 की डायरी से कुछ पद्य-गद्य की पंक्तियाँ तथा सांकृत्यायन-वंशवृक्ष का वर्णन है, जिसमें (क) वैदिक काल, (ख) बौद्ध काल, (ग) मध्य काल और (घ) आधुनिक काल के अनुसार ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया गया है। 'जीवन-यात्रा’ के इस प्रथम भाग के अनुसार राहुल जी मुख्यत: भारत में ही रहे। बस, विदेश के नाम पर उन्होंने नेपाल की यात्रा की और वहाँ के कई प्रभावशाली लोगों से मिले। कलकत्ता की दूसरी उड़ान में उन्होंने प्रसाद जी के प्रसिद्ध ख़ानदान ‘सुँघनी साहु’ की दुकान में काम किया था। काम क्या था, किस तरह उसे करते थे, इसका विशद वर्णन उन्होंने किया है। इसके माध्यम से हमें जयशंकर प्रसाद के ख़ानदान का इतिहास भी प्राप्त हो जाता है। इसी भाग में राहुल जी पर वैराग्य का भूत सवार हो जाता है। आर्यसमाज ने राहुल जी के जीवन की दिशा ही बदल दी थी।
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About the Book
हिन्दी में आत्मकथा-साहित्य के क्षेत्र में राहुल जी की 'मेरी जीवन-यात्रा’ एक अविस्मरणीय कृति है।
राहुल जी ने अपनी जीवन-यात्रा में, जन्म से लेकर तिरसठवाँ वर्ष पूरा करने तक का वर्णन किया है। उन्होंने आत्मचरित के लिए 'जीवन-यात्रा’ शब्द का प्रयोग किया है। इस विषय में उनका कथन है, ''मैंने अपनी जीवनी न लिखकर 'जीवन-यात्रा’ लिखी है, यह क्यों? अपनी लेखनी द्वारा मैंने उस जगत की भिन्न-भिन्न गतियों और विचित्रताओं को अंकित करने की कोशिश की है, जिसका अनुमान हमारी तीसरी पीढ़ी मुश्किल से करेगी।’’
'मेरी जीवन-यात्रा’ के प्रथम भाग के कालखंड के विस्तृत वर्ण्य-विषय को लेखक ने चार उपखंडों में विभाजित किया है, और पुस्तक के अन्त में महत्त्वपूर्ण परिशिष्ट भी दिया है। जीवनी के विभाजित खंडों के अनुसार—प्रथम उपखंड : बाल्य (1893-1909), द्वितीय उपखंड: तारुण्य (1910-1914), तृतीय उपखंड : नव प्रकाश (1915-1921), चतुर्थ उपखंड : राजनीति-प्रवेश (1921-1927) है। परिशिष्ट में 1922 की डायरी से कुछ पद्य-गद्य की पंक्तियाँ तथा सांकृत्यायन-वंशवृक्ष का वर्णन है, जिसमें (क) वैदिक काल, (ख) बौद्ध काल, (ग) मध्य काल और (घ) आधुनिक काल के अनुसार ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया गया है।
'जीवन-यात्रा’ के इस प्रथम भाग के अनुसार राहुल जी मुख्यत: भारत में ही रहे। बस, विदेश के नाम पर उन्होंने नेपाल की यात्रा की और वहाँ के कई प्रभावशाली लोगों से मिले।
कलकत्ता की दूसरी उड़ान में उन्होंने प्रसाद जी के प्रसिद्ध ख़ानदान ‘सुँघनी साहु’ की दुकान में काम किया था। काम क्या था, किस तरह उसे करते थे, इसका विशद वर्णन उन्होंने किया है। इसके माध्यम से हमें जयशंकर प्रसाद के ख़ानदान का इतिहास भी प्राप्त हो जाता है। इसी भाग में राहुल जी पर वैराग्य का भूत सवार हो जाता है। आर्यसमाज ने राहुल जी के जीवन की दिशा ही बदल दी थी।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 6th
- Publication year
- 1996
- Weight
- 2980 grams
- ISBN-13
- 9788183613736
- Pages
- 2050
- Reading time
- ~68 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 18 × 24 cm
- Language
- Hindi
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