Premchand : Kalam Ka Sipahi
Author:
Amrit RaiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies0 Ratings
Price: ₹ 479.2
₹
599
Available
हिन्दी समाज द्वारा व्यापक रूप में स्वीकृत इस पुस्तक को मुंशी प्रेमचन्द की पहली और अपने आप में सम्पूर्ण जीवनी का दर्जा प्राप्त है। जीवनीकार प्रेमचन्द के पुत्र और ख्यात लेखक-कथाकार अमृतराय हैं। लेकिन उन्होंने यह जीवनी पुत्र होने के नाते नहीं, एक लेखक की निष्पक्षता के साथ लिखी है। हाँ, उनके नजदीक होने के चलते यह सुविधा उन्हें जरूर रही कि वे प्रेमचन्द के कुछ उन पक्षों को भी देख सके, जिससे यह जीवनी और समृद्ध हुई। लेखक से इतर एक पिता, पति, भाई और मित्र प्रेमचन्द के कई रूप हम इसी के चलते देख पाते हैं। लेकिन अमृतराय यहीं तक सीमित नहीं रहे। जीवनी को सम्पूर्ण रूप देने के लिए वे हर उस जगह गए जहाँ प्रेमचन्द कभी रहे थे, हर उस व्यक्ति से मिले जो या तो उनके सम्पर्क में रहा था, या उनसे पत्र-व्यवहार करता था। उन्होंने प्रेमचन्द की कलम से लिखी गई हिन्दी और उर्दू की पूरी सामग्री को भी पढ़ा और उनके जीवनकाल की राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि का भी विस्तार से अध्ययन किया।</p>
<p>प्रेमचन्द की इस जीवनी में हम उनकी कहानियों और उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया के अलावा वे कब, किन परिस्थियों में लिखी गईं, यह भी जान पाते हैं, और प्रेमचन्द के व्यक्तित्व तथा जीवन के उन पहलुओं को भी जो कथाकार के रूप में उनकी अथाह ख्याति के पीछे छिपे हुए हैं।
ISBN: 9789389742831
Pages: 591
Avg Reading Time: 20 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: ‘मंज़िल अब भी दूर’ मुम्बई के कर्मठ साम्यवादी नेता और ट्रेड यूनियन आन्दोलन के अगुआ व्यक्तित्व—गंगाधर चिटणीस द्वारा लिखित मराठी पुस्तक ‘मंज़िल अजून दूरच!’ का स्वतंत्र हिन्दी अनुवाद है। स्व. कॉ. चिटणीस ने अपने 50-60 वर्षों के अनुभवों के आधार पर स्थिति का आकलन कर भारत के ट्रेड यूनियन आन्दोलन में एटक, मुम्बई गिरणी कामगार यूनियन और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के योगदान, कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा समय-समय पर की गई ग़लतियों, राजनीति का आकलन करने में हुई भूलों, कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन और इन सबके कारण भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, एटक, वामपंथी आन्दोलन, ट्रेड यूनियन आन्दोलन और भारतीय राजनीति पर हुए विपरीत प्रभावों; पार्टी द्वारा आपातकाल को दिए गए समर्थन, उसके पार्टी पर हुए विपरीत प्रभावों, मुम्बई की मिलों में हुई डॉ. दत्ता सामन्त की ऐतिहासिक असफल हड़ताल आदि तमाम घटनाओं का निष्पक्ष विवेचन, समालोचन व आकलन किया है। आत्मकथा के रूप में लिखी इस पुस्तक में लेखक ने अपने स्वयं के पिछले साठ वर्षों के अनुभवों के आधार पर समय-समय पर होनेवाली घटनाओं जिसमें भारत में ट्रेड यूनियन आन्दोलन, कम्युनिस्ट आन्दोलन, राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय घटनाएँ, विशेषकर मुम्बई के साथ-साथ भारत के एक समय के वैभवशाली टेक्सटाइल उद्योग व उसके श्रम आन्दोलन, स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज तक की सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक स्थिति का एक ईमानदार लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है। कॉ. चिटणीस पक्के आशावादी थे। ‘मंज़िल’ दूर होते हुए भी उन्हें पक्का विश्वास था कि एक न एक दिन इस देश का संघर्षरत अवाम मंज़िल पर ज़रूर पहुँचेगा। समाज की भलाई के लिए उसे पहुँचना ही होगा। यह किताब इन सारी घटनाओं का प्रामाणिक दस्तावेज़ है जिसे प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह कम्युनिस्ट विचारधारा में विश्वास रखता हो या विरोधी हो, ज़रूर पढ़ना चाहिए।
Rachna Ka Antrang
- Author Name:
Devendra
- Book Type:

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Description:
अर्थशास्त्र जाननेवाले कहते हैं कि गाँव की तरक़्क़ी हो गई है। समाजशास्त्र के विद्वान कहते हैं कि रिश्तों में दरार आ गई है। गाँव के लोग कहते हैं कि अब वह बात नहीं रहीं। बहुत उदास-उदास लगता है। यहाँ रहने का मन नहीं होता। लब्बोलुबाब यह कि इतनी उदास, मनहूस और क़र्ज़ में डूबी तरक़्क़ी। बैंकों की मदद से हमारे गाँव में तीन लोगों ने ट्रैक्टर ख़रीदे और तीनों के आधे खेत बिक गए। ट्रैक्टर औने-पौने दाम में बेचने पड़े। पता नहीं क़र्ज़ चुकता हुआ कि नहीं? पंचायती राज में लोकतंत्र को गाँवों तक ले जाने का कार्यक्रम बना। फिर तो, अपहरण, हत्याएँ और मुकदमेबाज़ी। सारे के सारे गाँव थानों और कचहरियों में जाकर क़ानून की धाराएँ रटने लगे।...
—'अस्सी की एक शाम' से
Dalda Ki Aulad
- Author Name:
Vishnu Nagar
- Book Type:

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Description:
इधर कुछ वर्षों में लेखकों की अनेक आत्मकथाएँ आई हैं। कुछ बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। कुछ अभी सोशल मीडिया पर टहल रही हैं लेकिन यह विष्णु नागर की आत्मकथा नहीं है। आत्मकथा के तत्त्व यहाँ अवश्य हैं मगर इसका स्वरूप संस्मरणात्मक भी है और इसमें अपने आसपास के आज के जीवन का भरपूर पर्यवेक्षण भी है। इसमें जीवन के स्वरों के बहुत से आरोह-अवरोह, बहुत से राग-विराग, ध्वनियाँ मिलेंगी। ये आत्मपरक होते समाज के कल और आज की हालत के बारे में हैं। लेखक ने बचपन से अब तक समाज को जितने रूपों में, जिस तरह देखा है, वह इसके केन्द्र में है। संस्मरणों से लोग पुराने समय को पहचान पाएँगे और इस समय को भी संस्मरणों-बिंबों के माध्यम से। एक खास बात यह है कि लेखक अतीतजीवी नहीं है। अतीत को भी उसी निर्ममता से देखता है, जितना आज को।
प्राय: छोटे कलेवर वाले इन संस्मरणों को लेखक की डायरी की तरह भी देखा जा सकता है यद्यपि यहाँ लेखक ने अपनी अनियमित डायरी का उपयोग केवल एक जगह किया है।
विष्णु नागर ने कविताओं के अलावा गद्य भी काफी लिखा है। उनके व्यंग्यात्मक गद्य की अपनी एक पहचान है मगर इस किताब में उनके उस तरह के गद्य का जहाँ भी आस्वाद मिलता है वह एकदम अलग तरह से मिलता है। यह गद्य कुछ हद तक कविता के निकट है, तो कुछ कहानियों, निबन्धों-सा है। ‘डालडा की औलाद’ में उनके जीवन के विभिन्न अनुभवों-पर्यवेक्षणों ने जगह पाई है। इसमें उनका गृहनगर शाजापुर भी है, मुम्बई भी, दिल्ली भी, जर्मनी भी। बचपन भी और समय का यह दौर भी। पत्रकारिता के अनुभव भी, बेरोजगारी के अनुभव भी। आस-पड़ोस भी, दूर भी। आनन्द भी, वेदना भी। इसमें जो सरलता है वह लेखन के निरन्तर अभ्यास से आती है। इस पुस्तक को एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद आपके लिए इसे बीच में छोड़ना कठिन होगा।
The Diary of a Young Girl by Anne Frank
- Author Name:
Anne Frank
- Book Type:

- Description: Discovered in the attic in which she spent the last years of her life, Anne Frank's remarkable diary has since become a world classic—a powerful reminder of the horrors of war and an eloquent testament to the human spirit. The Diary is a lot of things all at once. It is an amusing, enlightening, and often moving account of the process of adolescence, as Anne describes her thoughts and feelings about herself and the people around her, the world at large, and life in general. It is an accurate record of the way a young girl grows up and matures, in the very special circumstances in which Anne found herself throughout the two years during which she was in hiding. And it is also a vividly terrifying description of what it was like to be a Jew — and in hiding— at a time when the Nazis sought to kill all the Jews of Europe.
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